प्रजामंडल आंदोलन के प्रमुख नेता (part 02)

प्रजामंडल आंदोलन के प्रमुख नेता (part 02)

 गोकुल लाल असावा 
गोकुल लाल असावा का जन्म 2 अक्टूबर 1901 को देवली कैंटोनमेंट के एक सामान्य माहेश्वरी परिवार में हुआ था गोकुल लाल असावा शाहपुरा राज्य के रहनेवाले थे उनकी प्रारंभिक शिक्षा शाहपुरा के मिडिल स्कूलमें हुई थी 1926 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बीए और 1928 में दर्शनशास्त्र में M.A किया था इसके बाद उन्होंने कोटा के हर्बर्ट कॉलेज में अध्यापन कार्यशुरु किया लेकिन इनकी राष्ट्रीय गतिविधियों को देखकर इन्हें कॉलेज सेवा से पृथक कर दिया गया
इसके बाद गोकुल लाल असावा कोटा से अजमेरआ गया और नमक सत्याग्रह में सक्रिय रुप मे जुट गए यहां से गोकुल लाल असावा का जेल जाने का सिलसिला शुरू हुआ और 1930 से 32 के बीच में इन्हें चार बार जेल में जाना पड़ा गोकुल लाल असावा का अधिकांश समय अजमेर में ही व्यतीत हुआ
अजमेर कि कांग्रेस के माध्यम से उन्होंने अपने आप को देश के प्रति समर्पितकर दिया गोकुल लाल असावा 1930 से 1946 तक निरंतर अजमेर मेरवाडा प्रांतीय कांग्रेस कमेटी की व्यवस्थापिका सभाके सदस्य रहे
राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के निर्माणके बाद गोकुल लाल असावा 1951 तक इसकी कार्यकारिणी के सदस्यबने रहे1952 के बाद उन्होंने अपने आप को सार्वजनिक जीवन की राजनीति से प्रथक कर लिया गोकुल लाल असावा को दक्षिण पूर्व रियासतो को मिलाए गए संघ में मुख्यमंत्री बनाया गया इस संघ में मेवाड़ शामिल नहीं था संघ का उद्घाटन 25 मार्च 1948को किया गया था

 हरिभाऊ उपाध्याय (Haribhau upadhyay)
हरिभाऊ उपाध्याय का जन्म 9 मार्च 1892 को ग्वालियर राज्य के भौंरासा गांव में हुआ था उपाध्याय पत्रकारिता और राजनीति के क्षेत्र में कार्य करते थे कर सस्ता साहित्य मंडल की संस्था का काम संभाला था सस्ता साहित्य मंडल की स्थापना घनश्याम दास बिरला और जमुनालाल बजाज के सहयोग से हुई थी आंदोलन में भाग लेने के कारण हरिभाऊ उपाध्याय पहली बार जेल गए थे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1952 में हरिभाऊ उपाध्याय अजमेर केंद्र प्रशासित प्रदेश ( Union territory) के मुख्यमंत्रीबने थे अजमेर का राजस्थान में विलय होने के बाद 1956 से लगभग 10 वर्षों तक हरिभाई उपाध्याय मंत्रिमंडल के सदस्यबने हैं 

वह राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर के कुलपति भी रह चुके हैं उन्होंने महिला शिक्षा सदन हटुंडी ,गांधी आश्रम हटूंडी और गांधी सेवा संघ की स्थापना की थी उपाध्याय द्वारा 21 पुस्तकों की रचना और लगभग 24 ग्रंथों का अनुवाद किया गया था साहित्य सेवा के लिए इन्हें अनेक साहित्य पुरुस्कार दिए जा चुके हैं
25 अगस्त 1972 को अजमेर में हरिभाऊ उपाध्याय का निधन हुआ था हरिभाऊ उपाध्याय ने वाराणसी से औदुंबर नामक एक मासिक पत्रिकासंपादन किया था 1916 से 1919 तक इन्होने महावीर प्रसाद द्विवेदी के साथ सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन किया उन्होंने अपना कार्य क्षेत्र राजस्थान को बनाया इन्होंने युगधर्म ,सर्वोदय की बुनियाद ,विश्व की विभूतियां, बापू के आश्रम से साधना के पथ,पर ग्रंथों की रचना की थी
महात्मा गांधी की आत्मकथा माय एक्सपेरिमेंट विथ ट्रुथ ,पट्टाभि सीतारामैया के ग्रंथ द हिस्ट्री ऑफ कांग्रेसजवाहरलाल नेहरू की पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया का हिंदी में अनुवाद किया था इन्होंने गीता का सप्तश्लोकी हिंदी अनुवाद किया है

