India’s soil(भारत की मिट्टीया)

 India’s soil(भारत की मिट्टीया)

प्रत्येक देश के आर्थिक जीवन में मिट्टी का बहुत महत्व होता है । भारत जैसे कृषि प्रधान देश ने तो उसका महत्व होता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में तो इसका महत्व और भी अधिक है, क्योंकि हमारे देश में 70% से अधिक लोग अपनी आजीविका के लिए कृषि पर ही आधारित है। मृदा भूमि की वह परत हे, जो चट्टानों के विघटन और जीवांशो के सड़ने- गलने से मिलकर बनती है। इसमें पेड़ पौधों को उगाने की क्षमता होती है ।इसका निर्माण व गुण चट्टानों, जलवायु वनस्पति और समय पर निर्भर रहता है।​

रचना विधि के अनुसार मिट्टी के दो प्रकार हैं –

स्थानीय और विस्थापित ।

❄ऋतु क्रिया के प्रभाव से विखंडित चट्टानें जब अपने मूल स्थान से हटती हे, या बहुत कम हटती है, तो इस प्रकार से निर्मित मिट्टी को स्थानीय मिट्टी कहां जाता है। दक्षिण भारत के पठारों पर ऐसी मिट्टी मिलती है, ऐसी मिट्टी जीन चट्टानों से बनती है। उनके गुण उस में विद्यमान रहते हैं यही कारण है, कि वहां की जोरदार परिवर्तित चट्टानों से निर्मित मिट्टी कंकरीली मोटे करने वाली लाल रंग की ओर अनुपजाऊ होती है । जहां लावा के विघटन मिट्टी का निर्माण हुआ है, वहां मिट्टी काली और उपजाऊ होती है। नदी, हिमनदी, पावन आदि के प्रभाव से विखंडित चट्टानों से बनी मिट्टी जब अपने मूल स्तन से हटकर दूर चली जाती है, इस तरह से निर्मित मिट्टी को विस्थापित मिट्टी कहां जाता है। भारत के मध्यवर्ती मैदान तथा तटीय मैदानों की मिट्टियां इसी प्रकार की है। यह मिट्टियां बहुत ही उपजाऊ होती है।​

​ ❄हमारे देश की विशाल का वर्णन प्राकृतिक रचना के कारण यहां विभिन्न प्रकार की मिट्टियों का पाया जाना स्वभाविक है आर्थिक दृष्टि से इसकी प्रमुख उपयोगिता फसलें उगाने में है फसलों को उगाने से जुताई की इकाई, भूमि की सिंचाई प्रयुक्त फसलों का चुनाव, अपनाई जाने वाली कृषि पद्धति इत्यादि का ध्यान रखना पड़ता है जो बहुत कुछ मिट्टी की किस्म पर भी निर्भर रहता है। मिट्टी की रचना और गुणों के आधार पर भारतीय मिट्टियों का वर्गीकरण निम्नलिखित अनुसार किया जा सकता है।​

भारत की मिट्टीया कुछ इस प्रकार है

1. कांप मृदा​
2.काली या लावा मृदा​
3. लाल मृदा​
4. लैटेराइट मृदा​
5. बलुई मृदा​
6. पर्वतीय मृदा​

1. कांप मृदा​

​ भारत के विशाल मैदान में तटीय मैदान कांप मिट्टी से बने हैं यह कांप मिट्टी नदियों द्वारा लाकर जमा की गई है। यह मिट्टी लगभग 800000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है

?भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार इनको तीन भागों में बांटा जाता हे​??

?(अ)​ पुरातन कांप मृदा
?(ब) ​ नूतन कांप मृदा

?(स)​ नूतनतम कांप मृदा

​​(अ)​ पुरातन कांप मृदा –
नदियों के बाढ़ क्षेत्रों से ऊंचे बागों में जहां बाहर कमाने नहीं पहुंच पाता है पुरातन कांप मिट्टी पाई जाती है ऐसे क्षेत्रों को बांगर के नाम से भी पुकारा जाता है जिन्हें गहन खेती करके वर्ष में दो फसलें उत्पन्न की जाती है । जिनमें सिंचाई की आवश्यकता अधिक होती है​

​​(ब)​ नूतन कांप मृदा –
जहां तक नदियों के बाढ़ का पानी पहुंच पाता है, वहां तक नूतन का मिट्टी पाई जाती है। इसे नूतन का इसलिए कहते हैं। क्योंकि प्रतिवर्ष नदियों द्वारा लाई हुई मिट्टी की नई परत जमा होती रहती है, नूतन जलोढ़ वाले क्षेत्र को खबर करते हैं। खादर क्षेत्र की मिट्टी अधिक उपजाऊ होती है, इनमें सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है।​

​​(स)​ नूतनतम कांप मृदा –
यह मिट्टी गंगा ब्रम्हापुत्र के डेल्टा प्रदेश में पाई जाती है इन में चूना मैग्नीशियम पोटाश फास्फोरस तथा जीवांश की अधिकता होती है जिनमें कृषि के लिए यह मिट्टी बहुत उपयोगी होती है। यह मिट्टी तटीय मैदानों में भी मिलती है, इस मिट्टी के क्षेत्र सामान्यतः समतल होती है। जिन पर मेहरा निकलना कुआं खोदना तथा खेती करना सुगम होता है, इसमें नवमी अधिक समय तक रहती है यह बारीक कण वाली भुर-भुरी होती है ।जिनमें फसलों का उगाना तथा पौधों द्वारा सरलता से खुराक प्राप्त करना संभव होता है। इनमें वानस्पतिक वंश अधिक मिलता है क्योंकि नदियों के जल से अनेक वस्तु सर कर मिट्टी से मिल जाती है प्रतिवर्ष मिट्टी की नई परत बीच जाने के कारण इस मिट्टी का प्राकृतिक रूप से नवीनीकरण होता रहता है अतः खाद देने की आवश्यकता नहीं होती है यह स्थानांतरित मिट्टियां होने के कारण उपजाऊ होती है।​

