हड़प्पा सभ्यता का इतिहास | Harappan civilization Important Facts

हड़प्पा सभ्यता का इतिहास

हड़प्पा सभ्यता (Hadappa Civilization) या सिन्धु घाटी सभ्यता (Sindhu Vally Civilization) केवल भारत की ही नहीं बल्कि समस्त संसार की कांस्यकालीन सभ्यताओं में एक महान सभ्यता थी। सभ्यता या सिन्धु घाटी सभ्यता एक पूर्णतः सुविकसित नगरीय (Urban) थी जो कि मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के समकालीन थी। हड़प्पा सभ्यता या सिन्धु घाटी सभ्यता का जन्म ताम्र-पाषाण पृष्ठभूमि में भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में हुआ था।

हड़प्पा सभ्यता का सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक व राजनैतिक जीवन बहुत ही उत्तम अवस्था में था। हड़प्पा की लिपि को अभी तक पढने में सफलता नहीं मिली है। यह भावचित्रात्मक लिपि हैं तथा उनकी लिखावट क्रमशः दाँयी ओर से बाँयी ओर जाती हैं। हड़प्पा लिपि के 64 मूल चिन्ह एवं 250 से 400 तक चित्राक्षर हैं। अधिकांश लिपि के नमूने सेलखड़ी की मुहरों पर मिले हैं। हड़प्पा सभ्यता में माप तौल में मानकीकृत व्यवस्था थी जो 16 के अनुपात में थी। हड़प्पा सभ्यता की मुहरों पर सर्वाधिक अंकित पशु एक श्रृंग पशु है। कुछ मुहरों पर देवताओं के चित्र भी अंकित है।

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हड़प्पा सभ्यता का परिचय

इस सभ्यता के लिए तीन नामों का प्रयोग होता है – सिन्धु सभ्यता, सिन्धु घाटी की सभ्यता और हड़प्पा सभ्यता। हड़प्पा के टीलो की ओर सर्वप्रथम ध्यानाकर्षण चाल्स मैसन ने 1826 ई. में किया। सर्वप्रथम 1921 ई. में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जान मार्सल के निर्देशन में रायबहादुर दयाराम साहनी एवं माधोस्वरूप वत्स ने मांटगुमरी जिले (पाकिस्तान के पंजाब प्रांत) में हड़प्पा, जो कि वर्तमान में पाकिस्तान में है, नाम के स्थान में पुरातात्विक उत्खननों द्वारा एक प्राचीन सभ्यता के अवशेष की खोज की। इसी स्थान के नाम पर इसका नाम हड़प्पा सभ्यता रखा गया है विकसित हड़प्पा सभ्यता का मूल केन्द्र पंजाब व सिन्ध में था।  जाॅन मार्शल ने इसे सर्वप्रथम सिन्धु सभ्यता का नाम दिया। 

उसके एक वर्ष बाद सन् 1922 में राखालदास बनर्जी ने पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना जिले में मोहनजोदड़ो में कुछ प्राचीन अवशेषों को खोज निकाला। दोनों ही स्थानों से प्राप्त होने वाली मुहरें, उप्पे, लिपयाँ तथा कलाकृतियों में पूरी समानता थी। प्रारम्भ में प्राचीन सभ्यता के अधिकतम अवशेष सिन्धु घाटी में तथा सिन्धु नदी की सहायक नदियों के मैंदान में पायी गईं, इसलिए विद्वानों ने उस सभ्यता का नाम सिन्धु घाटी सभ्यता (Indus River Valley civilizations) रख दिया।  किन्तु बाद में किये गये अनुसन्धानों से स्पष्ट हुआ कि उस सभ्यता का विस्तार सिर्फ सिन्धु घाटी में सीमित न होकर राजस्थान, हरयाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी पंजाब एवं गुजरात जैसे क्षेत्रों तक थी। इस कारण से विद्वानों ने उस सभ्यता का नाम, उस सभ्यता के बारे में सबसे पहले जाने वाले स्थान हड़प्पा के आधार पर, हड़प्पा सभ्यता कर दिया। 

