PALI

“राजस्थान उच्च कोटि का प्रदेश है । इसका इतिहास अत्यंत रोचक और प्रेरणास्पद है। स्वतंत्रता के लिए यहां वीर राजाओं ने ही अपना सर्वस समर्पण नहीं किया अपितु साधारण कोटि के इन्सानों ने भी देश निर्माण के लिए प्रतिज्ञा की हैं कि जब तक अपना स्वराज्य का साम्राज्य कायम नहीं होगा तब तक हम थोड़ा सा भी आराम और साधन सुविधाओं का भी शौक नहीं भोगेंगे। इस प्रकार यह वीरभूमि है, जहां स्वतंत्रता का बीज कभी मुरझाया नहीं ।”  👉 पंडित गोविंद बल्लभ पंत।


“जब जब भी मैंं राजस्थान की वीर प्रसूता धरती पर कदम रखता हूं । मेरा हृदय कांप उठता है कि कहीं मेरे पैर के नीचे किसी वीर की समाधि ना हो, किसी वीरांगना का थान न हो ।” 👉 रामधारी सिंह दिनकर । 


“जब भी मैं राजस्थान आता हूं। मेरा मन पुराने जमाने की ओर चला जाता है । राजस्थान का इतिहास वीरता की गाथा  का प्रतिबिम्ब रहा है।” 👉 पंडित जवाहरलाल नेहरु ।


“राजस्थान वासियों ने चारों और अंधकार को प्रकाश में प्रदीप्त किया। राजस्थान का एक एक पत्थर वीरता के इतिहास से भरा हुआ है । बलिदानों के सुनहरे कारनामों से भरा हुआ है। राजस्थान की पुरानी कीर्ति आज भी हमारे दिल को अभिमान, हर्ष, और उत्साह से भर देती है । आज उसी राजस्थान में नई दुनिया के योग्य नया इतिहास बनाने का अवसर प्राप्त हैं ।” 👉 सरदार वल्लभ भाई पटेल । 


“भारतीय संस्कृति के निर्माण में राजस्थान का प्रमुख स्थान हैं। प्रकृति की देन के कारण ही यहां के लोग एक होकर लोक संस्कृति के कई रूपों से जुड़ गए। राजस्थान की संपूर्ण संस्कृति और संस्कार संजीवनी लोक से प्राप्त होती हैं। इसी कारण यह धरा अद्वितीय हैं। राजस्थान के लोग सुसंस्कृत तथा मृदु भाषी हैं ।” 👉 जैन मुनि विद्यानंद जी । 


“इतिहास साक्षी है कि राजस्थान कि इस पवित्र भूमि ने ऐसे वीर सपूतों को जन्म दिया है , जो संकटों से कभी घबराएं नहीं और जिन्होंने अपने देश अपने संस्कृति और अपने पूर्वजों की पवित्रता तथा अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता व अखंडता की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। पद्मिनी का जौहर, हल्दीघाटी का युद्ध, झाला राजा का आत्म बलिदान, भामाशाह का दान,वीर तेजाजी जैसे वचनों के पक्के (प्राण जाय, पर वचन न जाय), धन्ना और मीरा की भक्ति, क्षेत्रपाल दुर्गादास व पन्ना की स्वामी भक्ति तथा भीलों द्वारा राणा प्रताप के परिवार की रक्षा आधी प्रेरक प्रसंग राजस्थान की उज्जवल परंपरा के रोमांचकारी स्मरण को याद करवाते रहते हैं ।” 👉 डॉ मुरली मनोहर जोशी ।


🏀🔹 पाली का सामान्य परिचय 🔹🏀

🔸राज्य-राजस्थान (भारत)
🔹प्रशासनिक प्रभाग- जोधपुर संभाग
🔸मुख्यालय-पाली
🔸क्षेत्रफल- 12,386 वर्ग कि.मी.
🔻▪भौगोलिक स्थिति- 24॰-45॰26’उत्तरी अंक्षाश 72॰47′-74॰18’पूर्वी देशान्तर
🔹साक्षरता दर(%)- 62.4 %
*👨🏻‍💼साक्षरता दर(%)-*76.8%
*👩‍💼साक्षरता दर(%)-*48.0%


