उदारवादी दल की नीतियों का मूल्यांकन

📗बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में उग्रवादियों ने उदारवादी काल की उपलब्धियों की निंदा की थी
📗इस काल को राजनीतिक भिक्षावृत्ति का नामदिया गया था

⚜लाला लाजपत राय ने इसको अवसरवादी आंदोलनकहा➖कहा➖ “”अधिक से अधिक इससे पाखंड और देशद्रोह को बढ़ावा मिला है कुछ लोगों को देशभक्ति के नाम पर व्यापार करने””  का अवसर मिला है 


📗क्राउन के प्रति *राजभक्ति उदारवादी दल वालों के विरुद्ध सबसे बड़ा दोषारोपणथा
📗उदारवादी लोग विश्वास करते थे कि भारत में राष्ट्रीयता के कुछ आवश्यक तत्वविद्यमान नहीं है
📗इस कारण वे निकट भविष्य में अंग्रेजी राज्य का कोई विकल्प नहीं सोच सकते थे
📗वे विश्वास करते थे कि अंग्रेज के चले जाने से भारतीय राष्ट्रीय हितों को हानि होगी

⚜1887 में विपिन चंद्र पाल ने कहा था➖कि “”मैं अंग्रेजो का राज भक्त हूं क्योंकि मेरे लिए अंग्रेजी सम्राज्य के प्रति राजभक्ति वास्तव में अपने देश और उसके वासियों से प्रति राजभक्ति दोनों अभिन्न है मैं अंग्रेज के प्रति राजभक्त हूं क्योंकि मैं स्वशासन को प्यार”” करता हूं 


📗यदि हम दादा भाई नौरोजी,सर फिरोजशाह मेहता , दिनंशा वाचा गोपाल कृष्ण गोखले सुरेंद्रनाथ बनर्जीजैसे लोगों से न्याय करें तो हमें यह स्वीकारकरना पड़ेगा कि
📗यह लोग समकालीन भारतीय समाज के सबसे अधिक प्रगतिवादी तत्व थे और सच्चे देश भक्त थे
📗वे भारतीय समाज को सुधारने का लगातार प्रयत्न करते रहे
📗इन लोगों ने 1886 में एक लोक सेवा आयोग नियुक्त करवाया
📗1892 में भारतीय परिषद का अधिनियम पारित करवाया

📗इन दोनों से ही लोगों में निराशा हुई और मूलभूत सविधान में कोई परिवर्तननहीं हुआ
📗उन्होंने जानपद सेवा के लिए इंग्लैंड और भारत में एक ही समय में परीक्षा करने की मांग की
📗सरकार ने उनके अनुरोध पर भारतीय व्यय की समीक्षा के लिए वैलबाई आयोगभी नियुक्त किया
📗इन लोगों ने कठिन परिश्रम किया उनके कार्य करने के ढंगो प्रार्थना याचना और विरोध प्रकट करना सभी से राजनीतिक प्रौढ़ता आई और भारत में राष्ट्र भावना बड़ी थी
📗उदारवादी दल की सबसे महान सेवा उस समय हुई जब इन लोगों ने अंग्रेजी साम्राज्य के भारत पर आर्थिक प्रभाव का मूल्यांकन किया
📗उन्होंने भारतीय निर्धनता की ओर ध्यान आकर्षित किया और बताया कि यह निर्धनता अंग्रेजी औपनिवेशिक शोषण के कारण ही है
📗दादाभाई नौरोजी,दिनशा वाचा, दत्त द्वारा प्रतिपादित निकास का सिद्धांतअंग्रेजो की भारत में आर्थिक भूमिका पर दोषारोपण था
📗इस सिद्धांत की कालांतर में उग्रवादी दल वालों ने अंग्रेजो को बदनाम करने के लिए भरपूर प्रयोग किया

🌷भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रथम चरण के लिए चुने हुए विचार🌷 

♻✍🏻गोपाल कृष्ण गोखले✍🏻♻
⛳हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम देश की उन्नति के उच्चरणपर है
⛳जहां हमारी उपलब्धियां थोड़ी ही होंगी और हमारी निराशाएं अधिक और कठोरहोगी
⛳विधि का ऐसा ही विधान है कि हमें संघर्ष में यही भूमिकामिलती है और जब हमने अपना कार्य संपन्नकर दिया है तो हमारा उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है
⛳निस्संदेह हमारे देशवासियों की आने वाली पीढ़ीया अपनी सफलताओं से भारत की सेवा करेगी
⛳हम आज की पीढ़ी अपनी असफलताओं से ही देश की सेवा कर संतोष प्राप्त करें
⛳यद्यपि यह बहुत कठिन है ,इन असफलताओं से ही वह शक्ति आएगी जो अंत में बड़े कार्यकरने में सफल होगी
♻✍🏻पट्टाभि सीतारामैया✍🏻♻ 
⛳हम उनको उस रूख से अधिक के लिए दोषी नहीं ठहरा सकते जो उन्होंने भारतीय राजनीतिक सुधारों के मार्गदर्शक के रूप में अपनाया ⛳जितना कि हम उस ईंट और मिट्टी को दोष दे सकते हैं जो कि एक  आधुनिक भवन की नींव में छह फुट तक गडा है
⛳उन्होंने भवन के ऊपरी भाग का बनाना संभव बनाया, मंजिल दर मंजिल औपनिवेशिक स्वशासन, साम्राज्य के भीतर स्वायत्तता पूर्ण, शासन स्वराज्य और अंत में पूर्ण स्वराज्य की मांग द्वारा

♻✍🏻बिपन चंद्र✍🏻♻
⛳1885 से 1905 तक का काल भारतीय राष्ट्रवाद में बीज बोनेका समय था
⛳आरंभिक काल के राष्ट्रवादियों ने यह बीज गहरे और अच्छे ढंग से बोये थे
⛳अपने राष्ट्रवाद को अनुनय छिछली भावुकता और गुजरती भावना पर आधारित ना करके अथवा स्वतंत्रता के अर्मूत अधिकारों तथा प्राचीन परंपराओं के नाम की सुधार विरोधी दुहाई ना देकर,उन्होंने आधुनिक साम्राज्यवाद और अंग्रेजी सरकार और भारतीय लोगोंके हितों कें आपसी  विरोधाभास के गोरखधन्धेे के कठोर और मर्मभेदी विश्लेषण द्वारा दृढ रूपसे स्थापित कर दिया
⛳उसका फल यह हुआ कि उन्होंने एक साझा राजनीतिक और आर्थिक कार्यक्रमबना लिया है
⛳जिससे लोग बंटने के स्थान पर सयुक्तहो गए
⛳अपनी असफलताओं के होते हुए भी आरंभिक राष्ट्रवादियों ने राष्ट्रीय आंदोलन की नीव बहुत दृढ रखी
⛳ताकि उस पर यह आंदोलन अग्रसर हो सके और इसीलिए यह लोग आधुनिक भारत के निर्माताओं में उत्तम स्थानके अधिकारी है