कुतुबुद्दीन ऐबक की विजय

Bengal कुतुबुद्दीन ऐबक की विजय

बुंदेलखंड(1202 ईसवी) 
बुंदेलखंड (Bundelkhand) की विजय कुतुबुद्दीन ऐबक की महत्वपूर्ण विजय थी
1202 ईस्वी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कालिंजर पर आक्रमण किया जो चंदेल वंश के राजा परमार्दी देव का एक सुदृढ़ दुर्ग (सैनिक केंद्र )था
कई दिनों तक घेरा के बाद संधि वार्ता आरंभ हुई किंतु इसके पूर्व भी राजा परमार्दी देव की मृत्यु हो गई थी
परमार्दी देव के प्रधानमंत्री अजय देव ने पुन: विरोध प्रारंभ किया
उसने एक पहाड़ी सोते से पानी की व्यवस्था कर ली लेकिन तुर्को को पता चलते ही सोते का पानी दूसरी ओर मोड़ दिया फलस्वरुप जलापूर्ति बंद हो गई

अजय देव के लिए संधि के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहा

चंदेलो ने कालिंजर का दुर्ग खाली कर अजय गढ़ के निकटवर्ती दुर्ग में चले गए
कालिंजर विजय के पश्चात कुतुबुद्दीन ऐबक महोबा और खजुराहो पर भी अधिकार कर लिया
हसन अर्नल को इन क्षेत्रों का दायित्व सौंपा गया

 बिहार विजय(1202 ई.)
जब कुतुबुद्दीन ऐबक अन्य विजयों में व्यस्त था तो उसके सेनापति इख्तियारुद्दीन मोहम्मद बख्तियार खिलजी (गौरी का एक सरदार) ने Bihar और Bengal विजय की योजना बनाई
1202ई. में उसने बिहार की राजधानी उदंतपूर  पर आक्रमण किया यहां का राजा इन्दुमल भीरु था जो बिना युद्ध किए ही भाग गया
बख्तियार खिलजी ने वहां के बौद्ध विहारों को लूटा और भिक्षुओं का कत्ल किया
इसके पश्चात उसने विद्या केंद्र नालंदा और विक्रम शीला विश्वविद्यालय को भी नष्ट कर दिया
धीरे-धीरे उसने संपूर्ण बिहार को जीत लिया यहां से वह अतुल संपत्ति और उपहार प्राप्त किए
बौद्धों की परंपरा अनुसार 1200ई. में कश्मीर का प्रसिद्ध विद्वान संत शाक्य श्रीभद्र उदन्तपुर और विक्रमशिला के बौद्ध विहारों में आया किंतु उन्हें नष्ट पाया

 बंगाल विजय(1204-05 ई.)
बिहार विजय से उत्साहित होकर बख्तियार खिलजी ने बंगाल विजय की योजना बनाई थी उस समय वहॉ सेन वंश के शासक लक्ष्मण सेन का शासन था जिसकी राजधानी नदिया थी
कहा जाता है कि बख्तियार खिलजी की बंगाल विजय की भविष्यवाणी लक्ष्मण सेन के दरबार के कुछ ज्योतिषियों ने पहले ही कर दी थी और इसकी सूचना लक्ष्मण सेन को दी गई थी
इस भविष्यवाणी के बाद वहां के कुछ निवासियों ने नदिया छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर रहने चले गए थे लेकिन लक्ष्मण सेन राजधानी छोड़ने के पक्ष में नहीं था
उसने भावी विपत्ति दूर करने हेतु 1203 ईस्वी में देवताओं को प्रसन्न करने के लिए एक महान यज्ञ का अनुष्ठान किया जिसे ऐन्द्री महाशान्ति कहते हैं
1204-05 में बख्तियार खिलजी ने बंगाल पर आक्रमण किया इतनी तीव्र गति से राजधानी में प्रवेश किया कि उस समय उसके साथ केवल 18 अश्वारोही थे शेष सेना पीछे रह गई थी
राजधानी के सैनिकों और नागरिकों ने उसे घोड़ों के व्यापारी समझा वह बिना किसी बाधा के महल के फाटक तक पहुंच गया और अचानक आक्रमण कर दिया
लक्ष्मण सेन भयभीत होकर पीछे के दरवाजे से भाग गया राजा की अनुपस्थिति में राजधानी के सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया
तुर्को ने नदिया को बुरी तरह से लूटा ।बख्तियार खिलजी ने बंगाल पर कब्जा कर लिया

