क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद PART 01

क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद PART 01
भारतीय क्रांतिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद अत्यंत देदीप्यमान नक्षत्र हैं। 

वे न केवल क्रांतिकारी देशभक्त थे,अपितु गीता के निष्काम-कर्मयोग तथा

भारतीय संस्कृति में अटूट आस्था रखने वाले क्रान्ति पुरूष भी थे।

चन्द्रशेखर आजाद एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम जिसको सुनते ही ब्रिटिश 

अधिकारियों के रोंगेटे खड़े हो जाते। वे बिना किसी डर के अपने प्राण 

हथेली पर रखकर बेखौफ क्रान्तिकारी गतिविधियों को क्रियान्वित करते 

हुये घूमते थे। व्यक्तिगत रुप से वे कर्तव्यनिष्ठ, सीधे, सच्चे और ईमानदार 

व्यक्ति थे।


जन्म और बचपन :-
चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को एक आदिवासी ग्राम 

भाबरा(मध्यप्रदेश) में हुआ था। इनका पूरा नाम पण्डित चन्द्रशेखर तिवारी 

था। आजाद,पंडित जी,बलराज,Quick Silver इनके उपनाम थे।इनके 

पिता का नाम पण्डित सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी 

देवी था।पं. सीताराम की तीन शादियॉ हुई। इनका तीसरा विवाह जगरानी देवी से हुआ। आजाद इन्हीं की पाँचवी संतान थे।
इनके पिता का पैतृक गाँव कानपुर था किन्तु उनकी किशोरावस्था कानपुर के उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदर गाँव में व्यतीत हुई। उन्नाव जिले में भीषण अकाल पड़ने के कारण अपने किसी रिश्तेदार (हजारी लाल) की मदद से तिवारी जी पत्नी सहित अलीराजपुर आ गये और यहाँ से फिर भाबरा गाँव में। चंद्रशेखर आज़ाद का प्रारंभिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र भाबरा में व्यतीत हुआ।भील बालकों के बीच पले-बढ़े होने के कारण आजाद बचपन में ही निशाना लगाने में कुशल हो गये थे। बचपन से ही आजाद कुशल निशानची और निर्भीक स्वभाव के थे। आजाद के मन में देश प्रेम की भावना कूट कूट कर भरी थी।
आजाद का प्रराम्भिक जीवन चुनौती पूर्ण था। इनकी पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पारिवारिक रुप से सम्पन्न न होने के कारण इन्हें दो-दो दिन तक भूखा रहना पड़ता था। चन्द्र शेखर बचपन में बहुत दुर्बल लेकिन बहुत सुन्दर थे। वे अपने साथियों के साथ जंगलों में निकल जाते और डाकू और पुलिस का खेल खेला करते थे। आजाद अपनी माँ के बहुत लाड़ले थे। वही वे अपने पिता से बहुत डरते भी थे। एक बार आजाद ने बाग से कुछ फल चुराकर बेच दिये, जिस बाग की इनके पिता रखवाली करते थे। पं. सीताराम बहुत आदर्शवादी थे, जब उन्हें इस बात का पता चला तो उन्होंने आजाद को जितना पीट सकते थे उतना पीटा और जब चन्द्रशेखर की माँ ने इन्हें बचाने की कोशिश की तो उन्हें भी धक्का देकर एक तरफ हटा दिया और चन्द्रशेखर को पीटते-पीटते अधमरा कर दिया। यही कारण था कि आजाद अपने पिता से बहुत अधिक कतराते थे।

