नासीरुद्दीन खुसरव शाह

नासीरुद्दीन खुसरव शाह

(15 अप्रैल से 7 सितंबर 1320 )

मुबारक शाह ( Mubarak shah) की हत्या के बाद खुसरो खां ने नसीरुद्दीन खुसरव शाह की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा

उसने अपने नाम की खुत्बे पढ़वाये और सिक्के भी चलवाए ।

उसने पैगंबर के सेनापति की उपाधि धारण की

उसके शत्रुओं ने उसके विरुद्ध इस्लाम का शत्रु और इस्लाम खतरे में है का नारा लगाया

नासिरुद्दीन खुसरो शाह Hindu Religion से परिवर्तित मुसलमान था यह मूर्ति है गुजरात का हिंदुस्तान जिसने इस्लाम धर्म स्वीकार किया

उसका शासनकाल Indian Muslims द्वारा राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का द्वितीय प्रयास था

1- प्रथम प्रयास– नासिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में इमामुद्दीन रेहान ने किया था

2- अपने सिंहासन को सुरक्षित रखने के लिए नासिरुद्दीन खुसरव शाह ने–खिलजी वंश के प्रति वफादार सरदारों और अलाउद्दीन के शेष जीवित पुत्र की हत्या करवा दी

उसने देवल रानी से विवाह किया जो खिज्र खां और उसके बाद उसका भाई मुबारक शाह की पत्नी रह चुकी थी

कुछ अन्य सरदारों को सम्मान और पद देखकर उसने अपने पक्ष में कर लिया

उसने निजामुद्दीन ओलिया जैसे Religious people का भी नैतिक समर्थन प्राप्त कर लिया था

दीपालपुर का राज्यपाल और सीमा रक्षक गाजी मलिक तुगलक एकमात्र अधिकारी था जिसने खुसरव शाह के शासन को स्वीकार नहीं किया उसने इस्लाम खतरे में है का नारा दिया और नासिरुद्दीन खुसरो से युद्ध करने का निश्चय किया

गाजी मलिक की सेना में गीज,तुर्क मंगोल रूमी,तजीक ,खुरासानी मेवाती और दोआब के हिंदू राजपूत शामिल थे

गाजी मलिक ने पहले आईनुलमुल्क और सिवीस्तान, मुल्तान और समाना के सूबेदारों को विद्रोह के लिए प्रेरित किया लेकिन किसी ने उसका साथ देने के लिए अपने मन को तैयार नहीं किया

अंत में उसने निम्न अधिकारियों और उन प्रदेशों की जनता को इस्लाम के नाम पर विद्रोह करने के लिए उकसाया

गाजी मलिक तुगलक दिल्ली की ओर प्रस्थान करने लगा

सर्वप्रथम उसका मुकाबला समाना के सुबेदार यकलाकी खॉ से हुआ,यकलाकी पराजित हुआ और भाग खड़ा हुआ

सिरसा के निकट नासिरुद्दीन खुसरो शाह का भाई हिसामुद्दीन ने विद्रोह किया लेकिन वह भी पराजित हुआ और भाग गया

अंत में 5 सितंबर 1320 ईस्वी को इंद्रप्रस्थ के निकट गाजी मलिक और नासिरुद्दीन खुसरो की सेना के मध्य मुकाबला हुआ

नासिरुद्दीन पराजित हो कर भाग गया लेकिन तिलपत के निकट पकड़ा गया उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया गया जैसा उसने मुबारक शाह खिलजी के साथ किया था। खुशरव शाह का सिर धड़ से अलग कर मार डाला गया

अमीरों ने गाजी मलिक तुगलक को सत्ता ग्रहण करने का आग्रह किया लेकिन वह तैयार नहीं हुआ

उसने निवेदन किया कि यदि कुटुंब का कोई राजकुमार बचा हो तो सुल्तान घोषित कर दिया जाना चाहिए और यदि नहीं बचा हो तो उपस्थित योग्य अमीरों में से किसी एक को सत्ता दे देनी चाहिए

7 सितंबर 1320 ईस्वी को गाजी मलिक ने अलाउद्दीन खिलजी के हजार स्तंभो वाले महल में प्रवेश किया

8 सितंबर 1320 ईस्वी को गियासुद्दीन तुगलक के नाम से सिंहासन पर बैठा