🔅पाली में राष्ट्रीय राजमार्गों की संख्या-(3) NH-65, NH-112, NH-14
🔅मुख्य रेलवे स्टेशन-पाली व मारवाड़ जंक्शन
*🔅एसटीडी कोड-*02932
*🔅पिनकोड-*306401
*🔅वाहन पंजीकरण संख्या-*RJ-22
🔅आधिकारिक भाषाएं-हिन्दी एवं मारवाड़ी।


🔹🔸 जिले में प्रशासनिक दृष्टि से 10 तहसिले और 10 ही पंचायत समितियां हैं। 4 उपखण्ड कार्यालय हैं। तहसील व पंचायत समिति 👉  1.बाली 2 देसूरी 3 जैतारण 4 रायपुर 5 पाली 6 रोहट 7 मारवाड़ जंक्शन 8 सोजत 9 सुमेरपुर 10 रानी।


🔸  2011 की जनगणना के अनुसार पाली की जनसंख्या
पुरुष जनसंख्या 1025422
महिला जनसंख्या 1012151
योग  2037573
🔸 जनसंख्या घनत्व 164
🔸 लिंगानुपात  987
( राजस्थान में तीसरा स्थान)
🔸 0-6 आयु की जनसंख्या  297434  कुल जनसंख्या का 14.60 %
🔸 दशकीय जनसंख्या वृद्धि 11.9%


🏀🔻 तापमान 🔻🏀
▪ अधिकतम तापमान 44.2 सेल्सियस
▪ न्यूनतम तापमान -1.2 सेल्सियस
▪ वार्षिक वर्षा  41.64 सेमी
▪🔻 भूमि
कुल भौगोलिक क्षेत्र 1233 वर्ग हैक्टेयर


🔹🔻 कृषि क्षेत्रफल
अनाज 294 हैक्टेयर
दाले 44 हैक्टेयर
तिलहन 171 हैक्टेयर
कपास 20 हैक्टेयर
गन्ना – नगण्य


▪🔸 सिंचाई
साधनों के अनुसार विशुद्ध सिंचाई क्षेत्र  156296 हैक्टेयर


🔹🔻 कुएँ
कुल कुएँ – 49414
नलकूप – 8517


🔹🔻 पशुधन
पशुधन – 2803895
कुक्कुट – 72904


🔹🔻 उद्योग
पंजीकृत कारखाने – 656


🔸▪ सड़कें
कुल सड़कें – 5610
मोटर वाहन की पंजीकरण संख्या – 82882


🔸▪ संचार सुविधाएं
पोस्ट ऑफिस – 378
टेलीफोन एक्सचेंज केन्द्र – 129


🏀🔅 जलवायु 🔅🏀
इस जिले की जलवायु में तेज गर्मी अल्पवर्षा ठंडा शीतकाल और केवल मानसून के स्वर्ण काल को छोड़कर हवा के शुष्कता वाले लक्षण पाए जाते हैं । आधे नवंबर से लेकर फरवरी के अंत तक सर्दी का मौसम रहता है। इसके बाद कृष्ण काल का आगमन हुआ है , जो जून माह के अंत तक चलता है । फिर दक्षिण पश्चिम मानसून का मौसम होता है। जो लगभग आधे सितंबर तक रहता है। इसके बाद वाले 1 महीने को मानसून के बाद का अथवा जाती हुई मानसून का काल कहा जा सकता है । क्योंकि वक्त से दिन और रात दोनों के तापमान में तेजी से बदलाव होता है। उस समय न्यूनतम तापमान पानी के जमाव बिंदु से 2 या 3 डिग्री नीचे तक चला जाता है।

🏀🔸 हवाऐं 🔸🏀
सामान्यतः हवाएं हल्की से मध्यम तक होती हैं । किंतु गर्मी में और प्रारंभिक दक्षिण पश्चिम मानसून के मौसम में तेज हवाएं भी चलती है । वह मानसून के मौसम में पश्चिम से दक्षिण पश्चिमी हवाएं प्रभावित होती हैं । वर्षा काल के बाद में वह शीतकाल के महीनों में हवा का रुख प्रमुख रुप से पश्चिम और उत्तर के बीच रहता है । गर्मी के मौसम में हमें दक्षिण पश्चिम व उत्तर पश्चिम दिशाओं के बीच प्रभावित होती है।

