सविनय अवज्ञा आंदोलन

सविनय अवज्ञा आंदोलन करने का मुख्य कारण कांग्रेस की मांगों को ब्रिटिश सरकार द्वारा स्वीकार नहीं किए जाने के कारण नमक का कानून तोड़ कर किया गया
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1930 का वर्ष आरंभ होते ही  लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में प्रस्ताव पारित कर के पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति का लक्ष्य निर्धारित किया गया
कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अध्यक्षीय भाषण में आह्वान किया-“”विदेशी शासन से अपने देश को मुक्त करने के लिए अब हमें खुला विद्रोह करना है””
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इस विद्रोह के आह्वान के औचित्य को स्वतंत्रता दिवस 26 जनवरी 1930 को देश के गांव और कस्बों में ली गई शपथ को इन शब्दों में सिद्ध किया गया…….””किसी भी दूसरे देश की जनता की तरह भारतीय जनता का भी यह अहरणीय अधिकार है कि वह स्वतंत्र हो और अपने स्वराज्य का फल भोगे
ब्रिटिश सरकार ने भारतीय जनता को न सिर्फ स्वतंत्रता से वंचित किया है बल्कि इसकी नींव आम जनता के शोषण पर पड़ी है और इसने यहां की जनता को आर्थिक, राजनीतिक ,सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रुप से नष्ट कर दिया है
अब हम यह मानते हैं कि जिस विदेशी शासन ने चारों तरफ से हमारे देश का सत्यानाश किया उसके शासन के आगे समर्पण करना मनुष्य और ईश्वर के प्रति अपराध है हम अपने को सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए तैयार करेंगे
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 🍁🍃🍁सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि🍁🍃🍁

  • 1930 में कांग्रेस के नेतृत्व द्वारा इस निर्णय पर पहुंचने की ब्रिटिश राज्य अभिशाप है
  • उसकी अंत के लिए संघर्ष का रास्ता चुना जाए इसके पीछे वह ऐतिहासिक घटना चक्र कार्य कर रहा था जो 1922-27 के मध्य भारत में चलाया था
  • इस घटनाक्रम की मुख्य विशेषता यह थी कि एक और तो असहयोग आंदोलन की साफ दिखने वाली असफलता के बाद भी भारत की देशभक्त शक्तियां निराश नहीं हुई, वह साम्राज्यवाद विरोध के झंडे को अपने अपने ढंग से उठा रही थी
  • घटना चक्र की दूसरी विशेषता यह थी कि इस दौर में भारतीय जनता के विभिन्न वर्गों और साम्राज्यवाद के मध्य अंतर्विरोध और तीखा हुआ
  • सरकारी नीतियों का भारत विरोधी और शोषणकारी चरित्र अधिक उभरकर सामने आया
  • बढ़ता हुआ अंतर्विरोध और देशभक्त शक्तियों की सक्रियता इन दोनों ने मिलकर उस बेमिसाल जन आंदोलन के लिए जमीन तैयार कर दी जो 1930 में सामने आया है
  • 1922 से 27 के काल में राष्ट्रवाद को जिंदा रखने में जिन तत्वों ने सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया उनमें एक थे कांग्रेस के वह कार्यकर्ता जो गांधी के रचनात्मक कार्यों को देश की जनता की व्यापक हिस्सों में ले गए थे
  • सीधे तौर पर यह कार्यकर्ता शासन के विरुद्ध कोई संघर्ष नहीं कर रहे थे लेकिन अपने रचनात्मक कार्यक्रम द्वारा जन चेतना को बढाकर और उसके गांधी और उनकी विचारधारा के पीछे लामबन्द कर वह संघर्ष के लिए  जमीन तैयार जरूर कर रहे हैं
  • इसी कड़ी में आगे स्वराज दल की स्थापना मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास ने असहयोग आंदोलन की असफलता के उपरांत की थी
  • इनका मुख्य उद्देश्य था विधानसभाओं में पहुंचकर अवरोध की नीति अपनाकर 1919 के संवैधानिक ढाँचा को ध्वस्त करना
  • यह अपना उद्देश्य हालांकि पूरा नहीं कर सके लेकिन विधानसभा के अंदर भारत के राजनीतिक संघर्ष को ले जाकर उन्होंने ना केवल भारतीय प्रश्न को जीवित रखा बल्कि
  • इस दौर में राजस्थान, आंध्र प्रदेश, केरल व आधुनिक उत्तर भारत के कई जिलों में सामंती और साम्राज्यवादी उत्पीड़न के विरुद्ध  किसानों के शानदार संघर्ष हुए
  • पंजाब में महंतो के विरुद्ध  अकालियों ने गौरवपूर्ण  लड़ाई लड़ी  उत्तरी भारत में बंगाल से लेकर पंजाब तक वे क्रांतिकारी जिन्होंने गांधीवाद को अवसर देने के लिए अपने सशस्त्र संघर्ष को एक प्रकार से स्थगित कर दिया था नये जोश खरोश के साथ मैदान में आ गए


