मौर्य साम्राज्य | Maurya Empire)

मौर्य साम्राज्य (322 ई. पू. – 185 ई. पू.) 

मौर्य साम्राज्य के जानकारी के स्रोत  

1.  साहित्य

  • ब्राह्मण साहित्य – कौटिल्य का अर्थशास्त्र, सोमदेव कृत कथासरित्सागर, क्षेमेन्द्र की वृहत्कथामंजरी, पतंजलि का महाभाष्य,विष्णु पुराण, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, मुद्राराक्षस में चन्द्र गुप्त मौर्य द्वारा चाणक्य की सहायता से नन्दशासक धनानन्द को अपदस्थ करने व चन्द्र गुप्त की परिषद् सभा का उल्लेख है।
  • बौद्ध साहित्य – दीपवंश, महावंश, दिव्यावदान, महाबोधि वंश, दीर्घ निकाय।
    जैन साहित्य – भद्रबाहु का कल्पसूत्र , हेमचन्द्र का परिशिष्टपर्व।

2. विदेशी विवरण – स्ट्रेबो, कर्टिअस, डिओडोरस, प्लिनी, एरियन,जस्टिन प्लूटार्क, नियार्कस, ओनेसिक्रिटस, मेगस्थनीज।

3. पुरातत्व

शिलालेख    ▪ स्तम्भ लेख ▪ गुहालेख

शिलालेख  14 विभिन्न लेखों का समूह आठ अलग – अलग स्थानों पर प्राप्त हुए हैं। 

शहबाजगढ़ी, मानसेहरा, कालसी, गिरनार, धौली, जौगढ़, एर्रगुडि तथा सोपारा।

लघुशिलालेख 

यह 14 शिलालेखों के अतिरिक्त हैं तथा निम्न स्थानों पर प्राप्त हुए हैं – रूपनाथ, गुजर्रा, सहसराम, भाब्रू, मास्की, ब्रह्मगिरी, सिद्धपुर, जटिंगरामेश्वर, एर्रगुडि, गोविमठ, पालकिगुन्डु , राजुल मंडगिरी, अहरौरा, सारोमारो, नेट्टूर, उदेगोलम्, सन्नाती – गुलबर्गा (यहां से अशोक का नवीनतम शिलालेख मिला है।

स्तम्भ लेख 

अशोक के स्तम्भ लेखों की संख्या 7 हैं। ये केवल ब्राह्मी लिपि में है। जो 6 विभिन्न स्थानों से प्राप्त हुए हैं। जो पाषाण स्तम्भों पर उत्कीर्ण है । 

  • दिल्ली – टोपरा,
  • दिल्ली – मेरठ,
  • लौरियि – अरराज,
  • लौरिया – नन्दनगढ़, रामपुरवा व प्रयाग

लघु स्तम्भ लेख – अशोक की राजकीय घोषणाएं जिन स्तम्भों पर उत्कीर्ण है उन्हें लघु स्तम्भ लेख कहा जाता है। इनके मिलने के स्थान साँची, सारनाथ, कौशाम्बी, रूम्मिनदेई, निग्लिवा आदि। अशोक के सभी अभिलेखों का विषय प्रशासनिक था केवल रूम्मिन्देई लेख का विषय आर्थिक था। इससे मौर्य काल के कर नीति की जानकारी मिलती है

गुहालेख

गया जिले में बराबर की पहाड़ियों की गुफाओ की दीवारों पर अशोक के लेख उत्कीर्ण मिलते हैं। इनमें अशोक द्वारा आजीवक साधुओं को निवास हेतु गुहा दान करने का उल्लेख है। अशोक ने आजीविकों हेतु 4 गुफाए- कर्ण, सुदामा, चौपार, व विश्व झोपड़ी। पनगुडरिया गुहालेख में अशोक को महाराज कुमार कहा गया है। नागार्जुनी गुहालेख अशोक के पौत्र दशरथ ने उत्कीर्ण करवाए। मास्की और गुजर्रा अभिलेख में अशोक का व्यक्तिगत नाम देवनांप्रिय मिलता हैं।

