संगम काल का इतिहास | Sangam Period History in Hindi

संगम काल का इतिहास

संगम काल में तमिल भाषा का प्राचीनतम साहित्य संगम साहित्य के नाम से विख्यात है संगम का अर्थ संघ या परिषद होता है । संगम साहित्य में दक्षिण भारत के जनजीवन की झांकी मिलती है। संगम साहित्य में तीन महत्वपूर्ण राज्यों चोल, चेर व पांडेय का उल्लेख मिलता है । इनमें चेर का सबसे अधिक उल्लेख है । यह सबसे प्राचीन वंश था । पांडेय शासकों के संरक्षण में कुल तीन संगम आयोजित किए गए। जिनमें संकलित साहित्य को संगम साहित्य की संज्ञा दी गई। प्रथम संगम मधुरा में, द्वितीय संगम कपाटपुरम में तथा तृतीय संगम उत्तरी मथुरा में आयोजित किया गया। तीनों संगमों की कुल अवधि 9950 वर्ष मानी जाती है वह 197 पांड्य राजाओं ने इसे संरक्षण प्रदान किया।

प्रथम संगम का कोई ग्रंथ इस समय उपलब्ध नहीं है। तृतीय संगम के भी अधिकार ग्रंथ नष्ट हो गए हैं, लेकिन अवशिष्ट तमिल साहित्य तीसरे संगम से ही संबंधित हैं । तोलकाप्पियम द्वितीय संगम का एकमात्र उपलब्ध प्राचीनतम साहित्य हैं। इसके रचनाकार तोलकाप्पियरर थे । जो अगस्त्य ऋषि के 12 सदस्यों में से एक थे । यह तमिल व्याकरण ग्रंथ है जो चित्र शैली में रचित है।

तोलकाप्पियम में आठ प्रकार के विवाह का उल्लेख है। तिरुक्काम्पुलियर चेर, चोल व पांडेय तीनों राज्यों का संगम स्थल था । तमिल संगम का सर्वप्रथम उल्लेख अग्गपोरुल (8 वीं सदी) के भाष्य की भूमिका में मिलता है। संगम साहित्य से ज्ञात होता है कि दक्षिण में आर्य सभ्यता का विस्तार ऋषि अगस्त्य व कौंडिन्य ने किया । संगम साहित्य का काल रामचरण शर्मा के अनुसार 300 से 600 ईस्वी के बीच था।

Most important – महाजनपद काल (Mahajanapada period )

संगम साहित्य की दो मुख्य विषय वस्तु 

  1. अहूम – इसका संबंध प्रेम से हैं ।
  2. पूरम – यह युद्ध के बारे में है।

10 कविताओं का संग्रह पतुप्पतु  तीसरे संगम के दौरान लिखा गया 10 गीतों के संग्रह में नक्कीरर द्वारा लिखी गई । नेडूलअलवदे में पांडेय राजा ने नैडूनजेलियन व उनके रानी का वर्णन है । एतूतोके के संग्रह तिरूपति 4 में 10 कविताएं हैं । इनमें 8 चेर शासकों की प्रशस्ति मिलती है । 18 लघु गीतों का एक संग्रह पडिनैन्किल्कनक्कु है । तिरुक्कुरल को तमिल बाईबिल के नाम से भी जाना हैं। तथा सबसे प्राचीन तमिल ग्रंथ भी है । 

शिल्प्पादिकारम तथा मणिमेखलै संगम कालीन महाकाव्य है। शिल्पाधिकारम का नायक कॉवलन माधवी नामक गणिका पर अपना सारा धन गंवा कर अपनी पत्नी टंकी के पास आता है । कोवलन व कण्णगी मदुरा के लिए रवाना होते हैं। मदूरा में कोलन पर रानी की एक पायल (नुपुर) चुराने का झूठा आरोप लगता है । वह राजा कोवलन को जल्दबाजी में मृत्युदंड दे देता है । कणगी अपने पति को निर्दोष साबित करती हैं। निर्दोष कोलन को मृत्युदंड देने की ग्लानि में राजा की मृत्यु हो जाती है तथा कण्णगी के शाप से मधुरा जलकर राख हो जाता है। शिल्लपादिकारम का लेखक जैन है ।

