जयगढ़ दुर्ग(Jaigad Fort)

जयगढ़ दुर्ग(Jaigad Fort)

राजस्थान का यह बहुचर्चित और रहस्यमयी दुर्ग 

भारतीय दुर्ग, स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है 

जो आमेर के कछवाहा शासकों के प्रभुत्व और 

प्रताप का  प्रतीक बन इतिहास के अनेक घटना, 

प्रसंगों को संजोए शान से खड़ा है!

 श्रेणी – गिरि दुर्ग

 अन्य नाम- चिल्ह का टोला- अरावली पर्वत श्रेणी के चिल्ह का टीला / चील का टीला( हिल्स ऑफ ईगल) पर स्थित
संकटमोचक दुर्ग

 निर्माण- इस दुर्ग के निर्माण के विषय में प्रामाणिक जानकारी का अभाव है|

 अंग्रेज रेजिडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल एच एल  शावर्स की पुस्तक “Notes on Jaipur (1916)”के अनुसार – Jaighar fort was commenced by -Mansingh-1 about 1600 A.D. Additions were made by Mirza Raja Jai singh and it was completed in the 18th century by Sawai Jai Singh.

 ठाकुर हरनाथ सिंह के अनुसार –मानसिंह प्रथम द्वारा दुर्ग का निर्माण प्रारंभ किया गया व मिर्जा राजा जय सिंह प्रथम द्वारा दुर्ग निर्माण कार्य पूर्ण करवाने पर दुर्ग नाम जयगढ़ पड़ा|

 जगदीश सिंह गहलोत, डॉक्टर गोपीनाथ शर्मा और कुंवर देवी सिंह मंडावा के अनुसार- निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया|

  किले का विवरण-
 अरावली पर्वत श्रंखला में आमेर किले से लगभग 400m.की ऊंचाई पर स्थित|
 किले के चारों ओर की मोटी दीवारों का निर्माण लाल बलुआ पत्थर द्वारा|
 लंबाई -3 km.(1.9 मील)
 चौड़ाई -1km.(0.62 मील)
 किले के केंद्र में वॉच टावर स्थित है जिससे आसपास के क्षेत्र का नजारा देखा जा सकता है|
  किले के प्रवेशद्वार- 
डूंगर दरवाजा -नाहरगढ़ की ओर से
अवनी दरवाजा (फूलों की घाटी)-आमेर महल की ओर से
 दुर्ग दरवाजा -‘सागर’ जलाशय (कृत्रिम झील) की ओर से

जयगढ़ दुर्ग के प्रमुख स्थल
विजयगढी–  जयगढ़ के भीतर स्थित “लघु अंतः दुर्ग”
 सवाई जय सिंह अपने अपने छोटे भाई विजय सिंह (चिमाजी) को यहीं बंदी बनाकर रखा था बाद में इसका उपयोग शस्त्रागार के रूप में किया जाने लगा|
 दीया बुर्ज – विजयगढी के पार्शव में स्थित सात मंजिला प्रकाश स्तंभ|
 राम हरिहर मंदिर — निर्माण 10 वीं सदी|
 काल भैरव मंदिर –निर्माण 12 वीं सदी|
कठपुतली घर –राजाओं के मनोरंजन के लिए|

 जलेब चौक
 सुभट निवास (दीवान-ए- आम)
 खिलबत निवास (दीवान-ए-खास)
 लक्ष्मी निवास
 ललित मंदिर
 विलास मंदिर
 सूर्य मंदिर
 राणावत जी का चौक
आराम मंदिर

 संग्रहालय 
अवनी दरवाजे के बाईं ओर स्थित इसमें जयपुर के राजघराने के सदस्यों के चित्र ,मुहर व 15वीं सदी का पीकदान व महलों की हस्त लिखित योजना आदि संग्रहित है|

 शस्त्रागार
इसमें कई तरह की तलवारें ,भाले ,बंदूकें व तोप के गोले रखे हैं |
शस्त्रागार में रखी तोपें_–
✔ शिव बाण
✔नागिन
✔ रामबाण
✔  सिंहासन
✔कड़क बिजली
✔ धूमबाण
✔ माधुरी
✔भैरवी
✔रणचंडी
✔शेरजंग
✔फतह जुंग
✔नाहर मुखी
✔मुल्क मैदान

तोप ढालने का कारखाना–
✔ निर्माण – मानसिंह प्रथम ने 1587 में
✔लेथ मशीन -भारत का एकमात्र किला जिसमें बैलों से चलने वाली लेथ मशीन (तोप बनाने वाली मशीन) मौजूद है|

 जयबाण तोप (रणबंका)
✔ निर्माण 1720 में सवाई जयसिंह द्वितीय ने करवाया
✔ एशिया की सबसे बड़ी तोप जो कि जयगढ़ में रखी है
✔ नाल की लंबाई 20 फीट, गोलाई 8 फीट ,ऊंचाई 7.5 फिट
✔वजन लगभग 50 टन
✔ इससे 50 किलो के 11 इंच व्यास के गोले दागे जाते थे
✔ 22 मील तक  मारक क्षमता 

 जयबाण का परीक्षण-
केवल एक बार ,जिसमें गोला चाकसू के निकट लगभग 50 किलोमीटर दूर जाकर गिरा जिससे वहां पर एक तालाब का निर्माण हुआ जो आज भी गांव के लोगों की प्यास बुझा रहा है|
✔ जयबाण की नली पर नक्काशी की हुई है *इसके मुंह पर ‘हाथी’ पृष्ठ भाग पर ‘पक्षी- युगल’ व मध्य में ‘ वल्लरियोंं ‘के चित्र बने हैं|
✔ इसके द्वारा 360 डिग्री मैं किसी भी दिशा में फायर किया जा सकता है|
✔ आमेर शासकों  के मुगलों से अच्छे संबंध होने के कारण इस तोप का कभी भी किसी भी युद्ध में प्रयोग नहीं किया गया|

जय गढ़ से जुड़े कुछ अन्य तथ्य —
✔ जनश्रुति के अनुसार जयपुर के कछवाहा शासकों ने अपना खजाना इसी किले में छुपाया था|
✔ इसी खजाने की तलाश में 1975- 1976 के दौरान प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के द्वारा इस किले की खुदाई करवाई गई थी|
✔  जय गढ़ में स्वतंत्रता प्राप्ति तक सिवाय स्वयं महाराज के व उनके द्वारा नियुक्त दो किलेदारों (जो कि महाराज के परम विश्वस्त सामंतों में से हुआ करते थे)के अलावा किसी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं थी यहां तक की महाराज स्वयं भी अपने इन विश्वस्त सामंतों में से एक के बिना दुर्ग में प्रवेश नहीं करते थे|
✔ इस किले  का प्रयोग राजनीतिक कैदियों को रखने के लिए किया जाता था ऐसा माना जाता है की जो व्यक्ति एक बार जय गढ़ की जेल में चला गया वापस जीवित लौट कर नहीं आया|
✔ सिटी पैलेस जयपुर के पोथीखाने व कपड़द्वारे में जयगढ़ का नक्शा उपलब्ध है जो 18वी शताब्दी ईस्वी के पूर्वार्ध का है|
✔ जयगढ़ में पानी के विशाल टांके बने हैं|
✔ तोप रखने के स्थान को दमदमा कहते थे|

अस्मिता मिश्रा 

देवली 

टोंक