1916 का लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन

सूरत अधिवेशन में कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई थी कांग्रेस का यह विभाजन 1916 तक बना रहा इस बीच जहां एक और सरकार आतंकवादी कार्यवाही को कुचलने में लगी रही वहीं मार्ले मिंटो सुधारों से हिंदू और मुसलमानों के मध्य मतभेद की खाई और गहरी हो गई थी 1915 में उदारवादी नेता गोपाल कृष्ण गोखले और फिरोज शाह मेहता की मृत्यु हो गई थी बाल गंगाधर तिलक और ऐनी बेसेन्ट ने गरम दल और नरम दल को पुन:कांग्रेस के एक मंच पर एक साथ लाने का प्रयास किया और इन दोनों का यह प्रयास 1916 से लखनऊ सम्मेलन के कांग्रेस अधिवेशन में पूरा हुआ लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की
इसी समय इटली ने त्रिपोली पर आक्रमण किया और बाल्कन युद्ध आरंभ हुए इन युद्धों में इंग्लैंड का रुख तुर्की के समर्थन का नहीं था जिसकी भारतीय मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से में प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई युद्ध के बाद भारतीय मुसलमान अंग्रेजी सरकार से रूष्ट थे1915 में अपने वार्षिक अधिवेशन मुंबई में मुस्लिम संगठन ने अन्य संप्रदायों के परामर्श से राजनीतिक सुधारों की एक योजना बनाने के लिए विशेष समिति का गठन किया इस समिति में अनेक कांग्रेसी नेता भी शामिल हुए इसी अधिवेशन में मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने एक ही स्थान और एक ही समय पर अपने अगले वार्षिक अधिवेशन को आयोजित करने का निर्णय लिया था
दिसंबर 1916 को मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों ने लखनऊ में वार्षिक अधिवेशन का आयोजन किया इन दोनों दोनों दलों ने पृथक पृथक रूप से संवैधानिक सुधारों की सयुक्त योजना के संबंध में प्रस्ताव पारित किए और सयुक्त कार्यक्रम के आधार पर राजनीति क्षेत्रों में एक दूसरे के साथ सहयोग करने के संबंध में समझौता किया यह समझौता लखनऊ समझौता या कांग्रेस लीग योजना के नाम पर प्रसिद्ध हुआ
लखनऊ समझौते के तहत 19 सूत्री ज्ञापन पत्र तैयार किया गया जिसके द्वारा ब्रिटिश सरकार से भारत को शीघ्र अति शीघ्र स्वशासन प्रदान करने प्रांतीय विधान परिषद और गवर्नर जनरल की विधान परिषद का विस्तार करने एवं इन वितरित परिषदों में निर्वाचित सदस्य को अधिक प्रतिनिधि देने के संबंध में मांग की गई थी इस ज्ञापन पत्र में यह भी मांग की गई थी कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में नियुक्त करने का अधिकार भारत सरकार में निहित होना चाहिए ब्रिटिश भारतीय सेना में सेना और नौसेना के कमीशन और कमीशन पदों पर भारतीय लोगों की नियुक्ति की जाए लखनऊ समझौते में कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग को भी औपचारिक रुप से स्वीकार कर लिया जो मुस्लिम लिंग के लिए बहुत सकारात्मक उपलब्धि थी क्योंकि कांग्रेस अब तक इसका विरोध करती आ रही थी मुस्लिम लिंग में भी प्रतिनिधित्व के आदि के की शर्तों को उदार बनाकर उस में कमी कर दी थी लखनऊ समझौते का विरोध मदन मोहन मालवीय ने किया था  1916 का लखनऊ समझौता कांग्रेस लिंग की मित्रता स्थापित करके भारत में साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष के लिए जमीन तैयार करता था युद्धकाल मे होम रूल आंदोलन को नि:संदेह रूप से  इस समझौते से बल प्राप्त हुआ लेकिन यह समझौता केवल स्थाई विराम समझौता था जिसे एकता की कीमत सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के गेर लोकतांत्रिक सिद्धांत को स्वीकार करके दी गई थी लखनऊ समझोता जहां एक और ब्रिटिश सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति के लिए बड़ा धक्का था वहीं दूसरी और इसमें ना तो पूर्ण हिंदू मुस्लिम एकता को स्थापित किया और ना ही सांप्रदायिक विचारधारा और शक्तियों पर कोई निर्णायक चोट की थी मुस्लिम लीग ने इस समझौते के बावजूद अपना अलग अस्तित्व बनाए रखा मुस्लिम लीग हिंदुओं के सामान्य हितो से भिन्न मुसलमानों के लिए पृथक राजनीतिक अधिकारों की वकालत करती रही 1922 में चोरी चोरा घटना के परिणाम स्वरुप असहयोग आंदोलन के स्थगन पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों इस समझौते की भावना के अनुरूप एक दूसरे के साथ सहयोग करते रहे और एक साथ राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय है लेकिन असहयोग आंदोलन के स्थगन  के साथ ही लखनऊ समझौता भी भंग हो गया मुस्लिम अपना पुराना रास्ता पकड़ लिया कांग्रेस के बेलगांव अधिवेशन 1924 मैं मुस्लिम लिंग कांग्रेस से पृथक हो गई कांग्रेस के बेलगांव अधिवेशन 1924 की अध्यक्षता महात्मा गांधी द्वारा की गई थी डॉक्टर रमेश चंद्र मजूमदार ने लखनऊ समझौते की कटु आलोचना करते हुए लिखा है कि परिवर्ती घटनाओं की पृष्ठभूमि में नि:सन्देह रुप से यह कहा जा सकता है कि 1916 में कांग्रेस द्वारा लखनऊ समझौता करने के निर्णय ने वस्तुत: वह नीव डाली जिसके ऊपर 30 वर्षों बाद पाकिस्तान का निर्माण किया गया लखनऊ समझोते ने भावी भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता वाद के उदय का मार्ग प्रशस्त किया था