लक्ष्मण सेन पूर्वी बंगाल भाग गया और अपने साम्राज्य के शेष भागों पर कुछ वर्षों तक सुनारगांव से शासन करता रहा
बख्तियार खिलजी नदिया पर स्थाई रूप से शासन करना नहीं चाहता था क्योंकि nadiya दक्षिण बंगाल में पढ़ता था उस पर अधिकार और नियंत्रण रखना कठिन था
इसीलिए उसने उत्तरी बंगाल स्थित लखनौती को चुना।जो  बिहार स्थित उसके मुख्यालय के निकट था
बख्तियार खिलजी ने लखनौती को अपनी राजधानी बनाया
बख्तियार खिलजी ने उत्तरी बंगाल के अधिकृत प्रदेशों में सांस्कृतिक और सैनिक दृष्टि से अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली थी
इन क्षेत्रों में अनेक मस्जिदें, मदरसे और खानकाहे बनवाए गए और लखनौर( वीर भूमि जिले में एक नगर ) देवकोट में सैनिक चौकी स्थापित की गई और मोइनुद्दीन के नाम से खुत्बा पढ़वाया गया

 तिब्बत अभियान(1205 ई.)
बिहार और बंगाल विजय से प्रोत्साहित होकर बख्तियार खिलजी ने तिब्बत जीतने की योजना बनाई
1205 ईस्वी के लगभग अपने 10000 घुड़सवारों सहित तिब्बत अभियान के लिए बख्तियार खिलजी ने प्रस्थान किया
अपने इस अभियान के दौरान बख्तियार खिलजी ने तिब्बत और लखनौती के मध्य स्थित पहाड़ियों पर निवास करने वाले तीन जनजातियों कुंच ,मेज(मेगा) और तिहारू  की सहायता प्राप्त की थी
15 दिनों तक चलने के बाद बख्तियार की सेना तिब्बत की एक घनी आबादी वाले क्षेत्र में प्रवेश करती है और नगर पर आक्रमण कर देती है
नगर वासियों और किलो के रक्षकों ने आक्रमणकारियों का सामना किया युद्ध के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला और विश्व युद्ध के कारण बख्तियार खिलजी को भारी क्षति उठानी पड़ी
अंत में उसने पीछे मुड़ने का निर्णय किया और वापस लौट आया वापस आने के बाद उसकी स्थिति बहुत दयनीय हो गई थी
वह बीमार पड़ गया और 1206 ईस्वी में उसके एक सरदार अली मर्दन खिलजी ने उस का वध कर दिया
ख्वारिज्म मध्य एशिया का विशाल क्षेत्र जिसकी पश्चिमी सीमा पर केस्पियन सागर ,पूर्वी सीमा पर बुखारा और  ऑक्सस और दक्षिणी सीमा पर खुरासान था
मध्य एशिया में मोहम्मद गौरी का मुख्य शत्रु ख्वारिज्म शाह था
जिस समय मुहम्मद गोरी के सरदार भारत में उसके राज्य विस्तार कर रहे थे उस समय मोहम्मद गौरी स्वयं  ख्वारिज्म के शासक के साथ जीवन और मृत्यु का संघर्ष कर रहा था
1205 ईस्वी में ख्वारिज्म शाह ने अंधखुद के युद्ध में मोहम्मद गोरी को बुरी तरह परास्त किया
पराजित होने के बाद मोहम्मद गोरी किसी तरह भागकर गजनी वापस आ गया
अंधखुद युद्ध में मोहम्मद गौरी को पराजित करने के बाद ख्वारिज्म शाह ने सिकंदर द्वितीय की उपाधि धारण की
अंधखुद की पराजय ने मोहम्मद गौरी की प्रतिष्ठा को भयंकर हानि पहुंचाए
इस कारण मोहम्मद गौरी के विरोधी तत्व उसके संपूर्ण साम्राज्य में सक्रिय हो गए और उसकी मृत्यु के झूठे समाचार फैलाने लगे
इन अफवाहों की प्रतिक्रिया भारत में भी हुई

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