चंद्रशेखर वेंकट रमन

चंद्रशेखर वेंकट रमन
चन्द्रशेखर वेंकटरमन भारतीय भौतिक-शास्त्री थे। प्रकाश के प्रकीर्णन 

पर उत्कृष्ट कार्य  के लिये वर्ष 1930 ईस्वी में उन्हें भौतिकी का प्रतिष्ठित 

नोबेल पुरस्कार दिया गया। उनका आविष्कार उनके ही नाम पर रामन

प्रभाव के नाम से जाना जाता है। 1954 ई. में उन्हें भारत सरकार द्वारा 

भारत रत्न की उपाधि से विभूषित किया गया तथा सोवियत रूस ने 

उन्हें सन 1958 में लेनिन शान्ति पुरस्कार प्रदान किया था।

चंद्रशेखर वेंकट रमन जी का जन्म▶▶
चंद्रशेखर वेंकटरमन जी का जन्म तिरुचिरापल्ली शहर में 

7 नवंबर, 1888 ईसवीं को हुआ था, जो कि कावेरी नदी के तट पर 

स्थित है। इनके पिता चंद्रशेखर अय्यर एक स्कूल में शिक्षक थे। वह भौतिकी और गणित के विद्वान और संगीत प्रेमी थे। चंद्रशेखर वेंकटरमन की माता जी का नाम पार्वती अम्माल था।

चंद्रशेखर वेंकट रमन जी की शिक्षा▶▶
चंद्रशेखर वेंकटरमन संगीत, संस्कृत और विज्ञान के वातावरण में बड़े हुए। वह हर कक्षा में प्रथम आते थे। रमन ने प्रेसीडेंसी कॉलेज में बीए में प्रवेश लिया। सन 1905 ईसवी में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले अकेले छात्र थे और उन्हें इस वर्ष का स्वर्ण पदक भी प्राप्त हुआ। उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज में ही एम ए में प्रवेश लिया और मुख्य विषय के रूप में भौतिकी को चुना।
विज्ञान के प्रति प्रेम, कार्य के प्रति उत्साह और नई चीजों को सीखने की ललक उनके स्वभाव मे थी। रमन के बड़े भाई ‘भारतीय लेखा एवं संपरीक्षा सेवा'(IAAS) में पदस्थ थे रमन भी इसी विभाग में काम करना चाहते थे, इसलिए वह प्रतियोगी परीक्षा में सम्मिलित हुए। इस परीक्षा के एक दिन पहले ऍम ए का परिणाम घोषित हुआ, जिसमें उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय के इतिहास में सर्वाधिक अंक अर्जित किए और उन्होंने IAAS की परीक्षा में भी प्रथम स्थान प्राप्त किया।

रमन जी का कैरियर▶▶
रमन जी कोलकाता में सहायक महालेखापाल के पद पर नियुक्त थे, परंतु रमन  का मन अशांत था क्योंकि वह विज्ञान में अनुसंधान कार्य करना चाहते थे। एक दिन दफ्तर से घर लौटते समय उन्हें ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ साइंस’ का बोर्ड दिखा और अगले ही पल में परिषद के अंदर जा पहुंचे। उस समय वहां परिषद की बैठक चल रही थी। बैठक में सर आशुतोष मुखर्जी जैसे विद्वान उपस्थित थे। उन्होंने उनसे बात की। इसके पश्चात रमन भारतीय विज्ञान परिषद की प्रयोगशाला में अनुसंधान कार्य करने लगे। दिनभर दफ्तर में और सुबह शाम प्रयोगशाला में काम करना रमन की दिनचर्या हो गई थी, परंतु कुछ दिनों के पश्चात रमन का तबादला बर्मा के रंगून शहर में हो गया। रंगून में इनका मन नहीं लगता था क्योंकि वह प्रयोग करने की सुविधा नहीं थी। इसी समय रमन के पिता की मृत्यु हो गई। रमन 6 महीने की छुट्टी लेकर मद्रास चले गए। छुट्टियां पूरी हुई तो रमन का तबादला नागपुर हो गया।

1911 ईस्वी में रमन को अकाउंटेंट जनरल के पद पर नियुक्त करके पुनः कोलकाता भेज दिया गया। इससे रमन बड़े खुश थे क्योंकि उन्हें परिषद की प्रयोगशाला में पुनः अनुसंधान कार्य करने का अवसर मिल गया था। अगले 7 वर्षों तक रमन इस प्रयोगशाला में शोध कार्य करते रहे। सर्व तारक नाथ पालिक, डॉक्टर रास बिहारी घोष और सर आशुतोष मुखर्जी के प्रयत्नों से कोलकाता में एक साइंस कॉलेज खोला गया। रमन की विज्ञान के प्रति समर्पण की भावना का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर कम वेतन वाले प्राध्यापक पद पर आना पसंद किया। सन 1917 ईसवी में रमन कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक नियुक्त हुए।

