राजस्थान निर्माण के विभिन्न चरण ( part 02 )

 चतुर्थ चरण अथवा वृहत्तर राजस्थान का गठन 

संघ का नाम-वृहत्तर राजस्थान
तिथि-30 मार्च 1949
सम्मिलित रियासतें-संयुक्त राजस्थान द्वितीय+जयपुर,जोधपुर, जैसलमेर,बीकानेर
महाराजप्रमुख-भूपाल सिंह (आजीवन)
उप राज प्रमुख-भीमसिह व हनुवंतसिंह
राज प्रमुख-मानसिंह द्वितीय(आजीवन)
प्रधानमंत्री-हीरालाल शास्त्री
राजधानी-जयपुर
उद्घाटन-सरदार वल्लभ भाई पटेल

 

संयुक्त राजस्थान द्वितीय के निर्मित हो जाने से पूर्व ही अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् की राजपूताना प्रांतीय सभा 20 जनवरी 1948 को एक प्रस्ताव द्वारा राजस्थान की सभी रियासतों को मिलाकर एक वृहद् राजस्थान राज्य के निर्माण की मांग कर चुकी थी
इस प्रस्ताव को क्रियांवित करने में भारत सरकार के समक्ष अनेक कठिनाइयाप्रस्तुत हुई थी
लेकिन जब मार्च 1948 में मत्स्य संघ का गठनहो गया और अप्रैल 1948 में ही राजस्थान की दक्षिण और उत्तर पूर्ण की रियासतों को मिलाकर संयुक्त राजस्थान द्वितीय का निर्माण कर दिया गया तो भारत सरकार के समक्ष वृहद राजस्थान के निर्माण में आने वाली कुछ कठिनाइयां कमहो गई थी
उधर मई 1948 में ही भारत सरकार ने सिरोही रियासत का शासन प्रबंध मुंबई सरकार को सौंप दिया था
अब राजस्थान की प्रमुख रियासतों में जयपुर, जोधपुर, बीकानेर ,जैसलमेर रियासते ही  बची थी
जो अभी तक किसी संघ में नहीं मिलीथी
जोधपुर ,बीकानेर ,जैसलमेर रियासते पाकिस्तान की सीमा से सटी हुई थी
इसके अलावा इनका बहुत बडा क्षेत्र  रेगिस्तानी होने के कारण यातायात व संचार की दृष्टि से बहुत पिछड़ाहुआ था
इसीलिए भारत सरकार का गृह मंत्रालय इन तीनों राज्यों को केंद्रीय शासित प्रदेशबनाने के लिए उत्सुक था
लेकिन रियासती विभाग लोक-भावनाओं को ध्यान में रखकर ही कोई निर्णय लेना चाहता था
तीनों रियासतों के नरेश अपनी-अपनी रियासतों का स्वतंत्र अस्तित्व रखना चाहते थे
तीनों रियासतो के नरेश मे बीकानेर नरेश श्री शार्दूल सिह तो इस संदर्भ में अपने विचार व्यक्त कर चुके थे
उधर समाजवादी नेता श्री जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया भी राजस्थान का समर्थन 9 नवंबर 1948 को कर चुके थे
बीकानेर ,जैसलमेर ,जोधपुर की पाकिस्तान की सीमा पर स्वतंत्र इकाई के रूप में बने रहना भारत सरकार को स्वीकार  नहीं था

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने रियासती विभाग के सचिव श्री  वी पी मेनन को उक्त चारों रियासतों के नरेशों से बात करने भेजा
जयपुर रियासत के दीवान सर वी०टी०कृष्णामाचारी ने वृहद राजस्थान का विरोध किया पर साथ में ही अपने वजनदार सुझाव भीप्रस्तुत की है
उन्होंने कहा कि इस समय पंजाब में सिख प्रभुत्व की समस्या बनी हुई है यदि वृहद राजस्थान बन गया तो यहां पर राजपूत प्रभूत्वकी समस्या उठ खड़ी होगी
अतः राजपूत रियासतों का एकीकरण एक की बजाए तीन ईकाईयों में करनाचाहिए

पहली इकाई में *वर्तमान संयुक्त राजस्थान यूनियन हो
दूसरी में जयपुर अलवर व करौली शामिलकिए जाएं और
तीसरी का़ो जोधपुर, बिकानेर और जैसलमेर के विलय से बनाई जाए

