Local Governance स्थानीय स्वशासन

Local Governance

स्थानीय स्वशासन

भारत में स्थानीय स्वशासन के दो प्रकार हैं

  1. ग्रामीण स्थानीय स्वशासन  ( Rural local Governance )
  2. नगरीय स्थानीय स्वशासन  ( Urban local Governance )

ग्रामीण स्थानीय स्वशासन को पंचायती राज के नाम से जाना गया पंचायती राज का आदर्श स्वरुप चोल साम्राज्य में विद्यमान था आल्टेकर ने भारतीय गांव को छोटे-छोटे गणराज्य की संज्ञा दी है

विकास ( Development )

सर्वप्रथम 1686 में मद्रास में नगर निगम की स्थापना की गई 18 मई 1882 को लॉर्ड रिपन के द्वारा स्थानीय स्वशासन प्रस्ताव पारित किया गया जिसे स्थानीय स्वशासन का मैग्नाकार्टा कहा जाता है

नोट – लॉर्ड रिपन को स्थानीय स्वशासन का जनक कहा जाता है

1919 के भारत शासन अधिनियम द्वारा स्थानीय स्वशासन को वैधानिक दर्जा दिया गया तथा इसे हस्तांतरित विषय के अंतर्गत रखा गया जिसका उत्तरदायित्व भारत सचिव का था

1935 के अधिनियम द्वारा स्थानीय स्वशासन को प्रांतीय सूची का विषय बनाया गया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 के द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि राज्य ग्राम पंचायतों का गठन करेंगे

नोट – स्थानीय स्वशासन राज्य सूची का विषय है

सामुदायिक विकास कार्यक्रम 

  • 2 अक्टूबर 1952 
  • उद्देश्य  – विकास कार्यक्रमों में ग्रामीण जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना

बलवंत राय मेहता समिति

  • गठन जनवरी 1957 (योजना आयोग द्वारा)
  • उद्देश्य – सामुदायिक विकास कार्यक्रम के क्रियान्वयन की समीक्षा करना तथा लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण हेतु इस समिति ने अपनी सिफारिशें 14 नवंबर 1957 को प्रस्तुत की सिफारिशें त्रिस्तरीय पंचायती राज का गठन किया जाए

ग्राम स्तर ग्राम पंचायत

खंड स्तर पंचायत समिति

जिला स्तर जिला परिषद्

जिला कलेक्टर को जिला परिषद का सभापति होना चाहिए, ग्राम पंचायतों की स्थापना प्रत्यक्ष रूप से चुने प्रतिनिधियों द्वारा होनी चाहिए इन संस्थाओं का कार्यकाल 3 वर्ष होना चाहिए इस समिति की सिफारिशों को 1 अप्रैल 1958 को लागू किया गया

त्रिस्तरीय पंचायती राज का शुभारंभ

  • 2 अक्टूबर 1959
  • स्थान बगदरी गांव नागौर राजस्थान
  • दूसरा राज्य आंध्र प्रदेश 11 अक्टूबर 1959
  • उद्घाटनकर्ता तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू
  • तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण मंत्री शैलेंद्र नाथ
  • राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाडिया
  • राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल गुरुमुख निहाल सिंह
  • राजस्थान पंचायती राज का सूत्रधारक भगवंत सिंह मेहता (तत्कालीन मुख्य सचिव)
  • पंचायती राज व्यवस्था का जनक बलवंत राय मेहता

पंचायती राज के लिए गठित समितियां

  1. सादिक अली अध्ययन दल 1964 (राजस्थान सरकार)
  2. गिरधारी लाल व्यास समिति 1973 (राजस्थान सरकार)
  3. अशोक मेहता समिति 1977 (मोरारजी देसाई सरकार)
  4. जी वी के राव समिति 1985 (योजना आयोग द्वारा)
  5. लक्ष्मीमल सिंघवी समिति 1986 (राजीव गांधी सरकार द्वारा)
  6. पी के थुंगन समिति 1988 (राजीव गांधी सरकार द्वारा)

