ख्वाजा गरीब नवाज अजमेर दरगाह | Hazrat Khawaja Gharib Nawaz

ख्वाजा गरीब नवाज अजमेर

अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह लगभग 800 वर्षों से आध्यात्मिक आस्था सत्य का मार्ग दर्शन आत्म संतुष्टि और सांप्रदायिक सद्भाव का केंद्र रही है इसने एक प्रकाश स्तंभ की तरह दुखी मानवता को निरंतर निक्की आत्मशुद्धि वैश्विक मानव प्रेम वह निस्वार्थ मानव सेवा का रास्ता दिखाया है राजा महाराजाओं ने यहां एक फकीर के कदमों में आम इंसानों की तरह सर झुकाया है तो आम इंसानों के दरबार से बड़ी मुरादें भी कामनाएं पूरी हुई है प्रतिदिन सभी धर्म, जाति, वर्ग, नस्ल के हजारों लोग बिना किसी भेदभाव के देश विदेश से दरगाह की जियारत के लिए आते हैं

जब मजार शरीफ पर हाजिर होते हैं तो उनकी आत्मा समस्त सांसारिक कष्टों से पाक साफ हो जाती है वह दिलों में नूर रोशनी भर जात है दरगाह मार्ग की पाकीजा रूहानी फिजाओं में तमाम जाएगी एक एसी आंतरिक खुशी महसूस करते हैं जिससे वह अब तक अनजान थे

ख्वाजा साहब के उर्स अवसर पर अजमेर इंसानी भाईचारे धार्मिक उदारता और हिंदू मुस्लिम एकता की एक अद्भुत मिसाल बन जाता है अनेकता में एकता का ख्वाब एक जीती जागती हकीकत बन जाता है और विभिन्न सभ्यताएं नस्लें और भाषाएं पिघलकर एक दूसरे में मिलकर एक विश्वव्यापी मानव सभ्यता का रूप धारण कर लेती है यह सब अजमेर के महान सूफी बुजुर्ग की कृपा और आशीर्वाद का परिणाम है जो एक खुदा और मानव एकता के समर्थक थे

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ख्वाजा गरीब नवाज साहब की जीवनी : Hazrat Khwaja Garib Nawaz biography

हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती सूफी बुजुर्गों में से थे जिन्होंने हिंदुस्तान के इंसानो को रूहानी रोशनी प्रदान की और उन्हें सच्चा रास्ता दिखाया ख्वाजा साहब 18 अप्रैल 1143 ईसवी (537 हिजरी ) ईरान के राज्य सिस्तान के गांव संजर में पैदा हुए थे उनके पिता सैयद गयासुद्दीन और मां सैयदा बीवी होते हैं सिर्फ 13 वर्ष की छोटी सी उम्र में ही उनके पिता का इंतकाल हो गया

ख्वाजा गरीब नवाज का दिल बचपन से ही मानवता प्रेम और दया का समुंदर था मैं किसी बच्चे को रोता हुआ नहीं देख सकते थे और जब भी कोई ऐसा बच्चा नजर आता उसकी मां को फौरन दूध पिलाने का आग्रह करते हैं 3-4 वर्ष की आयु से ही वह अपना बच्चों को साथ लेकर  जाते हैं

एक बार ईद के दिन अच्छे कपड़े पहने हुए ईदगाह जा रहे थे कि वह एक अंधे बच्चे को फटे पुराने कपड़ों में देखा उसे देख कर उनका दिल भर आया ख्वाजा साहब ने अपने कुछ कपड़े उस बच्चे को पहना दिए और उसे अपने साथ ईदगाह ले गए |

आध्यात्मिक (रूहानी) प्रोत्साहन

अपने जमाने के प्रसिद्ध सूफी शेख इब्राहिम KANDO JI ने ख्वाजा साहब को अध्यात्म की राह दिखाई KANDO JI एक बार ख्वाजा साहब के पास आए और उन्होंने अपनी आंतरिक निगाहों से देख लिया क्या यह बच्चा भविष्य में एक बहुत बड़ा सूफी बुजुर्ग होने वाला है|
कहां जाता है के शेख ने अपनी हथेली से खल का एक टुकड़ा निकाला उसे जब चबाया और फिर वह टुकड़ा ख्वाजा साहब के मुंह में डाल दिया

