विकास की अवस्थाये

विकास की अवस्थाये

 शेशवाअवस्था (जन्म से 5/6 वर्ष)
 बाल्याअवस्था ( 5/6 से 11/12 वर्ष)
 किशोराअवस्था (12 से 18 वर्ष)
 प्रौढ़ाअवस्था या वयस्क (18 से उपरान्त आयु)

 शेशवावस्था 
 उपनाम-
 जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काल
 सीखने का आदर्श काल
 खिलौनों की आयु (पुर्व बाल्यावस्था)
 भावी जीवन की आधार शीला
 अतार्किक चिन्तन की आयु
 तीव्र विकास की आयु का सर्वाधिक महत्वपूर्ण काल
 सवेगो की दृष्टि से स्वर्णिम काल

 विशेषताए –
(1) शारीरिक व मानसिक विकास ( Physical and mental development) में तीव्रता
(2) सीखने की प्रक्रिया ( Learning process) में तीव्रता
(3) कल्पना जगत ( Fantasy) में विचरण
(4) मूल प्रव्रत्यात्मक व्यवहार
(5) दोहराने की प्रवर्ति
(6) अनुकरण द्वारा सीखने की प्रवति(The nature of learning)
(7) सवेगो का प्रदर्शन
(8) नैतिक भावना (Moral sense) का आभाव
(9) स्वंय-केन्दित बालक
(10) काम-प्रवति (फ़्रायड के अनुसार)
(11) दुसरो पर निर्भरता
(12) आत्म-प्रेम की भावना (आत्म केन्दित)
(13) दूसरे शिशुओ के प्रति रूचि
(14) जिज्ञासा की प्रवति
(15) अपनी सवेदनाओ व शारीरिक क्रियाओ के माध्यम से सीखना
(16) सामाजिक भावना (Social sentiment) का आभाव

 प्रमुख परिभाषाए 
 स्टैग- “जीवन के प्रथम 2 वर्षों में बालक अपने भावी का शिलान्यास करता है”
 ब्रीजेस “2 वर्ष की उम्र तक बालको में लगभग सभी संवेगो का विकास हो जाता है”
 जे. न्यूमेन- “5 वर्ष तक की अवस्था शरीर और मस्तिष्क के लिए बड़ी ग्रहणशील रहती है”
 वेलेटाईन- “शेशवावस्था सीखने का आदर्श काल है”
 वाटसन- “2 वर्ष में बालक में क्रोध, प्रेम, भय नामक सवेगो का विकास हो जाता है”
 गैसल- “बालक प्रथम छः वर्ष में बाद के 12 वर्ष से भी दुगुना सीख जाता है”
 एडलर- “शिशु के जन्म के कुछ समय बाद ही यह निशिचत किया जा सकता है की भविष्य में उस का क्या स्थान है”

 शैशवावस्था की एक जलक  
इस अवस्था में जीवन के अन्य वर्षो की तरहा सबसे ज्यादा विकास व व्रद्धि (Development and growth) होती है इस अवस्था के अन्त तक वह चलने,दौड़ने, और शब्दों द्वारा अपनी आवश्यकताओ को व्यक्त करने योग्य हो जाता है, स्वय खा सकता है, परिवार के सदस्यों व स्वय को पहचाने लगता है और जाने-पहचाने माहौल में आत्मविश्वास से घूमने लग जाता है, 5 वर्ष को आयु में सवेगो पर “वातावरण” का प्रभाव पड़ने लग जाता है I

 शारीरिक, मानसिक, सामजिक, संवेगात्मक, चारित्रिक विकास

 शारीरिक विकास ( Physical development)
 शारीरिक विकास के क्षेत्र 
 1- स्नायुमण्डल/ स्नायुसंस्थान
 2- मांसपेशी संस्थान
 3- पाचन संस्थान
 4- लिम्फटिक संस्थान
 5- प्रजनन संस्थान
( ये प्रश्न REET-2015 लेवल 1 में पूछा गया था )

 भार (Weight)-
जन्म के समय तथा सम्पूर्ण शैशवावस्था में बालक का भार बालिका के भार की अपेक्षा अधिक होता है I जन्म के समय बालक का भार 7.15 या 6-8 पौंण्ड और बालिका का भार लगभग 7.13 पौण्ड होता है I और उत्तर शैशवावस्था में यानि 6 वर्ष तक लगभग 40 पौंण्ड हो जाता है I

 लम्बाई (Height)-
जन्म के समय बालक की लम्बाई लगभग 51.25 सेमी और बालिका की लम्बाई लगभग 50.75 सेमी होती है I
इस प्रकार जन्म के समय बालिका की अपेक्षा बालक कुछ लम्बा होता है I 6 वर्ष तक लम्बाई लगभग 100 या 110 सेमी हो जाती है I

 सिर तथा मस्तिष्क-
जन्म के समय शिशू के मस्तिष्क ( Infant brain) का भार 350 ग्राम होता है I जो शरीर के अनुपात में अधिक होता है I दो वर्ष की आयु में इसका भार दो गुना हो जाता है I 6 वर्ष की आयु तक सर का लगभग पूर्ण विकास हो जाता है I मस्तिष्क का भार 1200-1400 ग्राम के बीच में होता है I

 हडिडयाँ(Bones)-
नवजात शिशु (Newborn Baby) की हडिडयाँ की संख्या 270 होती है I शैशवावस्था में ये छोटी, कोमल,  तथा भली प्रकार जुड़ी हुई नही होती है I ये क्लिसियम, फॉस्फोरस, तथा अन्य खनिज पदाथो की सहायता से धीरे-धीरे सूद्र्ढ़ होती है I हडिडयाँ की द्रढ़ीकरण की इस प्रक्रिया को अस्थिकरण कहते है I