 माणिक्य लाल वर्मा 
माणिक्य लाल वर्मा का जन्म 1887 को बिजोलिया ठिकाने के एक सामान्य कायस्थपरिवार में हुआ था उन्होंने अपने जीवन का प्रारंभ अध्यापक के रूप में शुरू किया था लेकिन विजय सिंह पथिक जी के संपर्कमें आने के बाद यह बिजोलिया में सामंती शोषण और उत्पीड़न के विरुद्ध किसानों को जागृत करने में अनुकरणीय कार्य करनेलगे
माणिक्य लाल वर्मा कवि होने के साथ साथ एक अच्छा गायक भी था उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से हताश और निराश व्यक्तियों में भी उत्तेजना का संचार भर दिया था कविता द्वारा भीरू मन में वीरत्व का संचारकर देना वर्मा जी की एक विशेषता थी
माणिक्य लाल वर्मा को पहली बार बिजोलिया आंदोलन में भाग लेने के कारण उदयपुर राज्य से निष्कासित कर दिया गया था 1924 में माणिक्य लाल वर्मा ने सागवाड़ा में खाण्डलोई आश्रम की स्थापना की यहां से इन्होंने भीलों के लिए कार्य करना प्रारंभ किया
वर्मा जी की प्रेरणा से भोगीलाल पांड्या व गौरी शंकर उपाध्याय ने 1935 में वागड सेवा मंदिर की स्थापना की गई 
स्वतंत्रता आंदोलन के समय उन्होंने प्रसिद्ध गीत पंछीड़ा की रचनाकी थी माणिक्य लाल वर्मा ने 24 अप्रैल 1938को मेवाड़ प्रजामंडलकी स्थापना की थी माणिक्य लाल वर्मा को मेवाड़ राज्य के संयुक्त राजस्थान में विलय हो जाने से उन्हें मुख्यमंत्री बनायागया माणिक्यलाल वर्मा को भारतीय संविधान सभा में मेवाड़ के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया था माणिक्य लाल वर्मा ने मृत्युपर्यंत शोषित और पीड़ितों की सेवा करते हुए अपना जीवन निर्वाह किया 14 जनवरी 1969 को माणिक्य लाल वर्मा का निधन हो गया

 भोगीलाल पांड्या 
भोगीलाल पांडेय का जन्म 13 नवंबर 1904 को एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था भोगीलाल पांडेय डूंगरपुर जिले के सीमलवाडा गांव के रहने वाले थे भोगीलाल पांडेय को वागड़ का गांधी कहा जाता था
भोगीलाल पांडेय का जीवन एक ऐसे राजतत्रं के विरुद्ध संघर्ष की कहानी है जिस में शिक्षा के कार्य कानूनन तौर पर बंद रखे थे और शिक्षा का प्रसार करने वाले कार्यकर्ताओं को राजद्रोह के अपराध में गिरफ्तार कर सजा दी जाती थी
1919 में 15 वर्ष की अल्प आयु में ही डूंगरपुर में एक विद्यालय की स्थापना की इसी क्रम में इन्होंने वागड़ सेवा मंदिर नाम से एक संस्थास्थापित की इसकी गतिविधियों से आतंकित होकर रियासत ने इस संस्था को बंदकर दिया था
इसके बंद हो जाने पर इन्होंने सेवा संघ संस्था का गठन किया 1942 में भारत छोड़ो आंदोलनमें भोगीलाल पांड्या ने रियासत के कोने-कोने में इसका प्रचार किया और 1944 में भी रियासती शासन के विरूद्धउठ खड़े होने के लिए अनेक सभाओं का आयोजन किया 1944 मे डूंगरपुर राज्य प्रजा मंडलका गठन किया 1948 मे बाद मे डूंगरपुर रियासत भी राजस्थान संघ में मिल गई थी और भोगीलाल पांड्या इसमें मंत्री बनाए गए थे सुखाड़िया मंत्रिमंडल में भी भोगीलाल पांड्या दो बार मंत्री बनाए गए 1975 मे पदम भूषण से सम्मानित किया गया भोगीलाल पंड्या को प्रजा मंडल आंदोलन का प्रमुख नेता कहा जाता था भोगीलाल पांड्या ने डूंगरपुर बांसवाड़ा क्षेत्र के आदिवासियों को आजादी की लड़ाई से जोड़ने के लिए प्रेरित किया आदिवासियों के सामाजिक और आर्थिक विकासके लिए उन्होंने कई कार्य किए थे आजादी के बाद भोगीलाल पांड्या राजनीति में सक्रिय हो गए 1952 और 1957 के विधानसभा चुनाव में सागवाडा से चुनेगए थे
भोगीलाल पांडेय का निधन 31मार्च 1981 को जयपुरमें हुआ था