🏀🔸 आद्रता 🔸🏀
केवल दक्षिण पश्चिम मानसून के अल्प काल के दौरान सापेक्ष आद्रता समय तक रहती हैं । वर्ष के बाकी दिनों में हवा शुष्क होती हैं । गर्मी के मौसम में जो कि वर्ष का सबसे गर्म होता है । दोपहर के समय आद्रता सामान्यतः 30% से नीचे रहती है।


⚜🔅 पाली का इतिहास एवं भूगोल 🔅
इस जिले का नामांकरण पाली नगर के आधार पर किया गया। प्राचीन काल में इस नगर को पालिका कहा जाता था । यह जिला 24 डिग्री 45′ व 26 डिग्री 29′ उत्तरी अक्षांश और 72 डिग्री 47′ व 74 डिग्री 18′ पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है । इसके उत्तर में जोधपुर व नागौर जिला, उत्तर-पूर्व में अजमेर दक्षिण पूर्व में उदयपुर जिला और राजसमंद जिला दक्षिण-पश्चिम जालौर व सिरोही जिला , पश्चिम में बाड़मेर जिला स्थित है । इसका क्षेत्रफल 12386 वर्ग किलोमीटर है । क्षैत्रफल की दृष्टि से पाली जिले का राजस्थान में 9वाँ स्थान हैं।


🏀 प्रमुख पर्वत श्रेणियाँ 🏀
इस जिले में अरावली की पहाड़ियां स्थित है । किसी भी पहाड़ी की उचाई महत्वपूर्ण नहीं है ।

पाली तहसील में स्थित पहाड़ियों के नाम इस प्रकार  हैं 👉 मनियारी, बालासोर , सोरावास , केरला , बुमाद्रा, चोटिला भोरी ,भाकरी वाला, हेमावास। 

सोजत तहसील की प्रमुख पहाड़िया इस प्रकार हैं 👉 माताजी की भाखरी, नरसिंह जी की भाकरी, धोलागर का भाकर, नीम की भाकरी ,धारेश्वर की भाखरी, खोड़िया व रायरा तथा गजनाई के भाकर, देसूरी नाल, करमाल भाकरी, भील बेरी, जेतारण सब डिवीजन के अंतर्गत बर, मेघड़दा, सेन्दड़ा, निमाज गिरी, सुमेल और रास में भी छोटी छोटी पहाड़ियां बिखरी हुई है ।


🏀  प्रमुख नदियां 🏀
पाली जिले की प्रमुख नदियां इस प्रकार हैं ।
लीलरी नदी 👉 यह नदी अरावली पर्वत श्रेणियों से निकलती हैं और पाली जिले के जैतारण तहसील के सुमेल और रास नामक गांव से प्रवाहित होती हुई दक्षिण पश्चिम की ओर मुड़ जाती हैं । सुकड़ी से मिलती हुई है निमाज से होकर प्रवाहित होती हैं और निम्बोल नामक गांव के निकट लूणी से मिल जाती है । इसी नाम की एक दूसरी नदी अरावली पर्वत से निकलती हैं और गोरिया एवं बोयल नामक गांव से प्रवाहित होती हुए लगभग 45 किलोमीटर की दूरी तय करती है।

सुकड़ी नदी 👉  यह नदी जयसुरी के दक्षिण में स्थित अरावली पर्वत से निकलती हैं और रानी गुडा एंदला और कानोर नामक गांव में प्रभावित होती हैं। पाली जिले में यह लगभग 130 किलोमीटर बहती हैं । इसी नाम की एक दूसरी नदी भी पाली जिले में ही बहती है यह नदी अरावली पर्वत से निकलती हैं और हरियामाली,बगड़ी नगर, सियाट, सोजत और गागुड़ा से होकर प्रवाहित होती हैं और सरदारसमन्द बांध में जाकर गिरती हैं।

बांडी नदी 👉  यह नदी अरावली पर्वत से निकलती हैं और फुलाद, मिथोरा, कालान, भटकते फेकारिया और पाली से होकर निकलती हैं । पाली में इसकी जल का उपयोग वस्त्रों की रंगाई हेतु किया जाता है । यह नदी पाली जिले में लगभग 118 किलोमीटर तक बहती है ।