सन 1935 ईस्वी में डॉक्टर रमन को बेंगलुरु में स्थापित ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज’ के संचालन का भार सौंपा गया। वहां उन्होंने सन 1948 ईस्वी तक कार्य किया। बाद में डॉक्टर रमन ने बेंगलुरू में अपने लिए एक स्वतंत्र संस्थान की स्थापना की। इसके लिए उन्होंने कोई भी सरकारी सहायता नहीं ली।डॉ रमन ने अपने संस्थान में जीवन के अंतिम दिनों शोधकार्य किया।

डॉ रमन महत्वपुर्ण शोधकार्य▶▶
सन 1917 ईस्वी में लंदन में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के विश्वविद्यालयों का सम्मेलन था। रमन  ने उस सम्मेलन में कोलकाता विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया। यह रमन की पहली विदेश यात्रा थी। इस विदेश यात्रा के समय उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण घटना घटी। पानी के जहाज से उन्होंने भूमध्य सागर के गहरे नीले पानी को देखा। इस नीले पानी को देखकर रमन के मन में एक विचार आया की है नीला रंग पानी का है या नीले आकाश का सिर्फ परावर्तन। बाद में रमन ने इस घटना को अपनी खोज द्वारा समझाया कि यह नीला रंग ना ही पानी का है और ना ही आकाश का। यह नीला रंग तो पानी तथा हवा के कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन से उत्पन्न होता है। जल कणों पर जब सूर्य का प्रकाश पड़ता है तो वह सात रंगों में विभक्त हो जाता है। इन सातों रंगो में बैंगनी और नीले रंग का प्रकीर्णन सर्वाधिक होता है और अन्य रंगों का प्रकीर्णन इनकी तुलना में बहुत कम होता है। यही कारण है कि हमें प्रकाश का नीला रंग ही जल में अधिक दिखाई देता है और जल हमें नीला दिखाई देने लगता है। आकाश के नीला दिखाई देने का भी यही कारण है।

एक बार रामन अपने छात्रों के साथ प्रकाश सम्बंधी प्रयोग कर रहे थे। उन्होंने प्रकाश की एक किरण को एक छोटे से छेद से गुजारने के बाद बेंजीन के द्रव पर डाला। दूसरे सिरे पर उन्होंने जब डायरेक्ट विजन स्पेक्ट्रोस्कोेप_Direct Vision Spectroscope द्वारा उस प्रकाश को देखा, तो उसमें कुछ असाधारण सी रेखाएँ भी नजर आईं। उसी दौरान शिकागो विश्वविद्यालय के ए.एच. कॉम्प्टन_A H Compton ने एक्स्-रे किरणों को किसी खास सामग्री से गुजार कर विशेष रेखाओं के देखे जाने की बात कही थी (Compton effect)। कॉम्प्टन को इस खोजे के लिए नोबेल पुरस्कार भी मिला था। रामन को महसूस हुआ कि कुछ ऐसा ही उनके प्रयोग में भी हो रहा है।

रामन ने महसूस किया कि प्रकाश की किरण वास्तव में कणों (फोटोन्स) की धारा की तरह व्यवहार कर रही हैं। उन्होंने देखा कि किसी द्रव पर प्रकाश की किरण डालने पर प्रकाश में उपस्थित फोटोन्स द्रव के अणुओं पर वैसे ही आघात करते थे जैसे एक क्रिकेट का बॉल फुटबॉल पर करता है। क्रिकेट का बॉल जब फुटबॉल से टकराता है, तो वह कितनी ही गति से क्यों न उससे टकराए, लेकिन वह फुटबॉल को थोड़ा-सा ही हिला पाता है। इस प्रक्रिया में क्रिकेट का बॉल अपनी कुछ ऊर्जा फुटबाल को दे देता है और स्व यं दूसरी ओर उछल कर गिर जाता है। रामन ने देखा कि इसी तरह फोटोन्स अपनी कुछ ऊर्जा छोड़ देते हैं और छितरे प्रकाश के स्पेक्ट्रम में कई बिन्दुओं पर दिखाई देते हैं। जबकि अन्य फोटोन्स अपने रास्ते से हट जाते हैं। वे न तो इस प्रक्रिया में ऊर्जा ग्रहण करते हैं और न ही छोड़ते हैं। इसलिए वे स्पेक्ट्रम में अपनी सामान्य स्थिति में दिखाई देते हैं।

