भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से पूर्व महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से पूर्व महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन

POLITICS OF ASSOCIATION BEFORE CONGRESS

भारत में पाश्चात्य संस्कृति व विचारों की उपस्थितिने अनेक ऐसी शक्तियों के जन्म में सहायता प्रदान की जो बाद में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए गंभीर चुनोतीयों का कारण बन गई थी
1833 में लार्ड मेकाले ने स्वयं हाउस ऑफ लॉर्ड्समें कहा था कि “”यह भी संभव है कि भारतीय लोक विचार हमारी शिक्षा प्रणाली के अधीन इतने विकसित हो जाएंगे कि वह हमारी प्रणाली की सीमाओं से अधिक आगे बढ़जाएंगे
 हम अपने अच्छे शासन से अपनी प्रजा को अधिक अच्छे शासन करने के लिए तैयार करें और यूरोपीय भाषा सीखनेके कारण वह स्वयं किसी भविष्य काल में यूरोपीय संस्थाओं की मांग करें
उनकी यह भविष्यवाणी सत्य साबित हुई
पाश्चात्य संस्कृतिके भारत आने के आने के फल स्वरुप राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता ,राजनीतिक अधिकारोंजैसी धारणाएं भारत में विकसित हुई
आधुनिक राजनीतिक विचारों और राजनीतिक अंगों के विकास के फलस्वरूप ही भारतीय इतिहास को अपना गौरव प्राप्त हो सका और भारत आधुनिकता की ओर बढ़नेमें सफल हुआ
भारतीय उपमहाद्वीप में उन राजनीतिक विचारों का विकास हुआ
जिनसे भारतीय इतिहास सर्वथा अनभिज्ञथा
वास्तव में राजनीतिक संगठन ने भारत को आधुनिक संसारमें प्रवेश दिलाया
इन राजनीतिक संघो के विकास से ही लोगों में एकता और एकजुटतादेखने को मिली
इन संगठनों की विशेषता यह थी कि यह धर्म जाति की परिधि से दूर अन्य उद्देश्य के लिए बनाए जा रहे थे
1885 से पूर्व अर्थात कांग्रेस की स्थापना से पूर्व कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठनबनाए गए थे
 जिन्होंने राष्ट्रवादी विचारों के विकास की दिशा में प्रयासकिए थे         ??हेनरी विवियन डेरोजियो??
1830 के दशक में राष्ट्रीय जागरण की भावनाओं के बीजारोपण में हेनरी विवियन डेरोजियोका नाम भी प्रसिद्ध है
उनके अनुयायी डेरोजियन कहलाते थे डेरोजियो हिंदू कॉलेज कलकत्ता में अध्यापक थे
उन्होंने एक समाचार पत्र दि ईस्ट इंडियन का प्रकाशन भी शुरू किया था
लेकिन राजनीतिक सुधारों के लिए आंदोलन जारी रखने के लिए केवल प्रेस और मंच ही पर्याप्त नहीं थे
इसलिए देश के विभिन्न भागों में संगठनों की स्थापना की गई

बंगाल में राजनीतिक संगठन
भारत में राजनीति आंदोलन के प्रवर्तक राजा राममोहन रायथे
यह पाश्चात्य विचारों से बहुत प्रभावित हुए थे
वह विद्वान व्यक्ति थे ,इसी कारण वह समकालीन बंगालियों की भांति हठधर्मी और कट्टरपंथी नहीं थे,उनके मन में सार्वभौमिकता थी
1821 में राजा राममोहन राय ने स्पेन में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना पर एक उत्सव मनाया था
राजा राममोहन राय पहले व्यक्ति थे,जिन्होंने आधुनिक भारत में समाज सुधार कार्योंऔर राजनीतिक आंदोलन का शुभारंभ किया था
उन्होंने भारतीयों की शिकायतों की ओर अंग्रेजों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयत्न किया और उनका समाधान मांगा
उन्होंने सार्वभौमिकता से ओतप्रोतराजाराममोहनराय ने समाचार पत्रों की स्वतंत्रता ,सिविल न्यायालय में भारतीयों की नियुक्ति और अन्य उच्च पदोंआदि की मांग की थी
परिणाम स्वरुप स्वरुप 1833 के चार्टर एक्ट की कुछ उदारवादी धारणाएं इन्हीं के प्रयत्नोंका परिणाम थी
 लेकिन राजनीतिक संस्थाओं की संगठन का श्रेय उनके साथियों को मिला
राजा राम मोहन राय ने भारत में किसी राजनीतिक संगठन की स्थापना नहीं की थी
लेकिन राजा राममोहन राय ने भारत में राजनीतिक विचारधारा की सही मायनों में शुरुआत की थी
उनके साथियों द्वारा बंगाल में स्थापित किए गए संगठन निम्न थे
बंगाल प्रेजिडेंसी में निम्न राजनीतिक संगठनों की स्थापना?