जवाई नदी 👉 यह नदी  सिरोही जिले से पाली जिले में प्रवेश करती हैं और लगभग 66 किलोमीटर तक प्रवाहित होती हैं। एरनपुरा में इस नदी पर जवाई बांध का निर्माण किया गया है।


🏀 झीले एवं तालाब  🏀
इस जिले में झीलों का अभाव है, यद्यपि यहां सिचाईं के उद्देश्य से अनेक तालाबों और बांधों का निर्माण किया गया है। जवाई बांध, रायपुर बांध , गजनाई बांध, लूणी बांध , हेमावास बांध, खारडा बांध, बिराटिया खुर्द बांध, कंटालिया बांध आदि जिले के प्रमुख बांध है ।


🏀 महत्वपूर्ण स्थल 🏀
रणकपुर 👉  यह स्थान महाराणा कुंभा के शासन काल में निर्मित जैन मंदिरों के लिए विख्यात है ।  रणकपुर जैन मंदिर उदयपुर के महाराणा कुंभा के शासनकाल में उनके मंत्री धरण शाह ने शिल्पी देपा से इस विशाल एवं भव्य चतुर्मुखी मंदिर का निर्माण करवाया था । इसमें 1444 विशाल खंबे हैं । जिनकी बनावट एक दूसरे से भिन्न है। इसका निर्माण 15वीं शताब्दी में हुआ। 

परशुराम गुफा 👉 यह स्थान सादड़ी से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अरावली पर स्थित हैं । जनश्रुति के अनुसार ऋषि परशुराम ने यहा पर तपस्या की थी । यहां शिवरात्रि एवं श्रावण माह में मेला लगता है

सालेश्वर महादेव 👉 यह स्थान पाली के गुड़ा प्रताप सिंह गांव के निकट स्थित सालेश्वर महादेव नामक प्राचीन तीर्थ स्थल के लिए प्रसिद्ध है । 
जवाई बांध 👉  यह जिले का सबसे बड़ा बांध है जो पेयजल की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा बांध और मारवाड़ का अमृत सरोवर कहा गया है।

जूना खेड़ा 👉  यह गांव नाडोल कस्बे के निकट स्थित हैं। चौहानों की प्राचीन राजधानी रही। यहा पर 8 वीं एवं नवीं शताब्दी के अनेक स्थल दर्शनीय हैं।  जूना खेड़ा चौहान वंश के क्षत्रियों की प्राचीन राजधानी रहा था। इसका इतिहास आठवीं व  9 वीं शताब्दी का रहा। कालांतर में इसका नाम नाडोल हो गया । यही पर  सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर सोलंकियों से युद्ध करते हुए शहीद हुए।

निम्बो का नाथ 👉  पांडवों की माता कुंती इसी स्थान पर शिव पूजा किया करती थी।

सोमनाथ मंदिर 👉 इसका निर्माण गुजरात के राजा कुमारपाल सोलंकी ने विक्रम संवत 1209 में करवाया।

चामुण्डा मंदिर 👉  निमाज कस्बे में राजा भोज का बनाया हुआ प्राचीन चामुंडा माता का मंदिर पुरातात्विक महत्व का प्रमुख स्थल है।

नाथ निरजंन कुटीर 👉में मेहन्दी नगरी सोजत के समीप नेशनल हाइवे पर स्थित  चन्डावल नगर में पश्चिमी राजस्थान के साईनाथ से विख्यात परम् श्रद्धेय, प्रातः वन्दनीय व स्मरणीय ब्रह्मलीन गुरुदेव वासुदेव जी महाराज का परम धाम हैं। महारात्री (गुरुदेव का जन्मदिन) और गुरुपुर्णिमा पर भव्य बरसी व धार्मिक समारोह का आयोजन होता है जो हजारों की तादाद में भक्त देश के कोने कोने से गुरूवर के धाम पर पहुंचते हैं।

नवगज पीर बाबा 👉 सरसमन्द बांध की तलहटी में बाबा की समाधि और मजार है, जहा हिन्दू और मुस्लिम दोनों मज़हब के भक्त लोग आते हैं।

