द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन

🌼द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन की घोषणा-*1 जनवरी 1932
*🌼द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत-*4 जनवरी 1932

🌼द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन करने का कारण-गांधी इरविन पैक्ट समझौता की शर्तों को ना मानना ब्रिटिश सरकार द्वारा औपनिवेशिक स्वराज्य देने की बात स्वीकार नहीं करना
*🌼द्वितीय अवज्ञा आंदोलन का प्रथम स्थगन-*8 मई 1933
🌼द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन का अंतिम-स्थगन 7 अप्रैल 1934
*🌼द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन को बंद करने की घोषणा-*18 19 मई 1934 

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🍁🌲🍁द्वित्तीय सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का कारण🍁🌲🍁

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से लौटकर वापस आने पर गांधी जी द्वारा पुन: सविनय अवज्ञा आंदोलन कब प्रारंभ किया गया जो की द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन कहलाया है

द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने के दो प्रमुख कारण है

1. प्रथम-इरविन की जगह नियुक्त हुए गवर्नर जनरल वेलिगंटन द्वारा इरविन समझौते को लागू नहीं किया जाना और आंदोलन को कुचलने के लिए दमनात्मक कार्यवाही करना
2. दुसरा-महात्मा गांधी का द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार के व्यवहार से निराश होना और ब्रिटिश सरकार द्वारा औपनिवेशिक स्वराज्य की मांग को स्वीकार करना

  • महात्मा गांधी जी की इंग्लैंड प्रवास के समय इस आंदोलन को सरकार ने बर्बरता से दबाना चाहा
  • इस बीच देश के अनेक भागों में किसानों में असंतोष की लहर फेल चुकी थी
  • विश्वव्यापी मंदी के कारण खेतिहर पैदावार के दाम गिर गए थे और लगान व मालगुजारी का बोझ उनके लिए असहनीय  हो गया था
  • दिसंबर 1930 में कांग्रेस ने “न लगाना न टैक्स देने” का अभियान चलाया था
  • फलस्वरूप 26 दिसंबर 1930 को जवाहर लाल नेहरू को गिरफ्तार कर लिया गया
  • पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में सरकार की मालगुजारी संबंधी नीति के खिलाफ खुदाई खिदमतगार किसान आंदोलन चला रहे थे
  • 24 दिसंबर को उनके नेता खान अब्दुल गफ्फार खाँ को भी गिरफ्तार कर लिया गया था
  • किसान आंदोलन पूरे देश में तेजी के साथ फेल रहा था
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के बाद भारत आते ही गांधीजी ने पुनः आंदोलन की बागडोर संभाली
  •  1 जनवरी 1932 को कांग्रेस कार्यसमिति ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को दोबारा शुरू करने का निर्णय लिया
  • दूसरी बार यह आंदोलन 4 जनवरी 1932 को प्रारंभ हुआ था
  • दूसरे सविनय अवज्ञा आंदोलन को भी जनता का पूर्ण समर्थन मिला इस आंदोलन में जनता द्वारा बड़े पैमाने पर भाग लिया गया
  • जनता के समर्थन के लिए विपिन चंद्र के शब्दों में जनता ने बड़ी दिलेरी से इस दमन का मुकाबला किया
  • लेकिन गांधीजी और अन्य नेताओं को इस आंदोलन को गति प्रदान करने का अवसर नहीं था नेतृत्व हीन और थके हुए इस जनांदोलन को सरकारी दमन ने कुछ ही महीनों में के भीतर कुचल दिया
  • इस दमन के प्रभाव का अनुमान से लगाया जा सकता है कि आंदोलन के पहले 4 महीने में 80000 सत्याग्रहियों ने गिरफ्तारी दी थी
  • लेकिन अगस्त 1933 में सत्याग्रही बंदियों की संख्या मात्र साढे चार हजार रह गई थी
  • आंदोलन को कमजोर बनाने में सरकारी दमन के साथ-साथ गांधी की कार्य नीति ने भी योगदान दिया
  • 1932 के दूसरे भाग में उन्होंने राष्ट्रीय संघर्ष में रुचि लेना कम कर दिया
  •  इसके अतिरिक्त जिस समय यह आंदोलन अपने चरम पर था उसी समय ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने अपना प्रसिद्ध सांप्रदायिक पंचाट (अधिनिर्णय) की घोषणा कर आंदोलन की दिशा बदल दी थी
  • ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड के सांप्रदायिक पंचाट को लागू होने से रोकने के लिए महात्मा गांधी ने सितंबर 1932 में आमरण अनशन आरंभ किया
  • इसके पश्चात 8 मई 1933 को महात्मा गांधी ने अपनी शुचिता के लिए 21 दिन का अनशन आरंभ किया
  • इस अवधि के बीच में इन्होंने द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन को 6 सप्ताह के लिए स्थगित करवा दिया
  • द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन के स्थगन पर  तीखी प्रतिक्रिया हुई
  • जुलाई 1935 पर सामूहिक सविनय अवज्ञा आंदोलन को व्यक्तिगत अवज्ञा आंदोलन के रूप में चलाया गया
  •  कांग्रेस के संगठन और संघर्ष समितियॉ भंग कर दी गई कांग्रेस को गैर सरकारी संस्था घोषित कर दिया गया
  • व्यक्तिगत आंदोलन भी सरकारी दमनचक्र से नहीं बच सका स्वयं गांधी जी को 1 अगस्त 1933 को कैद कर लिया गया
  •  आंदोलन में लोगों के उत्साह में कमी देखते हुए गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को 7 अप्रैल 1924 को स्थगित कर दिया था
  • गांधीजी के इस कार्य की सुभाष चंद्र बोस जवाहरलाल नेहरु और विट्ठल भाई पटेल जैसे नेताओं में आलोचना की उन्होंने कहा गांधी जी ने पिछले 13 वर्षों की मेहनत पर पानी फेर दिया
  •  18 -19 मई 1934 को कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में आंदोलन को बंद करने का निर्णय लिया
  • इस प्रकार महात्मा गांधी का चलाया गया सविनय अवज्ञा आंदोलन का परिणाम अंत में असफल रहा
  • सुभाष चंद्र बोस विट्ठल भाई पटेल जैसे अनेक नेताओं ने महात्मा गांधी को राजनीतिक दृष्टि से एक असफल नेता बताया
  •  महात्मा गांधी जी के इस कार्य से कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्यों ने महात्मा गांधी को कांग्रेस से निष्कासित करने की मांग की थी
  • अक्टूबर 1934 में  महात्मा गांधीजी ने अपना पूरा समय हरिजनों के कल्याण में लगाने के लिए सक्रिय राजनीति से स्वयं को हटा लेने का निश्चय किया
  • फल स्वरुप 29 नवंबर 1934 को महात्मा गांधी कांग्रेस से अलग हो गए

