वैदिक संस्कृति | Vedic culture

वैदिक संस्कृति सिन्धु सभ्यता के बाद अस्तित्व में आई है। इसकी जानकारी वेदों से मिलने के कारण इसे वैदिक संस्कृति कहा जाता है ।वैदिक काल को दो भागों में बांटा जा सकता है –

  1. त्रग्वेदिक काल (1500 ई. पू. से 1000 ई. पू. )
  2. उत्तर वैदिक काल (1000 ई. पू. से 600 ई. पू.)

सिन्धु सभ्यता नगरीय थी जबकि वैदिक संस्कृति मूलतः ग्रामीण थी

त्रग्वेदिक काल

ऋग्वैदिक संस्कृति ग्रामीण, पशुपालन पर आधारित व राजतंत्रीय थी। पशुपालन उनका प्रमुख व्यवसाय था। ऋग्वैदिक आर्य घुमक्कड़ जीवन शैली के कारण कृषि का पूर्ण विकास नहीं हो पाया था। इस काल का प्रमुख ग्रन्थ ऋग्वेद ही है। ऋग्वेद की अनेक बातें ईरानी भाषा के प्राचीनतम ग्रन्थ अवेस्ता (जेंदावेस्ता) से मिलती है। ऋग्वेद सबसे प्राचीन वेद है।

आर्य भारत में 1500 ई. पू. के आस पास आये। ऋग्वैदिक काल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण नदी सिन्धु हैं। तथा दुसरी सर्वाधिक महत्वपूर्ण नदी सरस्वती थी। सरस्वती का ऋग्वेद में सर्वाधिक बार उल्लेख हुआ है। सरस्वती व दृशद्वती नदियों के मध्य का प्रदेश ब्रह्मवर्त कहा जाता है। यह प्रदेश अत्यन्त पवित्र माना जाता है। मुख्यतः ऋग्वैदिक आर्य सिन्ध व उसकी सहायक नदियों में रहते थे, जिसे सप्तसैन्धव प्रदेश कहा गया है।

ऋग्वेद काल की राजनैतिक व्यवस्था 

ग्राम सबसे छोटी राजनैतिक ईकाई थी, जो कई परिवारों का समूह थी। ऋग्वेद काल में ग्राम सामान्यतः स्वजनों के एक समूह को इंगित करता है, न कि एक गांव को। ग्राम का प्रधान ग्रामणी होता था। विश अनेक गांवों का समूह जिसका प्रधान विशपति होता था। अनेक विशों को मिलाकर जन बनता था, जिसका मुखिया जनपति या राजा कहलाता था।त्रग्वेदिक काल में राजा का पद आनुवांशिक हो चुका था, परन्तु राजा को असीमित अधिकार नहीं थे।

ऋग्वेद व ऐतरेय ब्राह्मण में राजा के निर्वाचन संबंधी सूक्त है। ऋग्वेद में सभा 8 बार, समिति 9 बार, विदथ 122 बार, तथा गण 46 बार उल्लेख हुआ है।

  • सभा – यह वृद्ध व अभिजात लोगों की संस्था थी।
  • समिति – यह सामान्य जनता की प्रतिनिधि सभा थी। यह राजा पर नियंत्रण करती थी।
  • विदथ – यह आर्यों की सबसे प्राचीन संस्था थी। इसमें कबीलाई तत्वों की प्रमुखता थी। इसकी बैठक में सैनिक लूट के विभाजन संबन्धी कार्य सम्पन्न होते थे।

ऋग्वेद में इंद्र को पुरन्दर कहा गया है। ऋग्वेद के आठवें मण्डल में परुषणी (रावी) नदी के तट पर लड़े गए दाशराज्ञ युद्ध का वर्णन हैं। यह युद्ध भरत वंश के राजा सुदास तथा अन्य दस राजाओं के समूह के बीच हुआ। भरत जन के राजा सुदास का पुरोहित वशिष्ठ था तथा पराजित राजा का पुरोहित विश्वामित्र था। इस युद्ध का कारण यह था कि सुदास ने विश्वामित्र को पुरोहित पद से हटाकर वशिष्ठ को पुरोहित बना दिया। विश्वामित्र ने दस राजाओं का संघ बनाकर सुदास से युद्ध किया।

