गुप्त साम्राज्य का आर्थिक जीवन | Economic life of the Gupta Empire in Hindi

गुप्त साम्राज्य का आर्थिक जीवन

गुप्त साम्राज्य में कृषि सिंचाई व्यवसाय

गुप्त साम्राज्य में कृषि लोगों का मुख्य व्यवसाय था। कालिदास के अनुसार राष्ट्रीय आर्थिक विकास में कृषि व पशुपालन का बहुत महत्व है।कृषि अधिकांश वर्षा पर निर्भर थी । स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख में लिखा है कि अत्यधिक वर्षा के कारण सुदर्शन झील का पानी चारों ओर फैल गया था। इसके कारण वहां के निवासियों के लिए दुर्भिक्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। सुदर्शन झील सिंचाई हेतु काम में ली जाती थी। जूनागढ़ अभिलेख गुप्तकालीन सिंचाई का सर्वोत्तम उदाहरण है ।अमरकोश से ज्ञात होता है कि गुप्त काल में नदियों से नहर निकाली गई और तालाब भी बनाए गए । अग्नि पुराण के अनुसार कृषि की वृद्धि के लिए सिंचाई के साधन जुटाना राजा के प्रमुख 8 कर्तव्यों में से एक हैं। सिंचाई रहट (अरघट्ट) से भी होती थी।

वृहत्संहिता के अनुसार 3 फसलें होती थी तथा इसमें मौसम के विषय में अनेक भविष्यवाणियां हैं ।अमरकोश में हलों की बनावट का पूरा वर्णन दिया है तथा भूमि का अलग-अलग फसलों के लिए विभाजन किया गया है । अष्टांग संग्रह में चावल की 44 किस्मों का वर्णन है। इत्सिंग के अनुसार चावल व जौ प्रमुख फसलें थी । कालिदास ने गन्ना (ईख) व चावल धान की खेती का उल्लेख किया है । कालिदास के अनुसार काली मिर्च और इलायची मलय पर्वत नीलगिरी के पास बहुत होते थे काॅसमास ने भी मलय पर्वत को काली मिर्च का देश बताया है। वृहस्पति व नारद के अनुसार परिवार के मुखिया की मृत्यु के बाद उसकी भूमि उसके पुत्रों में बांट दी जाती थी। वराहमिहिर ने दुर्भिक्ष (अकाल) का वर्णन किया है।

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आर्थिक उपयोगिता की दृष्टि से भूमि के प्रकार 

  • क्षेत्र  – खेती के लिए उपयुक्त भूमि
  • वास्तु – निवास करने योग्य भूमि
  • खिल – जो भूमि जोती नहीं जाती थी ।
  • अप्रहत  – बिना जोती गई जंगली भूमि।
  • अदेवमातृक भूमि – वह भूमि थी जिस पर कृषि वर्षा पर आधारित न होकर कृत्रिम साधनों द्वारा की गई सिंचाई पर निर्भर थी। अर्थात वह भूमि जिस पर बिना वर्षा की अच्छी खेती हो सके

अमरकोश में 12 प्रकार की भूमि का उल्लेख है । नल भूमि माप में प्रयुक्त होने वाले धातु की छड या उसी लंबाई की रस्सी को कहा जाता था। पाटक भूमि का बड़ा माफ था । धनु व दंड भी भूमि नापते ।आढ़वाप, द्रोणवाप, कुल्यवाप भी भूमि के नाप थे। भूमि नापने वाले अधिकारी को क्षेत्रकर कहा जाता था। भूमि बिक्री से पहले पुस्तपालन व विषय पति से अनुमति लेनी पड़ती थी ।

पशुपालन जीविका का अन्य प्रमुख साधन था, अमरकोश में पालतू पशुओं की सूची दी गई है। हलदण्डाकार हल रखने वाले प्रत्येक कृषक द्वारा दिए जाने वाला एक कर था।

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गुप्त साम्राज्य में श्रेणी संगठन

गुप्तकाल में नालंदा, वैशाली आदि स्थानों में श्रेणियों सार्थवाह प्रथम खुलीक को अधिक की मुहरे, लिपियों एवं व्यापारिक श्रेणियों के संगठन व गतिविधियों को प्रदर्शित करती है। वृहस्पति के अनुसार नवीन श्रेणियों के निर्माण के समय सदस्यों को कुछ पूंजी जमा कर एक दूसरे में विश्वास व्यक्त करना पड़ता था। अपने व्यवसाय कार्यों के अतिरिक्त श्रेणी को सामाजिक कार्य में भी करने पड़ते थे । श्रेणियां बैंकों का भी कार्य करती थी।