  • प्रोफेसर मेंहण्डालें ने शिल्लपादिकारम को तमिल काव्य का इलियड और मणिमेखलै को तमिल का ओडिसी कहां है ।
  • ओवैयार तथा नच्चेलियर संगम काल की दो प्रसिद्ध कवयित्रयाँ थी।
  • पुत्तू पातु कोवरीपतनम पर रचित एक लंबी कविता है।

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संगम काल के पांच प्रमुख महाकाव्य  

1. शिल्लपादिकारम – इलंगो आदिगल
2. मणिमेखलै – सीतल सतनार
3. जीवक चिंतामणि – तिरून्तक देवर
4. तोल्लकाप्पियम – तोल्लकाप्पियर
5. वलयपति व कुंडलकेशि

संगम कवि कपिलर को पारि नामक चेर राजा सरंक्षण दिया। कपिलर ने कलिथौके और कुरिंजपातु नामक ग्रंथ लिखे। मामूलनार नामक तमिल कवि ने नंदों व मौर्यों का उल्लेख किया है । जीवक चिंतामणि को विवाह की किताब भी कहा जाता है। नच्चिरविकनियर ने संगम कृतियों पर टीका लिखी है।

चेर राजवंश का इतिहास

संगम साहित्य में सर्वाधिक प्राचीन वंश चेर वंश है तथा इसका ही सबसे अधिक उल्लेख है । चेरों का प्रतीक चिन्ह धनुष तथा राजधानी वांजी (करुवुर)थी । चेर राज्य मालाबार (केरल) क्षेत्र में था । चेर राज्य का प्रथम शासक उदियन जेरल था । उसने महाभारत में भाग लेने वाले वीरों को भोजन कराया था । उसने एक बड़ी पाठशाला भी बनवाई । संगम कालीन कवि परणर ने शेनगुट्टवन का यशोगान किया है। उसके पास जहाजी बेड़ा भी था। शेनगुट्टनवन ने उत्तर में चढ़ाई कर गंगा नदी को पार किया।

गजबाहु एक तमिल कवि इलबोदियार के साथ शेनगुट्टनवन के दरबार में आया । आदिक इमान नामक चेर शासक ने दक्षिण में गन्ने की खेती आरंभ की। बन्दरचेर राज्य का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह था। वाट्टेलुत्तु चेरों की एक लिपि थी।

चोल राजवंश का इतिहास

चोल राज्य तमिलनाडु में पैन्नर तथा वेलारू नदियों के मध्य स्थित था । इसका प्रतीक चिन्ह बाघ था। चोलों की प्रारंभिक राजधानी उतरी मनलूर थी । बाद में उरैयूर तथा तंजोर चोलो की राजधानी बनी। उरैयूर कपास व्यापार का प्रसिद्ध केंद्र था। एेलारा नामक चोल राजा ने ईसापूर्व दूसरी शताब्दी में श्रीलंका पर विजय प्राप्त कर वहां 50 वर्षों तक शासन किया।करिकाल इस काल में सबसे महत्वपूर्ण चोल शासक था । उसने 190 ई. के आसपास शासन किया ।

करिकाल ने पुहार (आधुनिक कावेरी पटनम) की स्थापना की तथा कावेरी नदी के किनारे 164 किमी लंबा बांध बनवाया । पुहार कावेरी की सहायक नदी वैगई पर स्थित है। तंजोर के निकट वेणी के युद्ध में उसने चेर तथा पांडेय राज्यों के 11 राज्यों के समूह को पराजित किया। इनमें प्रमुख बैलिर नामक राजा था । करिकाल ने चेर शासक पेरूनजेरल को पराजित किया। चोलो का सर्वप्रथम उल्लेख कात्यायन ने  किया । संगम काल में चोल शासकों ने कुंभकोणम में विस्तार कोषागार की व्यवस्था की।