बंगभाषा प्रकाशक/प्रकाशिका सभा
बंगाल का प्रथम राजनीतिक संगठन बंगभाषा प्रकाशिका सभा थी
इसकी स्थापना 1836में हुई थी
इस संगठन में सरकार की नीतियों और प्रशासन की समीक्षा की जाती थी
तत्पश्चात इसके द्वारा सरकार के पास प्रार्थना पत्र और मेमो भेजे जाते थे
इस संस्था ने भारत वासियों को राजनीति के प्रति जागरूक बनाने में प्रारंभिक प्रयासकिया था
इस सभा का उद्देश्य सरकारी क्रिया कलापों की समीक्षाकर उनके सुधार के लिए प्रार्थना पत्र भेजना था

जमीदारी एसोसिएशन अथवा लैंड होल्डर्स सोसाइटी
जमीदारी एसोसिएशन व्यापक रूप से लैंड होल्डर्स सोसाइटी के नामसे जानी जाती थी .
इसकी स्थापना कलकत्ता मे1838 में जमींदारों के हितों की रक्षा के लिएहुई थी
इस एसोसिएशन के संस्थापक द्वारिका नाथ टैगोर और अन्य जमीदार सहयोगी थे ?यद्यपि लैंड होल्डर्स सोसायटी के उद्देश्य सीमितहै, लेकिन इसमें संगठित राजनीतिक गतिविधियों की शुरुआतकी थी
जमीदारी एसोसिएशन पहली सभा थी जिसने संगठित राजनीतिक प्रयासों का शुभारंभ किया और अपने कष्टों को दूर करने के लिए संवैधानिक तरीकों का प्रयोग प्रारंभ किया
इस संस्था ने  ना केवल भारत में ही काम किया बल्कि लंदन में भी 1839 में मिस्टर एडम्ज को ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना करने में मदद की थी ?जमीदारी एसोसिएशन में शामिल अंग्रेज नेताओं में थियोडोर डिकेंस विलियम काब्री, विलियम थियोवोल्ड व जे.ए. प्रिंसेस प्रमुख थे
इस सोसाइटी के भारतीय नेता द्वारिका नाथ टैगोर राजा राधाकांत देव, प्रसन्न कुमार ठाकुर, राजा काली कृष्ण आदि सभी जमीदार थे
लैंड होल्डर्स सोसायटी के भारतीय सचिव प्रसन्न कुमार ठाकुर और अंग्रेज सचिव विलियम काब्री थे
जॉन क्रॉफर्डलंदन में इस एसोसिएशन के प्रतिनिधि थे

बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी
अप्रैल 1843में एक नई राजनीतिक संगठन बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना हुई
इस संगठन की स्थापना जार्ज थॉमसन की अध्यक्षता में हुई थी
इस संस्था ने सभी वर्गों के लोगों के उत्थान और अधिकारों की मांग रखी थी
इस संस्था ने लैंड होल्डर्स सोसाइटी को बिल्कुल दुर्बलकर दिया था
यह संस्था भी भारतीय और गैरसरकारी अंग्रेजों का सम्मलित संगठन था
इसके सचिव प्यारी चंद्र मित्र जमीदारी प्रथा की आलोचनाकिया करते थे और किसानों के अधिकारों का सवाल उठाते थे
इस सभा का प्रमुख उद्देश्य अंग्रेजी शासन में भारतीयों की वास्तविक अवस्था के विषय में जानकारी प्राप्त कर
उनका प्रचार प्रसारकरना और जनता की उन्नति,सामाजिक कल्याण के लिए व न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए शांतिमय और कानूनी साधनों का प्रयोग करना था ?1846 तक यह  सोसायटी भी निष्क्रियहो गई थी
ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन
लैंड होल्डर्स सोसायटी और बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसायटीकोई उन्नति नहींकर सकी थी और इसकी असफलताओं के कारण इन दोनों को 28 अक्टूबर 1851 को मिलाकर एक ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशनबना दिया गया
ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के संस्थापक राजा राधाकांत देवथे
इस सभा में भूमिपति ही मुखिया थे और यह उन्हीं के हितोंके लिए थी
यह संस्था भूमिपत्तियों के हितों के लिए मुख्य रूप से कार्य कर रही थी
इस संस्था ने एक उदारवादी प्रयत्नअवश्य किया और 1853 में चार्टर के नवीनीकरण के समय ब्रिटिश संसद को एक प्रार्थना पत्र भेजा
 जिसमें लोकप्रिय प्रकार की विधानसभा न्यायिक और दंडनायक कार्य अलगकर दिए जाने की बड़े अधिकारियों के वेतन कमकरने की नमक आबकारी और स्टाम कर इत्यादि समाप्त कर दिएजाने की मांग की थी
इस सभा के प्रार्थना पत्र का कुछ प्रभाव अवश्य हुआ और 1853 की चार्टर एक्ट में गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में 6 सदस्य कानून बनानेके लिए जोड़ दिए गए
बंगला में इस सभा का नाम भारत वर्षीय सभारखा गया और राजा राधाकांत देव इसके अध्यक्षथे
इसमें भारतीय जमीदारों के अलावा व्यापारी और नए बुद्धिजीवी लोग भी शामिल किए गए
इस संगठन ने नील विद्रोह की जांच के लिए आयोग बैठानेकी मांग की थी
इसनें 1860में अकाल पीड़ितों के लिए धन इकट्ठाकिया था
ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन ने कैनिंग द्वारा 1860 में आयकर लगाने का भी विरोधकिया
हिंदू पैट्रियाट इसका मुख्य पत्रथा
एक राजनीतिक संस्था के रुप में यह 20 वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में रही ,इसके पश्चात भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसे आच्छादितकर लिया

इंडियन लिंग
इस संस्था की स्थापना कोलकाता में 25 सितंबर 1975 को अमृत बाजार पत्रिका के संपादक और मालिक शिशिर कुमार घोषने की थी
इसके अस्थाई अध्यक्ष शंभू चंद्र मुखर्जीबने थे
इस का प्रमुख उद्देश्य लोगों में राष्ट्रवाद की भावना का विकास कर राजनीतिक शिक्षा को प्रोत्साहित करना था