1. सादिक अली समिति 1964 – पंचायत समिति के प्रधान जिला प्रमुख का निर्वाचन एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाए

2. गिरधारी लाल व्यास 1973 – ग्राम सेवक की नियुक्ति की जाए तथा पंचायतों को पर्याप्त धन दिया जाए

3. अशोक मेहता समिति 1977 – इस समिति में राजस्थान से इकबाल नारायण को शामिल किया गया

सिफारिशें –

  • द्विस्तरीय पंचायती राज की सिफारिश
  • जिला स्तर पर जिला परिषद
  • मंडल स्तर पर मंडल पंचायत 15- 20000 हजार जनसंख्या पर है
  • पंचायती राज संस्थाओं का निर्वाचन राजनीतिक दलों के माध्यम से किया जाए
  • अनुसूचित जाति व जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में तथा महिला वर्ग को आरक्षण
  • पंचायती राज मंत्री की बात कही
  • पंचायती राज व्यवस्थाओं में स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका बढ़ाई जाए
  • कर लगाने का अधिकार दिया जाए

4. जी वी के राव समिति – ग्रामीण विकास एवं गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम की प्रशासनिक व्यवस्था हेतु योजना आयोग द्वारा गठित

सिफारिशें – 

  • चार स्तरीय पंचायती राज की सिफारिश
  • जिला आयुक्त का पद सृजित किया जाए
  • राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाए
  • पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल 8 वर्ष किया जाए

नोट – इस समिति में पंचायत राज संस्थाओं को बिना जड़ की घास की संज्ञा दी

5. लक्ष्मीमल सिंघवी समिति 1986 – लोकतंत्र विकास में पंचायती राज संस्थाओं का पुनरुत्थान

सिफारिशें – 

  • पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की जाए
  • स्थानीय स्वशासन को सरकार का तीसरा स्तर घोषित किया जाए
  • गांव के समूह के लिए न्याय पंचायत का गठन किया जाए

नोट- इस समिति ने ग्राम सभा को प्रत्यक्ष लोकतंत्र की मूर्ति कहा है

इस समिति की सिफारिश पर पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने हेतु राजीव गांधी सरकार द्वारा 64 वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित करवाया जो राज्यसभा में पारित नहीं हो सका

6. पी के थुंगन समिति 1988 – पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया जाए

इस समिति की सिफारिश पर 65 वां संविधान संशोधन विधेयक 1990 वी पी सिंह सरकार द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत किया गया लेकिन पारित नहीं हो सका और सरकार गिर गई

  • पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने हेतु पी वी नरसिम्हा राव सरकार द्वारा 72 वां संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया
  • इस विधेयक पर विचार विमर्श हेतु नाथूराम मिर्धा (तत्कालीन नागौर सांसद) की अध्यक्षता में संसद की एक संयुक्त प्रवर समिति गठित की गई
  • इस समिति की सिफारिशों पर 22 दिसंबर 1992 को लोकसभा में एवं
  • 23 दिसंबर 1992 को राज्यसभा द्वारा यह अधिनियम 73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा पारित हुआ
  • 17 राज्यों के अनुमोदन के पश्चात 20 अप्रैल 1993 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा द्वारा इस अधिनियम पर हस्ताक्षर किए गए
  • 24 अप्रैल 1993 को यह अधिनियम मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली व मणिपुर के कुछ पहाड़ी इलाकों को छोड़कर संपूर्ण देश में लागू हुआ

नोट – इस अधिनियम के तहत सर्वप्रथम कर कर्नाटक 25 अप्रैल 1993 राज्य द्वारा पंचायती राज अधिनियम लागू किया गया

प्रतिवर्ष 24 अप्रैल को पंचायती राज दिवस के रुप में मनाया जाता है राजस्थान में पंचायती राज अधिनियम 1994 23 अप्रैल 1994 को लागू हुआ

