इतिहास के महत्वपूर्ण शब्द

इतिहास के महत्वपूर्ण शब्द

 स्वर्ण भूमि(Golden land) ➖ बर्मा के पेगू और मॉल मेल को स्वर्ण भूमि कहां गया है यहां भारतीय संस्कृति का प्रसार  व्यापारियों से हुआ था ब्राह्मण ग्रंथों के माध्यम से नहीं

 स्वर्णद्वीप (Gold island) ➖ Indonesia Java के साथ जिसे प्राचीन भारत के लोग स्वर्ण दीप कहते थे पहली सदी 56 ई में घनिष्ठ व्यापारिक संबंध स्थापित हुए यहां 56ई. में भारतीय बस्तियां सबसे पहले स्थापित हुई

 फूनान ➖ कंबुज या कंबोडिया को चीनी लोग फूनान कहते थे 15 शताब्दी के आरंभ में रचित दक्षिेणताई के इतिहास में फूनान हिंदू राजा की स्थापना का उल्लेख किया है यहा कौण्डिन्य ने पहली सदी मे अपना राज्य स्थापित किया था

अग्नि देश ➖ Malaysia में कल शहर को इस युग में अग्रणी देश करते थे वह बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ था

शैलेंद्र वंश ➖ आठवीं शताब्दी में शैलेंद्र वंश के राजाओं ने आसपास के राज्यों को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की जो शैलेंद्र साम्राज्य के नाम से जाना गया साम्राज्य में मलाया सुमात्रा जावा बाली बोर्नियो फारमूसा तथा श्रीलंका सम्मिलित है 

 इंद्रद्वीप ➖ बर्मा का प्राचीन नाम इंद्रद्वीप था बर्मा में गुप्तकाल के काफी बौद्ध अवशेष मिले हैं 

 ताम्रपाणी ➖ श्रीलंका का एक प्राचीन नाम , India and Lanka का संबंध रामायण के समय से ही था 3ई.पू.अशोक ने अपने पुत्र पुत्री महेंद्र-संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ यहा भेजा था परिणाम स्वरुप लंका में बौद्ध धर्म फेल गया

 दीपांतर ➖ अग्नि पुराण में भारतवर्ष को जम्बू द्वीप की संज्ञा दी गई है समंदर पार के Indian territories को दीपांकर कहा जाता था

 मीडोज ऑफ गोल्ड ➖ अरब भूगोल शास्त्री अल मसूदी ने 946 में लिखित अपनी पुस्तक मीडोज ऑफ गोल्ड ने कहा है कि भारत में भूमि और समुद्र दोनों पर फैला हुआ था

 अन्नाम ➖ प्राचीन चंपा या अंगाद्वीप का आधुनिक नाम अन्नाम है यहां 2ई. सदी में श्रीमार ने हिंदू वंश की स्थापना की थी यहां शैव धर्म का ज्यादा प्रभाव था मैंसन तथा पोनगर के मंदिर शिव को ही समर्पित है चंपा में धार्मिक विकास की मुख्य विशेषता सहिष्णुता थी

 मसाहत ➖ मसाहत कर निर्धारण का एक तरीका था जिसमें भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर कर का निर्धारण किया जाता था सल्तनत काल में इस पद्धति को पुनर्जीवित करने का श्रेय अलाउद्दीन खिलजी को है                                  

 आनंद मंदिर ➖ ब्रह्मा में स्थित पेगान में प्रसिद्ध मंदिर को आनंद मंदिर कहते हैं जो बर्मा की स्थापना कलाकार सबसे सुंदर नमूना है यह मंदिर क्यजित्थ ने निर्मित कराया था   

 श्वेत भारत ➖ पार्थियन लोग अफगानिस्तान को श्वेत भारत के नाम से पुकारते थे प्राचीन भारतीय साहित्य (Indian literature) तथा  यूनानी तथा रोमन लेखों में अफगानिस्तान को भारत का ही अंग माना है   

 कूची/कूची ➖ मध्य एशिया में भारतीय संस्कृति ( Indian culture) का महत्वपूर्ण केंद्र था यहां भी बौद्ध धर्म का व्यापक प्रभाव था  चौथी शताब्दी में कूची  के भिक्षुओं ने चीन में बौद्ध धर्म ( Buddhism) का प्रचार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

 खोतान ➖ मध्य एशिया में स्थित यहां पर अशोक के पुत्र कुणाल ने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की थी यहां  बौद्ध धर्म खूब फला-फूला था     

 पित्रा दूरा ➖ संगमरमर (Marble) की खुदाई कर उसमें चमकीले पत्थरों का जड़ना और अलंकृत करना ही पित्रा दूरा कहलाता है जो सर्वप्रथम एतामुद्यौला के मकबरे में देखी जाती है

 द्यूल ➖ उड़ीसा के मंदिरों का नाम ,उड़ीसा में मंदिर के दो भाग होते हैं थे एक भाग द् यूल होता दूसरा भाग  जगमोहन होता था

 मेहराब ➖ ईटो या पत्थरों के खंडों से बना अपने बल पर खड़ा ढाचा जिसके ऊपर कोई ढाचा खड़ा किया जाता है

भारत के इतिहास व संस्कृति के शब्द 

 राज्याभिषेक(Coronation )- राज्यभिषेक राजपद से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण संस्कार था ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार इस अनुष्ठान का उद्देश्य प्रमोच्च शक्ति प्रदान करना था

