अभिलेख ( Part 03)

अमेर लेख:-
1612 के इस अभिलेख में कछवाहा शासकों पृथ्वीराज से मानसिंह तक की वंशावली, मानसिंह की उपलब्धियां, जमवारामगढ़ में निर्माणों का उल्लेख है|
इस लेख में कछवाहा वंश को रघुवंशी तिलक कहा गया है|
यह लेख 1612 ई. का है इस लेख की भाषा संस्कृत और नागरी लिपि है|
आमेर के कछवाहा राजवंश के इतिहास को जानने के लिए यह लेख महत्वपूर्ण है|
इस लेख में दोसा से राजधानी जमुआ रामगढ़ आई जमुआ रामगढ़ के दुर्ग का निर्माण मानसिंह ने करवाया आदि का वर्णन मिलता है|

जना सागर प्रशस्ति:-
यह प्रशस्ति भी महाराणा राजसिंह के समय की है|
जना सागर का निर्माण महाराणा राजसिंह ने अपनी माता जनादे(कमेतीं) की स्मृति में कराया था|
यह उदयपुर से पश्चिम की ओर बड़ी ग्राम के समीप बनाया बनवाया गया था|
यह तालाब ऐतिहासिक स्मृति के साथ सिंचाई की दृष्टि से भी महान उपयोगी सिद्ध हुआ|
इसकी प्रतिष्ठा के समय महाराणा राजसिंह ने चांदी का तुलादान किया था|
इस अवसर पर पुरोहित गरीबदास को गलूण्ड व देवपुरा के ग्राम दान में दिए गए थे|
इसका निर्माण सुदृढ नींव पर किया गया है|
इसमें मेड़ता परिवार को वैष्णव बताया गया है|
इस प्रशस्ती में 41 श्लोक हैं इस प्रशस्ति कार के रूप में कृष्ण भट्ट का पुत्र लक्ष्मीनाथ माना जाता है|

जगन्नाथ राय प्रशस्ति:-
उदयपुर के जगन्नाथ राय मंदिर में काले पत्थर पर मई 1652 में उत्कीर्ण की गई थी|
इसके पूर्वार्द्ध में बापा से सांगा तक की उपलब्धियों का वर्णन है|
इसमें हल्दीघाटी युद्ध ,महाराणा जगतसिंह के युद्धों ,पुण्य कार्य ,व इस मंदिर के निर्माण और प्रशस्ति के रचयिता कृष्ण भट्ट का भी विस्तृत विवेचन है|
इस प्रशस्ति में राणा कर्णसिंह के समय सिरोंज के विनाश का वर्णन है|
इस प्रशस्ति का रचयिता कृष्ण भट्ट था|
इस प्रशस्ति में बप्पा रावल से लेकर जगत सिंह सिसोदिया तक गुहिलो का वर्णन है|
इस प्रशस्ति में जगन्नाथ मंदिर का निर्माण अर्जुन की निगरानी और भाणा व मुकंद की अध्यक्षता में करवाया गया था| इस की जानकारी मिलती है|
इस प्रशस्ति में यह भी विवरण आता है कि महाराणा जगत सिंह ने पिछोला के तालाब में मोहन मंदिर बनवाया और रूप सागर तालाब का निर्माण करवाया|

एकलिंग जी के मंदिर के दक्षिण द्वार की प्रशस्ति:-
यह महाराणा रायमल द्वारा मंदिर के जीर्णोद्धार के समय मार्च 1498 में उत्कीर्ण की गई है|
इसमें मेवाड़ के शासकों की वंशावली ,तत्कालीन समाज की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक स्थिति और नैतिक स्तर की जानकारी दी गई है|
इस प्रशस्ति में बप्पा के सन्यास लेने का वर्णन भी है|
इस प्रशस्ति में क्षेत्रसिंह द्वारा मालवा के अमीशाह को पराजित करने का विवरण भी दिया गया है|
इस प्रशस्ति का रचयेता महेश भट्ट था|

जैन कीर्ति स्तंभ के लेख:-
चित्तौड़गढ़ के जैन कीर्ति स्तंभ में उत्कीर्ण तीन अभिलेखों का स्थापनकर्ता जीजा था|
इसमें जीजा के वंश और मंदिर निर्माण और दोनों का वर्णन मिलता है|
यह 13वी सदी का लेख है|

वैद्यनाथ मंदिर की प्रशस्ति:-
पिछोला झील उदयपुर के निकट सीसारमा गांव के वेदनाथ मंदिर में यह प्रशस्ति 1719 में लगाई गई थी|
इसमें बप्पा को हारित ऋषि की कृपा से राज्य प्राप्ति का उल्लेख है|
इस प्रशस्ति में बप्पा से लेकर संग्राम सिंह द्वितीय जिसने यह मंदिर बनवाया था का संक्षिप्त परिचय है|
इसमें संग्राम सिंह द्वितीय और मुगल सेनापति रणबाज खां के मध्य हुए बाँधनवाड़ा के युद्ध का वर्णन भी मिलता है|

अर्थुना के शिव मंदिर की प्रशस्ती:-
अर्थुना बांसवाड़ा के शिवालय में 1079 को इस प्रशस्ति को लगाया गया था|
इस अभिलेख में बागड़ के प्रमाण नरेशों का वर्णन है|
इस लेख से स्पष्ट हो जाता है कि वागड़ के परमार मालवा के परमार वाग्पतिराज के दूसरे पुत्र डंवर सिंह के वंशज थे|