 🍁द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन की असफलता पर विभिन्न विचारकों की प्रतिक्रियाएं🍁
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द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन के स्थगन और असफलता पर तीखी प्रतिक्रिया करते हुए सुभाष  चंद्र बोस और वल्लभभाई पटेल ने वियना से जारी किए गए अपने वक्तव्य में कहा महात्मा गांधी द्वारा द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने का सबसे ताजा काम असफलता की स्वीकृति है गांधीजी की असफलता से वह निष्कर्ष पर पहुंचा की एक राजनीतिक नेता के रुप में श्री गांधीजी असफल हुए हैं और अब समय आ गया है जब गाने स्थान के आधार पर नए तरीके से कांग्रेस का मौलिक पुनर्गठन किया जाए इसके लिए एक नया नेता आवश्यक है

  • रजनी पाम दत्त जैसे विचारक आंदोलन की असफलता के लिए जनता को नहीं बल्कि आंदोलन के नेतृत्व को और उसके समझौतावादी चरित्र को उत्तरदायी मानते हैं
  • सुमित सरकार के विचार में आंदोलन में आए मोड़ के लिए भारतीय पूंजीपति वर्ग एक सीमा तक जिम्मेदार था
  • जो कुछ भी हो अंत में रजनी पाम दत्त के शब्दों में यही कहना होगा 1930 से 1934 में संघर्ष की जो महान लहर उठा थी उसके दुखद अंत में हमें एक क्षण के लिए भी यह नहीं भूल जाना चाहिए कि इस आंदोलन की उपलब्धियां भी रही है
  • यह संघर्ष व्यर्थ नहीं गया था इस संघर्ष की भट्टी में तपकर इस आंदोलन ने जनता में एक नई और अपेक्षाकृत अधिक राष्ट्रीय एकता, आत्मविश्वास ,गौरव और संकल्प को जन्म दिया


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🍁सविनय अवज्ञा आंदोलन से लक्ष्य की प्राप्ति ना होने पर गांधीजी का जवाब🍁

  • महात्मा गांधी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन खत्म करने पर कई तीखी प्रतिक्रियाएं और कई सवाल खड़े हो गए
  • जैसे सविनय अवज्ञा आंदोलन से लक्ष्य की प्राप्ति क्यों नहीं हो सकी? इसका क्या कारण था? यह क्यों सफल नहीं हुआ?
  •  इन सभी प्रश्नों के उत्तर में गांधीजी के पास एक सीधा-साधा उत्तर मौजूद था ​
  • गांधीजी के शब्दों में जनता अभी तक सत्याग्रह का संदेश ग्रहण नहीं कर पायी है क्योंकि यह जनता तक पहुंचते-पहुंचते अशुद्ध हो जाता है मेरे लिए अब यह बात साफ हो गई है कि आध्यात्मिक अस्त्रों के इस्तेमाल का तरीका जब गैर आध्यात्मिक माध्यमों से बताया जाता है तो वह अपनी ताकत खो बैठते हैं

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