ब्रिटिश काल तक की भारत की ललित व प्रदर्शन कलाएं

ब्रिटिश काल तक की भारत की ललित व प्रदर्शन कलाएं

Fine and Performing Arts of India till the British Period

अतिलघुतरात्मक (15 से 20 शब्द )

प्र 1. प्रागैतिहासिक पाषाण चित्रकला का प्रमुख स्थल- भीमबेटका ?

उत्तर- मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के पास स्थित भीमबेटका पहाड़ी पर लगभग 600 प्राचीन गुफाएं प्राप्त हुई है जिनमें 275 गुफाओं में चित्रों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहां एक विशिष्ट चित्र संसार रचा गया है। यहां से चित्रों के दो स्तर मिले हैं।

प्र 2. साफी कला क्या है ?

उत्तर- साफी कला जिसे लोग रंगोली, अल्पना या अश्विन के नाम से जानते हैं। पिछले 40 वर्षों से बिहार विशेषकर पटना व मिथिला क्षेत्र में अधिक प्रचलित है। यह मूलतः ब्रज क्षेत्र की कला है।

प्र 3. भरतनाट्यम ?

उत्तर- भरतनाट्यम तमिलनाडु का शास्त्रीय नृत्य है। यह भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित है। इसका विकास और आविर्भाव दक्षिण भारत के मंदिरों में देवदासियों द्वारा हुआ था। यह महिलाओं द्वारा प्रदर्शित गायन नृत्य है।

प्र 4. ठुमरी गायन शैली ?

उत्तर- यह संगीत की एक भारतीय गायन शैली है। स्वरूप की दृष्टि से ठुमरी हल्की और प्राय विषयासक्त है। यह एक भाव प्रधान तथा चप्पल चाल वाला श्रृंगार प्रधान गीत है। इसमें कोमल शब्दावली तथा कोमल रागों का प्रयोग होता है।

प्र 5. रऊफ नृत्य ?

उत्तर- यह जम्मू कश्मीर राज्य का सबसे प्रसिद्ध लोक नृत्य है। इस नृत्य को स्त्रियां फसलों की कटाई हो जाने के बाद करती है। इसमें नाचने वाली स्त्रियां आमने-सामने दो पंक्तियों में खड़ी होकर एक दूसरे के गले में बाहें डालकर नृत्य करती है। इस नृत्य हेतू किसी भी वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं किया जाता है।

लघूतरात्मक ( 50 से 60 शब्द )

प्र 6. अजंता चित्रकला और बाघ चित्रकला के बीच विभेदन और समानता के बिंदु बताइए।

उत्तर- अजंता तथा बाघ के चित्रों के बीच परस्पर विभेदन और समानता निम्नलिखित बातों को लेकर है –

  • बाघ गुफा के सभी चित्र एक साथ एक ही समय बने प्रतीत होते हैं, जबकि अजंता के चित्र 800 वर्षों के दौरान बनाए गए हैं।
  • बाघ के चित्रों में जीवन के विभिन्न पक्षों का चित्रण हुआ है जिनमें राजसी जीवन एवं उल्लास पूर्ण जीवन प्रमुख है, जबकि अजंता के चित्रों का आधार प्राय बुद्ध के जन्म जन्मांतर की कथाएं हैं।
  • अजंता तथा बाघ दोनों में छतों तथा दीवारों पर कमल, मूरियों के बड़े ही सुंदर अलंकरण बने हैं, जिनमें पशु, पक्षी, लताओं, पुष्पों का समावेश है। शुक, सारिका, कलहंस, मयूर, कोकिल, सारस, चकोर, गाय, बैल आदि सभी पशु पक्षियों का अंकन शोभनों के साथ चित्रित है।
  • अजंता तथा बाघ दोनों में ही नारी के आध्यात्मिक एवं शारीरिक सौंदर्य को बखूबी उकेरा है।
  • बाघ में रेखा, रूप, रंग, संयोजन, भित्ति चित्रण प्रक्रिया, वर्तनी एवं अभिव्यक्ति आदि सभी कुछ अजंता के चित्रों जैसा है।

