Master विश्व धरोहर में शामिल राजस्थान के पर्यटन स्थल
Join thousands of students accessing our vast collection of expertly curated tests, daily quizzes, and topic-wise practice materials for comprehensive exam preparation.
.1nk8s0hgo-y3u.png)
Join thousands of students accessing our vast collection of expertly curated tests, daily quizzes, and topic-wise practice materials for comprehensive exam preparation.
विश्व के सांस्कृतिक – ऐतिहासिक स्थलों को विरासत के रूप में संरक्षित रखने के लिए यूनेस्को द्वारा प्रतिवर्ष 18 अप्रैल को 'विश्व विरासत दिवस' भी मनाया जाता है। भारत के ऐतिहासिक महत्त्व के कुल 38 स्थल विश्व विरासत स्थल सूची में दर्ज हैं। इसमें 30 सांस्कृतिक, 7 प्राकृतिक और 1 मिश्रित श्रेणी की धरोहर है।
यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर सूची में अब तक (अक्टूबर 2019) राजस्थान के कुल चार स्थलों को शामिल किया गया जो इस प्रकार है–
इस अभयारण्य को 'एशिया की पक्षियों की सबसे बड़ी प्रजनन स्थली' एवं 'पक्षियों का स्वर्ग' माना जाता है। सर्दी की ऋतु में सैकड़ों वर्षों से करीब 365 प्रजातियों के प्रवासी पक्षी अफगानिस्तान, तुर्की, चीन, साइबेरिया तक से हजारों किलोमीटर का सफर तय करके यहां पहुंचते आए हैं। साइबेरियन सारस इस अभयारण्य मेंअक्टूबर-नवंबर माह में सर्दियां व्यतीत करने हेतु रूस से आते हैं और फरवरी के अंत अथवा मार्च के प्रारंभ में वापस प्रस्थान करते हैं।
देश के सभी पांच वेधशालाओं में जयपुर की वेधशाला सबसे बड़ी है।इतने वर्ष गुजर जाने के बावजूद इस वैद्यशाला के सभी प्राचीन लकड़ी, चूने, पत्थर और धातु से निर्मित यंत्र आज भी ठीक अवस्था में है, जिनके माध्यम से मौसम, स्थानीय समय, ग्रह नक्षत्रों और ग्रहण आदि खगोलीय परिघटनाओं की एकदम सटीक गणना आज भी की जा सकती हैं।
यहां के यंत्रों में 'सम्राट यंत्र' (जो एक विशाल सूर्य घड़ी हैं) 'जयप्रकाश यंत्र' और 'राम यंत्र' सर्वाधिक प्रसिद्ध है। जिनमें से सम्राट यंत्र सर्वाधिक ऊंचा धरती से करीब 90 फुट है जिसके माध्यम से पर्याप्त शुद्धता से समय बताया जा सकता है। सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित पांच वैद्यशालाओं में से आज केवल दिल्ली और जयपुर के जंतर मंतर ही शेष बचे हैं बाकी काल के गाल में समा गए हैं।
इस दुर्ग में विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ, मीरा मंदिर, पद्मिनी महल और शस्त्रागार प्रमुख हैं। यहां तीन इतिहास प्रसिद्ध साके क्रमशः 1303 ई. 1534 ई.एवं 1567 ई. में हुए।
1303 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने इसे जीतकर अपने पुत्र खिज्र खां को सौंपा एवं इसका नाम खिज्राबाद रखा।अकबर ने 1567 ईस्वी में चित्तौड़गढ़ के दुर्ग पर आक्रमण कर विश्व का सबसे बड़ा कत्लेआम किया। गोरा-बादल, नौलखा महल (बनवीर द्वारा निर्मित) और भीमलत कुंड दुर्ग में स्थित है। आठवीं शताब्दी के इस दुर्ग के बारे में कहा जाता है कि "गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया।"
अधूरा स्वप्न - रानी कर्मावती द्वारा रणथंभोर के किले में निर्मित भवन। महाराणा सांगा को खानवा के युद्ध में घायल होने के पश्चात इस दुर्ग में लाया गया था। मुगल काल में इस दुर्ग का उपयोग शाही कारागार के रूप में किया गया। इसमें राजस्थान के प्रथम जल जौहर व साके का उल्लेख मिलता है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पश्चात यह सर्वाधिक ऐतिहासिक महत्व का दुर्ग है। अबुल फजल ने इस किले के बारे में कहा है कि - "यह ना तो हाथों से बना था ना पानी और मिट्टी से, कल्पना की चिड़िया इसके ऊपर होकर नहीं निकली संसार में ऐसा दुर्ग दूसरा नहीं।"
