1857 की क्रांति

■ 1857 का विद्रोह भारत के गवर्नर जनरल केनिंग के कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी।  इस समय इंग्लैंड के प्रधानमंत्री पारमस्टन थे और विद्रोह के समय कंपनी का मुख्य सेनापति जॉर्ज  अनिसन और विद्रोह प्रारंभ होने के बाद में कॉलिन कैंपबेल को सेनापति नियुक्त किया गया तथा इस समय भारत का सम्राट बहादुरशाह जफर थे।

■31 मई 1857 के दिन को संपूर्ण देश में क्रांति की शुरुआत का दिन निर्धारित किया गया। नाना साहब के सलाहकार अजीमुल्ला खां वह सतारा के अपदस्थ राजा के सलाहकार राणो जी बापू ने लंदन में विद्रोह की योजना बनाई क्रांति के प्रतीक के रूप में कमल का फूल और रोटी को चुना गया।

विद्रोह का स्वरूप💐💐

■भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना 100 वर्ष पूरे होने की पूर्व संध्या पर भारतीय सैनिकों द्वारा जो भी तरह किया उसकी प्रकृति को लेकर विद्वानों में मतभेद है अंग्रेज इतिहासकारों ने इसे सिपाही विद्रोह, सामंतवादी प्रतिक्रिया, हिंदू मुस्लिम षड्यंत्र आदि की संज्ञा दी है।

■ मुंशी जीवनलाल और मोइनुद्दीन ,दुर्गादास बंदोपाध्याय, लॉरेंस ,सिले, टर्वेलियन, केय, मालेसन टी आर होम्स इत्यादि ने इसको सैनिक विद्रोह बताया तथा सर सैयद अहमद खान ने अपनी पुस्तक *एन इजी ऑन द कॉज ऑफ द इंडियन रिवोल्ट*1860  में इसे सैनिक विद्रोह माना।

👉🏻 l e r रिच ने इस विद्रोह को धर्मांधों का ईसाइयों के विरुद्ध विद्रोह माना।

👉🏻टी आर होम्स ने इसको बर्बरता तथा सभ्यता के बीच युद्ध माना है।

👉🏻 सर जेम्स आउटरम और w टेलर ने हिंदू मुस्लिम षड्यंत्र का परिणाम बताया।

👉🏻 बेंजामिन डिजरेली (ब्रिटिश प्रधानमंत्री) ने इसको राष्ट्रीय विद्रोह बताया।

👉🏻 अशोक मेहता ने अपनी पुस्तक द ग्रेट रिबेलियन में इसे राष्ट्रीय विद्रोह कहा।

👉🏻 वी डी सावरकर ने 1909 में लिखित अपनी पुस्तक द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस 1857 मैं इसे सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी थी।

👉🏻 एस एन सेन:- 1857 के विद्रोह का सरकारी इतिहासकार।  सरकार ने इन्हें 1857 के विद्रोह पर अधिकृत इतिहास लिखने को कहा उन्होंने सैनिक बगावत 1857 का विद्रोह नामक पुस्तक में 1857 की संबंध में लिखा है कि यदपि इस विद्रोह को राष्ट्रीय संग्राम नहीं कहा जा सकता परंतु इसे विद्रोह की संज्ञा देना भी गलत होगा क्योंकि यह कहीं भी केवल सैनिकों तक सीमित नहीं रहा।

👉🏻 आर सी मजूमदार उन्होंने अपनी पुस्तक द सिपोय म्युटिनी एंड द रिबेलियन ऑफ 1857 1957 ईस्वी में प्रकाशित की।  उन्होंने इस पुस्तक में निष्कर्ष निकाला है कि यह तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम न तो प्रथम नहीं राष्ट्रीय तथा नहीं स्वतंत्रता संग्राम था।

👉🏻 शशिभूषण चौधरी :- 1957 ईस्वी में प्रकाशित अपनी पुस्तक सिविल रिबेलियन इन इंडियन मुतिनिएस, 1857- 1859 में 1857 58 ईसवी की घटनाओं को सैनिक व असैनिक विद्रोह के समिश्रण के रुप में देखते हैं।
शशिभूषण चौधरी ने अपनी पुस्तक theories ऑफ द इंडियन म्युटिनी मे 1857 के संघर्ष को  स्वतंत्रता का संग्राम माना है।

कुल मिलाकर 1857 का विद्रोह मोटे तौर पर एक राजनीतिक आंदोलन था जिसका उद्देश्य भारत से विदेशी शासन को दूर करना था। 

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