 गणेश लाल व्यास- “उस्ताद” 
गणेश लाल व्यास का जन्म 21 मार्च 1907 को जोधपुरमें हुआ था गणेश लाल व्यास ने भीम राजपुरोहित के साथ मिलकर मारवाड यूथ लीग की स्थापना की थी
गणेश लाल व्यास ने गरीबों की आवाज, बेकसों की आवाज, इंकलाबी तराने नामक पुस्तक के प्रकाशित की गई थी  गणेश लाल व्यास की इंकलाबी तराने नामक पुस्तक को सरकार ने जब्त कर लिया था आजादी की लड़ाई के कारण गणेश लाल व्यास को कई बार जेलजाना पड़ा
 गणेश लाल का निधन 1965 में हुआ था
 राजस्थानी भाषा साहित्य और संस्कृति अकादमीद्वारा गणेश लाल व्यास के नाम से ₹11000 का साहित्यिक पुरस्कार दिया जाता है

 कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी 
 दुर्गा प्रसाद चौधरी का जन्म 18दिसंबर 1906 को नीम का थाना मे प्रसिद्ध अग्रवालपरिवार में हुआ था
 दुर्गा प्रसाद चौधरी स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और समाजसेवी”थे
 प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी रामनारायण चौधरी दुर्गा प्रसाद जी के बड़े भाई थे
 दुर्गा प्रसाद चौधरी ने स्वतंत्रता आंदोलन में 1931से भाग लेना प्रारंभ किया
 दुर्गाप्रसाद चौधरी को कप्तान साहब के नामसे जाना जाता है
 क्योंकि यह 1930 से 1945 तक कांग्रेस सेवा दल के कप्तान रहे थे ,इसलिए इन्हें कप्तान साहबकहते हैं
 दुर्गा प्रसाद चौधरी ने 1936 में अजमेर से साप्ताहिक समाचार पत्र नवज्योति का प्रकाशन किया था
 दुर्गा प्रसाद चौधरी 1942में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण जेलमें गए थे
 यह 3 वर्ष तक जेल में बंद रहे थे
 इससे पूर्व यह एक बार 3 माह के लिए दूसरी बार 6माह के लिए तीसरी बार 1 वर्ष के लिए जेल में रहे थे
 दुर्गा प्रसाद चौधरी ने 1962 के चीन युद्ध के समय असम में मेक मोहन रेखा पर जा कर रिपोर्टिंग की थी
 दुर्गा प्रसाद चौधरी का निधन 1992 में हुआ था

 भंवरलाल सर्राफ 
 भंवर लाल सर्राफ का जन्म जोधपुर के अग्रवाल परिवारमें हुआ था
 भंवर लाल सर्राफ ने मारवाड़ रियासत के गांव में निरंकुश  सामंतवाद के विरुद्ध प्रचारकिया था
 भवरलाल सर्राफ को “”पोपाबाई की पोल”” नामक पुस्तक का वितरण करने के कारण 5 वर्ष की सजा हुई थी
 भंवरलाल सर्राफ ने गणेशीलाल व्यास “उस्ताद” कि पुस्तक बेकसों की आवाज को कमर्शियल प्रेस नई दिल्ली से छपवाया था
 9 अप्रैल 1940 को जोधपुर राज्य ने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगादिया था
 भंवरलाल सर्राफ ने 1940 में योगीराज ब्रह्मचारी द्वारा लिखित पुस्तक अमानत का हिसाब को ब्यावर के रामनिवास शर्मा के माध्यम से प्रकाशितकरवाया था
 इस पुस्तक में जोधपुर राज्य के प्रधान मंत्री डोनाल्ड फील्ड के निरंकुश प्रशासनके विरुद्ध अभियान प्रारंभ करने की प्रार्थना जनता सेकी गई थी
 इस कारण इस पुस्तक को भी जब्त कर लिया गया था