इसके बारे में सम्पूर्ण जानकारियां प्राप्त करने के लिए - Click Here
यह दुर्ग संकटकाल में मेवाड़ के राजाओं की शरण स्थली था। यह दुर्ग अरावली की 13 पर्वत चोटियों से सुरक्षित हैं। यह 36 किलोमीटर लंबे तिहरे सुरक्षा परकोटे से सुरक्षित गिरा हुआ है, जो अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड में दर्ज हैं। इसकी सुरक्षा दीवार 7 मीटर चौड़ी है जिस पर एक साथ चार घुड़सवार चल सकते हैं। यह चीन की महान दीवार के बाद दुनिया की सबसे बड़ी महान दीवार है इसलिए इसे 'भारत की महान दीवार' कहते हैं।
कर्नल जेम्स टॉड ने कुंभलगढ़ की सुदृढ़ प्राचीरों, बुर्जों, कंगूरो की दृष्टि से इसकी तुलना एटरुक्सन से की हैं। दुर्ग के ऊपरी छोर पर राणा कुंभा का निवास स्थान व महाराणा प्रताप का जन्म स्थल है जो कटारगढ़ (मेवाड़ की तीसरी आंख) कहलाता है, यह बादल महल के नाम से भी प्रसिद्ध है। कुंभा स्वामी विष्णु मंदिर, मामादेव का कुंड, 12 स्तंभों की छतरी, हाथियागुढा की नाल यहां के दर्शनीय हैं। 12 स्तंभों की छतरी - महाराणा रायमल के कुंवर पृथ्वीराज की छतरी है। अपनी तेज धावक शक्ति के कारण 'उड़ना राजकुमार' के नाम से विख्यात हुए।
कुम्भलगढ़ दुर्ग के बारे और अधिक पढ़ने के लिए - Click Here
यह किला दूर से ऐसा लगता है मानो समुद्र में कोई विशाल जहाज लंगर डाले खड़ा हो। प्रातः काल और सूर्यास्त के समय सूर्य की लालिमा से यह दुर्ग सोने के समान चमकता हुआ प्रतीत होता है। यह दुर्ग बिना चूने के सिर्फ पत्थर पर पत्थर रखकर बनाया गया है। यहां महारावल अखेसिंह द्वारा निर्मित सर्वोत्तम शीश महल, गज विलास, जवाहर विलास, रंग महल, मोती महल स्थित है। बादल विलास या बादल महल का निर्माण सन 1884 ईस्वी में 'सिलावटों' ने करवाया। यह पांच मंजिला महल है।
इस किले में सबसे पुराना महल 'कदमी महल' है। दुर्ग में शिला माता का मंदिर है। इस मंदिर में स्थित शीला माता की मूर्ति को राजा मानसिंह बंगाल के शासक केदार से जीत कर लाए थे। बिशप हेबर ने आमेर के महलों की तुलना क्रेमलिन तथा अलब्रह्मा के महलों से की है। वर्तमान में यह दुर्ग पर्यटन विभाग के पास हैं और सांयकाल यहां 'लाइट एंड साउंड शो' चलता है। इस दुर्ग में दिलखुश महल, 24 रानियों का महल, बुखारा गार्डन, सुहाग मंदिर, मीना बाजार आदि हैं।
इसे पूर्व का पेरिस, रत्न नगरी, पन्ना नगरी, आइसलैंड ऑफ ग्लोरी (सी वी रमन के द्वारा), राजस्थान की हेरिटेज सिटी भी कहा जाता है। जयपुर कई शानदार किलों, महलों, मंदिरों और संग्रहालयों का घर हैं और स्थानीय हस्तशिल्प से भी भरा हुआ है। जयपुर में कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक पर्यटन स्थल है जो अपनी नैसर्गिक छटा के कारण देश विदेश के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं जो इस प्रकार हैं - सिटी पैलेस, हवामहल, जल महल, गलताजी, अल्बर्ट हॉल (म्यूजियम), जंतर-मंतर, जगत शिरोमणि मंदिर आमेर, आमेर की शिला माता का मंदिर, श्री गोविंद देव मंदिर, शाकंभरी माता का मंदिर, शील माता की डूंगरी चाकसू, जय निवास उद्यान, सवाई मानसिंह संग्रहालय, रामबाग, नाटाणी का बाग, गैटोर की छतरियां, ईसरलाट (सरगासूली), मुबारक महल, आमेर दुर्ग, जयगढ़ दुर्ग, नाहरगढ़ (सुदर्शनगढ़), चौमुंहागढ़ (चौमूं), माधोराजपुरा का किला।
Especially thanks to - मीना सोनी, चित्तौड़गढ़