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Master मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय: 'कलम के सिपाही' की अनकही कहानी

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मुंशी प्रेमचंद(Munshi Premchand)


1880 -- 1936
मुंशी प्रेमचंद का जन्म बनारस के गांव लूंगी में हूआ I  

उनका असल नाम धनपतराय था I गांव के लोग नवाबराय 

भी कहते थे इनके दादा गुरु शाही लाल पटवारी थे I पिता अजय 

लाल डाकखाने में मुंशी थे I
माता का नाम आनंदी देवी था

शिक्षा
प्रेमचंद की शुरूआती पढ़ाई गांव के मदरसे में हुई दसवीं पास करने के बाद 1899 में बनारस के करीब चुनारगढ़ केक मिशन स्कूल में सहायक अध्यापक के रूप में नौकरी लगी चिनार मिशन स्कूल के बाद जुलाई 1920 बहराइच के जिला स्कूल में स्थाई अध्यापक के रूप में लगे इसी साल सहायक प्रथम श्रेणी अध्यापक कउनका तबादला प्रतापगढ़ हो गया अध्यापक प्रशिक्षण की वाह कायदा शिक्षा हासिल करने की गरज से इलाहाबाद के शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज में दाखिला लिया और प्रथम श्रेणी से डिग्री हासिल की इसी दौर में उन्होंने हिंदी उर्दू स्पेशल वर्नाक्यूलर ट की परीक्षा भी पास कर ली ट्रेनिंग के बाद 1904 में इलाहाबाद के एक मिडिल स्कूल में हेड मास्टर रहे 1905 पूर्व 1905 में कानपुर के जिला स्कूल में मास्टर की हैसियत से तबादला हो गया 1909 में महुआ जिला हमीरपुर यूपी के लिए तबादला हो गया और पढ़ाने की बजाय उन्हें स्कूल के निरीक्षण का काम सौंपा l
महुआ रहने के दौरान 1916 में 12वीं उत्तीर्ण की और 1919 में गोरखपुर में रहते हुए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से प्राइवेट के रूप में b.a. का इम्तिहान पास किया गोरखपुर के जलसे में महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर 1920 में सरकारी नौकरी समाज सेवा और लेखन का कार्य शुरु कर दिया

प्रेमचंद का साहित्य में योगदान
प्रेमचंद को कहानियां लिखने का शौक बचपन से था उनके द्वारा लिखी गई पहली प्रति एक ड्रामा था जो उन्होंने लगभग 13 साल की उम्र में लिखा था इसका विषय था "एक मामू का रुमाल "यह ड्रामा छपा नहीं|
प्रेमचंद जी का प्रथम उपन्यास Asrare majbid ( देवस्थान रहस्य) बनारस से प्रकाशित होने वाले उर्दू अखबार आवाज ए खल्क में 8 अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक धारावाहिक के रूप में आने लगा था इस पर लेखक का नाम धनपतराय उर्फ नवाबराय इलाहाबादी लिखा जाता था I

1996 कृष्णा उपन्यास प्रकाशित होता है जिसमें अंग्रेजी को शासन की निंदा की गई है प्रेमा और कृष्णा बाद में कुछ परिवर्तित रूप में क्रमश "प्रतिज्ञा "और "गबन "नाम से 1922-30 में प्रकाशित किए गए हैं |

प्रेमचंद का दूसरा नोवेल हम खुर्मा  व हम शबाब है जॉब 1996 कानपुर से दयानारायण निगम ने जारी किया| वह एक मासिक पत्रिका जमाना भी जारी करते थे जिसने प्रेमचंद के बहुत से नावेल कहानियां निबंध जारी हुए |

1907 के पारम में प्रेमचंद ने अपनी प्रथम कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रतन" लिखी जो उसी वर्ष जमाना में प्रकाशित हुईं |