 नाना भाई खांट 
 आदिवासी बाहुल्य डूंगरपुर रियासत में जागीरदारों का आतंकफैला हुआ था
 इस तरह के वातावरण में राजकीय अध्यापक भोगीलाल पांड्या ने 15 मार्च 1938 में खांडलाई आश्रम के कार्यकर्ताओं को लेकर डूंगरपुर में सेवा संघ नामक संस्था को जन्म दिया
 जिसका उद्देश्य बांगढ़ में आदिवासियों का बहुमुखी विकास करना था
 1942 के राष्ट्रीय आंदोलन में सेवा संघ ने खूब सहयोग किया है
 दिसंबर 1942 को जुलूस निकाला
 1 अगस्त 1944 को तिलक की पुण्यतिथि पर सेवा संघ डूंगरपुर के भवन में ही डूंगरपुर राज्य प्रजामंडल की स्थापनाकी गई
 जिसका उद्देश्य डूंगरपुर रियासत की छत्रछाया में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था
 देश में करो या मरो आंदोलन के तीव्र पड़ने पर प्रजामंडल ने भी अपने लक्ष्य बदले और रियासत द्वारा प्रजामंडल का दमन अत्याचार किया जाने लगा
 1946मे प्रजामंडल का पहला अधिवेशन हुआ
 कुछ समय पश्चात कुछ प्रतिबंध कम किए गए जिससे सेवा संघ की पाठशाला में पुनः प्रारंभ की गई
 इसी बीच प्रजामंडल कार्यकर्ता और रियासत में संघर्षचलता रही
 एक दिन ग्राम धोडीकी मीटिंग हुई
 जिसमें माणिक्य लाल वर्मा ने कहा कि प्रतिबंध के बावजूद भी संघ पाठशालाएं जारी रखे चाहे कार्यकर्ताओं को जेल जाना पड़े
 रास्ता पाल के नाना भाई खांट भी इस सभा में उपस्थित थे
 उन्होंने वर्मा जी के समक्ष आम के वृक्ष को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा की थी कि
 जब तक मेरी जान रहेगी मैं अपने गांव रास्तापाल की पाठशाला बंद नहींहोने दूंगा
 प्रतिज्ञा का पता जब जागीरदार को लगा तो उसने रियासत को सूचना दी
 जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक इस बात से कुढ गए
 उन्होंने पाठशाला बंद करवाने के लिए नाना भाई खांट पर दबाव डाला
 पाठशाला पहुंचकर मास्टर सेंगा भाई से पाठशाला बंद करनेके लिए कहा
 नाना भाई खांट के मना करने पर पुलिस ने निर्मलता से नानाभाई खांट को पीटा और बंदूक के कुंदे से नाना भाई खांट के मर्मस्थल पर मारकर नाना भाई की हत्या कर दी थी
 आज भी उनकी याद में डूंगरपुर में प्रतिवर्ष मेला भरता है

 रघुवरदयाल गोयल   
 रघुवरदयाल का जन्म 21 मार्च 1908 को बिकानेर में हुआ था
 यह पेशे से वकील और विद्यार्थी जीवन से ही राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत थे
 इनके पिता वकील झमन लाल गोयल बीकानेर राज्य की असेंबली के सदस्य थे
 रघुवरदयाल 1932 से स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय हुए 22 जुलाई 1942 को रघुवर दयाल की अध्यक्षता में बीकानेर राज्य परिषद की स्थापनाहुई थी
 बीकानेर राज्य परिषद की स्थापना का उद्देश्य महाराजा गंगासिंह जी की छत्रछाया में बीकानेर राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था
 रघुवर दयाल को 29 जुलाई 1942 को बीकानेर राज्य से निर्वासितकिया गया था
 29 सितंबर 1942 को रघुवर दयाल  बिकानेर लौटआए थे
 बीकानेर लौटने पर इन्हें चीलो स्टेशन के पास रेल रुकवा कर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था
 1 वर्ष की सख्त कैद की सजा के बाद  1943को यह जेल से आजाद हुए थे
 जेल से रिहा होकर इन्होंने बीकानेर में खादी मंदिर की स्थापना की थी
 महाराजा शार्दूलसिंह ने खादी मंदिर बंदकरवा दिया था
 खादी मंदिर बंद कर देने के बाद रघुवर दयाल ने कंधे पर रखकर खादी बेचनेलगे थे
 30 मार्च 1949 को हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में बनी राजस्थान की पहली सरकार में रघुवर दयाल गोयल को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया
 इन्हें खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री बनाया गया
 रघुवरदयाल गोयल ने कलकत्ता में प्रजा परिषद की शाखा कायम की
 वहां से आज का बिकानेर नामक समाचार पत्रभी प्रकाशित किया
 1932 में इन्होंने राजद्रोह के आरोप में कैद राष्ट्रभक्तों के मुकदमों की पैरवी कर राज्य को नाराजकर दिया था

 भूपेंद्र त्रिवेदी  
 बांसवाड़ा में जन जागृति पैदा करनेमें भूपेंद्र त्रिवेदी का महत्वपूर्ण योगदान रहा
 प्रारम्भ में इन्होंने मुंबई से संग्राम नाम से एक साप्ताहिक पत्र निकाला
 जिसमें राजस्थान और मध्य भारत के देशी राज्यों के अत्याचारों और राजनीतिक आंदोलनों के समाचार प्रकाशित किए जाने थे
 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भूपेंद्र त्रिवेदी ने भूमिगत रहकर काम किया था
 उन्होंने धूल जी भाई और चिमनलाल मालोत के साथ मिलकर बांसवाड़ा राज्य प्रजामंडल की स्थापना की थी
 भूपेंद्र सिंह त्रिवेदी ने बेगार के खिलाफ लोगों को संगठितकिया था
 आजादी के बाद बांसवाड़ा में लोकप्रिय मंत्रीमंडल बना
 जिसमें भूपेंद्र त्रिवेदी प्रधान मंत्रीबनाए गए