इंडियन एसोसिएशन
26 जुलाई 1876 को इंडियन लिंग की स्थापना के 1 वर्ष बाद इसका स्थान इंडियन एसोसिएशन ने ले लिया था
इंडियन एसोसिएशन की स्थापना आनंद मोहन बोस और सुरेंद्र नाथ बनर्जीने की थी
इंडियन एसोसिएशन के संस्थापक सुरेंद्रनाथ बनर्जीथे
लेकिन इसके सचिव आनंद मोहन बोस थे
बाद में इसके अध्यक्ष कलकत्ता के प्रमुख बेरिस्टर मनमोहन घोष चुने गए थे
 इस संस्था का उद्देश्य मध्यमवर्ग ही नहीं बल्कि सर्वसाधारण को इसमें लाना था ?इसलिए इसमे सदस्यों के लिए चंदा ₹5 वाषिक रखा गया
जबकि ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन का चंदा ₹50 वाषिक था
शीघ्र ही इंडियन एसोसिएशन शिक्षित वर्ग के प्रतिनिधियों की मुख्य संस्था बन गई थी
सुरेंद्रनाथ बनर्जी के अनुसार के उद्देश्यनिम्न थे
देश में जनमत की एक शक्तिशाली संस्था का गठन करना
सामान्य राजनीतिक स्वार्थ के आधार पर भारतीयों को सूत्रबद्ध करना
हिंदू और मुसलमानों के बीच मैत्री भाव को बढ़ाना
इस एसोसिएशन में जमींदारों के स्थान पर मध्यम वर्ग को प्रधानता दी गई
इस संगठन ने सिविल सर्विसेज आंदोलनचलाया
जिसे भारतीय जानपद सेवा आंदोलन कहाजाता है
यह आंदोलन लिटन की नीतियों के विरुद्ध किया था
इसके अतिरिक्त वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, आर्म्स एक्ट और अल्बर्ट बिल के विरोध में आंदोलन चलाया गया था
इल्बर्ट बिल विवाद के दौरान अपने पत्र “बंगाली”में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जे.एफ.मारिश की आलोचनाकरने के कारण सुरेंद्रनाथ बनर्जी को 5 मई 1883 को दो माह की सजा मिली थी
 जुलाई 1883को उन्हें रिहा कर दिया गया था
इण्डियन एसोसिएशन ने 29 दिसंबर 1883 को कलकत्ता के अल्बर्ट हॉल में आनंद मोहन बोस की अध्यक्षता में नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया
दूसरी इंडियन नेशनल कांफ्रेंस कलकत्ता में 25 दिसंबर 1885 को हुई थी
 इसकी अध्यक्षता सुरेंद्र नाथ बनर्जी ने की थी
इस कारण वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में शामिल नहींहो सके थे
 सुरेंद्र नाथ बनर्जी ने देश में एक चक्रवात के समान तीव्र गतिसे दौरा किया
उन्होंने कुछ नगरों में इंडियन एसोसिएशन कलकत्ता की सहायक संस्थाएं स्थापित की थी 

भारतीय जानपद सेवा आंदोलन अथवा सिविल सर्विसेज आंदोलन
भारत में सिविल सेवा का जन्मदाता कार्नवालिसथा
1853 में सिविल सेवाके दरवाजे भारतीयों के लिए भी तब खुल गए थे
जब इसमें प्रतियोगितात्मक परीक्षा का आयोजन होने लगा था
1861 में इस परीक्षा में सम्मिलितहोने की अधिकतम आयु 22 वर्षथी और यह केवल लंदनमें ही होती थी
1863 में प्रथम भारतीय आई. सी. एस. सत्य नाथ टैगोर हुए थे
1866 में अधिक उम्र घटाकर 21 वर्ष कर दी गई
1869 सुरेंद्रनाथ बनर्जी सहित चार भारतीयों ने यह परीक्षा पास की थी
सुरेंद्रनाथ बनर्जी जब असम के कलेक्टर थे 1874 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था
1877मे इस सेवा की उम्र घटाकर 19 वर्षकर दी गई थी ताकि भारतीय शिक्षित लोग यह परीक्षा नहींदे पाए
क्योंकि इस परीक्षा को देने के लिए लंदन जाना पड़ता था और कम उम्र के कारण लंदन जाना असंभव हो गया था
कोलकाता में इंडियन एसोसिएशन ने इसके विरोध में 1877 में टाउन हॉल में एक सभा बुलाई
अपने जीवन में किसी भी राजनीतिक सभा में भाग न लेने वाले केशवचंद्र सेन इस सभा में उपस्थित हुए
 इंडियन एसोसिएशन ने 1879 मे ब्रिटिश सरकार के सामने स्मृति पत्र पेशकरने के लिए लालमोहन घोष को ब्रिटेनभेजा गया
1923 से सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन भारत और ब्रिटेन में एक साथ कियाजाने लगा *