शिक्षा और देशभक्ति का उद्भव:-
चन्द्रशेखर की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही प्रारम्भ हुई। पढ़ाई में उनका कोई विशेष लगाव नहीं था। इनकी पढ़ाई का जिम्मा इनके पिता के करीबी मित्र पं. मनोहर लाल त्रिवेदी जी ने लिया। वह इन्हें और इनके भाई (सुखदेव) को अध्यापन का कार्य कराते थे और गलती करने पर बेंत का भी प्रयोग करते थे। चन्द्रशेखर के माता पिता उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहते थे किन्तु कक्षा चार तक आते आते इनका मन घर से भागकर जाने के लिये पक्का हो गया था। ये बस घर से भागने के अवसर तलाशते रहते थे। इसी बीच मनोहरलाल जी ने इनकी तहसील में साधारण सी नौकरी लगवा दी ताकि इनका मन इधर उधर की बातों में से हट जाये और इससे घर की कुछ आर्थिक मदद भी हो जाये। किन्तु शेखर का मन नौकरी में नहीं लगता था। वे बस इस नौकरी को छोड़ने की तरकीबे सोचते रहते थे। उनके अंदर देश प्रेम की चिंगारी सुलग रहीं थी। यहीं चिंगारी धीरे-धीरे आग का रुप ले रहीं थी और वे बस घर से भागने की फिराक में रहते थे। एक दिन उचित अवसर मिलने पर आजाद घर से बम्बई भाग गये।
बम्बई में इन्होंने कुछ दिन वही रहकर समुद्र तट पर जहाज रंगने का कार्य किया, और अपना जीवकोपार्जन किया। किन्तु शीघ्र ही ये वहाँ के जीवन से ऊब गये और बिना टिकट के बनारस की ट्रेन में बैठकर बनारस आ गये।
यहाँ एक धर्माथ संस्था में प्रवेश लेकर संस्कृत पढ़ना शुरु कर दिया। यहाँ शेखर ने लघुकौमुदगी और अमरकोष का गहन अध्ययन किया। पढ़ाई के साथ ही आजाद में देश प्रेम की भी भावना जागृत हो रही थी। काशी में जहाँ कहीं भी संतसंग होता शेखर वहाँ जाते और वीर रस की कहानियों को बड़े प्रेम के साथ सुनते थे। इस दौरान वे पुस्तकालय में जाकर अखबार पढ़ते और राष्ट्रीय हलचलों की सूचना रखने लगे।
इन्हीं दिनों असहयोग आन्दोलन अपने जोरों पर था, जगह – जगह धरने और प्रदर्शन हो रहे थे। चन्द्र शेखर के मन में जो देश प्रेम की चिंगारी बचपन से सुलग रहीं थी उसे हवा मिल गयी और उसने आग का रुप ले लिया। उन्होंने भी सन् 1921 में, 15-20 विद्यार्थियों को इकट्ठा करके उनके साथ एक जुलूस निकाला और बनारस की मुख्य गलियों में “वन्दे मातरम्” “भारत माता की जय”, “इंकलाब जिन्दाबाद”, “महात्मा गाँधी की जय” के नारों की जय जयकार करते हुये घूमें। इन सब की आयु 13 से 15 वर्ष के बीच थी। छोटे नन्हें मुन्नों का जुलूस बड़े उत्साह और उमंग के साथ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसका नेतृत्व स्वंय चन्द्रशेखर कर रहे थे।

आजाद का आजाद स्वरूप:-
जब पुलिस को इस बात की भनक लगी तो इस जुलूस को रोकने के लिये पुलिस की एक टुकड़ी आ गयी, जिसे देखकर कुछ बालक इधर उधर हो गये और नेता सहित एक दो साथी गिरफ्तार कर लिये गये। यही वह समय था जब चन्द्रशेखर पहली और आखिरी बार पुलिस की गिरफ्त में आये। बालक चन्द्रशेखर को कोर्ट में जज के सामने पेश किया गया, किन्तु अब भी उनमें भय का कोई नामों निशान नहीं था। उन्होंने पारसी मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट द्वारा पूछे गये सवालों के जबाव इस तरह से दियेः-

“तुम्हारा नाम क्या है?” – मजिस्ट्रेट ने पूछा।
बालक ने निर्भीकता के साथ रौबीली आवाज में कहा-“आजाद।”
जज ने बालक को ऊपर से नीचे तक घूरा और दूसरा सवाल किया, “तुम्हारे पिता का क्या नाम है”
बालक ने उसी मुद्रा में जबाव दिया-“स्वाधीनता”
उनके इस जबाव से जज झल्ला गया और क्रोध में भरकर तीसरा सवाल किया-“तुम्हारा घर कहाँ है”
बालक ने उसी साहस के साथ कहा-“जेलखाना”