 कर्पूरचंद पाटनी 
 जयपुर के स्वतंत्र सेनानी कर्पूरचंद पाटनी ने अपना सार्वजनिक जीवन 1920 में खादी बैचनेसे शुरू किया था
 इन्होंने जयपुर राज्य प्रजामंडल की स्थापना की थी
 प्रबल समाज सुधारक और प्रगतिशील विचारधारावाले इस व्यक्ति ने उस युग में प्रचलित सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन किया था
 बाल, वृद्ध विवाह का विरोध और विधवा विवाह का समर्थन किया था

 पंडित अभिन्न हरि  

पंडित अभिन्न हरि हाड़ोती अंचल के स्वतंत्रता सेनानी कोटा राज्य प्रजामंडल के 1941 में अध्यक्षरहे
 कोटा में स्वतंत्रता संग्राम के वे सूत्रधार थे और नेतृत्व का दायित्वभी इन्ही पर था
 इन्होने जिम्मेदार हुकूमत के लिए लोकशक्तियों को संगठित किया
 इसके लिए उन्हे दो बार जेल जाना पड़ा
 अभिन्न हरि का जन्म 27 सितंबर 1905 को मांगरोल के पास सिंघानिया ग्राममें हुआ था
 यह वर्ष 1912 से 1927 तक माध्यमिक स्कूल के प्रधानाध्यापक रहे
 1927 से 1930 तक उज्जैन के कल्पवृक्ष पत्र में संपादनकार्य किया
 इन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी के कर्मवीर पत्र में भी संपादनकिया था
 जब 1930 में सत्याग्रह प्रारंभ हुआ तो उनके नेतृत्व में कोटा से सत्याग्रह का जत्था अजमेर भिजवाया गया
 जहां उन्हें रणभेरी नाम से सत्याग्रह के साइक्लोस्टाइल दैनिक निकालने का कार्य सौंपा गया
 1931 में वे सत्याग्रह के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए
 इन्होंने विजय सिह पथिक द्वारा प्रकाशित राजस्थान संदेश का भी संपादन किया
 1932 में रामचंद्र बापट द्वारा गिब्सन पर गोली चलानेके आरोप में इन्हें फंसाने का प्रयास किया गया था
 लेकिन इसमें पुलिस सफल नहीं हो सकी और वह मध्यप्रदेश चले गए
 उन्होंने 1934 में पंडित नेहरू राम के साथ विजयादशमी को प्रजामंडलकी स्थापना की
 1936-38 में दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान के संपादक के रूपमें भी कार्य किया और दिल्ली से अग्रसर नामक साप्ताहिक पत्र निकाला
 इन्होंने दिल्ली में उत्तर भारतीय देश की प्रजा परिषद की स्थापना की
 1942 की अगस्त क्रांति के समय इन्हें कोटा में गिरफ्तार किया गया और दो माह जेल में रखा गया
पंडित अभिन्न हरि ने  कोटा से लोकसेवक पत्रनिकाला जो 1951 तक चला
इन्होंने फ्री वर्ल्ड साप्ताहिक का संपादन भी किया
राजस्थान निर्माण के बाद इन्हे राज्य का कृषि मंत्री भी बनाया गया
अभिन्न हरि हाडोती में स्वतंत्रता आंदोलन के सुत्रधार जुंझारू पत्रकार और ओजस्वी कवि भी थे
1942 के अगस्त क्रांति में महात्मा गांधी के आह्वान पर 8 से 9 अगस्त 1942 को मुंबई के गवालिया टैंक मैदान में आयोजित
कांग्रेस अधिवेशन में कोटा से सम्मिलित होने वाले एकमात्र प्रतिनिधिथे
पंडित अभिन्न हरि का मूल नाम बदरीलाल शर्मा था

नयनूराम शर्मा
नयनूराम शर्मा बिजोलिया किसान आंदोलन से प्रभावित होकर राज्य की नौकरी छोड़कर हाड़ोती क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना और जाग्रति पैदा करने का कार्य किया
विजय सिंह पथिक और रामनारायण चौधरी के संपर्क में आने पर यह राजस्थान सेवा संघ के सदस्य बन गए
नयनूराम शर्मा ने बूंदी के बरड क्षेत्र के किसानों की मांग का समर्थनकिया था
इन्होंने बूंदी और कोटा राज्य के गांव में बेगार प्रथा के खिलाफ जागृति पैदा की और बेगार प्रथा को हटाने में सफलताप्राप्त की *
ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा प्रचार* के लिए नयनूराम शर्मा ने हाड़ोती शिक्षा मंडल की स्थापना की
जिसके माध्यम से कई  पाठशालाओं का संचालन किया गया
उन्होंने 1934 में हाड़ोती प्रजामंडल और 1938 में कोटा राज्य प्रजामंडल की स्थापना कर उत्तरदायी शासन की मांग की थी
अभिन्न हरि ,मोतीलाल जैन शंभू दयालआदी इनके सहयोगी थे
1941 में उनकी मृत्युहोने तक नयनूराम शर्मा रचनात्मक कार्य और राजनीतिक चेतना जागृतकरने का प्रयास करते रहे
नयनूराम शर्मा की हत्या अज्ञात लोगों ने उनके गांव निमाणा (बूंदी)जाते समय कर दी थी