भरतपुर ,धौलपुर जाट रियासतों को उत्तर प्रदेश में मिला दिया जाए
बीकानेर के दीवान श्री सी०एस० वैंकटाचारी ने वृहद राजस्थान का समर्थन किया और मेनन के साथ मिलकर कृष्णामाचारी को योजना से असहमति प्रकट करते हुए कहा कि
प्रदेश में फैली हुई जन भावनाओं और समाजवादियों द्वारा आरंभ किए गए आंदोलन को ध्यान में रखते हुए राजपूताना की रियासतों को एक ही इकाई के रुप में एकीकरणकरने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं है
सरदार वल्लभ भाई पटेल ने श्री वी पी मेनन व वेंकटाचारी की राय से सहमति प्रकट की
अत: सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रयासों से दिसंबर 1948 में जयपुर जोधपुर बीकानेर राजस्थान में मिलना स्वीकार कर लिया
जनवरी 1948 को सरदार पटेल ने उदयपुर की एक विशाल सभा में  इस आशय की घोषणा भी कर दी
वृहद राजस्थान के निर्माण की घोषणा तो कर दी गई पर इसके साथ ही भारत सरकार के सामने अनेक कठिनाइया उत्पन्न हो गई
वृहद  राजस्थान का राजप्रमुख कौन बने , मुख्य-मंत्री का पद किसेदिया जाए और नवीन संघ की राजधानी कहांरखी जाए
इन समस्याओं के निवारण के लिए  दिल्ली में 3 फरवरी 1948 को राजस्थान के गणमान्य कांग्रेस नेताओं(श्री गोकुल भाई भट्ट श्री माणिक्य लाल वर्मा श्री जयनारायण व्यास व हीरालाल शास्त्री)की एक बैठक आमंत्रित की गई
उसमें तय किया गया कि राज प्रमुख का पद जयपुर नरेश सवाई मानसिंह को मुख्यमंत्री का पद श्री हीरालाल शास्त्रीको दिया जावे
मेवाड़ के महाराणा की मान मर्यादा को ध्यान में रखते हुए श्री भूपाल सिंह को महाराज प्रमुख के पद से सम्मानितकिया जाए

इन सब शर्तो के तय हो जाने पर जब मानसिह जी वायु यान से दिल्ली जाने वाले थे कि उनका वायु यान भस्म हो गया और वह आहतहो गए
इस कारण वृहद राजस्थान के निर्माण में कुछ विलंब होगया
उधर जब वृहद राजस्थान का उद्घाटन करने 29 मार्च को सरदार वल्लभ भाई पटेल जयपुर आ रहे थे तो शाहपुरा के पास वायुयान में खराबी होने के कारण हवाई जहाज को शुष्क नदी में उतारना पड़ा
इन देवीय मुसीबतों को पार करने के उपरांत नवीन संघ की राजधानी जयपुर में 30 मार्च 1949 को सरदार पटेल ने वृहतर राजस्थान का उद्घाटन किया और 7 अप्रैल को हीरालाल शास्त्री के मंत्रिमंडल ने शपथ ली
श्री हीरालाल शास्त्री को अपना मंत्रिमंडल बनाने में ना तो श्री जय नारायण व्यास और नहीं सी माणिक्य लाल वर्मा से सहयोग मिला

यद्यपि मंत्री मंडल के सभी सदस्य चरित्रवान और योग्यथे
तथापि इनकी जडे कांग्रेस संगठन में गहरीनहीं थी, इसका खामियाजा श्री हीरालाल शास्त्री को उठानापड़ा
रियासती विभाग के वरदहस्त के बावजूद उन्हें 21 माह में अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा यह
एक सर्वथा अलग कहानी है यही कहना पर्याप्त होगा कि अंततोगत्वा वृहद राजस्थान बन गया
इस वृहतर राजस्थान के निर्माण से राजस्थान में सदियों से चली आ रही राजशाही समाप्तहो गई
राजशाही के अंतिम चिह्न के रूप में अब केवल मात्र राज प्रमुख के नव सृजित पद रह गए थे
यह पद संयुक्त राजस्थान और मत्स्य संघ  प्रांतों के राज्यपालों के समकक्ष थे

यह एक ऐसी रक्त हीन क्रांति थी जिसका उदाहरण संसार के इतिहास में ढूंढनेपर भी नहीं मिलेगा
30 मार्च 1949 को वर्तमान राजस्थान का एक ढांचामिल गया था
वृहद राजस्थान के निर्माण के पूर्ण होने की तिथि को ही राजस्थान दिवस के रुप में मनाया जाता है
हीरालाल शास्त्री राजस्थान के प्रथम मनोनीत मुख्यमंत्री थे
वह इस पद पर 7 अप्रैल 1949 से 5 जनवरी 1951 तक रहे ,जिनमें 24 जनवरी 1950 तक उन्हें प्रधानमंत्री पद नाम से और उसके बाद मुख्यमंत्री पद नाम से जानागया