राजा की सहायता के लिए सेनानी (सेनापति), पुरोहित तथा ग्रामणी नामक पदाधिकारी होते थे। इसमें पुरोहित सबसे प्रमुख पदाधिकारी होते हैं तथा पद प्रायः वंशानुगत होता था। राजा सहित कुल 12 रत्नीन होते थे। समिति के सभापति को ईशान कहा जाता था। ऋग्वेद में चरिष्णु शब्द का प्रयोग हुआ है संभवतः यह दुर्ग गिराने का इंजन था।

 सामाजिक जीवन 

आर्य समाज पितृसत्तात्मक था। पिता की सम्पति का पुत्र ही उत्तराधिकारी होता था। नारी को भी माता के रूप में पर्याप्त सम्मान था।धार्मिक अनुष्ठानों में पत्नी भी अनिवार्य रूप से भाग लेती थी। संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। ऋग्वेद के अन्तिम काल में वर्ण व्यवस्था के चिह्न दृष्टि गोचर होते हैं। ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में विराट पुरुष द्वारा चारों वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन मिलता हैं।

वैश्य तथा शुद्र का ऋग्वेद में केवल एक बार ही उल्लेख मिलता हैं।  ऋग्वेद में वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित न होकर कर्म आधारित थी। ऋग्वेद में एक ऋषि कहता हैं कि “मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं तथा मेरी माता अन्न पीसने वाली हैं। साधन भिन्न है परन्तु सभी धन की कामना करते है।

ऋग्वैदिक काल में दास प्रथा का प्रचलन था। दासों के बारे में कहा गया है कि वे न तो अग्नि में हविदान करते थे और न ही इंद्र व हवा के पक्षपाती थे। आर्य विशेष अवसरों पर माँस तथा मदिरा(सोमरस) का प्रयोग भी करते थे। आर्य तीन प्रकार के वस्त्र पहनते थे – अधोवस्त्र, उत्तरीय, अधिवास। सिर पर ऊष्णीय (पगड़ी) धारण करते थे। विवाह – ऋग्वेद काल में बालविवाह, व सती प्रथा प्रचलित नहीं थे। पुनर्विवाह व नियोग प्रथा प्रचलित थी। पर्दा प्रथा का उल्लेख नहीं है।

आजीवन अविवाहित रहने वाली कन्याओं को अमाजू कहा जाता था। कन्या की विदाई के समय जो उपहार दिये जाते थे, उसे वहतु कहते थे। ऋग्वैदिक काल में पुत्री का उपनयन संस्कार होता था । शिक्षा – स्त्रियाँ भी वैदिक शिक्षा प्राप्त करती थी व उन्हें यज्ञ करने का अधिकार भी था। लोपामुद्रा विदर्भ राजा की पुत्री व अगस्तय ऋषि की पत्नी थी। शिक्षा गुरुकुल में दी जाती थी, व मौखिक होती थी।

आर्थिक जीवन 

ऋग्वैदिक का मूल आधार पशुपालन एवं कृषि था। ऋग्वेद में फाल का उल्लेख मिलता हैं । कृषि योग्य भूमि को उर्वरा या क्षेत्र कहा जाता था। ऋग्वेद के चौथे मण्डल में कृषि सम्बन्धी प्रक्रिया का उल्लेख है। भूमि राजा की निजी सम्पत्ति न हो कर, सम्पूर्ण कबीलें का सामूहिक स्वामित्व  होता था। गविष्ठी -युद्ध का पर्याय माना जाता था।