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  • 1927 में उत्तरार्द्घ से साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में और अधिक तेजी आई इस भावना का उफान बिंदु पर पहुंचाने का श्रेय भी साम्राज्यवाद को ही है
  • नवंबर 1927 में कंजरवेटिव पार्टी की सरकार ने भारतीय समस्या पर विचार करने के लिए साइमन आयोग को नियुक्त किया
  • इस आयोग को नियुक्त करते समय भारतीयों को उसमें शामिल ना करके उनके आत्मसम्मान पर गहरी चोट की गई
  • यह चोट इतनी तीखी थी कि सामान्यतः सरकार परस्त के रूप में प्रसिद्ध लिबरल फेडरेशन से लेकर मुस्लिम लीग के प्रमुख धड़े तक सभी ने कमीशन के बहिष्कार का आह्वान किया और साइमन वापस जाओ आंदोलन अभूतपूर्व सफल रहा
  •  इस आंदोलन को कुचलने के लिए सरकार ने नृशंस दमन का सहारा लिया यहां तक की उन्होंने शेर-ए-पंजाब लाला लाजपत राय को भी नहीं बख्शा लाठी चार्ज करके इनकी जान ही ले ली
  • इस आंदोलन से जनाक्रोश में वृद्धि की इससे भी ज्यादा महत्व की बात यह थी कि नौजवानों  की पीढ़ी को साइमन आयोग के बहिष्कार के कारण राजनीतिक कार्यवाही का आरंभिक अनुभव हुआ
  • नौजवान लोगों की ही इस प्रतिरोध में अत्यंत सजग भूमिका थी और उन्हीं के कारण इस आंदोलन में कुछ जुझारूपन का आभास हुआ

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  • 1927 के इसी दौर में वामपंथी विचारधारा और गुटों का तेजी के साथ विकास हुआ, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस दोनों पर ही इन विचारों का असर था
  • साम्यवादी ग्रुप देश के विभिन्न भागों में किसानों और मजदूरों के मध्य सक्रिय थे मुंबई के मजदूरों की शानदार हड़ताल वामपंथी नेतृत्व का परिणाम थी
  • संयुक्त प्रांत, बंगाल,पंजाब,महाराष्ट्र आदि स्थानों पर वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी का गठन हो गया था इसके फलस्वरुप राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष में जुझारुपन आ रहा था
  • इस जुझारूपन का दमन करने के लिए और वामपंथी और मजदूर आंदोलन को कुचलने के लिए 1929 में मेरठ षड्यंत्र केस चलाया गया लेकिन साइमन आयोग की नियुक्ति की तरह इसका परिणाम भी सरकार के अनुकूल नहीं निकला ,मेरठ षड्यंत्र केस में साम्राज्यवाद विरोधी लहर को तेज किया
  • अगर लाला लाजपत राय पर चलाई लाठियों का जवाब भगत सिंह ने साण्डर्स की हत्या करके दिया तो मजदूरों के  दमन के लिए तैयार किए गए विधेयक का उत्तर उन्हीं के द्वारा असेंबली में बम फेंक कर दिया गया

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  • इस तरह साम्राज्यवादी विरोधी भावना तीव्र थी और व्यापक भी थी 
  • उसका ही परिणाम था कि जब सर्वदलीय सम्मेलन द्वारा नियुक्त मोतीलाल नेहरु कमेटी ने देश के भावी संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत करते डोमिनियन स्टेटस की मांग रखी तो जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र और सत्यमूर्ति के नेतृत्व में कांग्रेस के युवा वर्ग ने इसका विरोध किया
  • पंडित जवाहरलाल नेहरु ने तो 1927 में कांग्रेस के अधिवेशन में स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित करा लिया था लेकिन इस अधिवेशन में गांधी जी मौजूद नहीं थे
  • 1928 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गांधी जी और मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में स्वाधीनता की मांग का विरोध किया गया तथा एक समझौतावादी  रास्ता निकाला गया
  • निर्णय लिया गया कि सरकार को 1 वर्ष का समय दिया जाए अगर वह 1929 के अंत तक डोमिनियन स्टेटस प्रदान नहीं करती है तो पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ किया जा सकता है
  • औपनिवेशिक स्वराज्य की मांग स्वीकार नहीं की गई तथा जैसा लिखा जा चुका है कि 1930 के आरंभ में पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य और उसकी प्राप्ति के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन को चलाने का प्रस्ताव पारित किया गया

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🍁””रजनी पाम दत्त”” के अनुसार सविनय अवज्ञा आंदोलन का तात्पर्य🍁