शास्त्री के बाद 5 जनवरी 1951 से 26 अप्रैल 1951 तक सी एस वेंकटाचारी को उसके बाद 24 अप्रैल 1951 से 3 मार्च 1952 तक जय नारायण व्यास राजस्थान के मनोनीत मुख्यमंत्री रहे
3 मार्च 1952 को राजस्थान की पहली निर्वाचित सरकार गठित की गई
जिसमें टीकाराम पालीवाल को राजस्थान का प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्रीबनाया गया
यह 31 अक्टूबर 1952 तक मुख्यमंत्री पदपर रहे
1 नवंबर 1952 से 12 नवंबर 1954 तक जय नारायण व्यास राजस्थान के मुख्यमंत्रीबने
जय नारायण व्यास के बाद मोहनलाल सुखाडया को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया गया

यह 17 वर्ष तक मुख्यमंत्री राजस्थान में सर्वाधिक समय तक में थे

जयपुर को वृहद राजस्थान की राजधानी श्री पी सत्यनारायण राव की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिश पर बनाया गया
राजस्थान में निम्न विभाग स्थापितकरने के निर्णय लिए गए
जोधपुर में हाईकोर्ट ,बीकानेर में शिक्षा विभाग ,उदयपुर में खनिज और कस्टम तथा एक्सरसाइज विभाग ,कोटा मे वन और सरकारी विभाग ,भरतपुर में कृषि विभाग स्थापित करने का प्रस्तावकिया गया था

 पंचम चरण अथवा संयुक्त वृहद राजस्थान 

राज्य का नाम-संयुक्त वृहत राजस्थान
तिथि-15 मई 1949
सम्मिलित रियासत-वृहतर राजस्थान+मत्स्य संघ
इस चरण में मत्स्य संघ की धौलपुर व भरतपुर रियासत शंकरराव कमेटी की सिफारिश के आधार पर सयुक्त वृहत राजस्थान में शामिल की गई

जब संयुक्त राजस्थान की 10 रियासते जयपुर ,जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर के साथ मिलकर वृहद राजस्थान में रूपांतरित हो गई
तब मत्स्य राज्य का स्वतंत्र अस्तित्व भारत सरकार को निरर्थकलगा
इस संदर्भ में 13 फरवरी 1949 को दिल्ली में एक बैठक आयोजित की गई चारों रियासतों के नरेशों को बुलाया गया और उनके साथ एक लंबी वार्ताहुई
उनसे पूछा गया कि तुम्हारे राज्य राजस्थान में मिलाया जाए या उत्तर प्रदेश में
मत्स्य संघ के निर्माण के समय उसमें शामिल होने वाले चारों राज्यों के शासकों को स्पष्ट कर दिया गया था कि आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी न होने के कारण यह संघ भविष्य में उत्तर प्रदेश अथवा राजस्थान में विलीन किया जा सकता है
अलवर और करौली राजस्थान में मिलने के पक्षमें था
लेकिन धौलपुर, भरतपुर की स्थिति स्पष्ट नहीं थी
इन दोनों राज्यों की जनता की राय जानने की दृष्टि से सरदार पटेल ने शंकर राव देव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया
समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इन राज्यों की अधिकतर जनता राजस्थान में शामिलहोने के पक्ष में है
समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए 15 मई 1949 को मत्स्य संघ की चारो रियासत को वृहद राजस्थान में मिला  दिया गया और संयुक्त वृहद राजस्थान के नाम से संबोधित किया जाने लगा
मत्स्य संघ के प्रधानमंत्री श्री शोभा लाल कुमावत को श्री हीरालाल शास्त्री ने अपने मंत्रिमंडल में सम्मिलित कर लिया

भारत सरकार ने कमेटी की अनुशंसा को स्वीकारते हुए 1 मई 1949 को राजस्थान में मत्स्य संघ के विलय की प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी थी
10 मई 1949 को मत्स्य संघ के चारों राजाओं और संयुक्त राजस्थान के राजप्रमुख व मुख्यमंत्रियों को आगे की बातचीत के लिए दिल्लीबुलाया था और मत्स्य संघ को राजस्थान में मिलाने का अंतिम निर्णय लिया गया