चन्द्रशेखर के इन जबाबों से जज बुरी तरह आग बबूला गया और आजादी के दिवाने इस छोटे से बालक को 20 कोड़े लगाने की कड़ी सजा सुनाई।
कोड़े लगाने के लिये उन्हें जेल लाया गया और उन्हें बाँधा जाने लगा, तो इन्होंने बिना बाँधे कोड़े लगाने को कहा। जब इन पर लगातार बेरहमी से कोड़ो से प्रहार किया जा रहा था तो वे स्थिर खड़े होकर हरेक कोड़े के पड़ने के बाद भारत माँ की जय और इंकलाब जिन्दाबाद के नारे लगाते रहे। इन्हें जितने कोड़े मारे गये इन्होंने इतने ही जोर से और साहस के साथ नारे लगाये।
आखिरी कोड़े पर वह बेहोश हो गये और फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। उनका सारा शरीर कोड़ो की चोट से भरा था फिर भी बिना किसी दर्द की कराह के वह उठे और अपने घर की तरफ चल दिये। उनके इस साहस को देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने दाँतो तले अंगुली दबा ली।
इस घटना की खबर पूरे बनारस में आग की तरह फैल गयी, और इन्हें देखने के लिये लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। इसी घटना के बाद से ही इनका नाम ‘आजाद’ पड़ा, और इनके सम्मान की तैयारी की जाने लगी। डॉ. सम्पूर्णानन्द द्वारा सम्पादित पत्रिका “मर्यादा” में उनकी प्रशंसा में ‘वीर बालक आजाद’ के नाम से एक लेख भी प्रकाशित हुआ।
आजाद के सार्वजनिक अभिनन्दन की तैयारी की जाने लगी। अभिनन्दन सभा ठसाठस भरी थी।आजाद जब सभा में आये तो वह इतने छोटे थे कि लोग उन्हें देख भी नहीं पा रहे थे। इसलिये उन्हें एक मेज पर खड़ा कर दिया गया, लोगों ने फूल मालाओं से उनका स्वागत किया। उनका सारा शरीर फूलों से ढ़क गया। इस समारोह नें उन्होंने जोशीला भाषण दिया। अगले दिन पत्र – पत्रिकाओं में उनके अभूतपूर्व साहस के बहुत से लेख छपे। पूरे बनारस में उनके साहस की चर्चा होने लगी और वे बनारस के लोगों के बहुत प्रिय हो गये थे।

शायद यही वह घटना होगी जिसके बाद आजाद ने जीते जी पुलिस के हाथों कभी न पकड़े जाने की कसम खायी होगी।

आजाद ने आगे पढ़ने के लिये काशी विद्यापीठ में प्रवेश लिया। आजाद ने पढ़ने के लिये नाम तो लिखा लिया किन्तु इनका मन पढ़ाई में बिल्कुल भी न लगता था। अब तो उन्हें कैसे भी करके अंग्रेजों को अपने देश से बाहर भगाना था। वह अपने कोर्स की किताबें कम विप्लवी साहित्य अधिक पढ़ते थे। धीरे धीरे वह अपनी जैसी भावना रखने वालें अन्य विद्यार्थियों से सम्पर्क बनाने लगे।

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का गठन:-
इसी बीच गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन को चौरी-चौरा कांड के कारण वापस  ले लिया गया था। किन्तु क्रान्तिकारी अपनी गतिविधियों में लगे हुये थे। आजाद का गाँधीवादी नीति में कम विश्वास था और जो भी थोड़ा बहुत था, वह भी उनके द्वारा असहयोग आन्दोलन को वापस लेने के कारण नहीं रहा। वह पूर्ण रुप से सशक्त क्रान्ति के पक्षधर हो गये।

शचीन्द्रनाथ सान्याल ,सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य के साथ मिल कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन एक क्रांतिकारी संगठन बनाया संगठन में शामिल होने के साथ ही आजाद ने धीरे–धीरे घर-द्वार, माता-पिता, भूख-प्यास सब की चिन्ता छोड़ दी। वह बस पूरी तरह से संगठन को मजबूती देने के लिये सोचते रहते।


उग्रवादी नेता रामकृष्ण खत्री को HRA से जोड़ना:-
स्वामी गोविन्द प्रसाद(रामकृष्ण खत्री)काँग्रेस के उग्र राष्ट्रवादी दल के नेता थे। किन्तु वे अब संसार से पूर्ण रुप से विरक्त होकर स्वामी का जीवन व्यतीत कर रहे थे। आजाद और संगठन के अन्य सदस्य उन्हें अपने दल में शामिल करके उनके विचारों से दल को नयी दिशा देना चाहते थे। किन्तु संसार से विरक्त हो चुके स्वामी जी को दल में शामिल करना अपने आप में बड़ी चुनौती थी।

यह जिम्मा आजाद ने स्वंय लिया और अपने साथी उपेन्द्रनन्द ब्रह्मानन्द के साथ स्वामी जी के घर पहुँच गये। स्वामी जी उस समय बीमार थे। उनके मित्र ने चन्द्रशेखर का परिचय गाँधी जी के अनुयायी के रुप मेंकराया। उसी दिन से आजाद बीमार स्वामी जी की सेवा करने में लग गये। वे नियम से उनके पास तीन चार घण्टें बिताने लगे। आजाद की सेवा और देखरेख के परिणामस्वरुप स्वामी जी धीरे धीरे स्वस्थ्य होने लगे और दोनों की राजनीतिक मुद्दों पर बहस होने लगी।