 राजसूय यज्ञ – सर्वोच्चता के अभिलाषी शासक यह यज्ञ करते थे जो लगभग 1वर्षों तक चलता था और इसके साथ कई अन्य यज्ञ चलते रहते थे इसका वर्णन शतपथ ब्राह्मण में है

 वाजपेय यज्ञ – वाजपेय का अर्थ शक्ति का पान इसका उद्देश्य शासन को नव योवन प्रदान करना था तथा शासक की शारीरिक और आत्मिक शक्ति को बढ़ाना था

 अश्वमेघ यज्ञ (Ashwamedh yagya) -यह यज्ञ और भी वितरित समारोह था इसका उद्देश्य राजा के राज्य का विस्तार करना और राज्य के लोगों को सुख तथा समृद्धि प्राप्त करना था

 चरक – चरक का अर्थ भ्रमणशील गुरु होता है इनका काम देश के विभिन्न भागों में घूमना और जनता के ज्ञान को बढ़ाना था यह जहां भी जाते लोग ज्ञान प्राप्ति की आशा में इनको घेर लेते थे उद्दालक आरूणि इसी प्रकार का चरक था कुषाणकालीन चरक ने चरक संहिता लिखी

 ब्रह्मावादिनी – कुछ सुयोग्य और विदुषी स्त्रियों को ब्रह्मवादिनी कहा जाता था

 लिपिशाला या लेखशाला – लिपिशाला का अर्थ वह विद्यालय होते हैं  जहां पर छात्र केवल दिन में पढ़ने आते हैं ऐसे विद्यालयो को लिपिशाला या लेखशाला कहते हैं

 माणवक – वे छात्र जो आचार्य से धर्म ग्रंथ पढ़ते थे माणवक कहलाते थे

 शतपति – सौ ग्राम वाले क्षेत्र का प्रशासक को शतपति कहा जाता था

 रत्नी/रत्निन – मंत्री परिषद के सदस्य या राज्य अधिकारियों को रत्निन कहा जाता था शतपथ ब्राह्मण में इनकी संख्या 11 बताई गई है

 स्थितप्रज्ञ – ऐसा व्यक्ति जो सुख-दुख लाभ-हानि जय-पराजय आदि प्रत्येक स्थिति में दृढ़ता से कार्य करता है और प्रत्येक स्थिति में अविचलित रहता है ऐसे व्यक्ति को स्थितप्रज्ञ कहा जाता है

 स्वधर्म – जिस वर्ण का जो स्वाभाविक कर्म है या स्वभाव के अनुसार जो विशेष कर्म निश्चित है वही स्वधर्म है

 गीता में योग -गीता में योग का आशय से आत्मा का परमात्मा से मिलन बताया गया है

 चतुर्विंशति सगस्त्र संहिता – रामायण के 24000 श्लोको  को चतुर्विंशति सहस्त्र संहिता कहा गया है

 शतसहस्त्र संहिता – महाभारत में श्लोकों की संख्या 1 लाख है श्लोकों की इस संख्या को ही शतसहस्त्र संहिता कहा गया है

 भोजक – किसानों के प्रतिनिधि को भोजक कहा जाता था

 कहपण – एक तांबे का सिक्का था जिसका वजन 140 ग्रेन था

 सार्थवाह – व्यापारी के काफिले के प्रमुख को सार्थवाह कहा जाता था

 पांचरात्र – यह वैष्णव धर्म का प्रधान मत है इसका विकास तीसरी सदी ईसा पूर्व में हुआ था पांचरात्र के मुख्य उपासक विष्णु थे परम तत्व,युक्ति,मुक्ति, योग और विषय जैसे 5 पदार्थों के कारण इसे पांचरात्र कहा गया था

 पिपहराव – सबसे प्राचीन स्तूप जो आज भी मौजूद है यह नेपाल की सीमा पर है यह संभवत 450 ईसापूर्व में निर्मित हुआ था इसमें बुद्ध के अवशेष रखे हुए हैं भाजा (महाराष्ट्र) का चैत्य भी उत्कृष्ट है

 उपसंपदा – संघ परिवेश को बौद्ध धर्म में उपसंपदा कहा गया ह

 उपोसथ -कुछ पवित्र दिवस पूर्णिमा अमावस्या अष्टमी पर सारे भिक्षुगण एकत्रित होकर धर्म चर्चा करते हैं इसे उपोसथ कहा गया है

  चैत्य ग्रह (बुद्धायतन) – चिता से चैत्य बना है चिता के अवशिष्ट अंश को भूमि गर्भ में रखकर वहां जो स्मारक तैयार किया जाता है उसे चैत्य गृह कहा जाता था

 जातक ग्रंथ – सुत्त पिटक के पांचवें भाग खुद्दक निकाय में बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएं संकलित हैं इन्हें जातक ग्रंथ कहते हैं लक्खण जातक ,बट्टक जातक ,तेल पंत जातक, गोध जातक, मंगल जातक बावेरू जातक आदि प्रसिद्ध हैं

 पांचरात्र व्यूह – वासुदेव, लक्ष्मी, संकर्षण,प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के समूह को पांचरात्र व्यूह कहते हैं

 रमञ्ज देश – मीन लोग जो हिंदू बना लिए गए निचले बर्मा में बसे हुए थे इनके प्रदेश रमञ्ज देश कहलाता है

 रमल – ज्योतिष की प्राचीन विद्या इसका उद्गम अरब में हुआ मुगल काल में रमन का विस्तार अधिक हुआ इसमें  पासों के आधार पर परफल निकाला जाता हैं

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