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ब्रिटिश काल तक की भारत की वास्तु परम्परा

ब्रिटिश काल तक की भारत की वास्तु परम्परा

भारतीय इतिहास और संस्कृति में भारत की वास्तु परम्परा (Indian Architecture) का एक बेहद समृद्ध और गौरवशाली इतिहास रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता के नगर नियोजन से लेकर ब्रिटिश काल (British Era) के इंडो-सारसेनिक स्थापत्य तक, हमारी वास्तुकला ने हर दौर के सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को समेटा है। यह ब्लॉग पोस्ट विशेष रूप से RAS Mains Exam के पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है, जिसमें प्राचीन, मध्यकालीन और औपनिवेशिक काल की स्थापत्य शैलियों, जैसे मंदिर निर्माण, गुफा वास्तुकला, और महलों के प्रमुख तत्वों को कवर किया गया है। RPSC और अन्य राज्य व केंद्र स्तरीय प्रशासनिक परीक्षाओं (State and Central Govt Jobs) के साथ-साथ शिक्षण परीक्षाओं (Teaching Exams) के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण टॉपिक है। यहाँ दिए गए RAS Mains Questions, Practice Sets, और Quizzes आपके ज्ञान को बढ़ाने, उत्तर लेखन में सटीकता (accuracy) लाने और मुख्य परीक्षा में आपके प्रदर्शन को बेहतर बनाने में मददगार साबित होंगे। पूरी ऊर्जा और आत्मविश्वास के साथ अपनी तैयारी शुरू करें और सफलता की ओर कदम बढ़ाएं!

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भारतीय मंदिर स्थापत्य शैलियाँ

1. नागर शैली (उत्तर भारतीय शैली)

भौगोलिक विस्तार: हिमालय से लेकर विंध्य पर्वतमाला तक (उत्तरी भारत)

उत्पत्ति विकास: गुप्तकाल के संरचनात्मक मंदिरों (जैसे- देवगढ़ का दशावतार मंदिर, भीतरगाँव का ईंटों का मंदिर) से उत्पत्ति। चंदेल, सोलंकी, पाल (बंगाल) और ओडिशा के शासकों द्वारा संरक्षण।

प्रमुख विशेषताएँ:

1. चतुष्कोणीय (वर्गाकार) आधार: मंदिर का गर्भगृह चौकोर होता है।

2. रेखीय/वक्ररेखीय शिखर: शिखर ऊपर की ओर वक्र (Curved) होते हुए जाता है, जिसके शीर्ष पर 'आमलक' और 'कलश' होते हैं।

पंचायन शैली: मुख्य मंदिर के साथ चार कोने पर चार सहायक मंदिर।

प्रमुख उदाहरण:

  • खजुराहो के मंदिर (मध्य प्रदेश - चंदेल शासक)
  • कोणार्क का सूर्य मंदिर और पुरी का जगन्नाथ मंदिर (ओडिशा)
  • मोढेरा का सूर्य मंदिर (गुजरात - सोलंकी शासक)

2. द्रविड़ शैली (दक्षिण भारतीय शैली)

भौगोलिक विस्तार: कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी (कुमारी अंतरीप) तक।

संरक्षक राजवंश: पल्लव, चोल, चेर, चालुक्य और राष्ट्रकूट शासक।

प्रमुख विशेषताएँ:

1. पिरामिडाकार शिखर (विमान): नागर शैली के वक्र शिखर के विपरीत यहाँ मंजिला (Step-like) पिरामिड नुमा शिखर होता है जिसे 'विमान' कहते हैं।

2. गोपुरम: मंदिर का विशाल और भव्य प्रवेश द्वार।

3. अष्टभुजाकार आधार: गर्भगृह या संरचना का आधार प्रायः अष्टकोणीय होता है।

4. जलाशय: मंदिर परिसर के भीतर विशाल कल्याण मंडप और पानी का तालाब।

प्रमुख उदाहरण:

  • बृहदेश्वर/राजराजेश्वर मंदिर, तंजौर (चोल वास्तुकला का चरम, यूनेस्को धरोहर)
  • महाबलीपुरम के तटीय मंदिर (शोर टेंपल - पल्लव काल)
  • मीनाक्षी मंदिर, मदुरै (नायक/पांड्य काल)
  • कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम

चोल वास्तुकला (विशेष): 10वीं-11वीं शताब्दी में द्रविड़ शैली का चरमोत्कर्ष चोल काल में दिखा। इस काल के मंदिर केवल धार्मिक केंद्र थे, बल्कि सुंदर भित्तिचित्रों (Paintings), बारीक नक्काशी और कांस्य मूर्तियों (जैसे नटराज) के कारण आर्थिक सांस्कृतिक केंद्र भी थे।

3. बेसर शैली (दक्कन/मिश्रित शैली)

भौगोलिक विस्तार: विंध्य पर्वतमाला से लेकर कृष्णा नदी के बीच का क्षेत्र (दक्कन भारत)

