India’s Religious Movement भारत के धार्मिक आंदोलन और धर्म दर्शन

India’s Religious Movement and Religion Philosophy

प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के धार्मिक आंदोलन और धर्म दर्शन

प्र 1. बोधिसत्व से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर- बुद्ध के जन्मों के लिए प्रयुक्त, वह जो विश्व कल्याण के लिए कार्य करता है तथा जिसने स्वेच्छा पूर्वक जन्म मरण के चक्र से मुक्ति का त्याग कर दिया हो।

प्र 2. 4 सोम यज्ञों का उल्लेख कीजिए ?

उत्तर- प्राचीन भारत में अग्निष्ठोम, अत्यग्निष्ठोम, अतिरात्र तथा वाजपेय ये चार सोम यज्ञ थे।

प्र 3. शंकराचार्य 

उत्तर- 788 ईसवी में केरल में जन्मे शंकराचार्य ने वेदांत दर्शन ‘अद्वैतवाद का मत प्रतिपादित किया था। उन्होंने उत्तर भारत में केदारनाथ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में जगन्नाथ पुरी तथा पश्चिम में द्वारिका चार मठ स्थापित किए।

प्र 4. सत्तारी सिलसिला ?

उत्तर- सत्तारी सिलसिला की स्थापना लोदी काल में 1485 ईस्वी में सैयद अब्दुल्लाह सतारी के द्वारा की गई। सैयद अब्दुल्ला ने कहा कि जो भी ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है वह मेरे पास आए, मैं उसको ईश्वर तक पहुंच जाऊंगा।

प्र 5. अलवार संतो के बारे में बताइए ?

उत्तर- तमिलनाडु के मध्ययुगीन 12 वैष्णव संत जो भक्ति रस में डूबे रहते थे, अलवार कहलाए। ‘प्रबंधम’ नामक आदर प्राप्त तमिल ग्रंथ में इनके गीतों का संग्रह है।

लघूतरात्मक ( 50 से 60 शब्द )

प्र 6. सूफी एवं भक्त संतो के उपदेशों में समानताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर- सूफी मार्गियों एवं भक्ति मार्गियों इन दोनों ने ही क्रमशः मुस्लिम और हिंदू कट्टरवादिता का खंडन किया। फारसी, अरबी और संस्कृत के बदले लोक भाषाओं में उपदेश दिया। आध्यात्मिक रहस्यवाद, ईश्वर के एकेश्वरवाद, ईश्वर के प्रति संपूर्ण आत्मसमर्पण, गुरु की सर्वोच्चता, पवित्र व सादा जीवन, ईश्वर के प्रति प्रेम, ईश्वर नाम स्मरण एवं प्रार्थना आदि तत्व सूफी और भक्ति संतों में समान रूप से दिखाई दिए।

प्र 7. हीनयान और महायान में दार्शनिक मतभेद क्या है ?

उत्तर- हीनयान से तात्पर्य निम्न मार्गी, बुद्ध एक महापुरुष के रूप में, मोक्ष व्यक्तिगत प्रयासों से, मूर्ति पूजा व बुद्ध की भक्ति में विश्वास नहीं, पाली भाषा का प्रयोग, अर्हत रूपी आदर्श पद प्राप्त करना।

  1. महायान से तात्पर्य उच्च मार्गी, परोपकार पर विशेष बल, बुद्ध देवता रूप में, बुद्ध की मूर्ति पूजा, आदर्श बोधिसत्व, संस्कृत भाषा का प्रयोग।
  2. महायान अवसरवादी, भक्ति वादी ,अवतार वादी है जबकि हीनयान में इसका स्थान नहीं है।
  3. हीनयान का आधार दार्शनिकता व अपरिवर्तनशीलता है जबकि महायान व्यावहारिक व परिवर्तनशील है।
  4. हीनयान में निर्वाण व्यक्तिगत जबकि महायान में विश्ववादी भावना है।
  5. हीनयान प्रज्ञा पर जोर देता है जबकि महायान करूणा पर।
  6. हीनयान स्वाभाविक रूप से कठोर जबकि महायान उदार है।
  7. हीनयान के अधिकांश ग्रन्थ पाली में जबकि महायान के संस्कृत में है।
  8. हीनयान बुद्ध की मूर्ति पूजा व भक्ति द्वारा मोक्ष की बात नहीं करता जबकि महायान का आधार यही है।