2.काली या लावा मृदा​

​ यह मिट्टी दक्षिण भारत के अलावा प्रदेश में (महाराष्ट्र मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग आंध्र प्रदेश के पश्चिमी भाग वह कर्नाटक के उत्तरी भाग, गुजरात व दक्षिण-पूर्व राजस्थान में पाई जाती है)

?भारत में लगभग 500000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में इसका विस्तार है। इस मिट्टी की विशेषता यह है। कि इसमें आद्रता बनाए रखने की अपूर्व क्षमता होती है। उन स्थानों की मिट्टियां जीवाणुओं की अधिकता के कारण उपजाऊ है। और लावा निर्मित होने के कारण इन में लोहा और एल्युमिनियम खनिजों का अंश अधिक है ।पोटाश और चूने का अंत अधिक होता ।है किंतु फास्फोरस की मात्रा कम होती है इसकी उर्वरा शक्ति अधिक है। और कपास की कृषि के लिए बहुत उपयुक्त है। इसलिए इसके कपास की काली मिट्टी की संज्ञा दी जाती है। इस मिट्टी को रेगर भी कहते हैं। इन में सिंचाई की आवश्यकता कब पड़ती है। और खाद का भी उपयोग कम ही करना पड़ता है ।सूखने पर यह मिट्टी खड़ी हो जाती है। और इनमे दरारें पड़ जाती है। नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटियों में इनकी परत 7 मीटर तक घर ही मिलती इसमें अब मूंगफली व गन्ने की खेती की जाने लगी है। और सिंचाई की सुविधा के परमाणस्वरूप उपज में अत्यधिक वृद्धि हुई है।​

 3. लाल मृदा​

​ ?इस मिट्टी की विशेषता यह है। कि यह छिद्रदार है। इसमें आद्रता बनाए रखने की क्षमता नहीं होती है इसलिए इस में सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है पर उपजाऊ नहीं होती है।

खाद के उपयोग से इसकी उत्पादकता बढ़ाई जाती है। इसका रंग भूरा और लाल होता है क्योंकि इसमें लोहे का अंश अधिक रहता है। इसमें कंकड़ भी पाए जाते हैं। किस मिट्टी में नाइट्रोजन फास्फोरस तथा जीवांश की कमी रहती है। चूने का अंश भी कम रहता है इसकी परत पतली होती है केवल नदी घाटियों में इसकी गहराई अधिक मिलती है इस मिट्टी में बार-बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। यह मिट्टी छत्तीसगढ़ ,छोटानागपुर, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक में मुख्य रूप से मिलती है।​

4. लैटेराइट मृदा​

​ ?यह पक्की ईंट जेसी लाल रंग की मिट्टी होती है। जिनमें कंकड़ों की प्रधानता रहती है। यह पुरानी चट्टानों के विखंडन से बनी होती है ।इन में लोहा और एल्युमीनियम की मात्रा अधिक होती है। किंतु चुना फास्फोरस नाइट्रोजन पोटाश और जीवांश की कमी रहती है। यह उन बातों से मिलती है जहां अधिक वर्षा होती है। साथ ही तापमान भी अधिक रहता है अधिक वर्षा के कारण सिलिका रसायनिक लवण तथा बारीक उपजाऊ कण बह जाते हैं ।इस मिट्टी के क्षेत्र ऊसर हैं। सूखने पर यह मिट्टी पत्थर की तरह खड़ी हो जाती है। यह मिट्टी मुख्य रूप से पश्चिमी घाट क्षेत्र में मिलती है। पूर्वी घाट के किनारे से राजमहल पहाड़ी और पश्चिमी बंगाल होते हुए असम तक इसकी संकरी पट्टी जाती है। इस पर चाय की खेती कब होती है। इस मिट्टी में कहीं-कहीं वृक्ष भी उगते हैं जिनसे इमारती लकड़ी प्राप्त की जाती है।​

 5. बलुई मृदा​

​ ?यह मिट्टी पश्चिम राजस्थान सौराष्ट्र व कच्छ की मरुभूमि में मिलती है। इसमें सारे तत्व की अधिकता होती है किंतु नाइट्रोजन आदि तत्व की कमी रहती है। शुष्क होने के कारण पौधों के द्वारा स्थानांतरित होती रहती है। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो जाने पर यह मिट्टी काफी उत्पादक सिद्ध होती है। हनुमानगढ़ गंगानगर व बीकानेर में कृषि की समृद्धि इसकी पुष्टि करती है। इसी से प्रेरणा लेकर इंदिरा गांधी नहर योजना पर तेजी से कार्य चल रहा है यह नाहर जैसलमेर के निकट मोहनगढ़ से आगे तक पहुंच गई है। इसके पूर्व हो जाने पर थार का मरुस्थल लहराने लगेगा।​

6. पर्वतीय मृदा​

?​यह मिट्टी हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में मिलती है। अपरिपक्व होने के कारण यह मिट्टी मोटे करने वाली व कंकड़-पत्थर युक्त तो होती है अंतः इसे अपरिपक्व मिट्टी कहां जाता है इसमें चुने के तत्व कम होते हैं यह मिट्टी अम्लीय होती है कुछ स्थानों पर किसकी परत मोटी है उन स्थानों पर आलू और चाय की कृषि की जाती है बारिश होने वाली मिट्टी में सीडीनुमा खेत बनाकर चावल की कृषि की जाती है कहीं-कहीं उपजाऊ मिट्टी वाले डालो पर चरागाह पाए जाते हैं​

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