राजस्थान पंचायत राज अधिनियम 1996  30 दिसंबर 1996 को लागू हुआ

73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा भारतीय संविधान में भाग 9 पंचायत नाम से तथा अनुच्छेद 243 – 243(O) और एक नई अनुसूची ग्यारहवीं जोड़ी गई जिसमें पंचायती राज संस्थाओं के लिए 29 विषय निर्धारित किए गए

नोट – राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं को 21 विषय 29 दिसंबर 2010 तक है प्रदान कर दिए गए हैं

प्रावधान या विशेषताएं

  • अनुच्छेद 243 परिभाषाएं
  • जिला ग्राम सभा मध्यवर्ती स्तर (राज्यपाल द्वारा निर्धारित)
  • पंचायतें पंचायत क्षेत्र तथा ग्राम (राज्यपाल द्वारा निर्धारित)

अनुच्छेद 243 (A)  ग्राम सभा

  • प्रत्येक वयस्क नागरिक (18 वर्ष) जिनका मतदाता सूची में पंजीकरण हो ग्राम सभा की सदस्य होंगे
  • प्रत्यक्ष लोकतंत्र की दूसरी सबसे छोटी इकाई ग्राम सभा
  • प्रत्यक्ष लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई वार्ड सभा

अनुच्छेद 243 (B) पंचायतों का गठन

  • त्रिस्तरीय पंचायती राज की व्यवस्था
  • 20 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्यों में मध्यवर्ती स्तर पर पंचायतों का गठन नहीं किया जाएगा

अनुच्छेद 243 (C) पंचायतों की संरचना

  • विधानमंडल द्वारा निर्धारित की जाएगी सभी सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने जाएंगे
  • जिला मध्यवर्ती स्तर पर अध्यक्षों का निर्वाचन सदस्यों में से ही सदस्यों द्वारा किया जाएगा
  • ग्राम स्तर पर पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित तरीके से किया जाएगा

अनुच्छेद 243 (D) स्थानों का आरक्षण

  • SC ST को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण
  • महिलाओं को एक तिहाई से कम आरक्षण नहीं होगा
  • अध्यक्ष पदों पर महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिया जाएगा
  • विधानमंडल पिछड़े वर्गों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था करेगा

नोट- राजस्थान में 27 अगस्त 2009 को महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था 50% कर दी गई है

अनुच्छेद 243(E) पंचायतों की अवधि

  • कार्यकाल 5 वर्ष (प्रथम अधिवेशन से)

अनुच्छेद 243 (F) अयोग्यता

  • ऐसा कोई व्यक्ति जो 25 वर्ष की आयु पूर्ण नहीं कर चुका वह अयोग्य नहीं होगा
  • जबकि उसकी न्यूनतम आयु 21 वर्ष है

अनुच्छेद 243 (G) पंचायतों की शक्तियां/ प्राधिकार/ उत्तरदायित्व

अनुच्छेद 243 (H) कर लगाने की शक्ति

अनुच्छेद 243 (I) राज्य वित्त आयोग

  • राज्यपाल प्रत्येक 5 वर्ष के लिए गठित करेगा
  • प्रथम वित्त आयोग 1995 – अध्यक्ष कृष्ण कुमार गोयल
  • दूसरा वित्त आयोग 2000  – अध्यक्ष हीरालाल देवपुरा
  • तीसरा वित्त आयोग 2005 – अध्यक्ष माणिक चंद सुराणा
  • चौथा वित्त आयोग 2010 – अध्यक्ष बी डी कल्ला
  • पांचवा वित्त आयोग 2015 – अध्यक्ष ज्योति किरण

अनुच्छेद 243 (J) पंचायतों के लेखा परीक्षण ( विधानमंडल द्वारा उपबंध)

अनुच्छेद 243 (K) राज्य निर्वाचन आयोग

राज्यपाल पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव संपन्न करवाने हेतु एक राज्य निर्वाचन आयोग का गठन करेगा जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त होगा जिसकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उन्ही आधारों वह प्रक्रिया द्वारा हटाया जा सकेगा जिस प्रकार से उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जा सकता है