बलवंत सिंह मेहता 
बलवंत सिंह मेहता मेवाड़ के पुराने जनसेवक थे
1938 में प्रजामंडल के पहले अध्यक्षबने
उनका जन्म 8 फरवरी 1900को उदयपुर में हुआ था 
श्री राजस्थान संघ और राजस्थान में मंत्री सांसद और भारत सेवक समाज के अध्यक्ष* रह चुके हैं
यह राजनीतिक चेतना के पर्याय मेहता किसान आंदोलन के भी कार्यकर्ता रह चुके हैं
आदिवासी क्षेत्र के लिए इन्होंने महत्वपूर्ण अवदान किया
इंहोने उदयपुर में मोती मगरी पर बनाया हुआ राणा प्रताप का स्मारक इन्ही के प्रयासों की देन है
यह निरंकुश सत्ता के विरोधीथे
उन्होंने महाराणा भूपाल सिंह के शासनकाल की नौकरशाही और उसकी विसंगतियों पर आलेख लिखे थे
यह मेवाड शासन की आंखों में कांटे से सालनेलगे
1915 में स्थापित प्रताप सभाप्रजामंडल से पहले राजनीतिक जागृति का माध्यमथी
गुप्तचरो से घिरे रहने के बावजूद अजमेर की राजनितीक गतिविधियो,1929मे लाहोर कांग्रेस मे और 1930मे करांची कांग्रेसमे इनकी उपस्थिती बरकार थी
यह क्रांतिकारियों के सहयोगी रहे और हल्दी घाटी में एक शिवीर लगाया
यहां इस शिवीर मे बम बनाने की प्रक्रिया सिखाईजाती थी
अप्रैल 1938 को प्रजामंडल की स्थापना के बाद हुए आंदोलन में उन्हें गिरफ्तार करके सराडा भिजवाया गया
भारत छोड़ो आंदोलन में भी यह गिरफ्तारकिए गए व जेल में नजर बंद रखा गया
इन्होंने 1946 में उदयपुर में वनवासी छात्रावासकी स्थापना की थी
भारतीय लोक कला मंडल के संस्थापकोंमें एक और अनेक प्रकार से संबंध रहे हैं

बाल मुकुंद बिस्सा
बाल मुकुंद बिस्सा का जन्म 1908 में डीडवाना तहसील के पिलवा गांव में एक सामान्य पुष्करनापरिवार में हुआ था
बालमुकुंद बिस्सा के पिता श्री सुखदेव मिश्रा का व्यवसाय कलकत्तामें होने के कारण उनकी प्रारंभिक शिक्षा कलकत्ता में संपन्न हुई थी
बाल मुकुंद बिस्सा ने 1934 में जोधपुर में राजस्थान चर्खा एजेंसी लेकर खादी भंडारआरंभ किया था
जब 1940 में जोधपुर के प्रमुख क्रांतिकारीयों को जेलोंमें बंद कर दिया गया था
तब बिस्सा जी को जेल से बाहर रहकर स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों को जारीरखने का जिम्मा सौंपा गया था
बालमुकुंद बिस्सा को 9 जून 1942 को भारत रक्षा कानून के तहत जेल में बंदकर दिया गया था
मारवाड़ लोक परिषद के प्रसिद्ध नेताबाल मुकुंद बिस्सा की जेल में भूख हड़ताल में भाग लेने के कारण 19 जून 1942 को उनकी मृत्यु हो गई थी
बाल मुकुंद बिस्सा की शव यात्रा में शामिल होने के लिए मीलों पैदल चलकर एक लाख लोग जोधपुर पहुंचे थे
उनके भय से जोधपुर नगर के दरवाजे बंद कर दिए गए
भीड को तितर बितर करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्जभी किया था