मस्तान बाबा 👉 यहकलक्टर स्थल  पाली शहर से नये बस स्टैण्ड की तरफ जाते समय बायीं तरफ आता है।

आशापुरा माता 👉 यह नाडोल में स्थित है। यह भी पवित्र स्थान हैं जहा हजारों श्रद्धालू भक्त आते हैं।

ओम बन्ना 👉 यह पाली से जोधपुर वाले हाइवे मार्ग पर रोहट के समीप स्थित है। इन्हें बुलट वाला बाबा भी कहते हैं।

कर्माबाई का मन्दिर 👉 पाली जिले का एकमात्र कर्माबाई का मन्दिर सोजत में अवस्थित है।


🏀🔻 पाली जिले के मेले 🔻🏀
रामदेव जी का मेला 👉  रामदेव जी का मेला पाली जिले में रायपुर क्षेत्र के बिराटिया खुर्द गांव में प्रतिवर्ष भादवा शुक्ला एकादशी को पड़ता है।


 लोक संस्कृति
पाली जिले के पादरला गांव का 13 ताल लोक नृत्य देश विदेश में विख्यात है अन्य लोक नृत्य में मुंडारा की कच्छी घोड़ी नृत्य उसी कारण नित्य माता की दांडी भील युवतियों का घूमर गरासियों का गणगौर नृत्य एवं गवरी नृत्य आदि प्रमुख नृत्य है


मेले 
परशुराम महादेव मेला 👉 देसूरी क्षेत्र में स्थित परशुराम महादेव की प्राकृतिक गुफा एवं परशुराम जयंती श्रावण शुक्ला सप्तमी पर भारी मेला भरता है।

निंबो का नाथ मेला  👉नींबों के नाथ स्थल पर वैशाखी पूर्णिमा शिवरात्रि को मेला भरता हैं ।
सोनाणा खेतलाजी का मेला सारंगवास गांव में सोना जी खेतला जी का दो दिवसीय लक्खी मेला प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भरता है इसमें 7 से 70 गैर नृत्य दल अपनी पारंपरिक एवं विचित्र वेशभूषा में ढोल थाली तथा चंग के साथ गैर और लोक नृत्य प्रस्तुत करते हैं।

बरकाना का मेला 👉 जैन धर्मावलंबियों का यह मेला रानी के पास बरकाना जैन तीर्थ पर प्रतिवर्ष पौष सुदी 10 को भरता है ।

चोटिला में पीर दुलेशाह का मेला 👉  यह मेला जोधपुर पाली रेलवे लाइन पर केरला रेलवे स्टेशन के पास हजरत पीर की मजार पर दिवाली के दूसरे दिन भरता है ।

अन्य महत्वपूर्ण मेले
गोरिया गणगौर मेला , महादेव मेला, भाकरी मेला , बजरंग बाग, फूल मंडी मेला , हनुमान मेला, महालक्ष्मी मेला, खिवाड़ा तथा चंडावल का पशु मेला ,मावली पशु मेला, मानपुरा भाकरी पशु मेला, नया गांव चोपड़ा पशु मेला  आनंदपुर कालू में पशु मेला , ओम बन्ना पाली और जोधपुर के मध्य रोहट ओम बन्ना का पवित्र स्थान है जहां पर देश विदेश से लाखों भक्तों आते हैं।
सोमनाथ मंदिर का निर्माण गुजरात के राजा कुमारपाल सोलंकी ने विक्रम संवत 1209 में करवाया था । चामुंडा मंदिर निमाज कस्बे में राजा भोज का बनाया हुआ प्राचीन चामुंडा माता का मंदिर पुरातात्विक महत्व का प्रमुख स्थल है।
जूना खेड़ा चौहान वंश की प्राचीन राजधानी रहा था। इसका इतिहास आठवीं शताब्दी का रहा है । कालांतर में इसका नाम नाडोल हो गया । सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर सोलंकी युद्ध करते हुए शहीद हुए।