नोट – मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के बाद उसकी सेवा शर्तों में कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग का राज्य में प्रतिनिधि राज्य निर्वाचन अधिकारी के नाम से जाना जाता है

अनुच्छेद 243 (L) संघ राज्य क्षेत्रों में इस अधिनियम का लागू होना

अनुच्छेद 243 (M) अनुसूची 5 में वर्णित क्षेत्रों में इसका लागू न होना

अनुच्छेद 243(O ) निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक

न्यायालयों को इस बात का अधिकार नहीं होगा कि अनुच्छेद 243 के के अधीन निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन वह स्थानों के आवंटन संबंधी किसी विधि की वैधानिकता की जांच करें

अध्यक्ष व उपाध्यक्ष को पद से हटाना – अविश्वास प्रस्ताव द्वारा एक तिहाई सदस्यों के प्रस्ताव पर है 15 दिन की पूर्व सूचना पर ऐसा प्रस्ताव लाया जा सकेगा यदि ऐसा प्रस्ताव मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के तीन चौथाई बहुमत से पारित हो जाता है तो अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाना पड़ेगा

ऐसा प्रस्ताव यदि पारित हो जाता है तो हटाया गया व्यक्ति 5 वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ सकेगा और यदि ऐसा प्रस्ताव पारित नहीं हुआ तो पुनः 1 वर्ष से पहले ऐसा प्रस्ताव नहीं लाया जा सकेगा ऐसा प्रस्ताव निर्वाचन की तिथि से 2 वर्ष पूर्व तक नहीं लाया जा सकेगा

नोट- तीन चौथाई बहुमत व 2 वर्ष तक प्रस्ताव की व्यवस्था पंचायती राज अधिनियम 2001 द्वारा 2010 में की गई

21 नवंबर 1995 के पश्चात किसी व्यक्ति के तीसरी संतान होने पर चुनाव लड़ने के अयोग्य माना जाता है यदि कोई संसद या विधानमंडल का कोई सदस्य है पंचायत राज संस्थाओं में से किसी एक में सदस्य है या अध्यक्ष चुन लिया जाता है तो उसे 30 दिन के भीतर संसदीय विधानमंडल या पंचायती राज संस्था में से हैं किसी एक से त्यागपत्र देना होगा

नोट – वार्ड सभा की 1 वर्ष में न्यूनतम 2 बैठकें होना आवश्यक है  ग्राम सभा की वर्ष में दो बैठकें होना आवश्यक है लेकिन राजस्थान में सामान्यतः 4 बैठकें आयोजित की जाती हैं

  1. 26 जनवरी
  2. 1 मई
  3. 15 अगस्त
  4. 2 अक्टूबर

ग्राम सभा की बैठकों की अध्यक्षता सरपंच द्वारा और उसकी अनुपस्थिति में उपसरपंच द्वारा की जाती है

नोट – पेसा एक्ट (पंचायती राज विस्तार अधिनियम) 1996 भाग 9 अनुसूची 5 में वर्णित क्षेत्रों पर लागू नहीं होता लेकिन फिर भी संसद इन प्रावधानों को कुछ अपवादों तथा संशोधनों द्वारा उक्त क्षेत्रों में लागू कर सकती है

वर्तमान में राज्य में पांचवी अनुसूची के क्षेत्र आते हैं

1. राजस्थान
2. आंध्र प्रदेश
3. गुजरात
4. हिमाचल प्रदेश
5. झारखंड
6. मध्य प्रदेश
7. महाराष्ट्र
8. उड़ीसा

  • ग्राम सभा के लिए गणपूर्ति 1 / 10
  • स्थानीय निकाय के लिए गणपूर्ति एक तिहाई
  • राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 2015

राजस्थान में पंचायती राज चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता और शौचालय अनिवार्य संबंधी विधेयक लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना है