गाय आर्यों का मुख्य आर्थिक आधार था। अधिकांश लड़ाईया गायों और पशुओं के लिए लड़ी जाती थी। निष्क एक गले का स्वर्ण आभूषण था, जिसे विनिमय के माध्यम के रूप में काम में लिया जाता था। पशु ही इस काल की प्रमुख सम्पति थी। घोड़ा आर्यों का बहुूपयोगी पशु था। ऋग्वेद के अनुसार खेती के लिए हल द्वारा भूमि जोतने की शिक्षा सर्वप्रथम अश्वविनों द्वारा दी गई। ऋग्वैदिक काल में दासों को खेती में लगाया जाता था। नमक व कपास का उल्लेख नहीं हुआ है जबकि अनाज के रूप में यव का उल्लेख है। व्यापार वस्तु विनिमय द्वारा होता था। ऋग्वेद में प्रजा राजा को स्वेच्छा से जो अंश देती थी, उसको बली कहा जाता था। ऋग्वैदिक आर्य लोहे परिचित नहीं थे।

ऋग्वैदिक धर्म 

ऋग्वैदिक आर्य एक सार्वभौमिक सत्ता में विश्वास करते थे। आर्यों ने सर्वप्रथम द्यौस एवं पृथ्वी की उपासना शुरू की। यास्क के अनुसार देवताओं की तीन श्रेणियाँ थी –

  1. आकाश के देवता
  2. अन्तरिक्ष के देवता
  3. पृथ्वी के देवता

सर्वप्रमुख देवता इंद्र थे, उन्हें पुरन्दर भी कहा गया है। ऋग्वेद के दूसरे मण्डल में इंद्र की स्तुति में सर्वाधिक 250 सूक्त है। इन्द्र को वर्षा का देवता भी कहा गया है। इसके बाद अग्नि (200 सूक्त) तथा वरुण (30बार) का उल्लेख है।

उत्तर वैदिक काल 

ऋग्वैदिक काल में आर्य सभ्यता का केन्द्र पंजाब (सप्त सैन्धव प्रदेश) था, जबकि उत्तर वैदिक काल में आर्य सभ्यता का विस्तार कुरूक्षेत्र व गंगा यमुना के दोआब तक हो गया उतर वैदिक काल के अन्तिम चरण में (600 ई.पू. के आस पास )आर्य सभ्यता का विस्तार सदानीरा (गण्डक बिहार) नदी तक हो गया। आर्य कोशल, विदेह, एवं अंग राज्य से परिचित थे। यद्यपि मगध व अंग आर्य क्षेत्र से बाहर थे। अथर्ववेद में मगध के लोगों को व्रात्य कहा गया है।

ऋग्वैदिक काल के छोटे कबिले (जन) एक दूसरे में विलीन होकर बड़े जनपदों का रूप ले रहे थे। पुरू व भरत मिलकर कुरु तथा तुर्वश एवं क्रिवी मिलकर पंचाल कहलाए। उत्तर वैदिक काल में सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद तथा ब्राह्मण ग्रन्थों,आरण्यकों एवं उपनिषदों की रचना हुई। उत्तर वैदिक कालीन ग्रन्थों में तक्रिकुट नामक एक पर्वत श्रृंखला का उल्लेख मिलता हैं।

राजनैतिक व्यवस्था 

ऋग्वैदिक काल में राजा कबीले का शासक होता था , जबकि उत्तर वैदिक काल में आर्य जीवन में आये स्थायित्व के कारण कबीले बड़े जनपदों में परिवर्तित  हो गए तथा राजा बड़े प्रदेश पर शासन करने लगा। उत्तर वैदिक काल में राजतन्त्र ही शासन का आधार था। परन्तु कही कही गणराज्य के भी उदाहरण मिलते हैं । अथर्ववेद में विश द्वारा राजा के निर्वाचन का उल्लेख मिलता हैं। राजा निरकुंश नहीं थे। सभा एवं समिति राजा पर नियंत्रण रखती थी। समिति के अध्यक्ष को ईशान कहा जाता था।