हड़प्पा सभ्यता का काल निर्धारण 

मेसोपोटामिया के उर और किश नामक स्थानों से प्राप्त की मुद्राओं को हड़प्पा सभ्यता के काल निर्धारण का आधार माना गया। इस आधार पर मार्शल ने यह मत व्यक्त किया कि यह सभ्यता ई.पू. 3250 से ई.पू. 2750 तक फूलती-फलती रही। व्हीलर ने हड़प्पा सभ्यता का काल ई.पू. 2500-1500 बताया।

बाद में काल निर्धारण की रेडियो कार्बन विधि का आविष्कार हो जाने पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि आरम्भिक हड़प्पा काल लगभग ई.पू. 3500 से ई.पू. 2600 तक रहा; परिपक्व या पूर्ण विकसित हड़प्पा काल लगभग ई.पू. 2600 से ई.पू. 1900 तक रहा और उत्तर हड़प्पा काल लगभग ई.पू. 1900 से ई.पू. 1300 तक रहा। सरल शब्दों में कहा जाये तो हड़प्पा सभ्यता ईसवी सन् आरम्भ होने से लगभग तीन हजार वर्ष पुरानी है अर्थात यह सभ्यता आज से लगभग पाँच हजार साल पुरानी है। रेडियो कार्बन 14 (C-14) के विश्लेषण के आधार पर डीपी अग्रवाल द्वारा हड़प्पा सभ्यता की तिथि 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू. मानी गयी हैं। यह मत सर्वाधिक मान्य प्रतीत होता है।

सिन्धु घाटी सभ्यता | Indus Valley Civilization in Hindi

 हड़प्पा सभ्यता का विस्तार 

यह सभ्यता एक विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई थी जिसके अन्तर्गत् पंजाब, सिन्ध, बलूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमान्त भाग सम्मिलित थे। इसका विस्तार उत्तर में जम्मू से दक्षिण में नर्मदा के मुहाने तक और पश्चिम में बलूचिस्तान के मकरान समुद्र तट से उत्तर-पूर्व में मेरठ तक था। जिसका क्षेत्रफल लगभग 1250000 वर्ग कि.मी. है, एक त्रिभुज के आकार का है।

इस सभ्यता का कुल भौगोलिक क्षेत्र मिस्र की सभ्यता के क्षेत्र से 20 गुना और मिस्र एवं मेसोपोटामिया दोनों ही सभ्यताओं के सम्मिलित क्षेत्र से 12 गुना बड़ा है। सन् 1947 में भारत के बँटवारे के समय तक हड़प्पा सभ्यता की सिर्फ 40 बस्तियों की जानकारी मिल पायी थी किन्तु वर्तमान समय तक हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित लगभग 1400 बस्तियों का पता लगाया जा चुका है; जिनमें से लगभग 925 बस्तियाँ भारत में और शेष पाकिस्तान में स्थित हैं।

हड़प्पा सभ्यता की 40 बस्तियाँ सिन्धु और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में, 1100 बस्तियाँ, अर्थात् हड़प्पा सभ्यता की कुल बस्तियों की 80% बस्तियाँ, सिन्धु तथा गंगा के बीच के मैदान (जहाँ कभी सरस्वती नदी बहती थी) में और लगभग 250 बस्तियाँ भारत में सरस्वती नदी प्रणाली के क्षेत्र में पायी गयी हैं जिनमें से कुछ गुजरात और कुछ महाराष्ट्र में हैं। हड़प्पा सभ्यता के इस विशाल विस्तार से स्पष्ट हो जाता है कि ई.पू. 3000-2000 के काल में समस्त संसार में किसी भी सभ्यता का क्षेत्र हड़प्पा सभ्यता के क्षेत्र से बड़ा नहीं था। 

सिन्धु सभ्यता में कम से कम 4 प्रजातियाँ थी। प्रोटो आस्ट्रेलाइड, भूमध्य सागरीय, अल्पाइन, मंगोलायड। हड़प्पा के लोग मुख्यतः भूमध्य सागरीय थे। हड़प्पा सभ्यता के निर्माता संभवतः द्रविड़ थे।