कलकत्ता स्टूडेंट्स एसोसिएशन
इसकी स्थापना 1875 में आनंद मोहन बोस के द्वारा की गई थी
आनंद मोहन बोस के साथ सुरेंद्रनाथ बनर्जी भी छात्रों के इस संगठन में आ मिले थे
यह छात्रों के बेताज बादशाह हो गए

मुंबई में राजनीतिक संगठन
बंगाली हिंदुओं को तो अंग्रेजों ने मुसलमान अत्याचारी नवाबों के शासन से मुक्ति दिलाई थी
लेकिन मुंबई में तो राज्य हिंदुओंका था
अतएव वे लोग इन्हें विदेशी अत्याचारी मानते थे
एक बार एक श्री भास्कर पांडुरंग तरखदकर ने 1841 में अंग्रेजी राज्य के विषय में बंबई गजट में यह लिखा था कि
यदि मैं आपको(अंग्रेजो)इस बात का श्रेय दू की आपने हमारी पिंडारियों और रमोसियो से रक्षा की है तो
यह भी सत्य है कि आपकी व्यापारिक प्रणाली ने अधिक सुचारु रुप से हमारी जेबें खाली कर दी है और
जितना वह लोग 5-6 सौ वर्षों में भी नहीं लूट सके उतना आप ने थोड़े से वर्षों में ही लूट लिया
आपके ज्ञान और बुद्धि के संग संग आप की धूर्तता और कपट भी बढ़ गया है

बंबई एसोसिएशन
 कोलकाता की ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन के नमूने पर दादा भाई नौरोजी ने 26 अगस्त 1852 को बंबई में बंबई एसोसिएशन नाम का संगठनबनाया
 इसका मुख्य उद्देश्य सरकार को समय समय पर ज्ञापन देना था
ताकि हानिकारक समझे जाने वाले नियमों और सरकारी नीतियों के लिए सुझावदिए जा सके और बुराइयों को दूर कियाजा सके
इस संगठन ने भी अंग्रेजी संसद को एक ज्ञापनभेजा था
जिसमें नई विधान परिषदों भारतीय जिसमें भारतीयों को भी प्रतिनिधित्व मिलेके बनाए जाने की प्रेरणा की थी
उन्होंने भारतीयों की ऊंचे ऊंचे पद पर नियुक्ति न करने और अंग्रेज अधिकारियों को बड़े-बड़े वेतन देने की भी निंदाकी
लेकिन यह बंबई एसोसिएशन बहुत दिन तक नहीं चल सकी

बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन
?लिटन की प्रतिक्रिया वादी नीतियों और इल्बर्ट बिल पर हुए विवाद का मुंबई के राजनीतिक क्षेत्रों में भी बहुत प्रभाव पड़ा था
?लॉर्ड लिटन की दमनात्मक नीति और इल्बर्ट बिल के कारण 1885 में मुंबई में प्रेसीडेंसी एसोसिएशन की स्थापना की गई

मुंबई के 4 बड़े नेताओं फिरोज शाह मेहता ,बदरुद्दीन तैय्यब जी, के०टी० तेलंग (जो मुंबई के तीन प्रमुख संप्रदायों से थे) और काशिनाथ त्र्यंबक के प्रयासों से इस संगठन की स्थापनाहुई
31जनवरी 1885 को मुंबईमें नागरिकों की एक सभा जमशेद जी जीजी भाई की अध्यक्षता में बुलाई गई थी
इसी सभा में बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन के गठन की घोषणा हुई थी
लोगों में राजनीतिक विचारों का प्रचार प्रसार करना का मुख्य उद्देश्य था
बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन को पहले बोम्बे एसोसिएशन के नाम से जाना जाता था
जिसकी स्थापना 1825 में हुई थी

पूना सार्वजनिक सभा
इसकी स्थापना जस्टिस एम०जी० रानाडे ने पुणे में 1870(1867) के दशक में की थी
इस सभा का उद्देश्य जनता और सरकार के बीच सेतु का कार्य करना था
इस सभा के द्वारा जनता को यह बताना था कि सरकार के वास्तविक उद्देश्य क्या है और अपने अधिकार कैसे प्राप्त किए जा सकते हैं
इस सभा के सक्रिय सदस्यों में एस०एच०साठेऔर एस०एच०चिपलूनकरथे
पूना सार्वजनिक सभा मुख्यतः नवोदित मध्यमवर्ग ,जमींदारों और व्यापारियों के स्वार्थो का प्रतिनिधित्वकरती थी
इसके सदस्य में अधिकांश ब्राह्मण और वैश्यथे
अपने इसी चरित्र के कारण किसानों में इसका प्रभाव स्थापित नहींहो सका था
बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन और पूना सार्वजनिक सभाने मिलकर राष्ट्रीय हित में कार्यकिए थे

मद्रास की राजनीतिक संस्थाए
 मद्रास की केवल दो प्रमुख राजनीतिक संस्थाएंथी
प्रथम मद्रास नेटिव एसोसिएशन
द्वितीय मद्रास महाजन सभा थी

मद्रास नेटिव एसोसिएशन
यह ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन कलकत्ता की एक शाखा थी
जिसकी स्थापना 26 फरवरी 1852 को मद्रास में हुई थी
इसके संस्थापक गजुलू लक्ष्मी नरसुचेट्टीथे
इसके अध्यक्ष सी० वाई० मुदलियार और सचिव वी० रामानुजाचार्यचुने गए थे
13 जुलाई 1852 को इस संस्था ने अपना नाम बदलकर मद्रास नेटिव एसोसिएशन रख दिया
इसने लंदन में अपना प्रतिनिधि माल्कम लेविन को नियुक्त किया जो मद्रास में जज रह चुके थे
?इस संस्था ने भी 1853 का चार्टर एक्ट पारित होने से पूर्व वही मांगे अपने प्रार्थना पत्र में लिखकर ब्रिटिश संसद में भेजी, जो ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशनने लिख भेजी थी
इस संस्था ने 1857 के विद्रोह की निंदाकी थी
मद्रास नेटिव एसोसिएशन ज्यादा दिन नहीं चल सकी
क्योंकि इसके अधिकांश कार्यकर्ता सामान्य जनता की मुश्किलोंसे अनभिज्ञ थे और उनका जनता पर कोई प्रभाव नहीं था
 मद्रास नेटिव एसोसिएशन जन समर्थन जुटाने में असफल रही
अतः इसे जनसमर्थन प्राप्त नहीं हो सका जिसके कारण इसका अस्तीत्व शीघ्र ही समाप्त हो गया था

मद्रास महाजन सभा
लिटन की नीतियों के विरोध प्रतिक्रिया मद्रास में भी हुई थी
रिपन के कार्यकाल में यहां भी कुछ स्थानीय संगठन बने थे ?1884 में मद्रास महाजन सभाकी स्थापना वी० राघवाचार्य ,जी० सुब्रमण्यम अय्यर आनंद चार्लू और अन्य व्यक्तियों द्वारा की गई थी
 इस सभा के अध्यक्ष पिपलिया नायडूबने और वीर राघवाचार्य और आनंद चार्लू इसके सचिव बने
मद्रास नेटिव एसोसिएशन के अधिकाश नेता इस में सम्मिलित हो गए थे
इसकी स्थापना स्थानीय संस्थाओं के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए हुई थी
इनका पहला सम्मेलन 29 दिसंबर 1884 से 2 जनवरी 1885 तक हुआ
इसी समय मतदान मेले का आयोजन चल रहा था ,साथ ही थियोसॉफिकल सोसाइटी का सम्मेलन भी हो रहा था
जिसमें सभा ने विधान परिषदों के विस्तार की, विधान परिषदों में भारतीयों के प्रतिनिधित्व की और न्यायपालिका और राजस्व एकत्रित करने वाली संस्थाओं के पृथकीकरण की मांग और खेतीहर वर्गों की हालत पर विचार किया गया था