चन्द्रगुप्त मौर्य 

चन्द्र गुप्त मौर्य को ग्रीक साहित्य में सेन्ड्रोकोट्टस या एन्ड्रोकोट्टस कहा गया है स्ट्रेबो व जस्टिन ने चन्द्र गुप्त मौर्य को सेन्ड्रोकोट्टस ,एरियन व प्लूटार्क ने एन्ड्रोकोट्टस कहा है। सर्वप्रथम विलियम जोन्स ने सेन्ड्रोकोट्टस की पहचान चन्द्र गुप्त मौर्य से की है। इसने अपने गुरू चाणक्य की सहायता से नन्दशासक धनानन्द को पराजित कर मौर्य वंश की नींव रखी। मुद्राराक्षस में इनका वर्णन हैं। ब्राह्मण साहित्य में चन्द्र गुप्त मौर्य को शुद्र, जैन एवं बौद्ध साहित्य में क्षत्रिय तथा ग्रीक साहित्य में निम्न कुल का नहीं बल्कि निम्न परिस्थितियों में जन्मा हुआ बताते है ।

महावंश के अनुसार कौटिल्य ने चन्द्र गुप्त को जम्बू द्वीप (भारत) का शासक बनाया। 305 ईसा पूर्व में चन्द्र गुप्त मौर्य ने सीरिया के ग्रीक शासक सेल्युकस को परास्त किया। सन्धि के फलस्वरूप सेल्युकस ने अपनी पुत्री हेलना का विवाह चन्द्र गुप्त से किया। चार प्रान्त हैरात, कन्धार, बलूचिस्तान, व काबुल दहेज के रूप में दिए तथा मेगस्थनीज को अपने राजदूत के रूप में चन्द्र गुप्त मौर्य के दरबार में भेजा। बदले में चन्द्र गुप्त ने 500 हाथी दिये।

सेल्युकस के साथ हुए चन्द्र गुप्त के इस युद्ध व सन्धि का वर्णन एप्पियानस ने किया। चन्द्र गुप्त ने उत्तर – पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत तक अपनी सीमा का विस्तार कर सर्वप्रथम भारत की वैज्ञानिक सीमा को प्राप्त किया। चन्द्र गुप्त मौर्य की चन्द्र गुप्त संज्ञा का प्राचीनतम अभिलेखीय साक्ष्य रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से मिलता हैं। चन्द्र गुप्त मौर्य के सौराष्ट्र के गवर्नर पुष्यगुप्त वैश्य ने इतिहास प्रसिद्ध सुदर्शन झील का निर्माण करवाया।

बिन्दुसार (298 ई. पू. से 274 ई. पू.)  

बिन्दुसार चन्द्र गुप्त मौर्य का पुत्र था। इसे ग्रीक लेखों में अमित्रघात या अमित्रोकेटस कहा गया है। वायु पुराण में मद्रसार तथा जैनग्रन्थों में सिंहसेन कहा गया है। प्लिनी के अनुसार मिस्र के शासक टालमी द्वितीय फिलाडेल्फस ने डायनोसिस नामक राजदूत बिन्दुसार के दरबार में भेजा। एथिनियस नामक युनानी लेखक के अनुसार बिन्दुसार ने सीरिया के शासक एण्टियोकस प्रथम को मैत्रीपूर्ण पत्र लिखकर तीन वस्तुओं की मांग की –  मदिरा, सूखी अंजीर, व दार्शनिक

सीरियाई शासक ने दार्शनिक के अलावा सभी चीजें भिजवा दी। दार्शनिक के बारे में यह कहा कि यूनानी कानून के अनुसार दार्शनिक का विक्रय नही किया जा सकता। दिव्यावदान के अनुसार बिन्दुसार के समय तक्षशिला में दो विद्रोह हुए, जिनके दमन हेतु प्रथम बार अशोक व दूसरी बार सुसीम को भेजा गया। बिन्दुसार आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था। चाणक्य बिन्दुसार का भी प्रधानमंत्री था। चाणक्य के बाद राधागुप्त प्रधानमंत्री बना। बिन्दुसार की सभा में 500 सदस्यों वाली मंत्रिपरिषद थी जिसका प्रधान खल्लाटक था।

अशोक (273 ई. पू. से 232 ई. पू.) 