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हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख केन्द्र

अब तक उपलब्ध क्षेत्रों आरम्भिक अवस्था, परिपक्व अवस्था और उत्तर अवस्था, तीनों ही अवस्थाओं के क्षेत्र शामिल हैं। परिपक्व वाले क्षेत्र में से कुछ को ही नगर की संज्ञा दी जा सकती है और नगरों की संख्या सीमित है। परिपक्व अवस्था वाले नगरों में पंजाब में हड़प्पा और सिन्ध में मोहनजोदड़ो सबसे अधिक महत्वपूर्ण नगर हैं। यह दोनों ही क्षेत्र वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हुदड़ो, लोथल, कालीबंगा और बनावली परिपक्व एवं उन्नत हड़प्पा सभ्यता के नगर थे

हड़प्पा नगर

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के बीच की दूरी 483 कि.मी. है और यह दोनों सिन्धु नदी के द्वारा जुड़े हुए हैं। पंजाब के मांटगुमरी जिले में रावी नदी के तट पर स्थित हड़प्पा नगर के आकार एवं वहाँ से उपलब्ध वस्तुओं की विविधता के आधार पर कहा जा सकता है कि यह नगर विस्तृत सिन्धु सभ्यता के उत्तरी भाग की राजधानी रहा होगा। हड़प्पा नगर उस काल में मध्य एशिया, अफगानिस्तान तथा जम्मू को आपस में जोड़ने वाले महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों के मध्य में स्थित था।

हड़प्पा के आवास के दक्षिण में एक कब्रिस्तान हैं जिसे कब्रिस्तान आर. 37 नाम दिया गया है। ऋग्वेद के हरियुपिया का समीकरण हड़प्पा से किया गया है। हड़प्पा से कर्मचारियों के आवास, पीतल की इक्का गाड़ी, स्त्री के गर्भ से निकलता हुआ पौधा, ईटों के वृत्ताकार चबूतरे, गेहूँ और जौ के दाने, एक बर्तन पर मछुआरा का चित्र, हड़प्पा से लकड़ी के ताबूत में शवाधान का साक्ष्य। सर्वाधिकअभिलेख युक्त मुहरें हड़प्पा से प्राप्त हुई है जबकि सर्वाधिक मुहरें मोहनजोदड़ो से मिली है।

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मोहनजोदड़ो

मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ –  मृतकों का टीला। मोहनजोदड़ो से विशाल स्नानागार, सबसे बड़ी ईमारत अन्नागार, ग्रिड पैटर्न पर आधारित समान्तर सड़कें, काँस्य नर्तकी व प्रस्तर की योगी, मोहनजोदड़ो में किसी प्रकार कोई कब्रिस्तान नहीं है, मकान पक्की ईटों से निर्मित, सूत का कपड़ा व धागा।

सिन्ध प्रान्त के लरकाना जिले में सिन्धु घाटी नदी के किनारे बसे मोहनजोदड़ो को हड़प्पा सभ्यता की सबसे बड़ी बस्ती माना जाता है मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिट्टी की सात परतें पायी गई हैं जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यह नगर सात बार उजड़ा और बसा होगा। मोहनजोदड़ो से प्राप्त अवशेषों से ही हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना, गृह-निर्माण, मुद्रा, मुहरों आदि के बारे में अधिकांश जानकारी मिली है। विद्वानों के मतानुसार मोहनजोदड़ो एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र, अन्तर्राष्ट्रीय नगर और हड़प्पा सभ्यता के दक्षिणी प्रान्त की राजधानी था।

चन्हूदड़ो

यह पाक् हड़प्पा संस्कृति, जिसे झूकर व झांगर संस्कृति कहते हैं, के अवशेष मिले हैं। चन्हूदड़ो एकमात्र स्थल है, जहाँ से वक्राकार ईटें मिली है। चन्हूदड़ो से किसी प्रकार का दुर्ग के अवशेष नहीं मिले हैं। चन्हूदड़ो से अलंकृत हाथी के खिलौने, बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते के पद चिन्ह।