प्र 7. जहांगीर कालीन चित्रकला की मुख्य विशेषताएं बताइए।

उत्तर- जहांगीर के समय चित्रकला पूर्ण परिपक्व हो गई। वह स्वयं चित्र कला प्रेमी, पारखी और संरक्षक था। जहांगीर कालीन चित्रकला की प्रमुख विशेषताएं-

  1. पहले हस्त लिखित ग्रंथों को चित्रित करवाया जाता था जहाँगीर ने छवि चित्रों पर जोर दिया।
  2. छवि चित्र- मानवाकार एवं खड़े हुए व बैठे हुए व्यक्तियों के एकल एवं सामूहिक चित्र।
  3. प्रतिमापरक- जैसे शाह अब्बास का स्वागत करते हुए, आत्मा के सानिध्य में काल्पनिक सभा।
  4. प्राकृतिक दृश्यों का अंकन
  5. यूरोपियन तक्षण कला के रेखाचित्र
  6. पूर्णतः भारतीय चित्र
  7. बारीक अंकन
  8. स्वाभाविक व प्राकृतिक रंगों का प्रयोग
  9. शिकार के चित्र पर जोर
  10. रंग प्रतिरूप जैसी तकनीकी विषमता और गहराई और सही दृश्य विधान का अंकन करने संबंधी यूरोपियन प्रभाव

प्र 8. यक्ष गान नृत्य नाट्य के प्रमुख लक्षण बताइए।

उत्तर- यक्ष गान कर्नाटक राज्य का लोक नृत्य है। यह भारत का अत्यंत प्राचीन शास्त्रीय पृष्ठभूमि वाला एक अनूठा पारंपरिक नृत्य नाट्य रूप है। इस नृत्य नाट्य रूप का मुख्य तत्व धर्म से इसकी संलग्नता है जो इस के नाटकों को सर्वाधिक सामान्य विषय वस्तु प्रदान करता है। इसका प्रदर्शन भगवान गणेश की वंदना से प्रारंभ होता है।

इसके उपरांत एक हास्य अभिनय होता है। साथ ही साथ तीन सदस्यों के दल द्वारा बजाए जा रहे चेन्दा और मेडाले तथा एक ताल का पार्श्व संगीत होता है। वाचक जो दल का ही एक भाग होता है, भगवान कहलाता है।

तथा अनुष्ठान का मुखिया होता है।उस का प्राथमिक कार्य गीतों के माध्यम से कथा का वाचन, चरित्रों का परिचय देना और यदा कदा उनसे वार्तालाप करना है। इसकी एक और विलक्षण विशेषता संवादों का नितांत अनभ्यस्त और अलिखित प्रयोग है जो इसे इतना विशेष बनाता है।

प्र 9. आरंभिक भारतीय शिलालेखों में अंकित ‘तांडव’ नृत्य की विवेचना कीजिए ।

उत्तर- भारत के प्राचीन आध्यात्मिक परिदृश्य में तांडव नृत्य का धार्मिक महत्व अधिक है। इस नृत्य को सृष्टि के चक्कर से प्रभावित माना जाता है। इस नृत्य में महारुद्र की क्रोधित स्वरूप को दर्शाया गया है। तांडव नृत्य में सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव तथा अनुग्रह को सैद्धांतिक आधार दिया गया है। तांडव नामकरण तण्डु से हुआ है जो भगवान शंकर का सहायक माना जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तण्डु ने नाट्यशास्त्र के रचनाकार भरतमुनि को तांडव नृत्य की जानकारी दी। तांडव नृत्य की विभिन्न भंगिमाओं की चर्चा नाट्यशास्त्र के तांडव लक्षणम परिच्छेद में की गई है। भागवत पुराण में कृष्ण द्वारा कालिया नाग को नियंत्रित करने के दौरान तांडव नृत्य की चर्चा मिलती है।

तमिलनाडु के चिदंबरम मंदिर में शिव का तांडव नृत्य मुद्रा में अंकन मिलता है। जैन परंपरा के अनुसार जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की प्रतिष्ठा में इंद्र द्वारा तांडव नृत्य करने की बात की गई है।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri, रजनी जी तनेजा