खल का टुकड़ा मुंह में जाते ही ख्वाजा साहब की दुनिया बदल गई उनकी रूह आत्मा रोशन हो गई है KANDO JI के प्रभाव से ख्वाजा साहब ने छोटा सा भाग आटे की चक्की और वह माल जो है पैतृक संपत्ति के रूप में मिला था बेचकर गरीबों में बांट दिया इस तरह जो कुछ भी हाल में सामान आपके पास था उसे खुदा की राह मैं लुटा कर ज्ञान की तलाश मैं बुखारा आ गए समरकंद के सफर पर निकल गए

दुनिया भी ज्ञान प्राप्त करने के बाद आंतरिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए विभिन्न स्थानों पर गए इस तरह ख्वाजा गरीब नवाज की उम्र का बड़ा हिस्सा इसी मेहनत में बीत गया आखिर ख्वाजा साहब को मंजिल निसरपुर के कश्मीर हारुण में मिली आप हजरत ख्वाजा उस्मान हारुनी की सेवा में हाजिर हूं और आप के मुरीद (शिष्य) हो गए

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ख्वाजा गरीब नवाज का अजमेर आगमन (रवानगी)

अपने पीर (गुरु) की लगभग 20 वर्ष सेवा करने के बाद ख्वाजा साहब ने उनसे आज्ञा चाहिए ख्वाजा उस्मान हारुनी विदा होते समय उपदेश देते हैं यह मोइनुद्दीन अब जब तुमने फकीरी निवास धारण कर लिया है तो फकीरों की तरह ही कार्य करना गरीबों के साथ प्रेम से पेश आना, दरिद्रों की सेवा करना, बुराइयों से बचना और मुसीबत व कष्ट के दिनों में हिम्मत और हौसला बनाए रखना

इस तरह आंखें ज्ञान प्राप्ति के बाद ख्वाजा साहब एक और सफर पर चल पड़े जिस की आखिरी मंजिल अजमेर शरीफ थी यहां वह 1195 ईस्वी में आए हैं यह एक अनजान जगह थी मगर ख्वाजा साहब ने स्थानीय लोगों के साथ आत्मीयता का संबंध स्थापित कर लिया और पीड़ित सताए हुए मजबूर लोग हैं अपना सहारा समझने लगे

उन्होंने Khankah मठ स्थापित की जो मानव प्रेम और भाईचारे का संदेश फैलाने का केंद्र बन गई उन्होंने कव्वाली के रूप में एक नई Tablig प्रारंभ की और उससे रूहानी जागरूकता का काम लिया | अजमेर में रहकर इस्लाम धर्म की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया और लोगों को इस्लाम धर्म की अच्छाइयों के बारे में बताया

ख्वाजा गरीब नवाज के जीवन के अंतिम क्षण

एक रात रोजाना की तरह ख्वाजा साहब अपने कमरे में प्रवेश होकर इबादत उपासना में मशरूफ व्यस्त हो गए आप वहां दिन तक बाहर नहीं आ ए अकीदत बंधुओं को चिंता हुई उन्होंने छोटे रुद्र वादा तोड़ कर देखा की ख्वाजा साहब खुदा से जा मिले हैं आपकी पवित्र परेशानी मस्तक पर प्राकृतिक कलम से लिखा देखा गया Haja habi bullah mat Fi hubbilah
( हिंदी अनुवाद यह अल्लाह का दोस्त हैं और अल्लाह की मोहब्बत में उसने जान दी है)

यह 633 हिजरी 11 मार्च 1223 ईसवी का दिन था उनको उसी कमरे में सुपुर्द-ए-खाक (दफनाया)गया बाद में बाद में उनके शिष्य और उनके मानने वालों ने 1 से 6 रतब ख्वाजा साहब का उर्स मनाना शुरू किया |

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मजार शरीफ (दरगाह)

ख्वाजा साहब का इंतकाल उनकी उसी कमरे में हुआ जहां पर इबादत क्या करते थे और यही पर उनको दफन भी किया गया | उनका मजार लगभग 250 साल तक कच्चा रहा

सुल्तान गयासुद्दीन ने इसका निर्माण कराया दरगाह पर मौजूद गुंबद भी उन्ही का बनाया हुआ है गुंबद पर नक्काशी का कार्य सुल्तान महमूद दिन नसीरुद्दीन के जमाने में हुआ मजार शरीफ का दरवाजा मांडव के बादशाह ने बनवाया था

दरगाह के अंदर सुनहरी कटहरा मुगल  शहंशाह जहांगीर ने और चांदी का कड़ा शहजादी जहांआरा ने बनवाया दरगाह मुबारक के दरवाजे शहंशाह अकबर ने पेश किए थ वित्त विभाग में सोने का काम और मखमल की सुनहरी छतरी के नीचे चार सोने के कुमकुम ए लैंप सोने की जंजीर में लटके हुए हैं