सम्पूर्ण जानकारियां पढ़ने के लिए – चोल वंश- Chola Dynasty

पांडय वंश का इतिहास

पांडय राज्य सुदूर दक्षिण व दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित था। उनकी राजधानी मदुरे थी । पांडेय का प्रतीक चिन्ह मछली (कार्प) था । उनकी प्रारंभिक राजधानी कोरकई (कोल्ची) थी। बाद में मदुरै (मदुरा) राजधानी बनी । पांडेय का सर्वप्रथम उल्लेख मेगस्थनीज ने किया है। मेगस्थनीज़ के अनुसार पांडेय का राज्य मातृसत्तात्मक था। वहां पर एक स्त्री का शासन था तथा पांडेय राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था ।

नेडियोंन ने समुंद्र पूजा प्रारंभ कराई व पहरूली नदी को अस्तित्व प्रदान किया ।नैडुजेलियन सबसे विख्यात पांडेय शासक था। नैडुजेलियन ने तलैयालंगानम के युद्ध में विजय प्राप्त की। वह स्वयं एक कवि था तथा कवियों का संरक्षक था।नैडुजेलियन ने रोमन सम्राट अगस्टस के दरबार में अपना दूत भेजा था। शिलप्पादिकारम के नायक कॉवलन को नेडुजेलियन ने ही मृत्यु दंड दिया था । पांडेय की प्रारंभिक राजधानी कोरकाई मोतियों के लिए विख्यात थी।

संगम काल का राजनैतिक जीवन 

संगम कालीन प्रशासन राजतन्त्रात्मक था। राजपद वंशानुगत था । राज्य को मंडल कहा जाता था । समस्त अधिकार राजा में निहित थे । राजा को मन्नम, वंदन, कारवेन इत्यादि उपाधियां दी गई थी। यह उपाधियां राजा एवं देवता दोनों के लिए होती थी। राजा के सर्वोच्च न्यायालय या राज्यसभा को मनरम कहते थे । तथा राजा का जन्मदिन पेरूनल कहलाता था। राजा के दरबार को नलबै भी कहा जाता था।

सेना के सेनापति को एनाडी की उपाधि दी जाती थी। सेना कि अग्र टुकड़ी को तुशी तथा पिछली टुकड़ी को कुले कहा जाता था । सेना में वेल्लाल (धनी कृषक) भर्ती किए जाते थे । युद्ध में मरे सैनिकों की स्मृति में पाषाण मूर्तियां बनाई जाती थी। इस प्रकार की मूर्तियों को नड्डूकल या वीरकाल कहते थे । युद्ध में बंदी स्त्रियों को दासी बनाकर उनसे मंदिरों में दीपक जलाने का कार्य कराया जाता था।

प्रशासनिक शब्दावली 

  • नाडू  –  प्रांत
  • पैरूर – बड़े गांव
  • सिरेयूर – छोटा गांव
  • उर – नगर
  • मुडुर – पुराना ग्राम
  • पट्टनम – तटीय शहर
  • पेडियम – सार्वजनिक स्थल
  • अवे – छोटे गांव की सभा
  • अमियचार –  मंत्री
  • ओर्रार –  गुप्तचर
  • दूतार – राजदूत
  • सालै – प्रमुख सड़क
  • तेरु – प्रमुख गली

संगम काल में सामाजिक जीवन 

संगम काल में उत्तर भारत के आर्य संस्कृति के तत्वों का दक्षिण में प्रसार हुआ । संगम काल के चार वर्ण – अरसर (शासक) अंडनार (ब्राह्मण) वेनिगर (वणीक) वेलालर (किसान)। संगम काल में भी जाति प्रथा का आधार व्यवस्था ही थे। व्यवसाय का आधार विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति हुआ करती थी। तमिल क्षेत्र में ब्राह्मणों का आगमन सर्वप्रथम संगम काल में ही होता है ।क्षत्रिय वर्ग, वैश्य वर्ग तथा किसान वर्ग मिलकर गैर ब्राह्मण वर्ग बनाते थे । अतः समाज मोटे रूप से दो भागों में बटा था ।