1908 के अंत भाग में प्रेमचंद जी का प्रथम कहानी संग्रह सोजे वतन प्रकाशित हुआ इसमें वह "शेख मखमूर" " यही मेरा वतन है "  "संसारिक प्रेम" और "देशप्रेम"  आदि कहानियां संकलित है |

1910 तक उन की कहानियां निबंध नोवेल नवाब राय के नाम से छपती रही | प्रेमचंद की कहानियों का पहला भाग सोजे वतन भी नवाब राय के नाम से जारी हुआ लेकिन जब अंग्रेज सरकार को महसूस हुआ की इन की कहानियां वतन से मोहब्बत और आजादी हासिल करने की सोच लोगों में पैदा कर रही है तो सरकार ने इनकी सभी कहानियों को जप्त कर लिया पूछताछ के बाद कलेक्टर ने प्रेमचंद से कहा कि उनकी कहानियों से राजद्रोह की बू आती है वह कहता है की " thank your stars that you live under British empire. Your hands would have been chopped if it were mogul rule.

सोजे वतन की 29000 गोपिया छपी थी इनमें से 320 चुकी थी बाकी बची गोपियों को प्रेमचंद के सामने कलेक्टर ने आग लगा दी|

इस प्रकार बरसों की मेहनत से नवाब राय के नाम से जो शोहरत पाई थी उसे छोड़ना पड़ा और 1910 अक्टूबर-नवंबर में निगम जी द्वारा सुझाया गया प्रेमचंद नाम धारण कर लेते हैं और उसी नाम से जीवन पर्यंत लिखते है|

इस नाम से से उनकी प्रथम कहानी " बड़े घर की बेटी" के नाम से छपती है यह कहानी जमाना में दिसंबर 1910 में प्रकाशित हुई थी |

प्रेमचंद की कहानियां
1. दुनिया का सबसे अनमोल रतन (1907)
2. सांसारिक प्रेम और देशप्रेम (अप्रैल 1908)
3. शेख मखमूर (1909 से पूर्व)
4. शोक का पुरस्कार  (1909 से पूर्व)
5. बड़े घर की बेटी (दिसंबर 1910)
6. आखिरी मंजिल (सितंबर 1911)
7. नसीहतों का दफ्तर( जून 1912)
8. धर्मसंकट ( 1913)
9. अनाथ लड़की (जून 1914)
10. अपनी करनी (अक्टूबर 1914)
11. गैरत की कटार (1915)
12. जुगनू की चमक (1916)
13. मर्यादा की बेटी (दिसंबर 1917)
14. वफा का खंजर (19 18)
15. सब देसी (1919)
16. मृत्यु के पीछे (जून 1920)
17.l बूढ़ी काकी  (सितंबर 1921)
18. हार की जीत (जनवरी 1922)
19. हजरत अली (1923)
20. नमक का दरोगा
21. शतरंज के खिलाड़ी.
22. दो बैलों की कथा.
23. कफन
24. पंच परमेश्वर
25. सदा गति

प्रेमचंद की नोवेल
प्रेमचंद नोवेल और कहानीकार की हैसियत से मशहूर हुए इन को उर्दू अफसाना निगारी का  बादशाह कहा जाता था l
"गोदान".  "निर्मला" "गबन" "बाजारे हुस्न" "कवरदान"  "कायाकल्प" "प्रेमश्रम" इनके मशहूर नावेल है|

प्रेमचंद ने साहित्यकार के कर्तव्य के प्रति लिखा है कि"??"साहित्यकार का काम मन बहलाना नहीं है यह तो बांटो और मदारियों का काम है साहित्यकार का काम इससे कई बड़ा है वह हमारा पथ प्रदर्शक होता है वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है  हमने सद्भाव का संचार करता है हमारी दृष्टि को फैलाता है कम से कम उसका यही उद्देश्य होना चाहिए""

प्रेमचंद के विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहा जा सकता है*  "" प्रेमचंद शताब्दियों से दलित और अपमानित कृषकों की आवार ते पर्दे में कैद लांछित और अपमानित सहाय नारी जाति की महिमा के जबरदस्त वकील थ""

