Business Administration : Budget ( बजट प्रकार व उनके मूल सिद्धांत )

Business Administration : Budget

व्यावसायिक प्रशासन : बजट प्रकार व उनके मूल सिद्धांत 

अतिलघुतरात्मक (15 से 20 शब्द)

प्र 1. बजट को परिभाषित कीजिए ?

उत्तर- बजट वह प्रबंधकीय उपकरण है जिसके माध्यम से उपलब्ध संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करते हुए एक वित्तीय वर्ष के आय और व्यय के बारे में योजना बनाई जाती है।

प्र 2. बजटरी नियंत्रण से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर- बजटरी नियंत्रण का आशय है बजट के माध्यम से नियंत्रण करना। बजटरी नियंत्रण प्रबंध का एक महत्वपूर्ण यंत्र होता है। वस्तुतः यह नियोजन का एक साधन होता है जो समन्वय के द्वारा नियंत्रण तक पहुंचता है।

प्र 3. सूर्यास्त विधान क्या है ?

उत्तर- जब बजट में ही एक निश्चित समय सीमा के बाद वित्त आवंटन व्यवस्था को स्वतः ही रोकने का प्रावधान कर दिया जाता है तो उसे सूर्यास्त विधान कहते हैं।

प्र 4. जेंडर बजटिंग क्या तात्पर्य है ?

उत्तर-जब बजट के प्रावधानों में महिला सशक्तिकरण योजनाओं एवं कार्यक्रमों को अधिक महत्व दिया जाता है तो उस बजट प्रणाली को जेंडर बजटिंग कहते हैं।

लघूतरात्मक ( 50 से 60 शब्द )

प्र 5. निष्पादन बजट इन की अवधारणा स्पष्ट कीजिए ?

उत्तर- निष्पादन बजटिंग की शुरूआत संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई। यह परंपरागत बजटिंग के खर्चों की मात्रा पर अत्यधिक जोर देने की प्रतिक्रिया के स्वरूप हुई। जहां परंपरागत बजटिंग बजट में खर्चों की वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करती है वही निष्पादन बजटिंग खर्चों के बजाय उनसे प्राप्त होने वाले उद्देश्यों पर जोर देती है।

निष्पादन बजट में किसी कार्य या उद्देश्य को कार्य, कार्यक्रम क्रियाकलाप, योजना के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बजट प्रणाली में सुधार पर गठित अनुमान समिति के अनुसार- निष्पादन बजट कार्यों, क्रियाओं एवं परियोजनाओं पर आधारित वह बजट होता है जो कार्य निष्पादन के साधनों जैसे कार्मिक, आपूर्ति, संयंत्र आदि के स्थान पर निष्पत्ति एवं दी जाने वाली सेवाओं पर ध्यान केंद्रित करता है।

प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग के अनुसार निष्पादन बजटिंग धन के खर्च करने के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करता है तथा बजटिंग की यह प्रणाली बजट निर्माण में भी आसान है। यह प्रणाली ‘उद्देश्य द्वारा प्रबंध’ सिद्धांत पर आधारित है।

प्र 6. बजटीय नियंत्रण की सीमाओं का उल्लेख कीजिए। (100 शब्द )

उत्तर- 1. परिवर्तनशील परिस्थितियां – व्यापार चक्र, मुद्रास्फीति तथा बदलती हुई सरकारी नीतियों के कारण व्यावसायिक परिस्थितियां तेजी से परिवर्तित होती रहती है तथा व्यवसायिक अनिश्चितता बनी रहती है।

2. असंतुलित कार्यवाही– विभिन्न विभागों के प्रतिवेदनों में व्ययों की राशि का तो उल्लेख किया जाता है परंतु इस बात का उल्लेख नहीं होता है कि कितनी कुशलता से व्यय किया गया है।

3. लेखापाल की स्वतंत्रता का हनन – – बजट नियंत्रण प्रणाली में यह व्यवस्था होती कि एक बार बजट बन जाने के बाद उसकी सीमाओं में ही कार्य किया जा सकता है। इस प्रकार लेखापाल इन सीमाओं में बंध जाता है।

4. बजट प्रबंधकों का स्थानापन्न नहीं – – बजट एक साधन है साध्य नहीं। बजटरी नियंत्रण प्रणाली तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक प्रबंध इसके लिए पूर्ण रूप से प्रयत्न न करें।

5. आंतरिक संघर्ष– बजट निर्माण के समय प्रत्येक विभाग के प्रबंधक अपने विभाग के लिए अधिकतम सुविधाएं जुटाने का प्रयास करता है।