नारद व बृहस्पति स्मृति में स्त्रियों की प्रशासनिक व्यवस्था का उल्लेख मिलता है । तक्षशिला, विदिशा व कौशांबी नगर की श्रेणी अपने सिक्के जारी करती थी । तक्षशिला का शासन व्यापारियों के एक निगम द्वारा संचालित किया जाता था। व्यापारियों की समिति को निगम कहा जाता था निगम का प्रधान सृष्टि कहलाता था व्यापारियों के समूह को सार्थक तथा उनके नेताओं को सार्थवाह का जाता था। श्रेष्ठी बैंकरों एवं साहूकार के रूप में कार्य करते थे ।

गुप्त वंश महत्वपूर्ण प्रश्न

गुप्तकाल में सोने व चांदी के सिक्के

गुप्त शासकों ने प्राचीन भारत में सर्वाधिक सोने के सिक्के चलाए । सोने के सिक्कों को गुप्त अभिलेखों में दिनार का जाता था। दिनार लेटिन भाषा के देनेरिश सबसे बनाएं गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं पर राज्यों के स्पष्ट चित्र हैं । इन स्वर्ण मुद्राओं का उपयोग भूमि की खरीद बिक्री में अधिक होता था। फाह्यान के अनुसार साधारण लोग वस्तु विनिमय में अथवा कौड़ियों से काम चलाते थे।

गुप्त साम्राज्य में सर्वप्रथम चांदी के सिक्के चंद्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिमी भारत में शकों के विरुद्ध विजय के पश्चात् प्रारंभ किए। चांदी के सिक्कों का प्रयोग स्थानीय लेन-देन में किया जाता था। भाईजान के अनुसार मगध में बहुत सारे नगर थे तथा यहां के धनी नागरिक बौद्ध धर्म का समर्थन करते थे । प्रथम कुलिक से तात्पर्य स्त्रियों के प्रधान तथा कुलिक निगम से तात्पर्य शिल्पियों के निगम से हैं।

गुप्तकालीन वाणिज्य और व्यापार (Trade and Commerce)

कुषाण काल की तुलना में गुप्त युग में लंबी दूरी के व्यापार में गिरावट आई । ग्राम आत्मनिर्भर इकाई के रुप में उभर कर सामने आ रहे थे । सिक्कों की जो बहुलता पूर्व गुप्तकाल में है वह गुप्तकाल में नहीं है । अतः मुद्रा प्रणाली का भी पतन हो रहा था। विदेशी व्यापार क्षेत्र में भी पाश्चात्य देशों से संपर्क कि अब कुषाण सातवाहन युगीन स्थिति नहीं रही। 364 ईसवी में रोमन साम्राज्य का विभाजन हो गया तथा पाश्चात्य देशों से हो रहे व्यापार में गिरावट आई । गुप्तकाल में चीन तथा बेजन्टाइन (पूर्वी रोमन) साम्राज्य के साथ व्यापारिक संबंध थे ।

चीन के साथ व्यापार

काॅसमास यूनानी लेखक के वर्णन में भारत चीन व्यापार में सिंगल दीप (श्रीलंका) एक महत्वपूर्ण बिचौलिए का काम करता था । फाह्यान स्वयं एक व्यापारी जहाज पर चीन गया था। कालिदास ने चीनाशुक चीन का रेशम का उल्लेख किया था। भारत-चीन व्यापार वस्तुओं की अदला-बदली पर आधारित था । क्योंकि सिक्के दोनों देशों में ही नहीं मिले हैं। ताम्रलिप्ति प्रमुख बंदरगाह था जहां से चीन व श्रीलंका के साथ व्यापार होता था।

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बैंजनटाइन साम्राज्य (पूर्वी रोमन) के साथ व्यापार

बैंजनटाइन साम्राज्य को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में रेशम और मसाले प्रमुख थे। पश्चिमी तट के प्रमुख बंदरगाह भड़ौच से पाश्चात्य देशों के साथ व्यापार होता था । काॅसमास ने कल्याण का व्यापारिक केंद्र के रूप में उल्लेख किया है पश्चिमी जगत से मदिरा, बहुमूल्य रत्न, औषधियां और जड़ी-बूटियां आदि आयात की जाती थी। कुषाण युग के संबध गंगा घाटी के शहर अब अपनी रौनक हो चुके थे । पाटलिपुत्र भी व्हेनसांग के काल में गांव बन चुका था।