सिहली अनुश्रुति के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या कर सिंहासन प्राप्त किया। चार वर्ष तक चले इस उत्तराधिकार युद्ध के पश्चात् अशोक ने 269 ई. पू. में विधिवत रूप से राज्याभिषेक करवाया। महाबोधि वंश व तारानाथ के अनुसार सत्ता प्राप्ति हेतु अशोक ने गृहयुद्ध में अपने भाइयों की हत्या कर दी। अशोक के प्रारम्भिक जीवन की जानकारी बौद्ध ग्रन्थों दिव्यावदान व सिंहली अनुश्रुति से मिलती है। बौद्ध ग्रन्थों में अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी मिलता हैं। वह चम्पा के ब्राह्मण की बेटी थी।

अभिलेखों में अशोक को ईरानी शैली में देवनांप्रिय तथा देवनांप्रियदस्सि जैसी उपाधियों से विभुषित किया। अशोक को शिलालेख लगवाने का विचार ईरानी शासक दारा से मिला तथा दारा की भाँति उसने देवनांप्रिय जैसी उपाधियां ग्रहण की। मास्की, गुजर्रा, निट्टूर व उदेगोलम् के अभिलेखों में ही अशोक नाम मिलता हैं। राज्याभिषेक से पूर्व अशोक उज्जैन का गवर्नर था।

आजीवक मुनि पिंगलवत्सजीव ने भविष्यवाणी  की थी कि अशोक राजसिंहासन पर बैठेगा। अशोक ने नेपाल में देवपत्तन (ललितपाटन) नगर बसाया। सारनाथ लेख के अनुसार नेपाल अशोक के साम्राज्य में था। अशोक ने अपने ऊपर आश्रित बच्चों एवं पत्नी की समुचित व्यवस्था किये बिना भिक्षु बनने वालो के लिए दण्ड का विधान किया। राज्याभिषेक से सम्बन्धित लघु शिलालेख में अशोक ने अपने को बुद्ध शाक्य कहा है।

अशोक ने मोगलिपुततिस्स की अध्यक्षता में तीसरी बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ। अशोक ने राज्याभिषेक के आठवें वर्ष 261 ई. पू. में कलिंग पर आक्रमण किया जिसमें करीब 1 लाख लोग मारे गए। कलिंग युद्ध व परिणामों का वर्णन 13वें शिलालेख में मिलता हैं। प्लिनी के अनुसार अशोक ने व्यापारिक कारणों हेतु कलिंग पर आक्रमण किया। भाब्रू शिलालेख में अशोक बुद्ध, धम्म, तथा संघ के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करता है। यह अशोक के बौद्ध होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।

मोग्गलिपुत्त तिस्स ने अशोक के साथ उसके पुत्र महेन्द्र को बौद्ध में दीक्षित किया।सातवें अभिलेख में अशोक द्वारा जनता को दिया गया धर्म सन्देश धर्मश्रावण कहलाया। दूसरे अभिलेख में अशोक पुछता है कि धम्म क्या है फिर दूसरे व सातवें स्तम्भ लेख में इसका उतर देते हुए कहता हैं कि अपासिनव (पाप से मुक्ति), लोगों का कल्याण, दया, दान, सत्य एवं शुद्धि ही धम्म है । मास्की अभिलेख में अशोक ने स्वयं को बुद्धशाक्य कहा है। अशोक ने राज्याभिषेक के 13वें वर्ष में धर्ममहामात्य की नियुक्ति की। अशोक ने महेन्द्र व संघमित्रा को लंका में धम्म प्रचार हेतु भेजा। अशोक का समकालीन लंका नरेश देवनांप्रिय तिष्य था। अशोक के अभिलेखों में उसकी सिर्फ एक रानी कारूवकी का उल्लेख मिलता हैं। जो तीवर की माँं थी।