प्रेमचंद  के जीवन का अंतिम समय
प्रेमचंद पाचन क्रिया की शिकायत के कारण अक्सर बीमार रहते थे अपनी मृत्यु से 1 दिन पहले तक वह स्वस्थ हैं दूसरे दिन उनकी पत्नी ने डॉक्टर की सलाह के अनुसार प्रेमचंद को मांस की Akhni  खिला दी जिस कारण उन का हाजमा खराब हो गया और उन्हें खून की उल्टियां होने लगी इस  तरह भारत के महान साहित्यकार प्रेमचंद ने 8 अक्टूबर 1936 को अपनी अंतिम सांस ली I

पुरस्कार
1...  प्रेमचंद पुरस्कार महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की ओर से साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले साहित्यकार को  दीया जाता है I इसमें ₹25000 नकद स्मृति चिन्ह दीया जाता है|

2...  उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा बी प्रेमचंद स्मृति पुरस्कार दिया जाता है|

हिंदी और उर्दू साहित्य के बेताज बादशाह मुंशी प्रेमचंद भारतीय साहित्य जगत का वह चमकता सितारा हैं, जिन्होंने साहित्य को महलों और राजा-रानियों की कहानियों से निकालकर खेत-खलिहानों और आम आदमी की समस्याओं से जोड़ा। उन्हें 'उपन्यास सम्राट' और 'कथा सम्राट' जैसी उपाधियों से नवाजा गया है। आइए, उनके प्रेरणादायक जीवन, संघर्ष और महान साहित्यिक योगदान पर एक नज़र डालते हैं।


मुंशी प्रेमचंद: जन्म और प्रारंभिक जीवन (1880 – 1936)


मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही नामक गाँव में हुआ था।


मूल नाम: धनपत राय श्रीवास्तव।


उपनाम: नवाब राय (उर्दू लेखन के लिए) और बाद में 'प्रेमचंद'


पारिवारिक पृष्ठभूमि: उनके दादा गुरु सहाय लाल एक पटवारी थे और पिता अजायब लाल डाकखाने में मुंशी थे। उनकी माता का नाम आनंदी देवी था।


प्रेमचंद का बचपन अभावों में बीता। जब वे मात्र 8 वर्ष के थे, तब उनकी माता का देहांत हो गया और 15 वर्ष की आयु में पिता भी चल बसे। इन संघर्षों ने उनके लेखन को एक गहरी संवेदनशीलता और यथार्थवाद (Realism) प्रदान किया।


शिक्षा और संघर्षपूर्ण करियर


प्रेमचंद की शुरुआती शिक्षा गाँव के मदरसे में हुई जहाँ उन्होंने उर्दू और फारसी सीखी।


शिक्षण कार्य: 1899 में चुनारगढ़ के एक मिशन स्कूल में सहायक अध्यापक के रूप में मात्र ₹18 वेतन पर नौकरी शुरू की।


शैक्षिक उपलब्धि: नौकरी के साथ-साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। 1919 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी, दर्शनशास्त्र और इतिहास विषयों के साथ बी.. (B.A.) की डिग्री प्राप्त की।


प्रशासनिक पद: शिक्षा विभाग में रहते हुए वे स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर (सब-डिप्टी इंस्पेक्टर) के पद तक पहुँचे।


गांधीजी का प्रभाव और त्याग


1920 में गोरखपुर में महात्मा गांधी के एक भाषण से प्रभावित होकर, प्रेमचंद ने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया ताकि वे पूरी तरह से देश सेवा और लेखन कार्य में जुट सकें।


साहित्यिक सफर: नवाब राय से प्रेमचंद तक


प्रेमचंद को बचपन से ही कहानियाँ पढ़ने और लिखने का शौक था। 13 वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला नाटक "एक मामू का रुमाल" लिखा था।