  • रजनी पाम दत्त के अनुसार सविनय अवज्ञा आंदोलन के पीछे मात्र स्वराज्य प्राप्ति का लक्ष्य नहीं था
  • 1920 के दशक के उत्तरार्द्ध में देश के अंदर जुझारू व क्रांतिकारी आंदोलन जनता को अपने पीछे लामबंद करके कांग्रेस के लिए और गांधीवादी नेतृत्व कार्यक्रम के अस्तित्व के लिए एक गंभीर चुनोती बनता जा रहा था
  • इस बात का एहसास अन्य किसी व्यक्ति की तुलना में महात्मा गांधी जी को कहीं ज्यादा था
  • वह समझते थे कि इस क्रांतिकारी आंदोलन से जनता को अलग करने के लिए जरूरी है कि कांग्रेस का अपना सशक्त जन आंदोलन आरंभ किया जाए
  • यह एक ऐसा आंदोलन हो जो साम्राज्यवाद पर भी दबाव डाले और क्रांतिकारी आंदोलन की धार भी कुन्द करें
  • गांधीजी के ही शब्दों में मेरा मकसद यह है कि ब्रिटिश शासन की संगठित हिंसा के साथ साथ हिंसा के बढ़ते हुए पक्ष की असंगठित हिंसा के खिलाफ में उस शक्ति का (अहिंसा का) प्रयोग शुरू करो
  •  हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने का अर्थ दोनों शक्तियों को बेलगाम छोड़ देना होगा

🍁🌲🍁सविनय अवज्ञा आंदोलन का इतिहास🍁🌲🍁
सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने कि इस विवशता से मुक्ति पाने का एक रास्ता महात्मा गांधी के सामने था
वह रास्ता यह था कि सरकार समझौते का रूप अपनाकर कुछ न्यूनतम मांगों को स्वीकार कर ले
इस उद्देश्य से ही गांधी जी ने 31 जनवरी 1930 के यंग इंडिया में उन 11 मांगों को प्रस्तुत किया जिन्हें स्वीकार कर लेने पर आंदोलन नहीं चलाया जाता
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🥀🍃गांधी जी द्वारा प्रस्तुत 11 सूत्रीय मांगे (31 जनवरी 1930)🍃🥀 
गांधीजी ने अपने पत्र यंग इंडिया के माध्यम से वायसराय लार्ड इरविन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड उसके सम्मुख 31 जनवरी 1930 को 11 सूत्रीय मांगे रखी

🍁यह मांगे निम्न प्रकार की है🍁
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🔺सेना के व्यय में 50% की कटौती
🔺सिविल सेवा के वेतनों में 50% की कटौती
🔺पूर्ण शराबबंदी
🔺राजनीतिक बंदियों की रिहाई
🔺आपराधिक गुप्तचर विभाग में सुधार
🔺हथियार कानून में सुधार करके बंदूकों इत्यादि के लाइसेंस की स्थिति को नियंत्रण के अंतर्गत लाना
🔺रुपए-स्टर्लिंग के विनिमय अनुपात को घटाकर 1-शिलिंग 4 पेंस करना
🔺कपड़ा उद्योग को संरक्षण प्रदान करना
🔺तटीय नौवहन को भारतीयों के लिए आरक्षित करना
🔺भू-राजस्व को 50% की कटौती
🔺नमक कर की और नमक पर सरकारी एकाधिकार की समाप्ति
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  • उपयुक्त 11 सूत्री मांगों में प्रारंभिक छ:मागें आम रुचि के मुद्दों से संबंधित थी
  • उसके बाद की तीन मांगे विशिष्ट बुर्जुआ वर्ग से संबंधित थी और अंतिम दो मांगे किसानो से संबंधित थी
  • गांधीजी के इस मांग पत्र पर सरकार ने कोई भी सकारात्मक रूख नहीं अपनाया
  • सरकार के द्वारा इन मांगों को ठुकरा दिया गया और इस तरह कांग्रेस संघर्ष के रास्ते पर चलने के लिए मजबूर हो गई
  • परिणाम स्वरुप 14 फरवरी 1930 को साबरमती में कांग्रेस की एक बैठक में सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाने का निश्चय किया गया
  • गांधीजी ने 27 फरवरी को स्पष्ट कर दिया कि मैं चाहता हूं कि इस आंदोलन को आश्रमवासियों और उन लोगों के जरिए शुरू करो जिन्होंने आश्रम का अनुशासन स्वीकार कर लिया और कार्य पद्धति मान ली है
  • गांधीजी ने निश्चित किया कि वह नमक कानून को तोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन का आरंभ करेंगे
  • गांधीजी ने इस आंदोलन के दौरान अहिंसात्मक ढंग से सरकार के प्रति असहयोग का रवैया अपनाया
  • कालांतर में इसे ही सविनय अवज्ञा आंदोलन कहा गया
  • गांधी जी ने आंदोलन शुरु करने से पूर्व एक बार फिर ब्रिटिश सरकार से समझौते का प्रयत्न किया और इस हेतु लॉर्ड इरविन को 2 मार्च 1930 को एक पत्र लिखा ,लेकिन वायसराय ने इस पत्र पर कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया ​
  • इसीलिए महात्मा गांधी को विवश होकर सत्याग्रह करना पड़ा गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत प्रसिद्ध दांडी मार्च से की थी