अथर्ववेद में सभा व समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है। सभा को अथर्ववेद में नरिष्ठा भी कहा गया है। इसका शाब्दिक अर्थ है अनुल्लंघनीय । विदथ का उल्लेख नहीं मिलता हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में राजा की दैवी उत्पत्ति सम्बन्धी विवरण मिलता हैं। वैराज्य वे राज्य होते थे जहाँ राजा नहीं होता था। उत्तर वैदिक काल में पांचाल सर्वाधिक विकसित राज्य था। शतपथ ब्राह्मण में पांचाल को वैदिक सभ्यता का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि कहा गया है। 

शतपथ ब्राह्मण व छान्दोग्य उपनिषद के अनुसार इस समय के प्रमुख दार्शनिक राजा➖

  • विदेह – राजा जनक
  • केकैय – अश्वपति
  • काशी – अजातशत्रु
  • पांचाल – प्रवाहण जाबालि 

राष्ट्र शब्द प्रदेश का सूचक था। इसका बहुप्रचलन उत्तर वैदिक काल में हुआ। शतपथ ब्राह्मण में राज्याभिषेक का उल्लेख मिलता है तथा सबसे पहले राज्याभिषेक की परम्परा उत्तर वैदिक काल में शुरू हुई है। राज्याभिषेक का अनुष्ठान राजसूय यज्ञ के नाम से प्रसिद्ध था। उत्तर वैदिक काल में नियमित कर प्रणाली विकसित हुई। ऋग्वैदिक काल में जो बली एक स्वैच्छिक कर था, वह उत्तर वैदिक काल में नियमित कर हो गया। अथर्ववेद में परीक्षित को मृत्युलोक का देवता बताया गया है। अथर्ववेद के अनुसार राजा को आय का 16वां भाग मिलता था। उत्तर वैदिक काल में राजा की कोई स्थायी सैना नहीं होती थी। शतपथ ब्राह्मण में 12 रत्नियों का नाम मिलता हैं। इन रत्नियों को पंचविश ब्राह्मण में वीर कहा गया है।

उत्तर वैदिक काल में राजाओं द्वारा किए जाने यज्ञ 

1. राजसूय यज्ञ – यह राजा के राज्याभिषेक के लिए होता था। इसमें सोमरस पिया जाता था। इस यज्ञ के दौरान राजा रत्नियों के घर भी जाता था। शुक्ल यजुर्वेद में राजसूय यज्ञ से सम्बन्धित अनुष्ठानों का वर्णन हैं।
2. अश्वमेघ यज्ञ – इस यज्ञ में राजा एक घोड़ा छोड़ता था। यह घोड़ा जिन प्रदेशों से बिना किसी प्रतिरोध के गुजरता था वे प्रदेश राजा के अधिकार में माने जाते थे। दूसरे शब्दों में यह यज्ञ राजा की शक्ति का प्रतीक था।
3. वाजपेय यज्ञ – इस यज्ञ में राजा द्वारा रथों की दौड़ का आयोजन होता था। जिसमें राजा को सहभागियों द्वारा विजयी बनाया जाता था।
4. अग्निष्टोम यज्ञ – इस यज्ञ में सोम पीसा जाता था तथा अग्नि को पशुबली दी जाती थी। इस यज्ञ से पूर्व याज्ञिक व उसकी पत्नी को एक वर्ष का सात्विक जीवन व्यतीत करना पड़ता था।
5. पुरूषमेध यज्ञ – इसमें पुरुष की बलि दी जाती थी तथा 25 यूपों (याज्ञिक स्तम्भ) के प्रयोग का विधान था।