भूमि अधिकतर वैल्लाल जाति के हाथों में थी। यह धनी कृषक वर्ग था । शासक वर्ग भी वैल्लाल जाति से ही निकलता था । वैल्लाल के प्रमुख को वेलिर कहा जाता था। खेतों में काम करने वाले मजदूरों को कडेसियर कहते थे। वेल्लाल दो वर्गों में विभाजित थे। धनिक कृषक व भूमी हीन वर्ग। चोल राज्य में धनी कृषकों को वेल तथा आरशु की उपाधि दी जाती थी। व पांडेय राज्य में इन्हें कविदी की उपाधि दी जाती थी। उच्च सैनिक वर्गों में सती प्रथा का प्रचलन था । अंतरजातीय विवाह भी प्रचलित था । दास प्रथा भी प्रचलित थी। दासों के लिए नियमित बाजार लगते थे। गायक व नर्तकों को पार और विडेलियर कहा था।

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संगम काल में आर्थिक जीवन 

संगम काल में कृषि पशुपालन व शिकार जीविका के मुख्य आधार थे । दक्षिण भारत में अगस्त्य ऋषि द्वारा कृषि का विस्तार किया गया। जहाजो का निर्माण तथा कताई बुनाई महत्वपूर्ण उद्योग थे । उरैयूर सूती वस्त्र उद्योग का महत्व पूर्ण केन्द्र था। अधिकांश व्यापार वस्तु विनिमय में होता था। बाजार को अवनम कहते थे। पांडेय राज्य के प्रमुख बंदरगाह शालीयुर , कोरकाय आदि। चोल राज्य के प्रमुख बंदरगाह पुहार और उरई थे। टालमी ने कावेरी पट्टनम को खबेरिस नाम दिया है। तोंडी, मुशिरी तथा पुहार में यवन लोग बड़ी संख्या में विद्यमान थे । संगम काल में रोम के साथ व्यापार उन्नत अवस्था में था। अरिकामेडु से रोमन लोगों की बस्ती रोमन सम्राट ऑगस्टस व टिवेरियस की मुहरे मिली हैं।

पेरिप्लस ने अरिकामेडु को पोडुका कहां है ।पश्चिमी देशों को काली मिर्च, मसाला , हाथीदांत ,रेशम ,मोती सूती वस्त्र ,मलमल आदि का निर्यात किया जाता था । आयातित वस्तुओं में सिक्कें, पुखराज ,छपे हुए वस्त्र, शीशा, टीन, तांबा व शराब प्रमुख थे । पुहार एक सर्वदेशीय महानगर था । यहां विभिन्न देशों के नागरिक रहते थे । संगम काल में दक्षिण भारत का मलय द्वीपों व चीन के साथ भी व्यापार था। यूनान के दक्षिण भारत के साथ व्यापार के कारण ग्रीक भाषा में चावल , अदरक आदि शब्द तमिल भाषा से लिए गए थे। पेरिप्लस में संगम युग के 24 बंदरगाहों का उल्लेख किया है , जो सिंधु मुहाने से लेकर कन्याकुमारी तक विस्तृत थे। भूमि मापन की इकाई वैली या माहोती थी ।अंबानम अनाज का माप था।  नाली ,अल्लाकू और उल्लाक भी छोटे माप थे।

प्राचीन भारतीय इतिहास – History of ancient india

धार्मिक जीवन 

संगम युग में दक्षिण भारत में वैदिक धर्म का आगमन हो गया। दक्षिण भारत में मुरुगन की उपासना सबसे प्राचीन है । मुरुगन का एक अन्य नाम सुब्रमणयम भी मिलता है । बाद में सुब्रमणयम का एकीकरण स्कंध कार्तिकेय से किया गया। मुरगन का दूसरा नाम वेलन भी था। वेल या बरछी इसका प्रमुख अस्त्र था।

मुर्गन का प्रतीक मुर्गा था। पहाड़ी क्षेत्र के शिकारियों पर्वत देव के रूप में मुर्गन की पूजा करते थे । मुरुगन की पत्नियों में एक कुरवस नामक पर्वतीय जनजाति की स्त्री हैं । मरियम्मा परशुराम की माता चेचक की देवी थी। विष्णु का तमिल नाम तिरुमल है । किसान मेरूडम इंद्र देव की पूजा करते थे । पुहार के वार्षिक उत्सव में इंद्र की विशेष पूजा होती थी । मणिमेखलै में कापालिक शैव सन्यासियों का वर्णन है , इसमें बौद्ध धर्म के दक्षिण में प्रसार का वर्णन है । शिल्पादिकारम में जैन धर्म के संस्थानों का वर्णन है।

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