प्र 8. षड्दर्शन से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर-
1. सांख्य दर्शन– प्रवर्तक महर्षि कपिल (सांख्य शास्त्र) है। इसमें कारण वाद व अनेकात्मवाद है। अन्य विद्वान ईश्वर कृष्ण, भिक्षु वाचस्पति है।
2. योग दर्शन- प्रवर्तक महर्षि पतंजलि है। इसके अनुसार आत्मा का परमात्मा के साथ मिलन ही योग है। अन्य विद्वान व्यास है।
3. न्याय दर्शन- प्रवर्तक गौतम है। यह विश्लेषणात्मक तार्किक दर्शन है। अन्य विद्वान वात्सायन, उद्योतकार, उदयानाचार्य, जयंत भट्ट है।
4. वैशेषिक- प्रवर्तक महर्षि कणाद है। इसमें परमाणु वाद का सिद्धांत है। अन्य विद्वान प्रशस्त वाद, केशव मिश्र, विश्वनाथ, अन्नभट्ट है।
5. मीमांसा दर्शन- प्रवर्तक जैमिनी (मींमासा सूत्र) हो। वैदिक कर्मकांडों की दार्शनिक महता। अन्य विद्वान शब्बर स्वामी, प्रभाकर, कुमारिल भट्ट है।
6. वेदांत दर्शन- प्रवर्तक बादरायण (वेदांत सूत्र) है। अद्वैतवाद व द्वैतवाद का उल्लेख है। अन्य विद्वान शंकराचार्य, वाचस्पति, सदानंद, रामानुज, मध्वाचार्य है।

प्र 9. भक्ति के विचार अथवा भाव के स्रोत के बारे में लिखिए। भक्ति आंदोलन का भारतीय समाज पर क्या प्रभाव पड़ा ? ( निबन्धात्मक )

उत्तर- भक्ति के विचार की आद्यऐतिहासिक पुष्टि तो सिंधु कालीन अवशेषों से ही हो जाती है किंतु वैदिक संस्कृति में यह विचार निश्चित रूप से लोकप्रिय हुआ क्योंकि गीता में मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्ग- ज्ञान कर्म और भक्ति बताए गए हैं। व्यक्ति का संबंध चूंकि नैतिक आचरण से था। इसलिए बुद्ध ने वैदिक प्रभुत्व के विरुद्ध अपने आंदोलन में सबसे पहले नैतिक आचरण या भक्ति को संकेंद्रित किया।

बुद्ध के भक्ति भाव को शंकराचार्य ने ज्ञान के स्तर से खंडित किया और इसके बाद ज्ञान और नैतिक आचरण के रूप में भक्ति का संघर्ष प्रारंभ हो गया। रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णु स्वामी आदि ने भक्ति मार्ग को सामान्यतः सगुण की दिशा में मोड़ दिया। निर्गुण एकेश्वरवाद की धारा भी बहती रही। इस्लाम के आगमन के साथ ही संस्कृति की सुरक्षा, संरक्षण और विकास संबंधी आवश्यकताओं ने भक्ति आंदोलन का मध्यकालीन स्वरूप विकसित किया।

भारतीय समाज पर प्रभाव-

  1. सार्वभौम मानवता के आधार पर लोक धर्म और संस्कृति के समस्त सूत्रों को इकट्ठा किया।
  2. मानववाद के साथ व्यक्तिवाद को जोड़ा।
  3. निम्न वर्ग में आध्यात्मिक चेतना का स्फूरण।
  4. पूजा अर्चना पद्धति एवं जाति व्यवस्था का सरलीकरण।
  5. हिंदू-मुस्लिम विषमता में कमी।
  6. प्रांतीय भाषाओं में साहित्य का विकास।
  7. सगुण एवं निर्गुण भक्ति के समुद्देशीय प्रतिमान।
  8. निराशावादी वातावरण में हिंदू समाज में नव स्फूर्ति एवं नवजागरण का संचार।
  9. हिंदुओं में धर्म, संस्कृति और सामाजिक सुरक्षा भाव एवं राष्ट्रीय भावना की जागृति।
  10. सिखों, जाटों, सतनामियों एवं मराठों का राजनीतिक उदय।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri, रजनी जी तनेजा

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