सोजे-वतन और अंग्रेजों की कार्रवाई


1908 में उनका पहला कहानी संग्रह 'सोजे-वतन' (राष्ट्र का विलाप) प्रकाशित हुआ। इसमें देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत कहानियाँ थीं। अंग्रेज सरकार ने इसे 'राजद्रोही' मानकर इसकी 700 प्रतियाँ जब्त कर लीं और सार्वजनिक रूप से जलवा दीं।


कलेक्टर की चेतावनी: "भाग्य मनाओ कि तुम ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो, अगर मुगलों का शासन होता तो तुम्हारे हाथ काट दिए जाते।"


इस घटना के बाद, अपने मित्र दयानारायण निगम के सुझाव पर उन्होंने 'प्रेमचंद' नाम अपना लिया ताकि वे बिना किसी सरकारी बाधा के लिख सकें।


 


प्रेमचंद की प्रमुख कृतियाँ (Books & Stories)


प्रेमचंद ने लगभग 300 कहानियाँ और 12 से अधिक उपन्यास लिखे। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी 100 साल पहले थीं।


लोकप्रिय उपन्यास (Novels)


उपन्यास - मुख्य विषय


गोदान - भारतीय किसान का जीवन और ऋण की समस्या (उनका सर्वश्रेष्ठ उपन्यास) |


गबन - मध्यम वर्ग की दिखावे की प्रवृत्ति और आभूषण प्रेम |


निर्मला - अनमेल विवाह और दहेज प्रथा की त्रासदी |


रंगभूमि - औद्योगिकीकरण और ग्रामीण समाज का संघर्ष |


सेवा सदन - नारी जीवन और वेश्यावृत्ति की समस्या |


अमर कहानियाँ (Short Stories)


प्रेमचंद की कहानियाँ 'मानसरोवर' (8 भाग) में संकलित हैं। कुछ प्रमुख कहानियाँ निम्नलिखित हैं:


1.  कफन: गरीबी और अमानवीयता का चरम चित्रण।


2.  पूस की रात: किसान की लाचारी की मार्मिक कथा।


3.  नमक का दरोगा: ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक।


4.  ईदगाह: छोटे बालक हामिद का अपनी दादी के प्रति त्याग।


5.  पंच परमेश्वर: न्याय और मित्रता का संतुलन।


6.  दो बैलों की कथा: पशुओं का प्रेम और स्वतंत्रता का मूल्य।


साहित्य के प्रति दृष्टिकोण


प्रेमचंद के अनुसार, साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है। उन्होंने लिखा है:


"साहित्यकार का काम केवल मन बहलाना नहीं है, वह तो मदारी का काम है। साहित्यकार का काम हमारा पथ-प्रदर्शन करना है, हमारे भीतर मनुष्यत्व को जगाना है और हमारे सद्भाव का संचार करना है।"


आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनके बारे में सही कहा था कि प्रेमचंद शोषित किसानों और अपमानित नारी जाति के सबसे सशक्त वकील थे।


अंतिम समय और विरासत


लंबे समय तक पेट की बीमारी (जलोदर) से जूझने के बाद, 8 अक्टूबर 1936 को इस महान साहित्यकार का निधन हो गया। अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले तक वे अपने अंतिम उपन्यास 'मंगलसूत्र' को पूरा करने की कोशिश कर रहे थे, जिसे बाद में उनके पुत्र अमृत राय ने पूरा किया।


सम्मान और पुरस्कार


आज भी प्रेमचंद के नाम पर साहित्य के क्षेत्र में प्रतिष्ठित पुरस्कार दिए जाते हैं:


प्रेमचंद पुरस्कार: महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा ₹25,000 की राशि के साथ दिया जाता है।


प्रेमचंद स्मृति पुरस्कार: उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान के लिए दिया जाता है।


मुंशी प्रेमचंद आज भी अपनी रचनाओं के माध्यम से जीवित हैं। उनकी सादगी और यथार्थवादी लेखन शैली उन्हें विश्व के महानतम लेखकों की श्रेणी में खड़ा करती है।

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