ऋषि दत्त मेहता
ऋषिदत मेहता तरुणावस्था में ही गांधी जी के संपर्कमें आ गए थे
परिणाम स्वरुप इन्होंने अपने पैतृक ठाट-बाट को ठोकर मार कर खादी पहनना शुरुकर दिया
असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्होंने अपनी कॉलेज की पढ़ाई भी छोड़दी
1928 में ऋषिदत्त मेहता ने मुंबई से ब्यावरआ कर राजस्थान सेवा संघ और तरुण  राजस्थान पत्र की व्यवस्थाको संभाला
आगे चलकर ऋषि दत्त मेहता ने तरुण राजस्थान का संपादनभी किया था
नमक कानून सत्याग्रह में इन्हे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया
1932 में इन्हें पुन: गिरफ्तार कर दो वर्ष की कैद और जुर्माने की सजा दी गई
कुछ दिन बाद उनकी पत्नी को भी गिरफ्तार का छह माह के कठोर कारावासकी सजा देकर जेल भेज दिया
जेल से छूटने के बाद उन्होंने राजस्थान साप्ताहिक पत्र का संपादन किया
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्हें बूंदी में गिरफ्तार कर नजर बंद करदिया गया
नजरबंदी से मुक्त होने के बाद इन्होंने बूंदी राज्य लोक परिषद का गठन किया
उत्तरदायी शासन की मांग को लेकर आंदोलन किया
6 जनवरी 1973 को इन का देहावसानहो गया

अंजना देवी चौधरी
अंजना देवी का जन्म सीकर जिले के श्रीमाधोपुर में 1897में एक मध्यमवर्गीय अग्रवाल परिवार में हुआ था
अंजना देवी राजस्थान सेवा संघ के कार्यकर्ता रामनारायण चौधरी की पत्नी थी
23 वर्ष की आयु में इन्होंने आभूषण त्याग कर खादी पहनना प्रारंभ कर दिया था
इन्होंने बिजोलिया और बेगू किसान आंदोलन में महिलाओं का नेतृत्वकिया था
1929-30 में लगभग छह माह साबरमती आश्रम में रही
1932 से 35 की अवधि में राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान दो बार जेल में गयी थी
1934 से 36 में नारेली आश्रम में रहकर हरिजन सेवा कार्यों में भाग लिया था
कांग्रेस के नमक सत्याग्रह के दौरान 1930 में उन्हें 6 माह का कारावास दिया गया था
अंजना देवी ने 1939 से 42 तक महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम में रहकर आश्रम के कार्य में सहयोग किया था
वहा सर्वाधिक तेज गति से चरखा कातने का कीर्तिमान स्थापित किया था
अंजना देवी ने भारत सेवक समाज के महिला सूचना केंद्र में भी अपनी सेवाएं प्रदान की
1939 में सीकर में हुए सत्याग्रह का नेतृत्व किया था
अंजना देवी रियासतों (बूंदी)से निर्वासित होने वाली प्रथम महिला थी
1921-24 मे  मेवाड़ बूंदी राज्य की स्त्रियों में राष्ट्रीयता समाज सुधार की भावना विकसित की और उनके साथ सत्याग्रह का कार्यकिया था
यह समस्त रियासती जनता में गिरफ्तार होने वाली पहली महिलाथी

नारायणी देवी वर्मा
नारायणी देवी वर्मा का *जन्म मध्यप्रदेश की सिंगोली कस्बे मे रामसहाय भटनागर के यहां 1902 में हुआ था 12 वर्ष की आयु में इनका विवाह माणिक्य लाल वर्मा के साथ संपन्न हुआ था जो बिजोलिया ठिकाने मे नौकरी किया करते थे
जागीरदार के अत्याचारों को देख माणिक्य लाल जी ने जब आजीवन आम जन की सेवा का संकल्प लिया तो नारायणी देवी इस व्रत में उनकी सहयोगिनी बनी बीमारी के दौरान इलाज के अभाव में इनके दो पुत्रों की मृत्युभी उन्हें इस सेवा कार्य से विरत नहीं कर सकी
माणिक्य लाल वर्मा द्वारा 1934 में सागवाड़ा में खांडलोई आश्रम की स्थापना की गई थी नारायणी देवी द्वारा खांडलोई में भी भीलों के मध्य शिक्षा प्रसार हेतु कार्य किया गया था 1939 में प्रजामंडल के कार्य में भाग लेने के कारण उन्हें जेल जानापड़ा और राज्य से निर्वासित कर दिया गया
वह अजमेर आई और राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए प्रयास किए ताकी रचनात्मक कार्य प्रयास  प्रारंभ किए जा सकते हैं इसी समय मेवाड़ में भयंकर अकाल पड़ा तो इन्होंने अकाल सहायता समिति का गठन किया
भारत छोड़ो आंदोलन के समय भी नारायणी देवी वर्मा अपनी 6माह के पुत्र के साथ जेल गई थी 1944 में भीलवाड़ाआ गई और यहां पर 14 नवंबर 1944 को महिला आश्रम की स्थापना की
संस्था की स्थापना का उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों की पत्नियां और उनके परिवारजनों को शिक्षितकरना उनके परिवारों के भरण पोषण की व्यवस्थाकरना था
1952-53 में माणिक्य लाल वर्मा के साथ मिलकर आदिवासी कन्या छात्रावास की स्थापनाकी वर्मा जी के निधन के बाद 1970 से 76 तक राज्यसभा की सदस्य रही 12 मार्च 1977 को उनका देहांत हो गया

