मौर्योत्तर काल | Mauryottar Period

मौर्य वंश का अंतिम शासक वृहद्रथ था। जिसकी हत्या करके पुष्यमित्र शुंग ने शुंग वंश की स्थापना की ।

शुंग वंश (185 ई. पू. से 75 ई. पू.)

इस वंश की स्थापना मोर्य ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र सुनने मोर्य वंश के अंतिम शासक वृहद्रथ की हत्या करके की। पुष्यमित्र शुंग  ब्राह्मणवादी थे। प्रसिद्ध व्याकरण विद पतंजलि उनके अश्वमेघ यज्ञ के पुरोहित थे। पुष्यमित्र शुंग के समय यवनों का आक्रमण हुआ । यवन आक्रमण का उल्लेख पतंजलि के महाभाष्य गार्गी संहिता तथा कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्र में मिलता है।

पतंजलि लिखता है कि यवनों ने माध्यमिका  पर आक्रमण किया। मालविका अग्नि मित्र के अनुसार पुष्यमित्र ने विदर्भ के राजा यज्ञसेन को हराया। पुष्यमित्र का उत्तराधिकारी उसका पुत्र अग्निमित्र हुआ। पुष्यमित्र के शासनकाल में वह विदिशा का उप राजा था । पुष्यमित्र को उद्भिज भी कहा गया है। शुंग काल में विदिशा का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक महत्व बढ़ गया। शुंग वंश के नवे शासक भागभद्र के शासनकाल के 14वें वर्ष में तक्षशिला के यवन शासक एन्टीआल किड्स के राजदूत हेलियोडोरस ने विदिशा में वासुदेव के सम्मान में गरुड़ स्तंभ स्थापित किया। शुंगों की राजधानी पाटलिपुत्र थी।

मनुस्मृति के वर्तमान स्वरूप की रचना इसी काल में हुई । शुंग काल में संस्कृत भाषा का पुनरुत्थान हुआ। इसके उत्थान में पतंजलि का महत्वपूर्ण योगदान था। पतंजलि ने पाणिनी की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य लिखा। शुंग काल में स्तूपों के निर्माण में पाषाणो का प्रयोग होने लगा।

भरहूत व बोधगया के स्तूपों व तोरण द्वारों का निर्माण शुंग काल में हुआ। इन तोरण द्वार पर जातक कथाओं का अंकन लोग धर्म से संबंधित चित्र तथा गौतम बुद्ध से संबंधित चित्र प्राप्त होते हैं, किन्तु शुंग काल में बुध का मनुष्य रूप में अंकन शुरू नहीं हुआ था। शुंग वंश के अंतिम शासक भवभूति की हत्या कर उसके प्रधानमंत्री वासुदेव ने 75 ई.पूर्व कण्व वंश की नींव रखी।

कण्व वंश

इस वंश की स्थापना 75 ईसापूर्व में वासुदेव ने की। वासुदेव के बाद भूमि मित्र , नारायण व सुशर्मा शासक हुए। सुशर्मा की मृत्यु के साथ ही कण्व राजवंश समाप्त हो गया।

सातवाहन वंश

इस वंश की स्थापना सिमुक ने की थी। पुराणों में सातवाहन वंश को आंध्र जातीय कहा गया है। इनका निवास स्थान महाराष्ट्र में प्रतिष्ठान था । सिमुक ने कण्व नरेश सुशर्मा को पराजित किया। जैन परंपरा के अनुसार सिमुक ने बौद्ध एवं जैन दोनों प्रकार के मंदिरों का निर्माण कराया । सातकर्णी प्रथम इस वंश का प्रथम योग्य शासक था। उसकी उपलब्धियों का ज्ञान नायनिका (नागनिका) के नाना घाट अभिलेख से होता है। उसने दो अश्वमेघ व एक राजसूय यज्ञ किया। सातवाहन राजा हाल एक प्रसिद्ध कवि एवं विद्वानों का आश्रयदाता था । उसने गाथा सप्तशती नामक प्राकृत भाषा में श्रृंगार रस प्रधान एक काव्य लिखा । इसमें प्रेम गाथाओं का वर्णन है।  हाल की रानी मलयावती संस्कृत की ज्ञाता थी।

गौतमी पुत्र सातकर्णी

यह इस वर्ष का 23वां और सबसे महान शासक था इससे आगमन निलय अथार्त वेदों का आश्रय भी कहा गया है । गौतमीपुत्र सातकर्णि के अभिलेखों के अनुसार उसके घोड़े तीन समुद्रों का पानी पीते थे। वशिष्ठ पुत्र पुलुमावी के कुछ सिक्कों पर “दो पतवारों वाले जहाज” का चित्र बना हुआ है।

विशिष्टी पुत्र पुलुमावी 

आंध्र प्रदेश पर विजय के कारण उसे प्रथम आंध्र सम्राट भी कहा जाता है । पुलुवामी ने अपनी राजधानी गोदावरी नदी के किनारे प्रतिष्ठान को बनाया । पुलुमावी ने अमरावती के स्तूप के चारों और वेष्टिनी का निर्माण कर स्तूप को संवर्धित किया । पुलुमावी शक शासक रुद्रदामन से पराजित हुआ लेकिन उसने रुद्र दामन की पुत्री से विवाह कर अपनी स्थिति मजबूत की। कन्हेरी अभिलेख में भी इसका वर्णन है। वशिष्ठी पुत्र पुलुमावी के अभिलेख ही सातवाहन वंश के आंध्र प्रदेश में पाए जाने वाले सबसे प्राचीन अभिलेख है। पुराणों में पुलुमावी को पुलोमा कहा गया है । नासिक अभिलेख में उसे दक्षिणापथेश्वर कहा गया है।

यज्ञ श्री शातकर्णी  

यह इस वंश का अंतिम महत्वपूर्ण शासक था । उसने शंको द्वारा जीते गए भू भाग को पुनः जीता।इसके सिक्कों पर जहाज के चित्र बने हुए हैं , जो इसके समुंद्र  प्रेम व व्यापार के प्रति लगाव को दर्शाते हैं । मछली व शंख के चित्र भी यज्ञ श्री सातकर्णी के सिक्कों पर मिलते हैं।

 सातवाहन समाज, संस्कृति व प्रशासन 

सातवाहनों कुषाणों की भाँति सोने के सिक्के नहीं चलाएं। सोने का प्रयोग बहुमूल्य धातु के रुप में किया जाता था। उनके अधिकांश सिक्के शीशे के हैं । सातवाहनों ने पोटीन तांबे व काँसे मुद्रा भी चलाई। भारी मात्रा में मिले सातवाहन एवं रोमन सिक्कों से बढ़ते हुए व्यापार की ओर संकेत मिलता है । यहां कपास का भारी मात्रा में उत्पादन होता था।

भड़ौच इस समय का प्रमुख बंदरगाह वह व्यापारिक केंद्र था। व्यापार में चांदी व तांबे के सिक्कों का प्रयोग होता था । जिसे कार्षापण कहते थे। सातवाहन काल में छिन्न भिन्न होती वर्ण व्यवस्था को फिर से स्थापित किया गया । सातवाहन कालीन समाज चार जातियों में बटा था । जिसका आधार व्यवसाय था । सातवाहन कालीन समाज व प्रशासन में मातृसत्तात्मक ढांचा था। इस काल की दो रानियां नागनिका व गौतमी बालश्री ने प्रशासन में सक्रिय रुप से भाग लिया ।

ब्राह्मणों को भूमि दान देने की प्रथा को सातवाहनों ने प्रारंभ किया हालांकि उन्होंने अधिकतर भूमिदान बौद्ध भिक्षु को दिया। इस भूमि दान की प्रथम प्रशासनिक विकेंद्रीकरण एवं सामंतवाद को जन्म दिया ।क्योंकि गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में प्रशासनिक अधिकारियों को भी वेतन के बदले में करमुक्त भूमि दान दी जाने लगी । सातवाहन प्रशासन मौर्य प्रशासन की अनुकृति था। उनके समय में जिलों को मौर्य काल की तरह आहार कहा जाता था। गांव का प्रशासक गौल्मिक कहलाता था। गौल्मिक सैनिक टुकड़ी का प्रधान होता था।  सामंतों की तीन श्रेणियाँ होती थी।

  • प्रथम श्रेणी – राजा, 
  • द्वितीय श्रेणी – महाभोज और 
  • तृतीय श्रेणी – सेनापति।

व्यापारियों एवं शिल्पियों में महायान बौद्ध धर्म प्रचलित था। बाकि समाज में वैष्णव एवं शिव धर्म की प्रधानता थी । ईंटों के मंदिरों का सर्वप्रथम निर्माण ईक्षवाकुओं ने किया। इस समय का सबसे महत्वपूर्ण चैत्य कार्ले का एवं स्तूप अमरावती का है। शिल्पिंयों में गंन्धिकों का बार-बार उल्लेख मिलता है गंन्धिक इत्र बनाते थे । सातवाहनों की राजकीय भाषा प्राकृत एवं लिपि ब्राह्मी थी।

विदेशी जातियाँ 

इंडो – ग्रीक

सिकंदर की मृत्यु के बाद पश्चिमी एशिया में सेल्यूकस ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उसके पौत्र एंटीयोक्स के समय बैक्टीरिया और पर्थिया ने 250 ईसापूर्व में विद्रोह करके स्वतंत्रता प्राप्त की , जिसका शासक डियो डॉटअस प्रथम था। सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत के उत्तर पश्चिम में बैक्टीरिया में यूनानी बस्ती बस गई थी । जिन्हें प्राचीन भारतीय साहित्य में यवन कहा जाता है।

डेमेट्रियस ने 183 ईसापूर्व के लगभग भारतीय सीमा में प्रवेश कर पंजाब के कुछ भाग को जीतकर सियालकोट को अपनी राजधानी बनाई । डेमेट्रियस प्रथम इंडो ग्रीक शासक था जिसने भारत में अपना राज्य स्थापित किया तथा यूनानी तथा खरोष्ठी दोनों लिपियाँ वाले सिक्के चलायें। डेमैट्रेस के बाद यूक्रेटाइड्स ने भारत के कुछ हिस्सों को जीतकर तक्षशिला को अपनी राजधानी बनाया ।

सबसे प्रसिद्ध यवन शासक मिनांडर था  यह डेमेट्रियस कुल का था । इसे भारतीय बौद्ध साहित्य में मिलिंद कहा गया है। इसने बौद्ध भिक्षु नागसेन से बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की। प्रसिद्ध ग्रंथ मिलिंदपन्हो में नागसेन वह मिनांडर की दार्शनिक वार्ता संकलित हैं मिनांडर की राजधानी साकल थी। इंडो ग्रीक शासकों से पूर्व भारतीय सिक्कों पर राजा का नाम व तिथि उत्कीर्ण नहीं की जाती थी । इंडो ग्रीक शासक आगाथोक्लीज़ के कुछ सिक्कों पर वासुदेव तथा बलराम की आकृतियां अंकित है ।

इंडो ग्रीक शासकों ने सर्वप्रथम लेख वाले सिक्के तथा सोने के सिक्के जारी किए ।भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्के मिनांडर ने चलाएं ।मिनांडर की काँसी मुद्राओं पर धर्म चक्र का चिन्ह मिलता है। मिनांडर ने परिभाषिक लेख युक्त मुद्राएं चलाई । ग्रीक आक्रमण में भारतीय ज्योतिष, सिक्कों , नाटक एवं कला विशेषतः मूर्ति कला पर प्रभाव डाला ।गांधार मूर्तिकला स्पष्टतया यूनानी प्रभाव से प्रेरित है।महाभारत में यमुना को सर्वज्ञ यवन कहा गया है तथा यह कहा गया है कि यद्यपि यवन मलेच्छ है किंतु अपने ज्ञान के कारण पूजनीय है।

पर्थियन या पल्लव

इनका मूल निवास स्थान इरान था ।भारतीय साहित्य में इनको शकों के साथ उल्लेखित किया गया है तथा दोनों को शक पल्लव का गया है । पल्लव वंश का सबसे शक्तिशाली शासक गोंन्डोफर्नीज था । गोंडोफर्डीज के तख्तेबाही अभिलेख जो पेशावर में है , मैं खुद को गुदव्हर कहा है। उसके शासनकाल में सेंट थॉमस ईसाई धर्म का प्रचार करने भारत आया। इस साम्राज्य का अंत कुषाणों द्वारा हुआ । गोंडोफर्ड़नीस की राजधानी तक्षशीला थी। वोनोनीज भारत में पहला पल्लव शासक था जबकि पर्थियन साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मिथ्रदांत प्रथम था।

शक

शकों को भारतीय साहित्य में सीथियन कहा गया है ।भारत में पहला शक शासक मावेज या माउस था । शको की पाँच शिखाएँ थी –  अफगानिस्तान, पंजाब ,मथुरा, पश्चिमी भारत और उपरी दख्खन। शक राजाओं को क्षत्रप कहा जाता था। शकों की भारत में दो शाखाएं थी। उतरी क्षेत्रप तक्षशिला एवं मथुरा , पश्चिमी क्षत्रप नासिक एवं उज्जैन । पश्चिम क्षत्रप में क्षहरात वंश का नहपान तथा कार्दमक वंश का रुद्रदामन अधिक प्रसिद्ध थे।शकों ने पश्चिमी भारत में लगभग चार सदियों तक शासन किया और बड़ी संख्या में चांदी के सिक्के चलाए ।

चष्टन वंश

चष्टन वंश का संस्थापक यशोमोतिक है । यशोमोतिक का पुत्र चेष्टन था । रुद्रदामन ने गिरनार की प्रसिद्ध सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई । इस झील का निर्माण मौर्य काल में हुआ इस समय सौराष्ट्र का प्रांतपाल सुविशाख था। रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत में लिखित प्रथम अभिलेख था। इससे पूर्व के सभी अभिलेख प्राकृत में थे । इस में संस्कृत को राज्य शिक्षण दिया।

रुद्रदामन ने सातवाहन शासक वशिष्ठ के पुत्र पुलुमावी को दो बार पराजित किया । किंतु निकट संबंधी होने के कारण उसे छोड़ दिया ।रुद्रदामन चष्टन का पुत्र व जय दामन का पुत्र था । गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने चौथी शताब्दी में अंतिम शासक रुद्र सिंह तृतीय को पराजित कर शक शक्ति का उन्मुलन किया । रुद्रदामन प्रथम गांधर्व विद्या ( संगीत ) में प्रवीण था। रुद्रदामन नामक सिक्का शक शासक रुद्रदामन ने ही चलाया । भारत में सर्वप्रथम संस्कृत व तिथि लेख युक्त सिक्के शक शासक रुद्रदामन ने चलाएं । शक सातवाहन काल में सोने व चांदी के सिक्कों की विनिमय दर 1: 35 थी शकों ने क्षत्रप प्रणाली इरान से ग्रहण की।

क्षहरात वंश

भूमक शहरात वंश का प्रथम शासक था नहपान भूमक का उत्तराधिकारी था। नासिक अभिलेख संख्या 10 के अनुसार नहपान के दामाद ऋषभ दत्त ने ब्राह्मणों व बौद्ध भिक्षुओं को दान दिया । कन्हेरी अभिलेख में कार्ले के बौद्ध संघ के लिए कर्जत ग्राम के दान का उल्लेख है । इसी अभिलेख में वर्णासा व प्रभास के ब्राह्मणों को गांव दान देने का उल्लेख है ।

शक मुद्राओं पर शिव पार्वती के चित्र मिलते हैं । जिस प्रकार कोई महान पराक्रम करने पर रोमन सम्राट सीजर की उपाधि धारण करते थे, उसी प्रकार भारतीय शासक विक्रमादित्य की उपाधि धारण करते थे। गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य की उपाधि धारण करने वाले शासकों में सबसे प्रसिद्ध था तथा मध्यकाल में हेमू अंतिम व 14 शासक था जिसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।मिलिंदपन्हो में भी शक जाति का उल्लेख है चीनी लेखों में शक जाति के लिए सई नाम का प्रयोग हुआ है।

कुषाण वंश

ये यूची कबीले से संबंधित थे । कालांतर में युचि कबीला पांच भागों में बट गया । इनमें कोई चाउ आंग शाखा ने भारत में कुषाण वंश की स्थापना की ।

कुजूल कडफीसस – यह कुषाण वंश का प्रथम शासक था। इसके प्रारंभिक सिक्कों पर यूनानी राजा हर्मियस की आकृति उत्किर्ण है । जिससे सिद्ध होता है कि यह पहले हर्मीयस्त के अधीन था। इसने रोमन सिक्कों की नकल पर तांबे के सिक्के ढलवाए तथा महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। इन सिक्के की लिपि यूनानी व खरोष्ठी थी। विम कटफिशस सर्वप्रथम इसने ही भारत में कुषाण वंश की सत्ता स्थापित की । विम ने बड़ी मात्रा में सोने एवं तांबे के सिक्के चलाए। विम शेव मत का अनुयाई था । इसके सिक्कों पर शिव नंदी एवं त्रिशूल की आकृतियां मिलती हैं । उसने महेश्वर की उपाधि धारण की । कुषाणों में भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्कों विम कटपीसस ने ही चलाएं ।

कनिष्क 

कनिष्क महानतम कुषाण शासक था, जो 78 इसी में गद्दी पर बैठा। उसने 78 ई. में एक संवत चलाया जो शक संवत के नाम से प्रसिद्ध है । उसके शासनकाल में कश्मीर में कुंडल वन में वसुमित्र की अध्यक्षता में चौथी बौद्ध संगति हुई । चौथी बौद्ध संगति में बौद्ध ग्रंथों पर जो टिकाए लिखी गई। उन्हें विभाषा शास्त्र कहा जाता है। विभाषा शास्त्र को की रचना वसुमित्र ने की । सारनाथ अभिलेख से कनिष्क के महाक्षत्रप खरपप्लान व वनस्पर का नाम मिलता है। उत्तर पश्चिम में लल्ल व लाइक उसके क्षत्रप थे ।

कनिष्क के साम्राज्य की प्रथम राजधानी पेशावर या पुरुषपुर तथा दूसरी राजधानी मथुरा थी।कनिष्क ने कनिष्कपुर नामक  नगर बसाया । कनिष्क ने तक्षशिला में शिरकप नामक नगर स्थापना पर एक नए नगर का निर्माण किया । व्हेनसांग ने पुरुषपुर में कनिष्ठ द्वारा निर्मित कनिष्क विहार को देखा ।कनिष्क ने  पेशावर में स्तूप का निर्माण किया। पेशावर स्थित कनिष्क चैत्य का निर्माण व वास्तुकार अंगिलस ने किया। यह पहला चैत्य है जिस में लोहे के छत्र का प्रयोग हुआ।

पार्श्व कनिष्क के राज गुरु थे। पश्र्व की सलाह से कनिष्क ने चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन किया । कनिष्क चीन सेनापति पान चाओ से पराजित हुआ। कनिष्क ने उत्तर को छोड़कर अन्य सभी दिशाओं को जीत लिया। माध्यमिका दर्शन के आचार्य नागार्जुन ने प्रज्ञापारमिता सूत्र की रचना की। नागार्जुन विदर्भ का रहने वाला ब्राह्मण था।

हुविष्क के समय कुषाण सत्ता का केंद्र पेशावर से मथुरा हो गया। हुविष्क के सिक्कों पर शिव स्कंद तथा विष्णु आदि देवताओं तथा श्रृंग धारण किए उमा की आकृतियां उत्कीर्ण है । हुविष्क ने चतुर्भुजी विष्णु के सिक्के चलाएं । हुविष्क के सिक्कों पर संकर्षण एवं वासुदेव दोनों अंकित है। कनिष्क कुल का अंतिम महान शासक वासुदेव प्रथम था। वासुदेव के हैं। सिक्कों पर शिव उमा का चित्र है । एक सिक्के पर शिव का हाथी के साथ चित्र हैं।

कुषाणों ने भारत में सर्वप्रथम शुद्ध सर्वण मुद्राएं निर्मित करवाई । प्रथम बार स्वर्ण मुद्रा इंडो ग्रीक शासकों ने तथा वृहद् स्तर पर कुषाणों ने चलाई। सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएं गुप्ता ने चलाई । कुषाण शासको के सोने और तांबे के सिक्के बहुतायत से मिलते हैं । लेकिन विम कार्डफिशस इस व हुविष्क का एक-एक चांदी का सिक्का भी प्राप्त हुआ है । वासुदेव द्वितीय अंतिम कुषाण शासक था।

कुषाण कला

भारत में चमड़े के जूते बनाने, लंबे कोट पहने व पतलून बनाने का प्रचलन कुषाण काल में शुरू हुआ। उस सिक्कों में शासकों को लंबा कोट , पतलून व जूते पहने दिखाया गया है।

मौर्योत्तर कालीन सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक जीवन का वर्णन  

सामाजिक जीवन  

समाज 

इस काल में स्मृतियों की रचना हुई । मनु के अनुसार शूद्र का कार्य तीन अन्य वर्णों की सेवा करना था। विदेशी आक्रमणों की वजह से परंपरागत वर्ण व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया एवं अन्य वर्णसंकर जातियां उत्पन्न हुई। मनुस्मृति में साठ वर्णसंकर जातियों का उल्लेख है । मनुस्मृति में विधवाओं के मुंडन की संस्तुति की है । मनु के अनुसार जिस स्त्री को पति ने छोड़ दिया हो या जो विधवा हो गई हो यदि वह अपनी इच्छा से दूसरा विवाह करे तो वह पुनर्भू तथा उसकी संतान पुनर्भव कहलाती थी।

नियोग से उत्पन्न पुत्र क्षेत्रज कहलाता था ।अविवाहित लड़की के पुत्र को सहोदर कहा जाता था । घर में रहने वाली कन्या या दासी से उत्पन्न पुत्र को कानीन कहा जाता था । विधि अनुसार समान वर्ण में विवाह से उत्पन्न पुत्र को औरस कहा जाता था। औरस पुत्रों की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ था । स्मृतिकारो ने शक ,पल्लव, यवन व कुषाणों को निम्न कोटि के क्षत्रिय माना है तथा उंहें व्रात्य क्षत्रिय कहकर वर्ण व्यवस्था में स्थान दिया है। कोटिल्य ने चांडाल के अतिरिक्त अन्य सभी वर्णसंकर जातियों को शुद्ध माना है।

प्रारंभिक स्मृतिकारों के अनुसार ब्राह्मण को शुद्र द्वारा दिया गया व स्पर्श किया गया अन्न किसी भी स्थिति में ग्रहण नहीं करना चाहिए ।मौर्यकाल में अधिकतर शिल्पी शुद्र वर्ण में ही आते थे किंतु उनके धन प्रतिष्ठा में वृद्धि हो गई । इस प्रकार वैश्य एवं शूद्रों के बीच अंतर कम हो गया । भागवत पुराण में कहा गया है कि यह जातियां विष्णु पूजन से पवित्र हो जाती है।

मौर्योत्तर काल में कला

मौर्योत्तर काल में कला को प्ररेणा बौद्ध धर्म एवं यूनानी प्रभाव से मिली । हिंदी यूनानी शासको ने भारत के पश्चिम उत्तर सीमा प्रांत में यूनान की प्राचीन कला चलाई । जिसे हेलेनिस्टिक आर्ट कहते हैं। भारत में गांधार कला इसका उत्तम उदाहरण हैं। मूर्ति कला की दो शैलियां विकसित हुई ?गांधार कला शैली एवं मथुरा कला शैली । गांधार कला शैली को इंडो ग्रीक शैली भी कहा जाता है। इसका विकास कुषाण काल में हुआ इस कला की विषय वस्तु बोध किंतु निर्माण का ढंग यूनानी था।

गांधार शैली में काले रंग के सलेटी पत्थर का प्रयोग हुआ जबकि मथुरा शैली में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ। गांधार शैली में बुद्ध का मुख्य ग्रीक देवता अपोलो से मिलता है। गांधार शैली के अंतर्गत बुध्द की सर्वाधिक मूर्तियों का निर्माण हुआ।बोधिसत्व की मूर्तियों में सर्वाधिक मैत्रय की है । गांधार व मथुरा कला के अंतर्गत बुद्ध की धर्म चक्र मुद्रा ध्यान मुद्रा अभय मुद्रा व वरद मुद्रा में मूर्तियों का निर्माण हुआ ।

बुद्ध की प्रथम मूर्ति का निर्माण मथुरा शैली में हुआ। यह शैली प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में मथुरा में प्रारंभ हुई । मथुरा शैली की मूर्तियों में आध्यात्मिकता एवं भावुकता की प्रधानता रही है । मथुरा कला शैली विशुद्ध भारतीय हैं। मथुरा कला शैली आदर्शवादी और गांधार शैली यथार्थवादी है । गांधार और मथुरा शैली में अंतर यह है कि गांधार कला में शरीर रचना संबंधी विवरणों तथा शारीरिक सौंदर्य पर बल दिया गया है जबकि मथुरा शैली में मूर्ति को पवित्र आध्यात्मिक भावना देने का प्रयत्न किया गया है । इस समय के कला स्मारक स्तूप चैत्य एवं विहार हैं । कार्ले का चैत्य सातवाहन कालीन है।  तथा वह कला का प्राचीनतम श्रेष्ठ उदाहरण है । मथुरा संग्रहालय में कुषाणकालीन मूर्तियों का भारत में सबसे बड़ा संग्रह है।

धर्म

महायान बौद्ध धर्म का काफी विकास हुआ । वैदिक देवताओं के स्थान पर नवीन देव वर्ग का उदय हुआ। जिनमें ब्रह्मा , विष्णु तथा महेश की त्रिमूर्ति बहुत विख्यात है। द्वितीय शताब्दी ईसापूर्व के घोसुंडी वेदिका लेख में वासुदेव संकर्षण की मूर्ति की पूजा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। शक क्षत्रप षोडास मोराकूप अभिलेख में पंच वीरों की प्रतिमा व उनके मंदिर का उल्लेख हुआ है । शक क्षत्रप षोडास के अभिलेख में वासुदेव मंदिर के प्रवेश द्वार का निर्माण का उल्लेख है । विदेशी शासकों ने बौद्ध धर्म को प्रश्रय दिया ।भागवत धर्म भी विदेशियों में प्रसिद्ध था। हेलियोडोरस का बेसनगर (विदिशा) अभिलेख मोरा कूप अभिलेख भागवत धर्म की प्रसिद्धि को सिद्ध करते हैं ।

मौर्यौत्तर कालीन प्रशासन 

कुषाणों के लेखों में दंडनायक व महा दंडनायक जैसे पदाधिकारियों का उल्लेख मिलता है । संभवत वे सैनिक अधिकारी थे । मथुरा लेख के अनुसार कुषाण काल में ग्रामों का शासन ग्राम ग्रामीक द्वारा चला जाता था। कुषाण शासक देवपुत्र के अलावा शाही व शाहू नवासी की उपाधि धारण करते थे। सातवाहन शासन मौर्य प्रशासन से प्रभावित था। सातवाहन शासकों ने ब्राह्मणों वव श्रमणों को कर मुक्त भूमि अनुदान देने की प्रथा शुरू की।

अभिलेखों में भूमि अनुदान का प्रथम उल्लेख सातवाहन अभिलेख में प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व का है । बाद में अनुदानित भूमि पर से राज्य का प्रशासनिक नियंत्रण भी दानग्राही को सौंपा गया । इससे विकेंद्रीकरण की प्रथा को बढ़ावा मिला व केंद्रीय सत्ता क्षीण हुई। इस विकेंद्रीकरण को नियंत्रण में रखने हेतु राजतंत्र को देवी रुप देने की कोशिश की गई। गौतमीपुत्र शातकर्णी की तुलना कही देवताओं से की गई । कुषाण शासको ने चीनी शासकों की भांति देवपुत्र की उपाधि धारण की। कुषाण शासको ने मृत राजाओं की मूर्तियां भी मंदिर में स्थापित करवाना शुरू किया। इसकी प्रेरणा उन्होंने रोमन शासकों से ली । यह मंदिर देव कुल कहलाते थे ।

कुषाणों ने भारत में द्वैध शासन की प्रणाली शुरू की। शक पार्थियन शासकों ने संयुक्त शासन की प्रथा शुरू की । इस में युवराज राजा के काल में ही सत्ता में बराबर भागीदार होता था। शक कुषाण काल से प्रशासन में सामान्यीकरण की प्रक्रिया शुरु हुई। सर्वप्रथम अश्वघोष प्रथम शताब्दी ईस्वी में बुद्ध चरित्र में सामंत शब्द का प्रयोग जागीदार के लिए किया है।

आर्थिक जीवन

व्यापार 

प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में रोमन साम्राज्य के उदय से भी व्यापार बढ़ा क्योंकि रोमन साम्राज्य विलासिता के सामान का बड़ा ग्राहक बन गया ।यद्यपि मोर्य काल में विकेंद्रीकरण व सामंतवाद को बढ़ावा मिला किंतु आर्थिक गतिविधियां व्यापार वाणिज्य के विकास की दृष्टि से यह अत्यधिक उन्नति का था । इस समय कुषाण साम्राज्य के अधीन मध्य एशिया के प्रदेश थे तथा चीन को रोमन साम्राज्य से जोड़ने वाले सिल्क मार्ग पर भी कुषाणों का नियंत्रण था। भारत का मध्य एशिया व पाश्चात्य विश्व से घनिष्ठ व्यापारिक संबंध स्थापित हुआ। कुषाणों को सिल्क मार्ग पर नियंत्रण से भारी आय हुई।

अवदान शतक से कनिष्क कालीन व्यापार की जानकारी मिलती है । कुषाणों ने स्वर्ण सिक्कों का नियमित रूप से चलन कराया । ताम्रलिप्ति पूर्वी घाट  का सबसे महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था। पश्चिमी तट पर इस काल के प्रमुख बंदरगाह बरबारीकम, वेरीगाजा, भड़ौच या भृगु कच्छ, सुपार्क या सोपारा। पेरिप्लस सोपारा को सुपर, कल्याण को  कालीन , ताम्रलिप्ति को गंग तथा मसूलीपट्टनम को मसालिया कहता है ।

प्रतिष्ठान पैठण प्रसिद्ध व्यापारिक नगर था ।ईसा की प्रथम शताब्दी में अज्ञात यूनानी नाविक द्वारा लिखी पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रयन सी नामक पुस्तक में भारत रोम व्यापार का वर्णन है । पेरिप्लस का अर्थ है यात्री पुस्तिका तथा एरिथ्रियन सी का अर्थ है लाल सागर। ? पेरिप्लस आॅफ द ऐरिथ्रियन सी में लाल सागर से भारत तक की समुद्र यात्रा का वर्णन है। पेरिप्लस ने दक्षिण भारत में संगम कालीन दो महत्वपूर्ण अंतर्राज्य बाजारों का उल्लेख किया है प्रतिष्ठान एवं तगर पश्चिमी तट का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह बेरी गाजा भृगु कच्छ था।

पेरिप्लस के अनुसार फारस की खाड़ी में भृगु कच्छ में दासों का निर्यात किया जाता था। इथियोपिया में भी कुछ कुषाण शासकों के सिक्के मिले हैं । रोमन व्यापारी मसाले , हीरे एवं इस्पात खरीदने के लिए भुगतान स्वर्ण के रूप में करते थे। रोम में होने वाली भारी मात्रा में स्वर्ण प्रवाह को रोकने के लिए रोम को भारत के साथ होने वाले गोल मिर्च व इस्पात के व्यापार को रोकने के लिए कदम उठाने पड़े ।

दक्षिण भारत की गोल मिर्च पश्चिमी देशों में इतनी प्रसिद्ध हुई थी उसका नाम यवन प्रिय पड़ गया । मसाला लोहे की वस्तुएं रोमन साम्राज्य को भेजे जाने वाली मुख्य वस्तुए थी । दक्षिण में सर्वाधिक सिक्के रोम के सम्राट अगस्तय और टेवेरियस के मिले हैं। अरेकिमेडु से अगस्त के सिक्के मिले हैं । प्लिनी भारत के बहुमूल्य रत्नों की लंबी सूची देता है तथा भारत को बहुमूल्य रत्नों का एक बड़ा उत्पादक देश बताता है। उज्जैन उत्तर दक्षिण व पूर्व पश्चिम के व्यापारिक मार्गों पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र था कुषाण शासको ने दिनार नामक स्वर्ण मुद्रा रोमन संपर्क के फलस्वरुप चलाएं । दीनार गुप्तकाल में अधिक लोकप्रिय थी। स्टरबो के अनुसार किसी भारतीय राजा ने रोमन सम्राट अगस्त के पास शिष्टमंडल भेजा था। कन्नड़ भाषा प्रदेश में वैजयंती का प्रसिद्ध बंद रखा था।

उद्योग व व्यवसाय  

जातकों में 18 प्रकार के शिल्पियों का उल्लेख किया गया है। दिघनिकाय में 24 , महावस्तु वस्तु में 36 तथा मिलिंदपन्हो में 75 प्रकार के व्यवसाय का उल्लेख है । जहां मौर्यकाल में शिल्पी राज्य के नियंत्रण में थे वही मौर्योत्तर काल में वह स्वतंत्र रुप से कार्य करने लगे । शिल्पियों व व्यापारियों के निगम होते थे। शिल्पियों की श्रेणियां के प्रमुख को जेठ्ठककहा जाता था। श्रेणी, निगम, कुलिक निगम, पुग, सार्थ आदि व्यापारिक संगठन थे । श्रेणियों का उल्लेख इस समय के अभिलेखों में मिलता है।

निगम का प्रधान श्रेष्ठि श्रेणी का प्रधान प्रमुख तथा पूग का प्रधान ज्येष्ठक कहलाता था । श्रेणी का कार्यालय निगम सभा कहलाता था ।
श्रेष्टि को उत्तरी भारत में सेठ व दक्षिण भारत में शेट्टी या चैटयार कहा जाता था । गोवर्धन नासिक नगर शिल्पियों का महत्वपूर्ण के केन्द्र था। स्ट्रेबो के अनुसार किसी शिल्पी की आंख व हाथ को क्षति पहुंचाने वाले को मृत्युदंड दिया जाता था। उरैयूर से प्राप्त स्थानीय मलमल के कपड़े का नाम अरेगुरु था  श्रेणियों के पास लोग निधि के रूप में धन जमा कराते थे। मौर्योत्तर काल में सर्वाधिक प्रचलित सिक्का कार्षापण था। सूती वस्त्र उद्योग  सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्योग था। उरैयूर और अरिकमेडु सूती वस्त्र के प्रमुख केंद्र थे।

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