विश्व धरोहर में शामिल राजस्थान के पर्यटन स्थल | Famous Tourist Places

विश्व धरोहर में शामिल राजस्थान के पर्यटन स्थल | Famous Tourist Places

विश्व धरोहर अथवा विश्व विरासत स्थल ऐसे खास स्थानों, वन, क्षेत्र, पर्वत, झील, मरुस्थल, दुर्ग, स्मारक, भवन या शहर इत्यादि को कहा जाता है जो ‘विश्व विरासत स्थल समिति’ द्वारा चयनित होते हैं और यही समिति इन स्थलों की देखरेख यूनेस्को के तत्वावधान में करती हैं।

विश्व के सांस्कृतिक – ऐतिहासिक स्थलों को विरासत के रूप में संरक्षित रखने के लिए यूनेस्को द्वारा प्रतिवर्ष 18 अप्रैल को ‘विश्व विरासत दिवस’ भी मनाया जाता है। भारत के ऐतिहासिक महत्त्व के कुल 38 स्थल विश्व विरासत स्थल सूची में दर्ज हैं। इसमें 30 सांस्कृतिक, 7 प्राकृतिक और 1 मिश्रित श्रेणी की धरोहर है।

यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर सूची में अब तक (अक्टूबर 2019) राजस्थान के कुल चार स्थलों को शामिल किया गया जो इस प्रकार है–

  1. केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य, भरतपुर
  2. जंतर मंतर, जयपुर
  3. पर्वतीय दुर्ग
  4. जयपुर शहर

केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य, भरतपुर

यह भारत के प्रमुख पर्यटन परिपथ ‘सुनहरा त्रिकोण’ दिल्ली-आगरा-जयपुर पर अवस्थित है। इस पक्षी विहार का निर्माण 250 वर्ष पहले किया गया था। सन् 1956 में इसे अभयारण्य का दर्जा मिला एवं 1981 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। यूनेस्को से 1985 में विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त करने वाला यह राज्य का एकमात्र अभयारण्य है ।

इस अभयारण्य को ‘एशिया की पक्षियों की सबसे बड़ी प्रजनन स्थली’ एवं ‘पक्षियों का स्वर्ग’ माना जाता है। सर्दी की ऋतु में सैकड़ों वर्षों से करीब 365 प्रजातियों के प्रवासी पक्षी अफगानिस्तान, तुर्की, चीन, साइबेरिया तक से हजारों किलोमीटर का सफर तय करके यहां पहुंचते आए हैं। साइबेरियन सारस इस अभयारण्य मेंअक्टूबर-नवंबर माह में सर्दियां व्यतीत करने हेतु रूस से आते हैं और फरवरी के अंत अथवा मार्च के प्रारंभ में वापस प्रस्थान करते हैं।

जंतर मंतर

यूनेस्को ने 1 अगस्त 2010 को दुनिया भर के सात स्मारकों को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने की घोषणा की जिसमें जयपुर का जंतर मंतर भी एक हैं। जंतर मंतर का निर्माण सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा 1727 से 1734 के बीच करवाया गया। महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने हिंदू खगोल शास्त्र के आधार पर देशभर में पांच वैद्यशालाओं का निर्माण कराया था। ये वैद्यशालाएँ जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, बनारस और मथुरा में बनवाई गई।

देश के सभी पांच वेधशालाओं में जयपुर की वेधशाला सबसे बड़ी है।इतने वर्ष गुजर जाने के बावजूद इस वैद्यशाला के सभी प्राचीन लकड़ी, चूने, पत्थर और धातु से निर्मित यंत्र आज भी ठीक अवस्था में है, जिनके माध्यम से मौसम, स्थानीय समय, ग्रह नक्षत्रों और ग्रहण आदि खगोलीय परिघटनाओं की एकदम सटीक गणना आज भी की जा सकती हैं।

यहां के यंत्रों में ‘सम्राट यंत्र’ (जो एक विशाल सूर्य घड़ी हैं) ‘जयप्रकाश यंत्र’ और ‘राम यंत्र’ सर्वाधिक प्रसिद्ध है। जिनमें से सम्राट यंत्र सर्वाधिक ऊंचा धरती से करीब 90 फुट है जिसके माध्यम से पर्याप्त शुद्धता से समय बताया जा सकता है। सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित पांच वैद्यशालाओं में से आज केवल दिल्ली और जयपुर के जंतर मंतर ही शेष बचे हैं बाकी काल के गाल में समा गए हैं।