 राजस्थान के निर्माण व एकीकरण से संबंधित तथ्य 

वर्तमान राजस्थान के निर्माण के बाद राज प्रमुख का पद समाप्तकर दिया गया
इसके स्थान पर राज्यपाल का पद बनायागया
राजस्थान का प्रथम राज्यपाल गुरुमुख निहाल सिंह को बनाया गया
राजस्थान की रियासतों में सबसे प्राचीन रियासत मेवाड़ रियासत थी
सबसे नई रियासत झालावाड रियासत थी
क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ी रियासत जोधपुरथी
क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटी रियासत शाहपुराथी
15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ उस समय डूंगरपुर अलवर भरतपुर व जोधपुर इन 4 रियासतों के नरेशो ने स्वतंत्र रहने की घोषणा की थी
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में 3 श्रेणी के राज्य थे इसमें 10 ‘राज्य ‘अ”श्रेणी के 8 राज्य “ब” श्रेणी के 10 राज्य “स”श्रेणीका था
भारतीय संविधान परिषद में मेवाड़ से भेजे जाने वाले 2 प्रतिनिधियों में सर TV राघवाचार्य और माणिक्य लाल वर्मा थे,जोधपुर से सी एस वेंकटाचारी और श्री जयनारायण व्यासको भेजा गया था
वर्तमान राजस्थान के निर्माण की प्रक्रिया 1 नवंबर 1956 को प्रातः 9:40 पर जनता लोकतंत्र की मुख्यधारा में शामिल होने के साथ संपूर्ण हुई थी
संविधान के 7 वें संशोधन द्वारा ए बी व सी श्रेणियों का भेदभाव समाप्त कर राज्य व केंद्र शासित प्रदेश कर दिया गया और राज्य प्रमुख के स्थान पर राज्यपाल का पद सृजित किया गया

19 जुलाई 1948 को Lava ठिकाने को केंद्रीय सरकार के आदेश से जयपुर रियासत में शामिल कर दिया गया था

राजपूताने की रियासतों को सैल्यूट स्टेटस कहा जाता था
इन्हें अंग्रेजों से तोपों की सलामी प्राप्त करने का अधिकार था
खुदमुख्तयार ठिकाने इन्हें नॉन सैलूट स्टेट्स कहा जाता था
जिन्हें अंग्रेजो से तोपों की सलामी प्राप्त करने का अधिकार नहीं था
इन ठिकानों में कुशलगढ़-बांसवाड़ा, लावा-जयपुर और नीमराणा-अलवर आते हैं
शाहपुरा-भीलवाड़ा राजस्थान की एकमात्र ऐसी रियासत थी जहां के शासक सुदर्शन देव में 14 अगस्त 1947 को पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना की थी
1947 से पूर्व राजस्थान की एकमात्र रियासत जैसलमेर ऐसी थी जिसमें संवैधानिक सुधार को उत्तरदायी सरकार स्थापित करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया था
राजस्थान के स्वतंत्र होने के समय टोक एकमात्र ऐसी रियासत थी जिसका शासक मुस्लिम था
टोंक मुस्लिम रियासत का संस्थापक अमिर खां पिंडारीथा
ब्रिटिश सर्वोच्च सत्ता के अधीन आने वाली रियासतों के मुख्य को एजेंट टू गवर्नर जनरल कहा जाता था
भारत के गवर्नर जनरल विलियम बैंटिंक ने 1832 में अजमेर में ए जीजी का कार्यालय स्थापित किया था
मिस्टर लॉकेट प्रथम एजीजी थे
राजस्थान में अजमेर में स्थित एजीजी का प्रधान कार्यालय था ,इसके नियंत्रण में राजपूताने की सभी रियासतेथी
देलवाड़ा माउंट आबू और अजमेर मेरवाड़ा को फजल अली की अध्यक्षता में गठित राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर राजस्थान में सम्मिलितकर लिया गया था
राजपूताने की सबसे बड़ी सैल्यूट स्टेट जयपुर और उदयपुर थी
यहां के शासकों को अपनी रियासत में 21 तोपों की और रियासत के बाहर 13 तोपों की सलामी लेने का अधिकार था
भारतीय संघ के विलय पत्र पर सर्वप्रथम हस्ताक्षर बीकानेर महाराजा सादुल सिंह ने 7 अगस्त 1947 को किए थे
शाहपुरा रियासत के अंतिम शासक सुदर्शन देव थे
सुदर्शन देव के शासनकाल में गोकुल लाल असावा के नेतृत्व में 14 अगस्त 1947 को शाहपुरा में पहली लोकतांत्रिक और उत्तरदायी सरकार का गठन किया गया था
अजमेर मेरवाड़ा की विधान सभा को धार सभा कहा जाता था
अजमेर मेरवाड़ा के एकमात्र मुख्यमंत्री हरिभाऊ उपाध्याय बनाए गए थे

जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ी रियासत जयपुर व जनसंख्या की दृष्टि से सबसे छोटी रियासत शाहपुरा थी
राजस्थान के एकीकरण में 7 वर्ष 8 माह 14 दिन कासमय लगा था
चेंबर ऑफ प्रिंसेज का उद्घाटन 8 फरवरी 1931 को ब्रिटेन के तत्कालीन सम्राट जार्ज प्रथम के भाई ड्यूक ऑफ कनोट ने दिल्ली में किया था

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