सुमेल जेतारण के पास 👉 गिरी गांव के पास सुमेल का प्रसिद्ध युद्ध 1544 ई. में हुआ। शेरशाह व माल देव के बीच में हुआ था जो एक ऐतिहासिक स्थल है । यहां पर पूर्व सांसद ओंकार सिंह लखावत द्वारा सत्याग्रह उद्यान का निर्माण करवाया है ।
जूना खेड़ा देसूरी तहसील में स्थित चौहान वंश की प्राचीन राजधानी तथा जैन धर्म का प्रसिद्ध स्थल सारंगवास खेतलाजी के मेल में गोडवाड समारोह का आयोजन स्थल है । वहां पर हर साल समारोह व धार्मिक समारोह का आयोजन होता हैं।
घाणेराव मुंछाला महावीर का मंदिर, सादड़ी खुदाबख्श बाबा की प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है । सादड़ी सूर्य मंदिर टेंपल टाउन के रूप में विकसित किया जा रहा है।
जालेश्वर महादेव के नामक स्थान पर परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि तपस्या की थी । पाली सर्वाधिक जिलो की सीमा छूने वाला जिला है ।

श्री उम्मेद मिल 👉राज्य की सबसे बड़ी सूती मिल है । फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला और मरुधरा लोक कल्याण मंडल पाली में स्थित है।


🔅🔻 लोक संस्कृति 🔻🔅
पाली जिले के पादरला गांव का 13 ताल लोक नृत्य देश विदेश में विख्यात है । अन्य लोक नृत्य में मुंडारा की कच्छी घोड़ी नृत्य । नित्य माता की दांडी भील युवतियों का घूमर, गरासियों का गणगौर नृत्य एवं गवरी नृत्य आदि प्रमुख नृत्य हैं।
चोटिला पीर रुणिचा का मेला 👉 यह मेला जोधपुर पाली रेलवे लाइन पर केरला रेलवे स्टेशन के पास हजरत पीर की मजार पर दिवाली के दूसरे दिन भरता हैं।
अन्य मेला 👉गौरिया गणगौर मेला, महादेव मेला ,भाकरी मेला, पाली बजरंग बाण फूल मंडी मेला, हनुमान मेला, महालक्ष्मी मेला, खिवाड़ा तथा चंडावल का पशु मेला, मावली पशु मेला , मानपुरा भाकरी पशु मेला, नया गांव चोपड़ा पशु मेला , आनंदपुर कालू में पशु मेला भरता हैं।
ओम बन्ना पाली और जोधपुर हाइवे के ऊपर रोहट से पहले ओम बन्ना का पवित्र स्थान है । जहां पर देश विदेश से लाखों भक्तों आते हैं।


⚜🔅 दर्शनीय स्थल 🔅⚜
रणकपुर जैन मंदिर 👉 उदयपुर के महाराणा कुंभा के शासनकाल में उनके मंत्री धर्मपाल व शिल्पी देपा से इस विशाल एवं भव्य चित्रमुख् मंदिर का निर्माण करवाया था। इसमें 1444 विशाल खंबे हैं । जिनकी बनावट एक दूसरे से भिन्न है । निंबो का नाथ मेला पांडवों की माता कुंती जिस स्थान पर शिव पूजा क्या करती थी। परशुराम गुफा – जिस स्थल पर ऋषि परशुराम ने तपस्या की थी। गुफा में प्राकृतिक शिवलिंग है तथा मनमोहक स्थान देखते ही बनता है । सालासर महादेव – परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि ने इस स्थल पर तपस्या की थी । भीमगोडा वनवासी पांडव की याद दिलाता है । सोमनाथ मंदिर का निर्माण गुजरात के राजा कुमारपाल सोलंकी ने विक्रम संवत 1209 में करवाया था। चामुंडा मंदिर निमाज कस्बे में राजा भोज का बनाया हुआ है। प्राचीन चामुंडा माता का मंदिर पुरातात्विक महत्व का प्रमुख स्थल है । जवाई बांध — आधुनिक विकास तीर्थों में सुमेरपुर के निकट जवाई बांध है जो पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा बांध है। जूना खेड़ा – चौहान वंश की प्राचीन राजधानी रहा था। इसका इतिहास आठवीं शताब्दी का रहा है । कालांतर में इसका नाम नाडोल हो गया । सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर सोलंकी युद्ध करते हुए शहीद हुए । सुमेल — जेतारण के पास गिरी गांव के समीप सुमेल का प्रसिद्ध युद्ध 1540 में शेरशाह व माल देव के बीच में हुआ था । जो एक ऐतिहासिक स्थल है। यहां पर पूर्व सांसद ओंकार सिंह लखावत द्वारा सत्याग्रह उद्यान का निर्माण करवाया है । जूना खेड़ा देसूरी तहसील में स्थित चौहान वंश की प्राचीन राजधानी जैन धर्म की प्रसिद्ध स्थल सारंगवास खेतलाजी के मेले गोडवाड समारोह का आयोजन स्थल है । वहां पर हर साल धार्मिक समारोह आयोजित होता है। घाणेराव मुछाला महावीर का मंदिर सादड़ी खुदाबख्श बाबा की प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है । सादड़ी सूर्य मंदिर टेंपल टाउन के रूप में विकसित किया जा रहा है और एक सुंदर कस्बा परशुराम गुफा अरावली पर्वतमाला में स्थित हैं। इस गुफा में ऋषि परशुराम ने तपस्या की थी । यहां शिवरात्रि एवं श्रवण माह में मेला भरता है। पहाड़ी गुफा गुडा प्रताप सिंह ग्राम कि यह पहाड़ी में जालेश्वर महादेव नामक स्थान पर परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि तपस्या की थी । पाली सर्वाधिक जिलो की सीमा छूने वाला जिला है । श्री उम्मेद मिल राज्य की सबसे बड़ी सूती मिल है । फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला और मरुधरा लोक कल्याण मंडल पाली में स्थित है।