विश्व धरोहर में पर्वतीय दुर्ग

यूनेस्को द्वारा 2013 में राजस्थान के ऐतिहासिक महत्व के 6 पहाड़ी किलो को विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया जो इस प्रकार हैं–

चित्तौड़गढ़ दुर्ग 

इस दुर्ग को ‘राजस्थान का गौरव’ और ‘गढ़ों का सिरमौर’ कहा जाता हैं। इस दुर्ग का निर्माण चित्रांगद मौर्य के द्वारा चित्रकूट पहाड़ी पर करवाया गया। यह दुर्ग गंभीरी और बेड़च नदियों के तट पर स्थित राजस्थान का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट (आवासीय दुर्ग) हैं, क्षेत्रफल की दृष्टि से चित्तौड़गढ़ का दुर्ग राज्य का सबसे विशाल दुर्ग हैं। इसकी लंबाई लगभग 8 किलोमीटर एवं चौड़ाई 2 किलोमीटर है और इसकी आकृति व्हेल मछली के समान है। यह राजस्थान का एकमात्र ऐसा दुर्ग है जिसमें खेती की जाती है। दुर्ग के अधिकांश भाग का निर्माण महाराणा कुंभा द्वारा करवाया गया।इस दुर्ग में 7 प्रमुख प्रवेश द्वार हैं।

इस दुर्ग में विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ, मीरा मंदिर, पद्मिनी महल और शस्त्रागार प्रमुख हैं। यहां तीन इतिहास प्रसिद्ध साके क्रमशः 1303 ई. 1534 ई.एवं 1567 ई. में हुए।

1303 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने इसे जीतकर अपने पुत्र खिज्र खां को सौंपा एवं इसका नाम खिज्राबाद रखा।अकबर ने 1567 ईस्वी में चित्तौड़गढ़ के दुर्ग पर आक्रमण कर विश्व का सबसे बड़ा कत्लेआम किया। गोरा-बादल, नौलखा महल (बनवीर द्वारा निर्मित) और भीमलत कुंड दुर्ग में स्थित है। आठवीं शताब्दी के इस दुर्ग के बारे में कहा जाता है कि “गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया।”

रणथंभोर दुर्ग

इस दुर्ग का वास्तविक नाम ‘रंतःपुर’ है अर्थात ‘रण की घाटी में स्थित नगर ।’ अरावली पर्वत श्रंखला से घिरा यह एक विकट गिरी दुर्ग है जो 994 में ‘रणथम्मन देव’ द्वारा बनाया गया। रणथंभोर दुर्ग की सुदृढ़ नैसर्गिक सुरक्षा व्यवस्था से प्रभावित होकर अबुल फजल ने लिखा है कि – “अन्य सब दुर्ग नंगे हैं जबकि यह दुर्ग बख्तरबंद है।” इस किले में एक ही स्थान पर मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर स्थित है। इसे चित्तौड़गढ़ किले का छोटा भाई कहते हैं। इस किले में गणेश जी का त्रिनेत्र मंदिर, हम्मीर महल, रानीमहल, बादल महल, सुपारी महल, 32 खंभों की छतरी, रनिहाड़ तालाब, पीर सदरूद्दीन की दरगाह, जंवरा-भंवरा (जौरा-भौरा), जोगी महल, लक्ष्मीनारायण मंदिर, पद्मला तालाब स्थित है।

अधूरा स्वप्न – रानी कर्मावती द्वारा रणथंभोर के किले में निर्मित भवन। महाराणा सांगा को खानवा के युद्ध में घायल होने के पश्चात इस दुर्ग में लाया गया था। मुगल काल में इस दुर्ग का उपयोग शाही कारागार के रूप में किया गया। इसमें राजस्थान के प्रथम जल जौहर व साके का उल्लेख मिलता है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पश्चात यह सर्वाधिक ऐतिहासिक महत्व का दुर्ग है। अबुल फजल ने इस किले के बारे में कहा है कि – “यह ना तो हाथों से बना था ना पानी और मिट्टी से, कल्पना की चिड़िया इसके ऊपर होकर नहीं निकली संसार में ऐसा दुर्ग दूसरा नहीं।”

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कुंभलगढ़ दुर्ग

 इस दुर्ग का निर्माण महाराणा कुंभा ने अपनी पत्नी की स्मृति में सूत्रधार मंडन की देखरेख में सन 1448 ई. से 1458 ई. के मध्य करवाया। कुंभलगढ़ दुर्ग के उपनाम – ‘मेवाड़-मारवाड़ सीमा का प्रहरी’ एवं ‘मारवाड़ की छाती पर उठी हुई तलवार’ है। इस किले की ऊंचाई के बारे में अबुल फजल ने लिखा है कि “यह इतनी बुलंदी पर बना है कि नीचे से ऊपर की ओर देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती हैं।”