फोटोन्स में ऊर्जा की आई हुई यह कमी और इसके परिणामस्वरूप स्पेक्ट्रम में कुछ असाधारण रेखाओं का उत्पडन्नो होना ही रमन प्रभाव_(Raman effect) कहलाता है। फोटोन्स द्वारा खोई जाने वाली ऊर्जा की मात्रा उस द्रव रसायन के अणुओं की प्रकृति पर निर्भर करती है। यही कारण है कि भिन्न-भिन्न प्रकार के अणु फोटोन्स के साथ मिलकर अलग-अलग प्रकार की क्रिया करते हैं और इस दौरान ऊर्जा की मात्रा में कमी भी अलग-अलग होती है। रामन ने बताया कि स्प्रेाट्रम में दिखने वाली असाधारण रेखाओं के फोटोन्स की ऊर्जा में होने वाली कमी को माप कर पदार्थ की आंतरिक अणु संरचना का पता लगाया जा सकता है।

रमन की यह महत्वपूर्ण खोज 28 फरवरी 1928 को सम्पन्न् हुई, जिसकी परिणति तक पहुँचने में उन्हें सात वर्ष का समय लगा था। उन्होंने जब अपनी यह खोज दुनिया के सामने रखी, तो उसे प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ ने अपने आगामी अंक में प्रकाशित किया। उनकी इस महत्वपूर्ण खोज के लिए उन्हें भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। ‘रमन प्रभाव’ की महत्वपूर्ण खोज के प्रति अपना सम्मांन जताने के लिए भारत वर्ष में 28 फरवरी का दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस_(National Science) Day के रूप में मनाया जाता है।

डॉक्टर रमन ने संगीत का भी गहन अध्यन किया था। संगीत वाद्ययंत्रों की ध्वनियों के बारे में डॉक्टर रमन अनुसंधान कार्य किया, जिससे संबंध एक लेख जर्मनी के एक विश्वकोश में भी प्रकाशित हुआ था।

डॉ रमन के पुरुस्कार व् उपलब्धियां▶▶
चंद्रशेखर वेंकट रमन को सन 1914 में रॉयल सोयायटी, लंदन ने उन्हें अपना फेलो चुना।  उनकी अमूल्य् सेवाओं के लिए सन 1922 में कोलकाता विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.एस-सी. की मानद उपाधि प्रदान की। वे सन 1929 में मद्रास में होने वाली भारतीय विज्ञान काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। ब्रिटिश सरकार ने उनकी योग्यताओं के लिए उन्हेंं सन 1929 में ‘सर’ की उपाधि प्रदान की।

उनके महत्वपूर्ण अनुसंधान ‘रमन प्रभाव’ के लिए उन्हें सन 1930 में भौतिक विज्ञान का नोबेल पुरस्का्र प्रदान किया गया। सन 1941 में रामन को अमेरिका का प्रसिद्ध फ्रैंकलिन पुरस्कार प्राप्त हुआ। सन 1954 में भारत सरकार ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्ता सन 1958 में सोवियत रूस ने अपने प्रतिष्ठित सम्मान ‘लेनिन शान्ति पुरस्का्र’ से सम्मानित किया।

चंद्रशेखर वेंकट रमन जी का व्यक्तित्व▶▶
श्री वेंकटरमन के विषय में ख़ास बात है कि वे बहुत ही साधारण और सरल तरीक़े से रहते थे। वह प्रकृति प्रेमी भी थे। वे अक्सर अपने घर से ऑफिस साइकिल से आया जाया करते थे। वे दोस्तों के बीच ‘वैंकी’ नाम से प्रसिद्ध थे एक साक्षात्कार में वेंकटरामन के पिता श्री ‘सी. वी. रामकृष्णन’ ने बताया कि ‘नोबेल पुरस्कार समिति’ के सचिव ने लंदन में जब वेंकटरमन को फ़ोन कर नोबेल पुरस्कार देने की बात कही तो पहले  तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। वेंकट ने उनसे कहा कि ‘क्या आप मुझे मूर्ख बना रहे हैं?’ क्योंकि नोबेल पुरस्कार मिलने से पहले अक्सर वेंकटरामन के मित्र फ़ोन कर उन्हें नोबेल मिलने की झूठी ख़बर देकर चिढ़ाया करते थे।’

वे एक परिश्रमी और सरल स्वभाव के व्याक्ति थे। इसका पता इस बात से भी चलता है कि जब देश के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने उनके सामने ‘भारत के उपराष्ट्रपति ‘ पद का प्रस्ताव रखा, तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से उसे अस्वीकार कर दिया था।

चंद्रशेखर वेंकट रमन जी की मृत्यु▶▶
21 नवम्बर,1970 को 82 वर्ष की आयु में डॉ रमन की मृत्यु हो गई।

सचमुच उनके जैसे वैज्ञानिक धरती पर कभी-कभी ही जन्म लेते हैं।