लोथल

हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख बन्दरगाह था। लोथल में गढ़ और नगर दोनों एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हैं। लोथल के पूर्वी भाग में जहाज की गोदी (डाॅक-यार्ड) मिली है, जिसका आकार 214×36 मीटर हैं। यहा 6 से चावल का प्रथम साक्ष्य और फारस की मुहर भी मिली है।

कालीबंगा

इससे प्राक हड़प्पा एवं हड़प्पा काल के अवशेष मिले हैं। प्राक् हड़प्पा काल के जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं। यहाँ से बेलनाकार मुहरें मिली है। युगल समाधि और प्रतीकात्मक समाधि भी मिली है। प्रत्येक घरों में कुएँ, मातृदेवी की कोई मूर्ति नही मिली है। कालीबंगा और बनावली से हड़प्पा पूर्व तथा हड़प्पा कालीन दोनों ही समय के अवशेष मिले हैं धौलावीरा में भी एक किले के अवशेष मिले हैं।

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धौलावीरा एवं राखीगढ़ी

भारत में खोजे गए सबसे बड़े हड़प्पाकालीन नगर हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो व गनेड़ीवाल धौलावीरा से बड़े है लेकिन ये तीनों पाकिस्तान में है। धौलावीरा चौथा सबसे बड़ा हड़प्पाकालीन नगर हैं। धौलावीरा से खेल का स्टेडियम तथा सूचना पट्ट, साईन बोर्ड के साक्ष्य मिले हैं। यहाँ से बाँध निर्माण (जल संग्रहण) व नहर प्रणाली के साक्ष्य भी मिले हैं।

अन्य महत्वपूर्ण नगर

  • बनावली –  में जल निकासी प्रणाली का अभाव था। खिलौने के रूप में हल आकृति मिली है। जौ के अवशेष, तिल व सरसों के ढेर, ताँबे के बाणाग्र। सेलखड़ी व पकाई मिट्टी की मुहरें।
  • सुरकोटड़ा – हड़प्पा सभ्यता के पतन को दर्शाता हैं। अन्तिम स्तर से घोड़े की अस्थियाँ, विशेष प्रकार की कब्रगाह तथा तराजू का पलड़ा मिला है। सुतकागेंडोर और सुरकोटदा में नगर दुर्ग होने के साक्ष्य पाये गये हैं
  • रंगपुर – से न तो कोई मुद्रा और न ही कोई मातृदेवी की मूर्ति मिली हैं। यहाँ से कच्ची ईटों का दुर्ग मिला है तथा रोजदी से हाथी के अवशेष मिले हैं।
  • कोटदीजी – से प्राप्त मुख्य अवशेष – बाणाग्र, काँस्य की चुड़ियाँ, हथियार। यहाँ से पत्थर के बाणाग्र और किले बन्दी के साक्ष्य भी मिले हैं।
  • रोपड़ – की खुदाई में हड़प्पा से लेकर गुप्त व मध्य काल तक की संस्कृति के 5 स्तरीय क्रम मिले हैं।
    माँडा – चिनाब नदी के दांये तट पर अखनूर के पास स्थित है
  • गणवारीवाला,  सुकागेंडोर, रोज्दी आदि हड़प्पा सभ्यता के अन्य महत्वपूर्ण नगर थे।  