यह दुर्ग संकटकाल में मेवाड़ के राजाओं की शरण स्थली था। यह दुर्ग अरावली की 13 पर्वत चोटियों से सुरक्षित हैं। यह 36 किलोमीटर लंबे तिहरे सुरक्षा परकोटे से सुरक्षित गिरा हुआ है, जो अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड में दर्ज हैं। इसकी सुरक्षा दीवार 7 मीटर चौड़ी है जिस पर एक साथ चार घुड़सवार चल सकते हैं। यह चीन की महान दीवार के बाद दुनिया की सबसे बड़ी महान दीवार है इसलिए इसे ‘भारत की महान दीवार‘ कहते हैं।

कर्नल जेम्स टॉड ने कुंभलगढ़ की सुदृढ़ प्राचीरों, बुर्जों, कंगूरो की दृष्टि से इसकी तुलना एटरुक्सन से की हैं। दुर्ग के ऊपरी छोर पर राणा कुंभा का निवास स्थान व महाराणा प्रताप का जन्म स्थल है जो कटारगढ़ (मेवाड़ की तीसरी आंख) कहलाता है, यह बादल महल के नाम से भी प्रसिद्ध है। कुंभा स्वामी विष्णु मंदिर, मामादेव का कुंड, 12 स्तंभों की छतरी, हाथियागुढा की नाल यहां के दर्शनीय हैं। 12 स्तंभों की छतरी – महाराणा रायमल के कुंवर पृथ्वीराज की छतरी है। अपनी तेज धावक शक्ति के कारण ‘उड़ना राजकुमार’ के नाम से विख्यात हुए।

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सोनारगढ़ दुर्ग, जैसलमेर

राव जैसल द्वारा सन् 1155 में निर्मित यह गहरे पीले रंग के पत्थरों से निर्मित त्रिकुटाकृति का किला हैं। त्रिकूट पहाड़ी पर बना यह दुर्ग भाटी वंश के शासकों के गौरवमयी इतिहास का प्रतीक रहा है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पश्चात सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट यही है।इस दुर्ग के चारों ओर स्थित घाघरानुमा दोहरा परकोटा ‘कमरकोट’ कहलाता है।

यह किला दूर से ऐसा लगता है मानो समुद्र में कोई विशाल जहाज लंगर डाले खड़ा हो। प्रातः काल और सूर्यास्त के समय सूर्य की लालिमा से यह दुर्ग सोने के समान चमकता हुआ प्रतीत होता है। यह दुर्ग बिना चूने के सिर्फ पत्थर पर पत्थर रखकर बनाया गया है। यहां महारावल अखेसिंह द्वारा निर्मित सर्वोत्तम शीश महल, गज विलास, जवाहर विलास, रंग महल, मोती महल स्थित है। बादल विलास या बादल महल का निर्माण सन 1884 ईस्वी में ‘सिलावटों’ ने करवाया। यह पांच मंजिला महल है।

आमेर का किला, जयपुर

 राजा मान सिंह प्रथम द्वारा सन 1952 ईस्वी में निर्मित यह दुर्ग हिंदू-मुस्लिम शैली का समन्वित रूप है। अरावली पर्वतमाला की काली खोह पहाड़ी पर स्थित यह गिरी दुर्ग हैं। इस दुर्ग के नीचे मावठा तालाब और दिलाराम का बाग स्थित हैं और रंग-बिरंगे कांच की भव्य कलाकृति शीश महल, सुख मंदिर, जगत शिरोमणि मंदिर, केसर क्यारी दर्शनीय हैं।

इस किले में सबसे पुराना महल ‘कदमी महल’ है। दुर्ग में शिला माता का मंदिर है। इस मंदिर में स्थित शीला माता की मूर्ति को राजा मानसिंह बंगाल के शासक केदार से जीत कर लाए थे। बिशप हेबर ने आमेर के महलों की तुलना क्रेमलिन तथा अलब्रह्मा के महलों से की है। वर्तमान में यह दुर्ग पर्यटन विभाग के पास हैं और सांयकाल यहां ‘लाइट एंड साउंड शो’ चलता है। इस दुर्ग में दिलखुश महल, 24 रानियों का महल, बुखारा गार्डन, सुहाग मंदिर, मीना बाजार आदि हैं।