🔹🔸लोकसभा क्षेत्र  – पाली
▪🔸वर्तमान सांसद- प्रेमप्रकाश चौधरी(पाली)

▪🔻विधानसभा क्षेत्र(6)-
क्षेत्र का नाम          विधायक
01.सोजत-  श्रीमती संजना आगरी (भाजपा)
02.जैतारण – श्री सुरेन्द्र गोयल (भाजपा)
03.पाली – श्री ज्ञानचन्द पारख (भाजपा)
04.सुमेरपुर – श्री मदन राठौड़ (भाजपा)
05.बाली – श्री पुष्पेन्द्र सिंह (भाजपा)
06.मारवाड़ जंक्शन – श्री केसाराम चौधरी (भाजपा)


🔅जिला परिषद (1)-पाली
🔅जिला प्रमुख-श्री पेमाराम चौधरी


जीवन शैली 
▪🔻 पाली जिले के लोग बहुत मिलनसार होते है, ये सदैव दुसरों की मदद के लिये तत्पर रहते है। बोली बहुत मीठी होती हैं। बोली में मिठास व अपनत्व होता है।
कलात्मक रूप से बनी हुई रंगबिरंगी पोशाकें पहने हुए लोगों को देखकर प्रतीत होता हैं कि पाली की जीवनशैली असाधारण रूप से सम्मोहित करने वाली है। वैसे पाली प्रेम, प्यार व स्नेह का अभिप्राय है। पुरूषों द्वारा पहनी हुई रंगीन पगड़ियाँ एक अलग ही पहचान और चहुँ ओर रंग बिखेर देती हैं।


🏀 खान-पान 🏀
यहाँ खासतौर पर दूध निर्मित खाद्य पदार्थों का ज्‍यादा प्रयोग होता है। जैसे मावा का लड्डू, क्रीम युक्‍त लस्‍सी, मावा कचौरी, और दूध फिरनी आदि।
भोजन में प्राय यहाँ बाजरे का आटे से बनी रोटियां, जिन्हें सोगरा कहते हैं, प्रमुखता से खाया जाता है। सोगरा लसन व पुदीने की चटनी, साग आदि के साथ खाया जाता है। जो खाने में स्वादिष्ट होता है। गेहूँ का फुलका (रोटी) भी बड़ी तबियत से जिमते हैं। दाल बाटी चूरमा यहां के लोगों का पसंदीदा व्यंजन हैं। इसी प्रकार छाछ और प्याज भी इसके साथ खाया जाता है।


अन्त में आहुवा के 1857 की क्रान्ति में जो जो योगदान रहा हैं, उसका ओजपूर्ण और वीर रस के संयोजन का सुन्दर वर्णन 