 दाँत-

जन्म के समय शिशु के दाँत नही होते है I छठे माह में शिशु के दूध के दाँत निकलने लगते है I सबसे पहले निचे के अगले दाँत निकलते है और एक वर्ष की आयु तक उनकी संख्या 8 तक पहुँच जाती है I चार वर्ष की आयु तक शिशु के दुध के सभी दाँत निकल आते है I जिन की संख्या 20 होती है I दुध के दाँत अस्थायी होते है I इसके बाद धीरे-धीरे ये दाँत गिरने लगते है तथा पाँचवे या छठे वर्ष में स्थायी दाँत निकलने आरम्भ हो जाते है I

 धड़कन( Heart Beat)-
प्रथम माह में शिशु के ह्रदय की धड़कन लगभग 140 बार प्रति मिनट होती है जो लगभग छः वर्ष की आयु में घटकर 100 बार प्रति मिनट रह जाती है I

 मानसिक विकास 
 1 वर्ष- हाथ-पैर हिलाने लगता है, ध्वनि करने लगता है, छोटे- छोटे शब्दों को बोलने लगता है I
 2 वर्ष- ठीक से समझने लगता है, शब्दों का विकास भी होता है I
 3 वर्ष-  पूछने पर शिशु अपना नाम बता देता है,  अपने नाक, कान, मुँह, दाँत को हाथ से छुकर बताने लगता है
 4 वर्ष- गिनती गिनने लगता है, छोटी-बड़ी रेखाओं में अन्तर करने लगता है, अक्षर लिखने लगता है, वस्तुओं को क्रम से रखना जान जाता है I
 5 वर्ष- रंगो को पहचानने लगता है, हल्के व भारी का ज्ञान होने लगता है, 10-11 शब्दों के वाक्य दोहराने लगता है, माता-पिता की आज्ञाये मानने लगता है और उनके कामों में सहायता भी करने लगता है I

 सामाजिक विकास (Social development)
 शिशु जन्म से सामाजिक नही होता है I
 एक वर्ष के भीतर शिशु माता-पिता को पहचाने लगता है, प्रेम व क्रोध के व्यवहारो का अनुकरण करने लगता है I
 दो वर्ष की आयु मेँ बड़ो के साथ घर का कार्य करने का प्रयत्न करता है I
 दो और तीन वर्ष की आयु के बिच बालक खेलने के लिए साथी बनाकर उनसे सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने लगता है I
 चौथे-पाँचवे वर्ष में वह बाहरी दुनिया से सम्पर्क स्थापित करता है और मित्र बनाता है I
 सामूहिक जीवन से अनुकूलन स्थापित कर लेता है I
 पाँच या छः की आयु से बालक में नैतिक भावना का विकास होता है I

 संवेगात्मक विकास ( Emotional development)
 जॉन. बी. वाटसन- “नवजात शिशु में मुख्य रूप से तीन संवेग विधमान रहते है – भय(Fear) क्रोध(Anger) एंव स्नहे (Love)”
 शिशु जन्म के समय रोता, चिल्लाता तथा पैर पटकता है I इस प्रकार वह जन्म के समय से ही संवेगात्मक व्यवहार की अभिव्यक्ति करता है I
 “बिर्जिस”- के अनुसार जन्म के 2 वर्ष तक उसमे लगभग सभी सवेगो का विकास हो जाता है”

 02. बाल्यावस्था (06 से 12 वर्ष तक)

  1. स्थूल संक्रियात्मक अवस्था l
  2. अनोखा काल l
  3. निर्माण काल (भावी जीवन की सफलता एवं  असफलता की नींव का काल) l
  4. प्रारंभिक विधालय की आयु l
  5. वैचारिक क्रिया अवस्था l
  6. टोली, दल, समूह की आयु l
  7. खेल की आयु l
  8. प्रतिद्वंद्वात्मक सामाजीकरण का काल l
  9. मूर्त चिंतन की अवस्था l
  10. कल्पना शक्ति एवं अमूर्त चिंतन के प्रारम्भ का काल l
  11. बाल्यावस्था तीव्र शारीरिक क्रियाशीलता अभिवृद्धि का काल l
  12. सामाजिकता विकसित होने का काल l
  13. नये कौशलों एवं क्षमताओं के विकास की  वृद्धि का स्वर्णिम काल 

 03. किशोरावस्था (13 से 18 वर्ष तक)

  1. अमूर्त चिंतन की अवस्था l
  2. दल भक्ति की अवस्था l
  3. जीवन का सबसे कठिन काल l
  4. अटपटी व उलझन की अवस्था l
  5. समस्याओं की अवस्था l
  6. द्रुत एवं तीव्र विकास की अवस्था l
  7. स्वर्ण काल l
  8. बसन्त ऋतु l
  9. सामाजिक स्वीकृति की अवस्था l
  10. व्यक्तिगत एवं घनिष्ठ मित्रता की अवस्था l
  11. प्रबल दबाब एवं तनाव की अवस्था l
  12. संवेगात्मक परिवर्तन की अवस्था l
  13. आत्म-सम्मान व आत्म-स्वीकृति की अवस्था
  14. तार्किक चिन्तन की अवस्था l
  15. संघर्ष और तूफान की अवस्था l
  16. उथल-पुथल की अवस्था l
  17. संक्रमण काल की अवस्था/संक्रान्ति काल l
  18. टीन एज l
  19. सुनहरी अवस्था l
  20. ऐज ऑफ ब्यूटी l

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