अशोक के उत्तराधिकारी  

वायु पुराण के अनुसार अशोक के बाद कुणाल शासक बना। राजतरंगिणी के अनुसार जालौक कश्मीर का शासक था। वायु एवं मत्स्य पुराण के अनुसार संप्रति से पहले अशोक का दूसरा पौत्र दशरथ (कुणाल का पुत्र) शासक बना। इसकी पुष्टि आजीविकों को दान दी गई नागार्जुनी गुफाओं से भी होती हैं। मौर्य वंश का अन्तिम शासक वृहद्रथ था। जिसकी हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई. पू. में कर दी। बाणभट्ट का हर्षचरित व पुराण इस घटना का वर्णन करते हैं। वृहद्रथ अशोक का सातवां उत्तराधिकारी था।

मौर्य प्रशासन 

मौर्य प्रशासन केन्द्रीय राजतन्त्रात्मक प्रशासन था जिसमें पहली बार भारत को राजनैतिक एकता के सूत्र में बांधा। अर्थशास्त्र में राजा को परामर्श दिया गया है कि वह सम्पूर्ण शक्ति को अपने हाथों में ग्रहण करें।  “प्रजा के सुख में ही राजा का सुख हैं और प्रजा की भलाई में उसकी भलाई है, राजा को जो अच्छा वह हितकर नहीं है वरन् हितकर वह हैं जो प्रजा को अच्छा लगे। ” -अर्थशास्त्र

प्राचीन भारत में सबसे विस्तृत नौकरशाही मौर्यकाल में थी। अर्थव्यवस्था पर राजकीय नियन्त्रण सर्वाधिक था।

कौटिल्य ने राज्य के सप्तांगबतायें –

  1. राजा    
  2. अमात्य  
  3. राष्ट्र  
  4. दुर्ग      
  5. बल (सैना)
  6. कोष  
  7. मित्र

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में मंत्री परिषद को एक वैधानिक आवश्यकता बताते हुए कहा है कि “राजा एक पहिये पर नहीं चल सकता। ” मंत्रिपरिषद के सदस्यों को 12000 पण वार्षिक मिलते थे जबकि मंत्रिण के सदस्यों को 48000 पण वार्षिक वेतन। मंत्रिण एक बहुत ही विश्वसनीय व्यक्तियों की छोटी परिषद होती थी, जिसमें तीन चार व्यक्ति ही होते थे। अशोक के शिलालेखों में मंत्रिपरिषद को परिषा कहा गया है।

 केन्द्रीय प्रशासन 

राजा को प्रशासन में मदद देने के लिए 18 पदाधिकारियों का एक समूह होता था जिसे तीर्थ कहा जाता था, ये महामात्य भी कहे जाते थे। सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ मंत्री एवं पुरोहित थे। मंत्रियों की नियुक्ति हेतु इनके चरित्र को जाँचा परखा जाता था, जिसे उपधापरीक्षण कहते थे।युक्त तथा उपयुक्त केन्द्रीय तीर्थ एवं अध्यक्षों के नियन्त्रण में कार्य करते थे। इनके द्वारा केन्द्रीय व स्थानीय शासन के बीच संपर्क बना रहता था।

अर्थशास्त्र में कुल 26 अध्यक्षों का उल्लेख है। और 18 तीर्थों की सूची हैं। अशोक के शिलालेखों में पुरोहित का उल्लेख नहीं मिलता हैं जबकि चन्द्र गुप्त मौर्य के समय में यह महत्वपूर्ण था। दण्डपाल सेना की सामग्री जुटाने वाला अधिकारी था तो अन्तपाल सीमावर्ती दुर्गों का रक्षक। दुर्गपाल दुर्गों का प्रबंधक था। नागरक नगर का प्रमुख अधिकारी था। दौवारिक राजमहलो की देखरेख करने वाला था। आटविक वन विभाग का प्रधान। प्रदेष्टा फौजदारी न्यायालय का न्यायाधीश था तो व्यावहारिक दीवानी न्यायधीश। कर्मान्तिक उद्योग धन्धों का प्रधान निरीक्षक था। समाहर्ता राजस्व का संग्रहकर्ता था। वही सन्निधाता कोषाध्यक्ष था।