चन्द्रशेखर अपनी इस बहस में गाँधी का पक्ष लेकर खत्री को उत्तेजित करते थे। खत्री गाँधी विरोधी थे वे गाँधी द्वारा असहयोग आन्दोलन के वापस लेने के खिलाफ थे, इसी बात पर वो आजाद से बहस करते किन्तु वे तो बस गाँधी के फैसले को सही बताकर उनका पक्ष लेते और स्वामी जी को और अधिक उकसाते। जब चन्द्रशेखर को इस बात का दृढ़ निश्चय हो गया कि खत्री आज भी उसी उग्र विचारधारा के समर्थक है और क्रान्तिकारी दल में शामिल होने के लिये उत्सुक है तो एक दिन जब वे उनसे मिलने के लिये आये तो उनके हाथ में पिस्टन थमा दी जिसे देखकर खत्री समझ गये कि वे किसी और से नहीं बल्कि इतने दिनों से आजाद से ही अपनी सेवा करा रहे थे। इसी तरह अपनी सूझ-बूझ से बहुत से नवयुवकों को अपने संगठन के साथ जोड़ा।

संगठन के लिए डकैती करना:-
आजाद ने अपने प्रयासों से इतना बड़ा संगठन तो खड़ा कर लिया किन्तु अब इनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी- संगठन के लिये धन एकत्र करने की। आर्थिक समस्या उत्पन्न होने का मुख्य कारण संगठन के सभी लोगों का व्यवसायी तथा नौकरीपेशा न होना था। दल की आर्थिक स्थिति के सम्बंध में सलाह करने के लिये एक बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लाहिड़ी, रोशन सिंह, मन्मनाथ गुप्ता, शचीन्द्र नाथ बख्शी, अशफाक उल्ला खाँ और रामकृष्ण खत्री ने भाग लिया। सबकी सहमति से गाँव के धनी जमीदारों के घर पर ड़ाका डालने का कार्य शुरु किया गया।

इस निर्णय के बाद ड़कैती डालने के बहुत से प्रयास किये गये, जिस में से ज्यादातर असफल रहे और कुछ एक सफल भी रहें। किन्तु इन ड़कैतियों से भी बहुत कम धन एकत्र होता जो संगठन के लिये प्रयाप्त नहीं था। इन प्रयासो के विफल होने पर गाँव में ड़ाका ड़ाल कर धन एकत्र करने की योजना को रद्द कर दिया गया क्योंकि इससे दल की प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव अधिक पड़ रहा था और लाभ बहुत कम हो रहा था। अतः अब यह निश्चय किया गया कि अब केवल रेलों और बैंको में ड़ाके डाले जाये और सरकारी संपत्ति लूटी जाये। क्रान्तिकारी दल के सभी सदस्य इस बात से सहमत हो गये कि सरकारी खजानो को ही लूटने में अधिक लाभ है। 1925 तक संगठन मजबूत भी हो गया था और इसके कार्यों में तेजी भी आ गयी थी। इसी बीच जुलाई के अन्त में सूचना मिली की जर्मनी से पिस्तौलों का जखीरा आ रहा है, जिसे कलकत्ता बन्दरगाह पर पहुँचने से पहले नगद रुपया देकर खरीदना है। इसके लिये धन की आवश्यकता थी जो केवल लूट के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता था। इसी कारण काकोरी कांड का सूत्रपात हुआ।

असफाकउल्ला खाँ ने इस योजना का विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि अभी संगठन इतना भी मजबूत नहीं हुआ है कि सीधे सरकार को चुनौती दे सके।

ऐसे कार्यों को करने के लिये आजाद सबसे आगे रहते थे। उनके जोश, स्फूर्ति और निर्भीकता को देखकर रामप्रसाद बिस्मिल उन्हें को “क्विक सिलवर” अर्थात् “पारे” का खिताब दिया था। चाहे कोई भी कार्य कितना भी मुश्किल क्यों न हो वे सबसे आगे रहते थे। वे मजाक में कहा करते थे कि “मुझे बचपन में शेर का मांस खिलाया गया है।” हांलाकि यह सच नहीं था किन्तु उनमें वास्तव में शेर की तरह ही निर्भीकता और साहस था।