  • यह अधिनियम सरपंच पद के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता आठवीं उत्तीर्ण
  • अनुसूचित क्षेत्रों के लिए 5 वी उत्तीर्ण
  • पंचायत समिति जिला परिषद के लिए 10 वीं उत्तीर्ण
  • वार्ड पंच के लिए 5 वी उत्तीर्ण

पंचायती राज संस्थाओं से संबंधित विषय

  1. कृषि जिसमें कृषि विस्तार सम्मिलित है
  2. भूमि विकास भूमि सुधार लागू करना भूमि संगठन व भूमि संरक्षण
  3. लघु सिंचाई जल प्रबंधन और नदियों के मध्य का भूमि विकास
  4. पशुधन दुग्ध का व्यवसाय तथा मुर्गी पालन
  5. मछली उद्योग
  6. वन्य जीवन तथा वनों में कृषि
  7. लघु वन उत्पादन
  8. लघु उद्योग जिसमें खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी शामिल है
  9. खादी ग्रामीण कुटीर उद्योग
  10. ग्रामीण विकास
  11. पेयजल
  12. इंधन व चारा
  13. सड़क पुल नदी तट जलमार्ग तथा संचार के साधन
  14. ग्रामीण विद्युत एवं बिजली विभाजन
  15. गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोत
  16. गरीबी उन्मूलन
  17. शिक्षा प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा के विद्यालय
  18. तकनीकी प्रशिक्षण व्यावसायिक शिक्षा
  19. प्रौढ़ अनौपचारिक शिक्षा
  20. पुस्तकालय एवं वाचनालय
  21. सांस्कृतिक गतिविधियां
  22. मेले बाजार
  23. स्वास्थ्य से संबंधित संस्थाएं अस्पताल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आदि
  24. परिवार कल्याण
  25. महिला एवं बाल विकास
  26. समाज कल्याण विशेषकर मानसिक विमंदित दिव्यांगों का शामिल
  27. समाज के कमजोर वर्ग विशेषकर अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के कल्याण व समृद्धि के कार्य
  28. सार्वजनिक वितरण प्रणाली
  29. सार्वजनिक संपत्तियों की देखरेख

नगरीय निकाय

74वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के द्वारा नगरीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया इस संविधान संशोधन के द्वारा संविधान में एक नया भाग (भाग 9 क) नगर पालिका के नाम से तथा अनुच्छेद 249 P से अनुच्छेद 249 ZG तक तथा एक नई अनुसूची 12 वीं अनुसूची जोडी गयी जिसमे 18 विषय (243W) निर्धारित किये गए ह

  • अनुच्छेद 243 P परिभाषाए
  • अनुच्छेद 243 Q नगरपालिकाओ का गठन
  • अनुच्छेद 243 R नगरपालिकाओ की संरचना
  • अनुच्छेद 243 S वार्ड समितियों का गठन व संरचना
  • अनुच्छेद 243 T स्थानों का आरक्षण
  • अनुच्छेद 243 U कार्यकाल
  • अनुच्छेद 243 V निर्योग्यताए
  • अनुच्छेद 243 W शक्तियाँ व क्षेत्राधिकार
  • अनुच्छेद 243 X कर लगाने की शक्ति
  • अनुच्छेद 243 Y राज्य वित्त आयोग
  • अनुच्छेद 243 Z लेखा परीक्षण
  • अनुच्छेद 243 ZA राज्य निर्वाचन आयोग
  • अनुच्छेद 243 ZB संघ शासित प्रदेशो में लागु होना ( राष्ट्रपति द्वारा )
  • अनुच्छेद 243 ZC अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति क्षेत्रो में इसका लागु न होना
  • अनुच्छेद 243 ZD जिला आयोजना समिति
  • अनुच्छेद 243 ZE महानगरीय आयोजना समिति
  • अनुच्छेद 243 ZF विद्यमान विधियों और नगरपालिकाओं का बने रहना
  • अनुच्छेद 243 ZG निर्वाचन मामलो में न्यायालय के हस्तक्षेप से रोक

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

सुभाष शेरावत

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