गृहस्थ आर्यों द्वारा किये जाने वाले पाँच महायज्ञ 

1. ब्रह्मयज्ञ – अध्ययन – अध्यापन द्वारा ब्रह्म के प्रति कृतज्ञता।
2. देवयज्ञ – हवन द्वारा देवताओं की पूजा अर्चना।
3. पितृ यज्ञ – पितरो को जल व भोजन द्वारा तर्पण।
4. मनुष्य यज्ञ – अतिथि सत्कार द्वारा।
5. भूत यज्ञ – समस्त जीवों के प्रति कृतज्ञता।

 सामाजिक जीवन 

उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था में कठोरता आने लगी। वर्ण व्यवस्था कर्म के स्थान पर जन्म पर आधारित हो गई। समाज स्पष्टतः चार वर्णों में विभाजित हो गया – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र। ऐतरेय ब्राह्मण में सर्वप्रथम चारों वर्णों के कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है।कर्मकाण्डों व यज्ञों का प्रचलन बढ़ा जिससे ब्राह्मणों की शक्ति बढ़ी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही उपनयन संस्कार के अधिकार थे। इन तीनों को द्विज कहा जाता था।

उत्तर वैदिक काल में गौत्र प्रथा स्थापित हुई। गौत्र का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता हैं। यहाँ गौत्र एक वंश, कुल या जाति के रूप में परिभाषित होता है। उत्तर वैदिक काल में सर्वप्रथम छान्दोग्य उपनिषद में तीन आश्रमों की जानकारी मिलती है। चौथे आश्रम संन्यास आश्रम की स्थापना अभी तक नहीं हुई थी। ये तीन आश्रम- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ थे।

सर्वप्रथम जाबलोपनिषद् में चारों आश्रमों का उल्लेख मिलता है। उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों की दशा में गिरावट आई। उन्हें पैतृक सम्पति के अधिकार से वंचित कर दिया गया। सभा एवं समिति में स्त्रियों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया। स्त्रियों को उपनयन संस्कार से भी वंचित कर दिया गया। छान्दोग्य उपनिषद में दासों को संपत्ति माना गया है। केवल आश्वलयन गृहसूत्र में आठ प्रकार के विवाह का उल्लेख है।

आर्थिक जीवन 

उत्तर वैदिक काल में कृषि आर्यों का प्रमुख व्यवसाय था। काठक संहिता में 24 बैलों द्वारा खींचे जाने वाले हलों का उल्लेख मिलता है शतपथ ब्राह्मण में कृषि की चारों क्रियाओं जुताई, बुआई, कटाई तथा मड़ाई का उल्लेख हुआ है। वैदिक ऋचाओं में लोग अब भी पशुधन की वृद्धि की कामना करते थे, क्योंकि पशु ही चल सम्पति का मुख्य आधार थे। इस काल में मुख्य फसल जौ के स्थान पर गेहूँ और धान हो गई। चावल का उल्लेख यजुर्वेद में ब्रीहि नाम से हुआ है।

अथर्ववेद के अनुसार सर्वप्रथम पृथुवैन्य ने हल और कृषि को जन्म दिया। कृषि अनुसंधानकर्ता। उत्तर वैदिक काल की विशेषता चित्रित धूसर मृदभान्ड हैं। जबकि लाल मृदभान्ड सबसे ज्यादा प्रचलित थे। उत्तर वैदिक काल में ताँबे के अलावा लोहे का व्यापक प्रयोग शुरू हुआ। लोहे को श्याम अयश कहा गया है। शिल्प के व्यापार में भी उत्तर वैदिक काल में विकास हुआ। व्यापारिक श्रेणी के प्रधान को श्रेष्ठि कहा जाता था। श्रेष्ठि का उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता हैं।

शतपथ ब्राह्मण में वैश्य को अन्यस्य बलिकृत कहा गया है। महाजनी प्रथा का पहली बार उल्लेख हुआ है तथा सूदखोर को कुसीदिन कहा गया। तैतिरिय संहिता में ऋण के लिए कुसीद शब्द मिलता हैं। उत्तर वैदिक काल में निष्क, शतमान, पाद, कृष्णल आदि माप की इकाइयाँ थी। निष्क स्वर्ण मुद्रा थी व शतमान चाँदी की मुद्रा थी। गाय व निष्क लेन-देन का माध्यम थी। वस्तु विनिमय द्वारा भी व्यापार होता था। रत्तिका व गुंजा भी तौल की ईकाई थी।