6. कागजी कार्यवाही– कभी-कभी बजट का निर्माण केवल नियम का पालन करने हेतु किया जाता है। इसका उचित ढंग से क्रियान्वित करने तथा इनकी सहायता से व्यवसायिक कार्यकुशलता में वृद्धि करने का कोई प्रयास नहीं किया जाता है। इस प्रकार बजट केवल कागजी कार्यवाही बनकर रह जाता है जो उचित नहीं है।

प्र 7. वर्तमान संदर्भ में राजकोषीय घाटे की स्थिति स्पष्ट कीजिए तथा भारतीय अर्थव्यवस्था के संबंध में राजकोषीय घाटे की स्थिति में सुधार के उपाय भी लिखिए। (150 शब्द)

उत्तर- वर्ष 2018-19 के बजट अनुमानों में राजस्व प्राप्तियों में 2017-18 के संशोधित अनुमानों की तुलना में 14. 6% वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। राजकोषीय घाटा 2017-18 के संशोधित अनुमानों में जीडीपी का 3. 5% है। (बजट अनुमानों के 3.2 प्रतिशत से अधिक) एवं 2018-19 के बजट अनुमानों में 3. 3 प्रतिशत (पूर्व में लक्ष्य 3. 5 से अधिक) रखा गया है।

राजकोषीय घाटे में सुधार के उपाय-

घाटे की वित्त व्यवस्था अपनाने के कारण भारत को मुद्रास्फीति, मूल्य वृद्धि, आर्थिक अपराध आदि समस्याओं का सामना करना पड़ा है। अतः हमें बजट नीति में घाटे की वित्त व्यवस्था अपनाते समय इन बातों का ध्यान रखना होगा ताकि देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव न पडे। इसलिए हमें राजकोषीय नीति में वांछित परिवर्तन करने होंगे तथा इन नीतियों को ईमानदारी व कुशलता से लागू करना होगा।

सरकार को अपने व्यय पर नियंत्रण करना होगा, सब्सिडी को न्याय संगत व विवेकपूर्ण बनाना होगा। आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाना होगा और मुद्रास्फीति पर नियंत्रण स्थापित करना होगा। वर्तमान में एन के सिंह की अध्यक्षता में भारत के राजकोषीय घाटे के संबंध में नई नीति निर्धारित करने के लिए एक समिति काम कर रही हैं।

राजकोषीय घाटे का जीडीपी से एक निश्चित अनुपात निर्धारित करने की बजाय इसकी एक सीमा तय कर दी जाए जिससे राजकोषीय घाटे को जीडीपी की एक विशेष सीमा के बीच रखने का प्रयास किया जा सकता है जिससे इसमें लचीलापन आ सकेगा। यदि राजकोषीय घाटा पूंजीगत व्यय की वृद्धि कारण होता है तो बुरा नहीं माना जाता है। अतः इसकी गुणवत्ता सुधारी जानी चाहिए।

08. बजट नियंत्रण के मूल सिद्धांत 

बजटीय नियंत्रण पद्धति को अपनाते समय निम्न सिद्धांतों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए-

1. अधिकार तथा उत्तरदायित्व दोनों ही साथ साथ उन विभागों को दिए जाने चाहिए जहां कार्य निष्पादित होता हो तथा साधनों का उपयोग किया जाता है।

2. नियोजित कार्यों के उचित निष्पादन एवं साधनों के उपयोग के लिए समय संबंधित अधिकारी को ही उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए परंतु यह उत्तरदायित्व उसके अधिकारों की सीमा तक ही सीमित होना चाहिए।

3. उत्तरदायी अधिकारियों को उनसे संबंधित कार्यों के नियोजन में अपनी राय देने का पूरा अधिकार होना चाहिए तथा उनकी राय को पूरा महत्व मिलना चाहिए।

4. अधिकारियों को कार्य करने का आदेश अपने से उच्च स्तर के अधिकारी से प्राप्त होना चाहिए। यह उच्च अधिकारी वही होना चाहिए जहां से उन्हें कार्य करने के साधन प्राप्त होते हैं। साथ ही उनका उत्तरदायित्व भी उसी उच्च अधिकारी के प्रति होना चाहिए।

5. वास्तविक निष्पादन का निश्चित समयान्तर के पश्चात माप किया जाना चाहिए तथा बजट लक्ष्यों से उनकी तुलना से ज्ञात विचरणों या अंतरों का निरंतर विश्लेषण किया जाना चाहिए।

6. प्रत्येक उत्तरदायी अधिकारी व कर्मचारी को उसके बजट से अच्छे निष्पादन के लिए पुरस्कृत किया जाना चाहिए तथा बुरे निष्पादन के लिए दंडित किया जाना चाहिए।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

दिनेश जी मीना, P K Nagauri

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