किराडू का लेख:-
किराडू बाड़मेर के शिव मंदिर में संस्कृत मैं उत्कीर्ण के लेख है|
जिसमें परमारों की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के आबू यज्ञ से बताई है|
इस शिलालेख का समय 1152ई. है यह शिलालेख आल्हण देव के समय का है|
इस शिलालेख से स्पष्ट होता है कि आल्हणदेव द्वारा कुछ निश्चित तिथियों को पशु वध का पूर्ण निषेध किया गया था|

चाकसू की प्रशस्ति:-
चाकसू जयपुर में स्थित प्रशस्ति 813 ई. की है|
इस लेख में यहां पर चाकसू  के गुहिल वंशीय राजाओं की वंशावली दी गई है|
 इस प्रशस्ति का रचनाकार भानू और इसका उत्कीर्ण भाइल था|
इस प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि यहां पर गुहिल वंश का शासन था जो प्रतिहार वंश के शासकों के सामंत थे|

समिधेश्वर मंदिर का शिलालेख:-
यह लेख 1428 का है यह लेख चित्तौड़ के समिधेश्वर  मंदिर की दीवार पर उत्कीर्ण है|
इसकी रचना एकनाथ ने की थी और इसका उत्कीर्ण कर्ता वीसल था|
इस लेख से मेवाड़ के शिल्पियों/ वास्तु कारो के वंश परंपरा की विषय में जानकारी होती है|
इस लेख से सामाजिक रीति रिवाजों और महाराणा मोकल द्वारा विष्णु मंदिर के निर्माण की जानकारी मिलती है|
इस लेख में हम्मीर की तुलना विष्णु ब्रह्मा शंकर और करण से की गई है|

दिलवाड़ा का लेख:-
तत्कालीन समाज की व्यवस्थाओं और टेक नामक मुद्रा का उल्लेख मिलता है|
इस लेख में मेवाड़ी भाषा के प्रयोग का उल्लेख है इस लेख का समय 1437ई.  है|
यह लेख संस्कृत और राजस्थानी भाषा में है|
इस लेख के माध्यम से 14वी शताब्दी की राजनीतिक ,आर्थिक, धार्मिक स्थिति ,तत्कालीन भाषा, कर और मुद्रा की जानकारी मिलती है|

नाथ प्रशस्ति:-
यह लेख एकलिंग जी के मंदिर के पास लकुलीश मंदिर से प्राप्त हुआ था|
इसमें नागदा नगर और बप्पा गुहिल और नरवाहन राजाओं का वर्णन है|
इस लेख का समय 971ई.माना गया है|
इस प्रशस्ति में मेवाड़ का सांस्कृतिक व राजनीतिक इतिहास का उल्लेख है|
इस लेख में पाशुपत संप्रदाय के योगियों का वर्णन मिलता है जो एकलिंग जी के मंदिर में पूजा करते थे|
इस लेख में जैन और बौद्ध विचारों के मध्य वाद विवाद का वर्णन भी आता है|
इस प्रशस्ति के रचयिता आम्र कवि थे|

हर्षनाथ की प्रशस्ति:-
हर्षनाथ (सीकर) के मंदिर की यह प्रशस्ति 973ई.की है|
यह प्रशस्ति सांभर के चौहान शासक विग्रहराज के समय की है|
इसमें मंदिर का निर्माण आल्लट द्वारा किए जाने का उल्लेख है|
इसमें चौहानों के वंश क्रम उनके शासनकाल में राजपूताने की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का का उल्लेख है|

नगरी का लेख:-
यह एक खंड लेख है, यह नगरी से प्राप्त हुआ था इस लेख का समय 200 से 150 ईसवी पूर्व का माना है|
डॉक्टर ओझा ने इसे उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित रखवा दिया है|
इस लेख में प्रयुक्त कुछ वाक्य और शब्द बड़े महत्व के हैं|
‘स'(र्वे)’भूताना दयार्थ ‘ता (कारिता) से अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां सब जीवों की दया के निमित या तो कोई नियम बनाया गया था अथवा यहां कोई स्थान बनाया गया जहॉ जीवों की रक्षा की सुविधा हो सके|
संभवत यह लेख बौद्धों या जैनों से संबंध रखता हो|
इस अभिलेख की भाषा संस्कृत और ब्राह्मी लिपि है इसमें विष्णु की पूजा और उसके निर्मित मंदिर की चारदीवारी बनवाया जाने का उल्लेख है|

बड़ली अभिलेख-अजमेर:-
यह अभिलेख राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख है|
बडली में 443 ईसवी पूर्व का एक अभिलेख एक स्तंभ के टुकड़े पर अंकित हुआ प्राप्त पाया|
यह अभिलेख अजमेर से 35 किलोमीटर दूर बड़ली के पास मिलोत माता के मंदिर से प्राप्त किया गया है|
यह अभिलेख दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व का है|
जो प्रियावा अभिलेख (487ई.पू.) के साथ ही भारत के अभिलेखों में प्राचीनतम समझा जाता है|
यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ है|

गोठ मांगलोद का शिलालेख:-
नागौर जिले के गोठ मांगलोद गांव में स्थित दधिमति माता के मंदिर में उत्कृष्ट अभिलेखों 608ई. का माना जाता है|
पंडित रामकरण आसोपा के अनुसार इस शिलालेख पर गुप्त संवत की तिथि संवत्सर सतेषु 289 श्रावण बदी 13 अंकित है|
यदि यह गुप्त संवत है तो यह राजस्थान में अब तक प्राप्त सबसे पुराना शिलालेख है|
विजय शंकर श्रीवास्तव ने इसे हर्ष संवत की तिथि माना है यदि यह हर्ष संवत है तो यह शिलालेख 895 ई. का है|
ख में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि भू स्वामित्व का अधिकार शासकों में नीहित होता है|

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