हड़प्पा सभ्यता की विशेषताएँ

  • नगर योजना एवं संरचनाएँ – हड़प्पा सभ्यता की सबसे प्रभावशाली विशेषता उसकी नगर योजना एवं जल निकासी प्रणाली हैं। नगर योजना जाल पद्धति (ग्रीड पैटर्न) पर आधारित है।
  • गृह स्थापत्य – 
  • सड़कें – सड़कें व गलिया योजनानुसार निर्मित की गई। नगर की प्रमुख सड़क को प्रथम सड़क कहा जाता था। नगर में प्रवेश पूर्वी सड़क से होता था। जहाँ ये प्रथम सड़क से मिलती थी उसे ओक्सफोर्ड सर्कस कहा जाता था। सड़कें मिट्टी की बनी होती थी। मोहनजोदड़ो की सबसे चौड़ी सड़क 10 मीटर से कुछ ज्यादा चौड़ी थी।
  • नालियाँ – जल निकासी प्रणाली सिन्धु सभ्यता की अद्वितीय विशेषता थी। नालियाँ ईटों व पत्थरों से ढकी हुई होती थी। घरों से जल निकासी मोरिया द्वारा होती थी, जो मुख्य नालियों में गिरती थी।
  • दुर्ग
  • सार्वजनिक भवन
  • विशाल स्नानागार, अन्नागार और भवन

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सिन्धु घाटी सभ्यता के महत्वपूर्ण स्थल खोज किसने और कब की

स्थल वर्तमान अवस्थिति खोजकर्त्ता कब
सुत्कांगेडोर बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में ऑरेल स्टाइन और जॉर्ज डेल्स 1927 और 1962 में
चान्हूदड़ो पाकिस्तान के सिंध प्रांत में एन.जी. मजूमदार और अर्नेस्ट मैके 1931 और 1935
रंगपुर अहमदाबाद जिले में मादर नदी के तट पर एम.एस. वत्स और रंगनाथ राव ने 1931 और 1953-54 में
डाबरकोट पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में ऑरेल स्टाइन ने 1935 में (उत्खनन अर्नेस्ट मैके द्वारा)
कालीबंगा राजस्थान के गंगानगर, हनुमानगढ   ए. घोष, बी.बी. लाल एवं वी.के. थापर ने 1961 में
कोटदीजी पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त में फजल अहमद खान ने 1955 में
रोपड़ पंजाब में यज्ञदत्त शर्मा ने 1953-56 में
लोथल अहमदाबाद जिले में एस.आर राव ने 1957 में
आलमगीरपुर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में वी.डी शर्मा ने 1958 में
संद्योल पंजाब के लुधियाना जिले में तलवार एवं बिस्ट ने
मिताथल हरियाणा के भिवानी जिले में पंजाब विश्वविद्यालय ने 1968 में
सुरकोतदा कच्छ (गुजरात) में जगपति जोशी ने 1972 में
बनवाली हरियाणा के हिसार जिले में रविन्द्र सिंह बिस्ट ने 1973-74 में
राखीगढ़ी हरियाणा के जींद जिले में प्रो. सूरज भान ने
धौलावीरा कच्छ (गुजरात) में रविन्द्र सिंह बिस्ट 1990-91 में
बालाकोट पाकिस्तान के सोमाली खाड़ी में जी.एफ डेल्स ने  1963-76 में
अन्य महत्वपूर्ण स्थल अलीमुराद, पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त मे & बाड़ा, पंजाब में स्थित है 

सिन्धु घाटी सभ्यता के विनाश के कारण और किसका मत है

1. आर्यों के आक्रमण से हुआ – व्हीलर और गार्डन का
2. भीषण बाढ़ से हुआ           – मार्शल, मैके और एस.आर. राव का
3. मोहनजोदड़ों में आगजनी  – डी.डी. कोसांबी का
4. वर्षा की कमी के कारण कृषि तथा पशुपालन नष्ट हो जाने से हुआ – ऑरेल स्टाइन का 
5. भूकम्प द्वारा हुआ – डेल्स का
6. जलप्लावन एवं भूतात्विक परिवर्तनों द्वारा हुआ – दयाराम साहनी 
7. ओलावृष्टि एवं जलवायु परिवर्तन द्वारा हुआ – ऑरेल स्टाइन और अमलावंद घोष का 
8. प्राकृतिक आपदाओं द्वारा हुआ – केनेडी का
9. महामारी द्वारा हुआ – कलकत्ता तथा कराँची के शव परीक्षक का
10. प्रशासनिक शिथिलता के कारण हुआ – सर जॉन मार्शल का
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