विशेषता: यह नागर (उत्तर) और द्रविड़ (दक्षिण) दोनों शैलियों का मिश्रित रूप है। इसमें मंदिर का आधार द्रविड़ शैली जैसा और शिखर नागर शैली से प्रभावित होता है।

संरक्षक राजवंश: चालुक्य, राष्ट्रकूट और होयसल शासक।

प्रमुख उदाहरण:

1. एलोरा का कैलाश मंदिर (राष्ट्रकूट कृष्ण प्रथम द्वारा निर्मित, एकाश्मक पत्थर वास्तुकला)

2. ऐहोल का दुर्गा मंदिर (चालुक्य काल)

3. सोमनाथपुर का चेन्नाकेशव मंदिर (होयसल काल, कर्नाटक)

मूर्तिकला एवं मृदभांड संस्कृतियाँ (2-अंक और 5-अंक प्रश्न हेतु)

1. गांधार कला शैली (इंडो-ग्रीक शैली)

कालखंड: ईसा की प्रथम - द्वितीय शताब्दी (कुषाण शासक कनिष्क का काल)

भौगोलिक क्षेत्र: भारत का पश्चिमोत्तर क्षेत्र (आधुनिक वास्तुकला का केंद्र - पेशावर/गांधार)

विशेषताएँ: यह बौद्ध मूर्तिकला की एक विशिष्ट शैली है, जिसमें विषय-वस्तु 'भारतीय' (बुद्ध का जीवन) है, परंतु निर्माण की तकनीक 'यूनानी-रोमन' (Hellenistic) है। मूर्तियों में बुद्ध को लहराते बाल, मूंछें, और रोमन टोगा जैसे वस्त्रों में दिखाया गया है। नीले-धूसर शिस्ट पत्थर का प्रयोग हुआ है।

2. चमकीली लाल मृदभांड संस्कृति

कालखंड: लगभग 2000 .पू. से 1500 .पू.

मुख्य क्षेत्र: गुजरात का काठियावाड़ क्षेत्र (रंगपुर, लोथल)

महत्व: यह उत्तर-हड़प्पा कालीन संस्कृति है, जो हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों और नव-मृदभांड परंपरा के बीच एक क्रमिक/सांस्कृतिक कड़ी को दर्शाती है। इन बर्तनों की सतह चमकीली लाल होती थी।

3. काली-लाल मृदभांड परंपरा

कालखंड: लगभग 1100 .पू. से 800 .पू. (कुछ क्षेत्रों में यह ताम्रपाषाण काल से ही शुरू हो जाती है)

मुख्य क्षेत्र: गुजरात, सौराष्ट्र, राजस्थान का आहड़ (ताम्रवती नगरी), गंगा घाटी तथा दक्षिण भारत।

महत्व: यह संस्कृति भारत में आरंभिक ऐतिहासिक काल और लौह युग के आगमन की सूचक है। इन बर्तनों को उलटा करके पकाया जाता था, जिससे अंदर का भाग काला और बाहर का निचला भाग लाल हो जाता था।

RAS Mains परीक्षा के लिए सुझाव:

1. जब भी नागर और द्रविड़ शैली का प्रश्न आए, तो उत्तर पुस्तिका में भारत का एक छोटा सा मानचित्र (Map) बनाकर उनका भौगोलिक क्षेत्र (उत्तर, मध्य, दक्षिण) अवश्य दर्शाएं।

2. शैलियों की तुलना के लिए मुख्य विशेषताओं (शिखर, प्रवेश द्वार, गर्भगृह) के आधार पर एक छोटा सा तुलनात्मक बॉक्स/टेबल बना देना ज्यादा अंक दिलाता है।

Specially thanks to Post Author - दिनेश मीना झालरा टोंक 

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प्यारे साथियों, तैयारी के इस सफर में हर एक छोटा कदम आपको आपकी मंजिल के करीब ले जाता है! मुझे पूरा भरोसा है कि भारत की वास्तु परम्परा पर आधारित यह अभ्यास सत्र आपकी RAS Mains और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को एक नई मजबूती देगा। अपनी कंसिस्टेंसी (consistency) बनाए रखिए, क्योंकि निरंतर प्रयास ही सफलता की असली चाबी है।

आपको यह कैसे लगे? हमें comment करके अपना feedback जरूर दें, क्योंकि आपके विचार हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। अगर आपको यह पोस्ट मददगार लगी हो, तो इसे अपने उन सभी फ्रेंड्स और फैमिली मेंबर्स के साथ जरूर share करें जो सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे ही और भी शानदार क्विज, प्रैक्टिस सेट्स और स्टडी मटेरियल सीधे अपने मोबाइल पर पाने के लिए अभी 9015746713 पर WhatsApp करें और हमारे साथ जुड़ें। सकारात्मक रहें, खुद पर विश्वास रखें और पूरी ऊर्जा के साथ आगे बढ़ते रहें। ऑल द बेस्ट!

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