 रतनशास्त्री
इनका जन्म 15 अक्टूबर 1912 में खाचरोद मध्य प्रदेश में रघुनाथ जी व्यास के यहां पर हुआ था इनका विवाह हीरालाल शास्त्रीसे हुआ था 1929 के ग्राम सेवा ग्रामोत्थान और जन सेवाके उद्देश्य से स्थापित की गई जीवन कुटीर कार्यक्रम में इन्होंने हीरालाल शास्त्री का पूरा सहयोग दिया था
रतन शास्त्री ने 1939 में जयपुर राज्य प्रजामंडल के सत्याग्रह आंदोलन में सक्रिय रुप से भाग लिया 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिगत कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों की सेवाकी
रतन शास्त्री कस्तूरबा स्मारक ट्रस्ट की क्षेत्रीय समिति और लोकवाणी सोसाइटी की सदस्य रही1955 में इन्हें पदम श्रीसे सम्मानित किया गया
महिला और बाल कल्याण के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए इन्हें जमुनालाल पुरस्कार और 1975 में पदम भूषणसे सम्मानित किया गया पदम श्री और पद्म भूषण सम्मान प्राप्त करने वाली राजस्थान की पहली महिला की 

शांति त्रिवेदी
शांति त्रिवेदी का जन्म नागपुर (महाराष्ट्र )में 1927में हुआ था
शांति त्रिवेदी ने प्रजामंडल के आंदोलन ने स्वयं सेविका के रूप में भाग लेकर विद्यार्थियों में राष्ट्रीय चेतना का संचारकिया उदयपुर के परसराम त्रिवेदी के साथ विवाह के बाद उनके साथ ही समाज कार्य में लग गई 1948 में *उदयपुर में सामंतवाद के विरुद्ध छेड़े अंतिम संघर्षमें अप्रैल को जब वे चार लॉरियों में बैठी महिला का नेतृत्व करती हुई रामनिवासपहुंची तो उनके आक्रमण से बुरी तरह घायलहो गई
1947 में उदयपुर में इन्होंने राजस्थान महिला परिषद की स्थापना की ताकि महिलाओं का समुचित विकासहो सके स्वाधीनता मिलने के बाद इन्होंने शरणार्थी महिलाओं को गृह उद्योग द्वारा सहयोग दिलायाअनुसूचित हरिजन महिलाओं के विकासके लिए भी  कार्य किए यह उदयपुर नगर परिषद और नगर निगम की निर्वाचित सदस्यरही

काली बाई
काली बाई का जन्म डूंगरपुर राज्य के रास्ता पाल गांव के भील परिवार में हुआ था कालीबाई एक 12 वर्ष की छोटी सी लड़की थी जिसने वीरता पूर्वक  अन्याय का सामनाकिया और अपने गुरु की जान बचा कर अपने जीवन का बलिदानदिया और देश के लिए एक मिसालबनी थी गोकुल भाई भट्ट के निर्देश पर नाना भाई खांट वनवासी बच्चों में शिक्षा का प्रसार कर रहे
महारावल ने इस कार्य पर रोक लगा रखी थी 19जून 1947 में डूंगरपुर के मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक ने नाना भाई के घर में घुसकर नाना भाई और स्कूल के अन्य शिक्षक सेंगा भाई को लाठियों से पीटना प्रारंभ किया
इन्होंने नाना भाई से पाठशाला की चाबी मांगीथी जिसे नाना भाई ने देने से मना कर दिया था इस कारण  नाना भाई को पीटते समय बंदूक का कूंदा जोर से लग गया और नाना भाई की मृत्युहो गई पुलिस ने सेंगा भाई की कमर में रस्सी बांधकर ट्रक के पीछे बांध दिया और उन्हें घसीटनेलगे
इस पर काली बाई ने पुलिस को ललकारा और पूछा कि मेरे गुरु जी को कहां लेकरजा रहे हो लेकिन काली बाई की इस ललकार का पुलिस पर कोई फर्क नहीं पड़ा और वह सेंगा भाई को घसीटरहे थे इस पर कालीबाई ने पुलिस वालों की परवाह नहीं करते हुए अपनी दांतली से उस मोटे रस्से को काट दिया जिससे सेंगा भाई बन्धे हुए थे
पुलिस ने काली बाई द्वारा सेंगा भाई की गिरफ्तारी का विरोध किया तो पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चला दी अंधाधुंध गोलीबारी में काली बाई की गोलियां लग गई और वहीं गिर पड़ी काली बाई 40 घंटे तक जीवन मृत्यु का संघर्ष करते हुए मरगई आज भी काली बाई की याद में डूंगरपुर में प्रतिवर्ष मेलाभरता है