गुप्त काल में भू धारण पद्धति पर प्रकाश डालने वाली 6 शब्दावलियां  

  1. निविधर्म,
  2. अक्षयनिवि धर्म,
  3. निवीधर्म अक्षयन,
  4. अप्रदाधर्म, 
  5. अप्रदानिवि धर्म और
  6. भूमिछिन्द्र न्याय

विविध धर्म का अर्थ है कि मूलधन सदा उतना ही रहेगा अर्थात भूमि को सदा एक्शन रखने की अनुमति,अक्षय निधि धर्म से तात्पर्य ऐसी भूमि से हैं ,जिससे अनवरत भू राजस्व प्राप्त होता रहे । इससे दान गृहीता को भूमि राजस्व का स्थाई रूप से दान कर दिया जाता था । इस धान का प्रचलन कुषाण काल से शुरू हुआ किंतु यह पद्धति गुप्त उत्तर काल में अत्यधिक लोकप्रिय हुई । गुप्त संवत की तिथि 319 ईसवी है यही तिथि वल्लभी संवत की है।

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गुप्त साम्राज्य में राजस्व व्यवस्था

प्राचीन परंपरा के अनुसार राजा भूमि का स्वामी होता था। अर्थशास्त्र में भी राजा को भूमिका स्वामी माना गया है । मनु व गौतम ने भी राजा को भूमि का अधिपति बताया है । 

भूमि कर

राजा भूमि कर के रूप में उपज का छठा हिस्सा लेता था। इस कर को भाग कहा जाता था। मनुस्मृति में भोग नामक कर का उल्लेख हुआ है । यह राजा को प्रतिदिन दी जाने वाली फल फूल इत्यादि की भेंट थी । उद्रंग व उपरी कर अन्य भूमि कर थे, उद्गग स्थल किसानों से तथा उपरीकर स्थाई किसानों से लिया जाता था । गुप्त काल में भूमि कर में वृद्धि हुई तथा व्यापारिक करो में कमी हुई। कृषक अपना भूमि कर हिरण्य व दोनों आने के रूप में दोनों रूप में देते थे । विदेशी वस्तुओं के आयात पर लगा भूतोंवातप्रत्याय कहलाता था । शुल्क या बिक्रीकर भी एक कर था।

भूमि दान के साथ गांव से उत्पन्न होने वाली आय भी गणिता को सौंप दी जाती थी । अतः सामंती व्यवस्था में राजस्व पर केंद्रीय नियंत्रण कमजोर होता जा रहा था। भूपति कृषकों व उनकी स्त्रियों से बेकार भी ले सकता था। बेगार को विष्टी कहा जाता था। वर्णिको व शिल्पियों की भी विष्टी देनी पड़ती थी।

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गुप्त साम्राज्य में राजस्व के अन्य स्रोत

भूमि रत्न गडा गुप्तधन, खान, नमक इत्यादि  थे। अगर गुप्त खजाना दान दी गई भूमि में से निकले तो इस धन पर दान ग्रहगति का अधिकार माना जाता था । गुप्त काल के प्रारंभिक दिनों में केंद्रीय प्रांतों में राजा की अनुमति के बिना सामंत को भूमि दान देने का अधिकार नहीं था। परंतु छठी शताब्दी से राजा को अनुमति के बिना भी भूमि दान देने की परंपरा शुरू हो गई ।

मंदिरों तथा ब्राह्मणों को शैक्षणिक व धार्मिक उद्देश्य से जुड़कर मुक्त भूमि दान दी जाती थी। उसे अग्रहार कहा जाता था। बाद में गुप्त शासकों ने राजकीय कर्मचारियों को भी वेतन के बदले भूमि दान देना शुरु कर दिया तथा अनुदान व राजकीय पद वंशानुगत होने लगे ।
भूमि कर संग्रह के लिए सर्वाधिक करण नामक अधिकारी होता था । भूमि अभिलेखों को सुरक्षित रखने के लिए माहाअक्षपटिलक तथा करणी नामक अधिकारी होते थे । भूमि संबंधी विवादों के निपटारे के लिए न्यायाधिकरण नामक अधिकारी होते थे।​

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