गागरोन दुर्ग झालावाड़

इस दुर्ग का निर्माण परमार नरेश बीजलदेव होड़ ने सन 1195 ईस्वी में करवाया। यह दुर्ग आहू और काली सिंध नदियों के संगम स्थल ‘सामेलजी’ के निकट मुकुंदरा की पहाड़ी पर स्थित है। खींची नामक राजवंश के संस्थापक देवनसिंह ने इसे जीतकर इसका नाम गागरोण रखा। गागरोण नाम श्री कृष्ण के राजपुरोहित गर्गाचार्य के नाम पर पड़ा।गागरोण के विशाल परकोटे को ‘जालिमकोट’ नाम से जाना जाता है। इस दुर्ग में स्थित मुदफ्फर (ढेंकुली) पत्थरों की वर्षा करने वाला यंत्र है। दुर्ग के दर्शनीय स्थल ‘पीपाली की छतरी’ , ‘मीठेशाह की दरगाह (सूफी संत हमीदुद्दीन चिश्ती), बुलंद दरवाजा आदि है। इस दुर्ग में कोटा राज्य के सिक्के ढ़ालने की टकसाल स्थापित की गई थी। यह दुर्ग को डोडगढ़ (डोड परमाओं द्वारा निर्माण), धूसरगढ़, गर्गराटपुर, मुस्तफाबाद के नाम से भी जाना जाता है। यह एक ‘जलदुर्ग’ हैं।

जयपुर शहर

भारत के पेरिस, दूसरा वृंदावन व गुलाबी नगर के नाम से प्रसिद्ध जयपुर नगर का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा 18 नवंबर सन् 1727 में प्रख्यात बंगाली वास्तुशिल्पी विद्याधर भट्टाचार्य के निर्देशन में करवाया गया। जयपुर की नींव जगन्नाथ पुंडरीक रत्नाकर ने रखी थी । जयपुर का आधुनिक निर्माता  ‘मिर्जा इस्माइल’ को कहते हैं । जयपुर नरेश सवाई रामसिंह द्वितीय (1835-80) ने जयपुर की सभी इमारतों पर 1863 में प्रिंस अल्बर्ट के जयपुर आगमन पर गुलाबी रंग करवाया। तभी से जयपुर ‘गुलाबी नगर’ कहलाने लगा। जयपुर का पूर्व नाम जयनगर था। वर्तमान में जयपुर राजस्थान की राजधानी हैं। बिशप हेबेर ने इस नगर के बारे में कहा था कि नगर का परकोटा मास्को के क्रेमलिन नगर के समान है।

इसे पूर्व का पेरिस, रत्न नगरी, पन्ना नगरी, आइसलैंड ऑफ ग्लोरी (सी वी रमन के द्वारा), राजस्थान की हेरिटेज सिटी भी कहा जाता है। जयपुर कई शानदार किलों, महलों, मंदिरों और संग्रहालयों का घर हैं और स्थानीय हस्तशिल्प से भी भरा हुआ है। जयपुर में कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक पर्यटन स्थल है जो अपनी नैसर्गिक छटा के कारण देश विदेश के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं जो इस प्रकार हैं – सिटी पैलेस, हवामहल, जल महल, गलताजी, अल्बर्ट हॉल (म्यूजियम), जंतर-मंतर, जगत शिरोमणि मंदिर आमेर, आमेर की शिला माता का मंदिर, श्री गोविंद देव मंदिर, शाकंभरी माता का मंदिर, शील माता की डूंगरी चाकसू, जय निवास उद्यान, सवाई मानसिंह संग्रहालय, रामबाग, नाटाणी का बाग, गैटोर की छतरियां, ईसरलाट (सरगासूली), मुबारक महल, आमेर दुर्ग, जयगढ़ दुर्ग, नाहरगढ़ (सुदर्शनगढ़), चौमुंहागढ़ (चौमूं), माधोराजपुरा का किला।

निष्कर्ष

प्रत्येक विरासत स्थल उस देश-विदेश की संपत्ति होती है, जिस देश में वह स्थित हो। आने वाली पीढ़ियों और मानवता के हित के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का हित भी इसी में होता है कि वे इनका संरक्षण करें। इनके संरक्षण की जिम्मेदारी पूरे विश्व समुदाय की होती है।

Especially thanks to – मीना सोनी, चित्तौड़गढ़

हमारे द्वारा विश्व धरोहर में राजस्थान के पर्यटन स्थल के अलावा अन्य महत्वपूर्ण Notes & Test – 

आपको हमारे द्वारा विश्व धरोहर में शामिल राजस्थान के पर्यटन स्थल पर लिखा गया निबंध कैसा लगा आप comments करके जरूर बताये  – धन्यवाद

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