मारबर्ग वायरस और उसके लक्षण और इलाज

वायरस क्या होते है - ये अतिसूक्ष्म अकोशिकीय परजीवी होते है जो न्यूक्लियोप्रोटिन यानी नाभिकीय अम्ल और प्रोटीन से बने होते है और यह सजीव और निर्जीव के मध्य की कड़ी है जो शरीर के अंदर होने पर जीवित होकर अपनी वंश वृद्धि करते हैं तथा शरीर के बाहर यह कई सालों तक मृत समान अवस्था में उपस्थित रहते हैं और दुनिया में अब तक बहुत से वायरस जैसे करोना, एचआईवी, इन्फ्लूएंजा, पोलियो, इबोला आदि वायरस का पता लगाया जा चुका है और उन्हीं में से मारबर्ग वायरस एक है जो इबोला वायरस की तरह ही खतरनाक है वायरस का संचरण वायु, जल, भोजन और संपर्क द्वारा होता है 

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सर्वप्रथम डॉक्टर एडवर्ड जेनर ने सन 1716 में पता लगाया कि चेचक वायरस के कारण होता है उन्होंने चेचक के टीके का भी अविष्कार किया, परपोषी प्रकृति के अनुसार वायरस तीन प्रकार के होते हैं 1. पादप वायरस (Plant Virus),  2. जंतु वायरस (Animal Virus) और  3. जीवाणुभोजी वायरस (Bacteriophage Virus)

मारबर्ग वायरस क्या है (What is Marburg virus)


Centers for Disease Control and Prevention (CDC) के अनुसार,  सर्वप्रथम 1967 में जर्मनी और पूर्व यूगोस्लाविया में युगांडा से आयात किए गए हरे बंदरों के साथ काम करने वाले लोगों में मारबर्ग वायरस की पहचान की गई थी। तथा यह एक दुर्लभ गंभीर रक्तस्रावी बुखार बताया है, यह भी इबोला वायरस  की भांति RNA Virus Filoviruses (फाइलोवायरस) परिवार का सदस्य है, पिछ्ले प्रकोपो के अनुसार ये दुर्लभ वायरस के मामले में मृत्यु दर 24 से 88 फीसदी तक अलग- अलग थी। अंगोला में 2004-05 में इसकी वजह से 88% संक्रमित व्यक्तियो की मौत हुई थी। 

ऐसा माना जाता है कि मारबर्ग वायरस फल खाने वाले अफ्रीकी चमगादड़ों के मूत्र या मल & रूसेटस एजिपियाकस से पैदा हुआ है। और यह तभी सम्भव है इन चमगादड़ों के रहने वाली जगहों पर जब श्रमिक लोग (खानों या गुफाओं) में लंबे समय तक काम करते हैं या पर्यटक आस-पास भ्र्मण करते है।

हाल ही मे World Health Organization (WHO) ने अफ्रीका के एक छोटे देश भूमध्यवर्ती गिनी में मारबर्ग वायरस रोग के संक्रमण से कम से कम नौ लोगों की मौत हो गई है और 16-20 संदिग्ध मामलों की जांच की जा रही है, यह भी इबोला वायरस की तरह जानलेवा और ख़तरनाक है। यदि समय पर उपचार नही होता है तो ये भी करोना वायरस की भांति भयकर स्थिति उत्पन्न कर सकता है|

इससे पहले जुलाई 2022 में घाना देश में इस बीमारी का आउटब्रेक हुआ था। संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य शाखा (WHO) ने 13 फरवरी को बताया कि स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी के चेतावनी के बाद पश्चिम अफ्रीकी देश से नमूने सेनेगल की एक प्रयोगशाला में भेजे गए थे। शुरुआती जांच में अत्यधिक विषाणु जनित रोग की पहचान हुई।

मारबर्ग वायरस रोग के लक्षण (Symptoms of Marburg Virus Disease)


विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार मारबर्ग वायरस के कारण तेज बुखार, ठंड लगना, हरारत, गंभीर सिरदर्द, गले में खराश, मांसपेशियों में दर्द, उल्टी और दस्त, नाक से खून, घबराहट, पेट में दर्द और ऐंठन, मतली हो सकती है। इसके अलावा इसके संक्रमण के दौरान रोगियों की आंखें अंदर की और धंस जाती है, चेहरे के हाव भाव बदल जाते हैं और रोगी को अत्यधिक सुस्ती महसूस होती है। यह शरीर के सभी अंगो को प्रभावित कर सकता है 

मारबर्ग वायरस के कारण आसानी से रक्तस्राव हो सकता है और जिसके कारण 5 से 7 दिनो मे संक्रमित व्यक्ति के शरीर (पेट, पीठ और सीने में) पर मैकुलोपापुलर दाने दिखाई देने लगते हैं और यह उसके केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है जिससे संक्रमित व्यक्ति मे भ्रम और चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो जाता है और यदि संक्रमित व्यक्ति को सही से उपचार ना मिले तो 8 से 9 दिन के बाद पीड़ित की मृत्यु भी हो सकती है

मारबर्ग वायरस रोग का इलाज (Marburg virus Treatment)


वर्तमान में मारबर्ग वायरस रोग के इलाज के लिए कोई टीका, दवा या एंटीवायरल थेरेपी को मंजूरी नहीं दी गई है। WHO ने सहायक देखभाल जैसे शरीर को हाइड्रेट रखने के लिये अधिक से अधिक पानी पिलाना, ऑक्सीजन के स्तर को बनाए रखना और विशिष्ट लक्षणों का इलाज करने से जीवित रहने की दर में सुधार करने में मदद मिल सकती है।

इनके अलावा इबोला वायरस रोग के लिए नैदानिक परीक्षणों में उपयोग किए जा रहे मोनोक्लोनल एंटीबॉडी या एंटीवायरल का भी संभावित रूप से मारबर्ग वायरस के लिए उपयोग किया जा सकता है। कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग करना और संदिग्ध लोगों को आइसोलेट करके ही मारबर्ग वायरस से बचा जा सकता है । संक्रमित व्यक्ति को सख्त अलगाव में रखना, सुई, उपकरण, और रोगी के मलमूत्र का बंध्याकरण या उचित निपटान है|

बचाव के लिये किये जा रहे प्रयास 


WHO ने प्रभावित क्षेत्रों में चिकित्सा दल और सैकड़ों स्वास्थ्य कर्मियों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण भी प्रदान सुनिश्चित किया है। साथ ही इक्वेटोरियल गिनी में आसपास के दो गांवों के बीच आवाजाही पर रोक लगाकर कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की जा रही है। इक्वेटोरियल गिनी से जुडे बॉर्डर अस्थायी रूप से बंद कर दिए गये है ताकि बीमारी कॉ जल्दी ट्रेस करने और संक्रमण रोकने में मदद मिल सके ।

Sources: CDC, Dainik Bhaskar, NBT, NEWS18, AAJTAK, 

Disclaimer - हम डॉक्टर नही है लेकिन उपलब्ध कराई गई सभी जानकारियां आपको जागरूक करने के लिए है, इसलिए आप को अपने स्वास्थ्य से सम्बंधित कोई भी परेशानी हो रही है या ऐसे कोई भी लक्षण नजर आ रहे हैं तो तुरंत चिकित्सक से सलाह ले | 

आपको हमारा लेख कैसा लगा Comment के माध्यम से अवश्य बताये - धन्यवाद

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