⚜⚜ पाली के आऊवा का 1857 की क्रान्ति में योगदान ⚜⚜
🔹🔸लेखक सुभाष रावल के द्वारा आहुवा युद्ध का संजीव वर्णन 🔸🔹
18 सितंबर 1857 की सुबह सुगाली देवी का फतवा ठाकुर कुशालसिंह अपने बाकी साथियों के साथ अंग्रेजों के सामने मैदान में डट गया । लंबे-लंबे भाले और तलवारों की धार चमचमा उठी। अंग्रेजों को सामने देखकर क्रोधित कुशाल सिंह में जोश का तूफ़ान सा आ गया । युद्ध के नगाड़े बजे उठे । सुगाली देवी की जय जय कार के साथ सभी योद्धा ताल ठोक कर मैदान में उतर गए हैं। घोड़ों की लगामें कसली गई। कुशाल सिंह भूखे शेर की भाँति अंग्रेजों की फौज पर टूट पड़ा। घमासान युद्ध छिड़ गया ।युद्ध में उड़ने वाली धूल से अंधेरा होने लगा । विकराल युद्ध में तलवारों के टकराने की आवाज दूर दूर तक सुनाई देने लगी । क्रोध की ज्वाला में धधकता वीर साहसी ठाकुर निडर होकर दुश्मन की ओर आगे बढ़ता ही चला जा रहा था । तोपे उसका स्वागत कर रही थी।
भालों के प्रहाऱों से एवं तलवारों के वार से सिर धड़ से अलग होकर गिर रहे थे । 2 दिन के घमासान युद्ध में जोधपुर के किलेदार अनार सिंह तथा राव रायमल मारे गए और सिंघवी कुशल राज अपनी सेना के साथ चेलावास गांव की ओर भाग गए। इसी बीच जोधपुर का अंग्रेजी रेजिडेंट मेजर मैंसन भी इस आक्रमण में सम्मिलित होने पहुंचा। लेकिन लारेंस की सेना के कैंप तक पहुंचने से पूर्व ही विद्रोहियों की गोली का शिकार हो गया। फिरंगियों का एजेंट मारा गया। इस जीत की खुशी में आहुवा के सिपाही जोर जोर से ढोल थाली बजाने लगे । मेंशन का सिर काटकर के पेड़ पर लटका दिया गया। लॉरेंस ने 3 दिन तक के गेट को घेर रखा । किंतु आहुवा की तोपों से निकलने वाले गोलों के सामने नहीं टिक सका और उसको अपनी सेना के साथ पीछे हटना पड़ा ।
20 जनवरी 1858 कर्नल होम फिर हमला बोल दिया । अपने साथी योद्धाओं के साथ आहुवा ठाकुर भी युद्ध में कूद पड़ा। बारुद के भंडार उड़ने लगे । हजारों योद्धा युद्ध में झुनझुनी लगे। ठाकुर कुशालसिंह भी अंग्रेजों पर टूट पड़ा । 3 दिन के युद्ध में शक्ति क्षीण हो गई । ऐसी स्थिति में ठाकुर पृथ्वी सिंह ने युद्ध का भार लेकर ठाकुर कुशालसिंह को जबरदस्ती युद्ध से चले जाने का दबाव बनाया । घमासान युद्ध के पश्चात अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति सेे किले के दरवाजे खुलवा दियेे । अंग्रेजों की सैना गांव में घुस गई । जबरदस्ती लूटपाट के साथ लगा कर के महल मंदिर तोड़ दिए गए और इस प्रकार 24 जनवरी 1858 होम्स की सेना ने अाहुवा पर अधिकार स्थापित कर लिया। ठाकुर कुशालसिंह पर विपत्ति के पहाड़ टूट पड़े । गांव छुटा , परिवार बिछड़ा , लेकिन उन्होंने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार नहीं की । यह आज़ादी की लड़ाई थी। और वह आजादी के सच्चे सिपाही थे।  जिनका गांव गांव में आज भी गीतों में गाया जाता हैं । 


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हीरालाल जाट, 

अध्यापक चण्डावल नगर 

तह सोजत 

जिला पाली

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