धार्मिक जीवन 

उत्तर वैदिक काल में धार्मिक अनुष्ठानों व कर्मकाण्डों में वृद्धि हुई। यज्ञ में अधिक पुरोहितो की आवश्यकता होने लगी। ऋग्वैदिक देवता इन्द्र व अग्नि का महत्व कम हो गया तथा प्रजापति (ब्रह्म) को सृष्टि निर्माता के रूप में सर्वोच्च स्थान मिला। पशुओं के देवता रूद्र उत्तर वैदिक काल में शिव के रूप में प्रतिष्ठित हुए। विष्णु भी सृष्टि के संरक्षक के रूप में पूजे जाने लगे। उपनिषदों में ब्रह्म को ही एकमात्र परम् सत्ता के रूप में स्वीकार किया गया। छान्दोग्य उपनिषद में धर्म के तीन स्कन्ध – यज्ञ, अध्ययन, व दान बताया हैं।

विविध महत्वपूर्ण तथ्य 

ऐतरेय ब्राह्मण में सर्वप्रथम चारों वर्णों के कर्तव्यों का उल्लेख मिलता है। छान्दोग्य उपनिषद में इतिहास पुराण को पंचम वेद कहा गया है।याज्ञवल्क्य – गार्गी संवाद का उल्लेख वृहदारण्यक उपनिषद में मिलता हैं। यम – नचिकेता की कहानी कठोपनिषद में हैं। यह कृष्ण यजुर्वेद की कठशाखा का उपनिषद हैं। तैतिरिय ब्राह्मण के अनुसार ब्राह्मण सूत का, क्षत्रिय सन का, और वैश्य ऊन का यज्ञोपवीत धारण करते थे।

पुनर्जन्म का सिद्धांत सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण में मिलता हैं। अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त वैदिक राष्ट्रीय गीत है। लोपामुद्रा अगस्तय ऋषि की पत्नी थी। लोपामुद्रा ने कई वैदिक ऋचाओं की रचना की। लोपामुद्रा क्षत्रिय थी। निष्काम कर्म सिद्धांत का सर्वप्रथम प्रतिपादन इशोपनिषद् में हुआ हैं।

इस काल का सबसे बड़ा लोह पुंज अंतरजीखेड़ा में मिला है। उमा शब्द का उल्लेख केन उपनिषद में हुआ है। गोपथ ब्राह्मण की रचना ब्राह्मण ग्रन्थों में सबसे अन्त में हुई हैं। श्राद्ध प्रथा की शुरूआत सर्वप्रथम दत्तात्रेय ऋषि के बेटे निमि ने की। शल्य चिकित्सा का उल्लेख अथर्ववेद में मिलता हैं। शुल्व सूत्र मे यज्ञ वेदियों के निर्माण का वर्णन हैं तथा शुल्व सूत्र से वैदिक गणित की जानकारी मिलती है। सत्यमेव जयते मुंडक उपनिषद में हैं।

शून्य का उल्लेख यजुर्वेद में हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में जलप्लावन की कथा का वर्णन हैं। मगध व अंग का प्राचीनतम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता हैं। “युद्ध का प्रारम्भ मनुष्यों के मस्तिष्क में होता है। ” यह अथर्ववेद में उल्लिखित है। विवाहों में ब्रह्म विवाह सबसे आदर्श था। आधुनिक समय में भी अधिकांश विवाह ब्रह्म विवाह ही होते हैं। असतो मा सद् गमय – ऋग्वेद से लिया गया है। ऋग्वेद में अग्नि को देवताओं का मुख कहा गया है। 

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