Ras Mains Test Series -3

Ras Mains Test Series -3

राजस्थान की धरोहर- मेले व पर्व तथा लोक संगीत व लोक नृत्य

अतिलघुतरात्मक ( 15 से 20 शब्द )

प्र 1. कपिल मुनि का मेला ?

उत्तर- बीकानेर में स्थित कोलायत में कार्तिक पूर्णिमा को कपिल मुनि का मेला भरता है। लाखों लोग कोलायत पवित्र झील में स्नान करने आते हैं।

प्र 2. जन्माष्टमी ?

उत्तर- अत्याचार पर न्याय की एवं धर्म पर अधर्म की विजय के रूप में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के रूप में प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को संपूर्ण देश में हिंदुओं के द्वारा मनाया जाने वाला जन्माष्टमी एक बड़ा त्योहार है।

प्र 3. अल्लाह जिलाह बाई ?

उत्तर- ‘पदम श्री एवं राजस्थान श्री’ के साथ अनेक पुरस्कारों से सम्मानित बीकानेर की प्रसिद्ध मांड गायिका अल्लाह जिलाह बाई नृत्य एवं शास्त्रीय गायन में भी पारंगत थी। उनका गाया गीत ‘केसरिया बालम……… म्हारे देश’ प्रसिद्ध है।

प्र 4. अलगोजा वाद्य यंत्र ?

उत्तर- दो बांस की नलियों से निर्मित राजस्थान का प्रसिद्ध सुषिर लोक वाद्य जो नकसांसी से बजाया जाता है। अलवर, सवाई माधोपुर क्षेत्र एवं भील, कालबेलिया आदि में बहुत लोकप्रिय है।

प्र 5. डांडिया नृत्य ?

उत्तर- यह मारवाड़ का प्रसिद्ध लोक नृत्य है जो पुरुषों द्वारा होली के अवसर पर शहनाई, नगाड़ा वाद्य यंत्रों व ख्याल, धमाल शैली में सामूहिक रूप से किया जाता है।

लघूतरात्मक ( 50 से 60 शब्द )

प्र 6. ‘तीज त्यौहारां बावड़ी, ले डूबी गणगौर’ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- तीज त्योहार निरस ग्रीष्म ऋतु के बाद आने वाले त्योहारों की कड़ी का पहला त्यौहार है। इसलिए कहा गया है ‘तीज त्यौहारां बावड़ी, ले डूबी गणगौर’ अर्थात तीज त्योहारों को लेकर आती है जिनको गणगौर अपने साथ वापस ले जाती है। तीज का त्योहार मुख्यतः बालिकाओं और नवविवाहिताओं का त्योहार है। एक दिन पूर्व बालिकाओं का सिंजारा किया जाता है।

‘आज सिंजारा तड़के तीज छोरिया ने लेगी पीर’ उक्त कहावत भी प्रचलित है। यह मुख्यत स्त्रियों का त्यौहार है जिसमें स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत करती है। श्रावण शुक्ल तीज को छोटी तीज मनाई जाती है। जयपुर में इस दिन तीज माता की सवारी निकाली जाती है। उव गणगौर चैत्र मास में मनाई जाती है। यह भी बालिकाओं और स्त्रियों का त्योहार है। इसमें शिव और पार्वती की पूजा की जाती है। तीज के साथ ही मुख्यतः त्योहारों का आगमन माना जाता है जो गणगौर के साथ समाप्त होता है।

प्र 7. राजस्थानी लोक संगीत की मुख्य विशेषताओं की व्याख्या कीजिए ।

उत्तर- लोक संगीत में भाषा की अपेक्षा भाव का महत्वपूर्ण होना मुख्य विशेषता है। मानवीय भावनाओं का सजीव वर्णन, मौखिक होने पर भी लयबद्ध होना तथा जनमानस के स्वाभाविक उद्गारों का प्रस्फुटन होता है। इसकी मांड, तालबंदी, लंगा आदि गायन शैलियां है। इसके जनसाधारण के, व्यावसायिक जातियों के, मरू प्रदेश के, पर्वतीय प्रदेश के आदि विविध रूप प्रचलित है।

यह हमारे जीवन का वास्तविक इतिहास, सामाजिक तथा नैतिक आदर्श एवं संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को सुरक्षित रखे हुए हैं। आदिवासियों, घुमंतु जातियों आदि के लोक संगीतों ने राजस्थान की प्राचीन परंपरा एवं संस्कृति को सुरक्षित बनाए रखा है।

प्र 8. कच्छी घोड़ी नृत्य ?

उत्तर- यह राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र का प्रसिद्ध व्यावसायिक लोक नृत्य है जो पुरुषों द्वारा बांस की खपच्ची के लाल घोड़ों को धारण कर सामूहिक रूप से कमल के फूल की पंखुड़ियों के समान पैटर्न बनाते हुए किया जाता है।

इसमें ढोल, बांकिया आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग होता है। नृत्यकार सफेद चूड़ीदार पायजामा, रेशमी पीली शेरवानी एवं सिर पर लाल साफा धारण कर पैरों में घुंघरू बांधते हैं। आज इस नृत्य ने व्यावसायिक रूप धारण कर लिया है।

प्र 9. राजस्थान की लोक संस्कृति एवं मेलें तथा त्योहारों के महत्व को उजागर कीजिए। (निबन्धात्मक)