प्रान्तीय प्रशासन

मौर्य साम्राज्य प्रान्तों में विभाजित था। चन्द्र गुप्त मौर्य के समय चार तथा अशोक के समय कलिंग विजय के पश्चात पाँच प्रान्त हो गए। प्रान्तों को चक्र या आहार कहा जाता था।
    प्रान्त                 राजधानी
1. उत्तरापथ          तक्षशिला
2. दक्षिणापथ        सुवर्णगिरि
3. अवन्ति            उज्जैन
4. मध्य देश          पाटलिपुत्र
5. कलिंग              तोसाली

अशोक ने तक्षशिला, उज्जैन व तोसाली में कुमार नियुक्त किये। ये प्रान्तपति होते थे तथा युवराज ही होते थे।  प्रान्तो का शासन राजवंश के किसी निकट संबंधी या राजकुमार द्वारा चलाया जाता था। 

मौर्य प्रशासन का विभाजन निम्न प्रकार से था –

  • साम्राज्य
  • प्रान्त
  • आहार या विषय –  जिला
  • स्थानीय  – 800 गाँव
  • द्रोणमुख  – 400 गाँव
  • खार्वटिक – 200 गाँव
  • संग्रहण –  100 गाँव
  • ग्राम – प्रशासन की सबसे छोटी इकाई

प्रदेष्टि – यह अधिकारी समाहर्ता के अधीन कार्य करता था जो स्थानिक व गोप के कार्यों की जाँच करता था। अशोक ने युक्त नामक अधिकारी की नियुक्ति की। ये स्थानीय तथा केन्द्र शासन के बीच की सम्पर्क कड़ी था।  जिले का प्रशासनिक अधिकारी स्थानिक था। गोप के अधीन दस गाँव होते थे। गोप स्थानिक के अधीन था। अपराधों पर नियन्त्रण हेतु पुलिस की व्यवस्था थी। पुलिस को रक्षिण कहा जाता था। ग्राम का प्रधान ग्रामिक कहलाता था।

  • राजुक – ग्रामीण क्षेत्रों की देखभाल हेतु, कर संग्रहण एवं न्यायिक शक्तियों युक्त अधिकारी।
  • प्रादेशिक – जिलाधिकारी (अर्थशास्त्र का प्रदेष्टा)
  • महापात्र – उच्चअधिकारी
  • प्रतिवेदक – राजा को सूचना देने वाला अधिकारी।

 नगर प्रशासन 

कौटिल्य नगर प्रशासन का वर्णन नहीं करता है। जबकि मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र का नगर प्रशासन तीस सदस्यों के मंडल द्वारा जो 6 समितियों में विभक्त था, चलाया जाता था। प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे। 

  • प्रथम समिति – उद्योग शिल्पों का निरीक्षण।
  • द्वितीय समिति – विदेशियों की देखरेख।
  • तृतीय समिति – जन्म – मरण का रजिस्ट्रेशन।
  • चतुर्थ समिति  – व्यापार एवं वाणिज्य।
  • पंचम् समिति – निर्मित वस्तुओं के विक्रय का निरीक्षण।
  • षष्ट समिति – बिक्री कर वसूल करना (1/10 भाग)

मेगस्थनीज नगर अधिकारी को ऐस्टोनोमोई कहता हैं। एग्रोनोमोई नामक अधिकारी नगर में सड़क व भवन निर्माण का काम देखता था।

न्याय व्यवस्था 

सम्राट सर्वोच्च व अन्तिम न्यायाधीश था। अर्थशास्त्र में दो प्रकार के न्यायालयों का वर्णन हैं।

1. धर्मस्थीय –  इन्हें दीवानी अदालत कहा जाता था।
2. कण्टक शोधन – ये फौजदारी न्यायालय तथा राज्य व नागरिकों के मध्य होने वाले विवादों का निपटारा करती थी। नगर के न्यायधीश को व्यवहारिक महापात्र तथा जनपद के न्यायधीश को राजुक कहा जाता था।

फौजदारी मामलों के न्यायाधीश को प्रदेष्टा कहा जाता था। चोरी व लूट के मामलों को साहस कहा जाता था। इन्हें धर्मस्थीय न्यायालय में पेश किया जाता था।

गुप्तचर व्यवस्था 

अर्थशास्त्र में गुप्तचर व्यवस्था पर विस्तृत एवं महत्वपूर्ण सूचना मिलती है। अर्थशास्त्र में गुप्तचरों को गूढ़ पुरूष कहा जाता था। दो प्रकार के गुप्तचर थे –
1. संस्था – एक ही स्थान पर रहकर कार्य करने वाले गुप्तचर।
2. संचार – भ्रमणशील गुप्तचर।

यह गुप्तचर नाना प्रकार के वेश धारण कर और हुलिया व पहचान छिपाकर जनता के बीच में रहते थे। विद्यार्थियों के वेश में , सन्यासियों के वेश में, गरीब किसान के वेश में, गरीब व्यापारी तथा तपस्वी के वेश में भी गुप्तचर रहते तथा अपना दायित्व निर्वाह करते थे।

सैन्य प्रशासन 

मेगस्थनीज के अनुसार सैन्य प्रशासन छः समितियों द्वारा देखा जाता था। प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते होते थे। सैना के पाँच अंग थे। पैदल, अश्व, हाथी, रथ तथा नौसेना। जस्टिन ने चन्द्र गुप्त की सैना को डाकुओं का गिरोह कहा है। अन्तपाल नामक अधिकारी सेना का प्रशासन देखता था। इसके अतिरिक्त वह सीमान्त क्षेत्रों की देखभाल करता था। नौसेना के प्रमुख को नवाध्यक्ष कहा जाता था। सर्वप्रथम ग्रुनवेडेल ने यह बताया कि मौर्यों का वंश चिह्न (dynastic emblem)  मोर था।

 मौर्यकालीन सिक्के 
❇ कार्षापण, पण ? चाँदी का सिक्का।
सुवर्ण, निष्क ? सोने का सिक्का।
माषक – ताँबे का सिक्का।
काकणि – ताँबे का छोटा सिक्का।

मौर्यकालीन सिक्के आहत सिक्के (पंचमार्क) थे।

व्यापार 

व्यापार जल एवं थल दोनों मार्गों से होता था। व्यापारी श्रेणियों में संगठित थे। इनका मुखिया श्रेष्ठी कहलाता था। जातकों में 18 प्रकार की श्रेणियों का उल्लेख मिलता हैं। व्यापारिक जहाजों का निर्माण भी एक प्रमुख उद्योग था। स्ट्रेबो व कौटिल्य के अनुसार जहाज निर्माण पर राज्य का एकाधिकार था। पश्चिम भारत में भृगुकच्छ (भड़ौच) एवं पूर्वी भारत में ताम्रलिप्ति प्रमुख बन्दरगाह थे।

कौटिल्य के अनुसार स्थल मार्ग की अपेक्षा नदी मार्ग से व्यापार अधिक अच्छा था। तक्षशिला, उज्जैन, काशी, कौशाम्बी, तोसाली, पाटलिपुत्र आदि आन्तरिक व्यापार के प्रमुख केन्द्र थे। मौर्य काल का सबसे प्रधान उद्योग सूत कातने व बुनने का था। वस्त्र निर्माण के लिए सरकारी कारखाने थे। अर्थशास्त्र के अनुसार काशी, वंंग, पुण्ड्र , कलिंग, मालवा सूती वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध थे। काशी और पुण्ड्र में रेशमी वस्त्र भी बनते थे। बंग की मलमल विश्व विख्यात थी। 

मौर्य वंश से सम्बन्धित जानकारी 

चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म ई.पू. 340 में पाटलिपुत्र में हुआ था। चन्द्रगुप्त मौर्य की माता का नाम मुरा था। चन्द्रगुप्त मौर्य की शिक्षा तक्षशिला में सम्पन्न हुई थी। चन्द्रगुप्त मौर्य का सिकंदर से परिचय तक्षशिलामें हुआ था। चन्द्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य की सहायता से मौर्य वंश की स्थापना की। चन्द्रगुप्त मौर्य का शासनकाल ई.पू. 323 से 298 था। चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रथम पत्नी का नाम दुर्धरा था जिससे बिन्दुसार नामक पुत्र का जन्म हुआ। ई.पू. 304-5 में चन्द्रगुप्त मौर्य ने बैक्ट्रिया के शासक सेल्युकस को परास्त कर उनकी पुत्री हेलेना से विवाह किया।

इस विवाह के फलस्वरूप उन्हें हेरात, मकरान और काबुल दहेज के रूप में मिला।  ‘सेंड्रोकोट्स’ की पहचान ‘चन्द्रगुप्त से स्थापित करने वाले पहले विद्वान विलियम जोन्स थे। सेल्युकस मेगस्थनीज को अपना राजदूत बनाकर चन्द्रगुप्त के दरबार मे भेजा था। यूनानी लेखकों ने चन्द्रगुप्त मौर्य को पोलिबोथ्रा के नाम से समबोधित किया है। चन्द्रगुप्त ने श्रवणवेलगोला में अपने प्राण त्यागे थे चन्द्रगुप्त मौर्य के पश्चात उनके पुत्र बिन्दुसार राजसिंहासन पर बैठे।

बिंदुसार आजीवक सम्प्रदाय के अनुयायी थे। बिंदुसार के काल में भी चाणक्य ही प्रधानमंत्री थे। स्ट्रेबो ने लिखा है कि यूनानी शासक एण्टियोकस ने डाइमेकस नामक दूत को बिंदुसार के दरबार मे भेजा था। बिन्दुसार को ‘अमित्रघात’ के नाम से भी जाना जाता है। यूनानी इतिहासकारों ने बिन्दुसार का नाम ‘अमित्रोचेट्स’ लिखा है। बिन्दुसार ने अपने पिता चन्द्रगुप्त मौर्य के द्वारा जीते गए क्षेत्रों को पूरी तरह से बरकरार रखा था। बिंदुसार ने कर्नाटक के आसपास तक के क्षेत्रों तक अपने राज्य का विस्तार किया। बिन्दुसार ने ई.पू. 297-98 से लेकर ई.पू. 272 तक राज्य किया। ई.पू. 272 में बिन्दुसार का निधन हो गया। बिन्दुसार के निधन होने के बाद उसके पुत्र अशोक ने राजगद्दी संभाली।

अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी था। महादेवी एवं करूवाकी अशोक की पत्नियाँ थीं। अशोक भी अपने पिता बिन्दुसार एवं पितामह चन्द्रगुप्त मौर्यके जैसे ही अपने साम्राज्य विस्तार करता गया। कश्मीर, कलिंग और अन्य प्रदेशों पर विजय प्राप्त कर अशोक ने पूरे भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार कर लिया। अशोक के साम्राज्य की पश्चिमी सीमा ईरान तक फैली हुई थी। राजतरंगिणी के रचयिता कल्हण के अनुसार अशोक ने कश्मीर में ‘श्रीनगर’ की स्थापना की थी। अपने शासन के सातवें वर्ष में अशोक ने कश्मीर व खोतान पर विजय प्राप्त की। आठवें वर्ष अर्थात ई.पू. 261 में अशोक ने कलिंग का युद्ध लड़ा। कलिंग युद्ध में हुए भीषण नर संहार ने अशोक का हृदय परिवर्तन कर दिया जिसके परिणामस्वरूप उसे बौद्ध धर्मको अपना लिया। अशोक भारत का प्रथम सम्राट था जिसने अभिलेखों के माध्यम से प्रजा को सम्बोधित किया।

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