लंदन में राजनीतिक संगठन
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लंदन में भारतीयों ने 3 संगठन बनाए
लंदन इंडियन कमेटी
इसकी स्थापना 1862 में लंदन में पुरुषोत्तम मुदलियार द्वारा की गई थी
लंदन इंडिया सोसाइटी की स्थापना 1865 में लंदनमें दादा भाई नौरोजी द्वाराकी गई थी

ईस्ट इंडिया एसोसिएशन
ईस्ट इंडिया एसोसिएशन का उद्देश्य ब्रिटिश जनता और संसद को भारतीय विषयों से अवगत कराना था
इस संगठन को सबसे अधिक समर्थन भारत में बंबई प्रेसिडेंसीमें मिला था
22 मई 1869 को मुंबई में दादा भाई नोरोजी द्वारा इसकी शाखा स्थापित कि गयी
इसके अधयक्ष जमशेद जी जीजी भाई और सचिव फिरोज शाह मेहता और एच०वी०एम०वागलेबने थे
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से पूर्व इस दिशा में किए गए महत्वपूर्ण प्रयासों के अंतर्गत 1 मार्च 1883 को ह्यम ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकोके नाम एक पत्र लिखा था
इसमें उन्होंने सब से मिल जुलकर  स्वाधीनता के लिए प्रयत्न करने की अपील की थी
अपील का शिक्षित भारतीयों पर अच्छा प्रभाव पड़ा
वे एक अखिल भारतीय संगठन की आवश्यकता महसूस करने लगे
इस दिशा में निश्चित रूप पर पहला कदम 1884में उठाया गया था
जब अड्यार मद्रास में थियोसोफिकल सोसायटी का वार्षिक अधिवेशन हुआ था
इस अधिवेशन में ह्यम सहित दादा भाई नौरोजी और सुरेंद्र नाथ बनर्जीआदि शामिल हुए थे
इसी के बाद 1884 में इंडियन नेशनल यूनियन नामक संगठनकी स्थापना ह्यम की थी
इस संगठन की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य देश की सामाजिक समस्याओं के संबंध में विचार विमर्श करना था
1885 में ह्यम शिमला पहुंचे और नए वायसराय डरफिनसे मिले और अपना उद्देश्यबताया
ह्य़ूम ने स्पष्ट किया की क्रांतिकारी असंतोष के लिए कांग्रेस एक सुरक्षा कपाटका कार्य करेगी
ह्यम डरफिन कि योजना से सहमतहो गया
इस संगठन की स्थापना से पूर्व  ह्यम इंग्लैंड गए जहां उन्होंने रिपन डलहौजी जॉन ब्राइट एवं स्लेग जैसे राजनीतिज्ञों से इस विषय पर व्यापक विचार विमर्श किया था
?भारत आने के पहले ह्यम इंग्लैंड में भारतीय समस्याओं के प्रति ब्रिटिश संसद के सदस्यमें रुचि पैदा करने के उद्देश्य से एक भारतीय संसदीय समिति की स्थापना की थी
भारत आने पर ह्यम ने इंडियन नेशनल यूनियन की एक बैठक मुंबई में 25 दिसंबर 1885में की थी
 जहां पर विचार विमर्श के बाद इंडियन नेशनल यूनियन का नाम बदलकर इंडियन नेशनल कांग्रेस रखा गया
कांग्रेस के बारे में पहली सार्वजनिक घोषणा मद्रास के एक पत्र हिंदू के 5 दिसंबर 1885 के अंक में मिलती है
इस प्रकार मुंबई में इस संस्था ने जन्म लिया
कलकत्ता बंबई और मद्रास के व्यापक दौरे के बाद ह्यम ने यह घोषणा की कि दिसंबर 1885 में भारतीय राष्ट्रीय संघ का एक सम्मेलन पुणे में आयोजित किया जाएगा
जिसमे प्रमुख प्रातों के शिक्षित प्रतिनिधि शामिल होंगे, लेकिन पुणे में प्लेग फेलने के कारण सम्मेलन का स्थान मुंबई कर दिया गया था

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