🍁सविनय अवज्ञा आंदोलन का राष्ट्रीय आंदोलन में इसका महत्व🍁
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  • महात्मा गांधी जी द्वारा 6 अप्रैल 1930 को दांडी समुद्र तट पर नमक कानून को तोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया
  • इस आंदोलन के लिए विपिन चंद्र का मानना है कि इस आंदोलन की योजना बहुत समझदारी से बनाई गई है ऊपर से हानि रहित दिखने वाला आंदोलन भयंकर साबित हुआ
  • रजनी पाम दत्त भी मानते हैं कि गांधी की राजनीति बहुत ही कुशल और योग्य राजनीति थी अपने लक्ष्य और तरीके के निर्धारण में उन्होंने बेहद कुशलता का परिचय दिया था
  •  लेकिन उनकी दृष्टि मे यह कुशलता अपने वर्गीय  हितों की रक्षा में थी इस आंदोलन से यह संभावना खत्म हो गई कि मजदूर वर्ग संघर्ष में भाग लेगा
  • इस आंदोलन में किसानों का समर्थन प्राप्त करने की योग्यता थी क्योंकि जैसा कि सुमित सरकार ने रेखांकित किया नमक के मुद्दे ने स्वराज्य के आदर्श को ग्रामीण निर्धनजन की एक ठोस और व्यापक शिकायत से देखते-देखते जोड़ दिया

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🍁🌲🍁सविनय अवज्ञा आंदोलन में थे किए गए कार्यक्रम🍁🌲🍁
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9 अप्रैल को महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के विस्तृत कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की
इस आंदोलन के कार्यक्रम की मुख्य बातें निम्न थी

🌀जनता द्वारा जगह-जगह पर गैरकानूनी नमक तैयार करना अथवा नमक कानून को तोड़ना था
🌀महिलाओं द्वारा विदेशी वस्तुओं शराब और अफीम की दुकानों के सामने धरना देना था

  • विदेशी कपड़ों की होलिया जलाना था और छुआछूत व सांप्रदायिकता का अंत करना
  • विद्यार्थियों द्वारा सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार किया जाएगा
  • सरकारी कर्मचारियों द्वारा अपने पदों से त्याग पत्र दे दिया जाएगा
  • इस कार्यक्रम को लागू करते समय शर्त थी की स्वराज्य पाने की सत्य और अहिंसा की हमारी प्रतिज्ञा का ईमानदारी से पालन किया जाना चाहिए
  • गांधी जी को विश्वास था कि यदि ऐसा किया तब हम देखेंगे कि पूर्ण स्वराज्य हमारे दरवाजे पर खड़ा दस्तक दे रहा है
  • आंदोलन में विदेशी कपड़ों और शराब के बहिष्कारों में छात्रों और नौजवानों की भूमिका महत्वपूर्ण थी
  • इस आंदोलन में महिलाओं को विशेष रुप से भाग लेने को कहा था
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत कर ना देने का भी आंदोलन चलाया गया था
  • पूर्वी भारत में चौकीदारी के लिए कर अदा करने से लोगों ने मना कर दिया
  • गुजरात में लोगों ने भू राजस्व देने से इंकार कर दिया
  • मध्य भारत की रियासत छतरपुर में करो कि नाअदायगी का एक आंदोलन चला जिसका नेता डाकू मंगल सिंह था
  • उत्तर प्रदेश में भी कर ना देने का आंदोलन चलाया गया
  • महाराष्ट्र कर्नाटक और मध्य भारत में जंगल नियमों के उल्लंघन में आंदोलन चलाया गया
  • इस आंदोलन से भारत का आयात घटकर 1/3 हो गया
  • मुंबई की 14 अंग्रेजी मिले बंद हो गई सिगरेट का आयात घटकर 1/6 हो गया
  • भारतीय सूती वस्त्र उद्योग में कई गुना की वृद्धि हुई इस संघर्ष की प्रति कठोर दमन का रास्ता अपनाया गया
  • गांधीजी सहित अन्य नेताओं और 90 हजार से अधिक सत्याग्रह जेल में बंद कर दिए गए
  • इसी समय साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने से तीन गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया गया जिसमें कांग्रेस ने केवल दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था​
  • इन सभी कार्यों से देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक प्रकार से जागरूकता उत्पन्न हुई इस जागरुकता ने राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

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