अजमेर के प्रमुख दर्शनीय स्थल

बुलंद दरवाजा – इसका निर्माण सुल्तान महमूद खिलजी ने 1455 ईस्वी में करवाया था इसकी ऊंचाई 85 फुट है |

अकबरी मस्जिद – अकबर ने लाल पत्थर की मस्जिद 1570 से बनवाई थी मस्जिद की मेहराब की ऊंचाई 56 फुट है |

संदली मस्जिद – सुल्तान महमूद खिलजी ने इस मस्जिद का निर्माण *1425ईस्वीमें करवाया था बाद में मुगल बादशाह जहांगीर औरंगजेब ने इस का पुनः निर्माण करवाया उसका फर्स्ट संगमरमर का है |

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शाहजहानी मस्जिद – यह मस्जिद शाहजहां ने 1640 ईस्वीमें 240000 रुपए की लागत से बनवाई थी इसका निर्माण 14 वर्षों में पूरा हुआ |

शाहजहानी दरवाजा – शाहजहां ने 1638 में यह दरवाजा बनवाया था इसके ऊपर नक्कारखाना भी बना हुआ है |

बेगमी दालान – दरगाह शरीफ के पूर्व में स्थित इस दालान का निर्माण शहजादी जहांआरा ने 1646 में करवाया था |

होलिया लिया मस्जिद – यह मस्जिद कटिहार के खान बहादुर चौधरी मोहम्मद बक्स ने उस पवित्र जगह पर बनवाई थी जहां cख्वाजा साहब ने पहली बार नमाज अदा की थी|

महफिल खाना – इसे हैदराबाद के नवाब सिराजुद्दोला ने 1899 में बनवाया था यहां ओरसे के समय  में कव्वाली होती है यही दरगाह कमेटी की तरफ से दारुल उलूम मदरसा चलाया जाता है जिसमें अजमेर और पूरे देश भर से आए विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते हैं विद्यार्थियों के मुफ्त भोजन एवं रहने अधिक व्यवस्था कमेटी के होती है |

HOJ QUVIN MARI – इसका निर्माण  महारानी विक्टोरिया की दरगाह जियारत (दर्शन) के समय 1911 ईस्वी में हुआ |

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निजाम दरवाजा 

यह दरवाजा  दरगाह में प्रवेश का मुख्य दरवाजा है इसका निर्माण निजाम हैदराबाद मीर उस्मान अली खान 1912 – 1913 ईस्वी में करवाया था यह 70 फीट ऊंचा है इसके ऊपर बड़े बड़े न करें गाने का नगाड़े रखे हुए हैं जो शहंशाह अकबर ने पेश किए थे वह *प्रतिदिन 5 बार शहनाई *BAJAI जाती है |

जन्नती दरवाजा (Heaven Door)

यह दरवाजा दरगाह शरीफ के पश्चिम में स्थित है यह दरवाजा वर्ष में चार बार खोला जाता है
1  उर्स के मौके पर 1 से 6 रज्जब तक .
2   ईद उल फितर के मौके पर सुबह 4:00 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक
3   उर्स ख्वाजा उस्मान हारूनीके मौके पर छह सवाल को सुबह 4:00 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक
4  बकरा ईदके मौके पर सुबह 4:00 से दोपहर 2:30 बजे तक

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मजार बीबी हाफिज जमाल – ख्वाजा साहब की बेटी हाफिज जमाल का यह मजार जहांगीर ने बनवाया था |

सेहन चिराग – यह बुलंद दरवाजे के सामने स्थित है इसका निर्माण बादशाह अकबर ने करवाया था |

भारत की सबसे बड़ी देग अजमेर 

बुलंद दरवाजे के पश्चिम में रखी हुई यह देख शहंशाह अकबरने 1569 में पेश की थी इसमें लगभग 37 क्विंटल देग (Parsad) पकाया जा सकता है

छोटी देग (कड़ाही)- बुलंद दरवाजे के पूर्व में रखी हुई विदेश शहंशाह जहांगीर ने 1633 इश्क में पेश की थी इसमें लगभग 29 क्विंटल देग पकाया जा सकता है|

अजमेर शरीफ को भारत का मक्का भी कहा जाता है | मक्का सउदी अरब में स्थित है जो मुस्लिम धर्म का सबसे बड़ा धार्मिक स्थल है वहां पर मुस्लिम लोग हज पढ़ने के लिए जाते हैं

 

समसुद्दीन सुलेमानी, बीकानेर

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