उत्तर- मेले से अभिप्राय है कि एक विशेष स्थान पर जन समूह का मिलना और सामूहिक रूप से उत्सव मनाना। ये स्थानिक, देशव्यापी, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक रूपों में होते हैं।

लोक उत्सव (त्योहार) – प्रत्येक लोकोत्सव किसी धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक विचारधारा, महापुरुषों से संबंधित, नई फसल पकने, ऋतु परिवर्तन आदि विशेष घटना से जुड़े उत्सव होते हैं जहां लोक आनंदोत्सव करता है।

मेले एवं त्योहारों का महत्व-

1. सामाजिक समरसता एवं भाईचारे को बढ़ावा – विभिन्न उत्सव एवं मेलों में सभी जाति के लोग आपस में मिलते हैं और भाईचारे की भावना का प्रदर्शन करते हैं। उनमें आपसी प्रेम, स्नेह, सौहार्द, मैत्री, जनसेवा की भावना में वृद्धि होती है तथा सामाजिक मेल मिलाप को बढ़ावा मिलता है।

2. राजस्थान की लोक संस्कृति की झलक- राजस्थान के मेले एवं त्योहारों पर गाए जाने वाले गीत, लोक वार्ताएं, वादन, नृत्य आदि में धार्मिक निष्ठा एवं ऐतिहासिक तथ्य होते हैं। यहां का जन समूह विभिन्न प्रकार की वेशभूषा, आभूषण पहनकर परंपराओं, नाच गान आदि की रंग बिरंगी छटा बिखेरते हैं जहां राजस्थान की लोक संस्कृति साकार हो उठती है।

3. सामाजिक- सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा– इन मेलों एवं उत्सवों के साथ प्राचीन परंपराएं तथा विचारधाराएं जुड़ी रहती है। इनको सभी धर्मावलंबी एक सामाजिक कार्य मानते हैं जिससे वे एकता का अनुभव करते हैं तथा सामाजिक सौहार्द कायम रहता है।

4. राजस्थान की हस्तकला को बढ़ावा- इन मेलों एवं उत्सवों के दौरान राजस्थानी ग्रामीण समाज अपनी आवश्यकता अनुसार लोक देवी-देवताओं, महापुरुषों के मूर्ति चित्र, लोक वाद्य यंत्र, वस्त्र, आभूषण व घरेलू सामान आदि खरीद कर राजस्थानी हस्तकला को जीवित रखे हुए हैं।

5. आदिवासी संस्कृति को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका – राजस्थान के पूरे दक्षिणांचल में आदिवासी मेले ही सर्वाधिक है जिनमें बेणेश्वर, गौतमेश्वर, भेड़ माता आदि प्रमुख है। इन मेलों में हमें राजस्थान की वास्तविक संस्कृति के दर्शन हो जाते हैं जिन्हें आदिवासियों ने सहेज कर रखा हुआ है।

6. लोक संस्कृति को बढ़ावा-  मेले एवं त्यौहारों में लोकनाट्य, तमाशा, नृत्य, वादन, गायन आदि का प्रदर्शन करते समय विभिन्न वेशभूषा एवं आभूषणों को धारण किया जाता है। दस्तकारों या कृषकों के जातिगत झगड़े भी मेलों के आयोजनों के समय निपटाए जाते हैं।

7. देवी देवताओं एवं संतों के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति- अपनी मनोकामनाओं की सिद्धि के लिए इन मेलों एवं उत्सवों के अवसर पर लोग देवी-देवताओं या संतो के स्थान पर सामूहिक रूप से एकत्रित होते हैं, जिनमें भजन भाव, नृत्य, भक्ति आदि से जनता विभोर होती है और स्नान अर्चना से अपने को कृतार्थ समझती है। पीढ़ी दर पीढ़ी यह परिपाटी प्रवाहमान रहती है।

8. जन समूह में नई प्रेरणा का संचार – ऐसे मेलों के समय लोक नायकों के चरित्र एवं जीवन लीला की याद अनायास आ जाती है। पाबूजी, गोगाजी, देवनारायण जी, करणी माता आदि इन महान आत्माओं ने अपने संपूर्ण जीवन को जन कल्याण के लिए अर्पित कर अमरत्व प्राप्त किया। इन्होंने सन्मार्ग दिखाया। जनमानस उन्हीं के द्वारा बताए गए सन्मार्ग पर आज भी चल रहा है।

9. आर्थिक मेले– राजस्थान के पशु मेले आज भी राजस्थान की बहुसंख्यक ग्रामीण जनता का आर्थिक आधार है। इन मेलों में विभिन्न पशुओं का बड़े पैमाने पर लेन-देन होता है। साथ ही यहां राज्य के विविध प्रकार के हस्तशिल्प, लघु उद्योग निर्मित विभिन्न प्रकार की वस्तुएं खरीदी जाती है। राजस्थान में परबतसर, नागौर, पुष्कर, गोमतेश्वर, गोगामेडी और ऐसे ही अनेक मेलें बड़े स्तर पर पशु एवं अन्य सामानों की खरीद स्थल रहे हैं। वर्तमान में आधुनिकता ने उनके व्यवसाय को प्रभावित किया है।

उपयुक्त एवं संक्षिप्त बिंदुओं के अध्ययन से राजस्थान की लोक संस्कृति एवं आर्थिक विकास में मेले एवं त्योहारों का महत्व स्पष्ट हो जाता है।

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri