Religion Reform Movement and Enlightenment धर्म सुधार आन्दोलन

Religion Reform Movement and Enlightenment

धर्म सुधार आन्दोलन एवं प्रबोधन

अतिलघुतरात्मक (15 से 20 शब्द)

प्र 1. काल्विन ?

उत्तर- 16 वीं शताब्दी के फ्रांस निवासी काल्विन एक विशुद्ध नैतिकता वादी धर्म सुधारक था। इस की प्रसिद्ध पुस्तक ‘इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिश्चियन रिलिजन’ थी। इसे ‘प्रोटेस्टेंट पोप’ कहा जाता है।

प्र 2. धर्म सुधार आंदोलन से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर- यह एक धार्मिक आंदोलन था जिससे 16 वीं शताब्दी में यूरोप के इसाई धर्म संगठन में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। जिसके परिणाम स्वरुप इसाई धर्म दो बड़े भागों में विभाजित हो गया – कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट।

प्र 3. ह्यूगोनोट्स कौन थे ?

उत्तर- फ्रांस में कॉल्विन के अनुयायी ह्युगोनोट्स के नाम से जाने गए। ये काल्विनवाद के समर्थक थे। ये सत्य, सरलता और शुद्धता से कर्म करने में विश्वास तथा नियतिवाद में आस्था रखते थे।

प्र 4. प्रबोधन से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर- 18 वीं सदी में यूरोप में वैचारिक स्तर पर एक नए दृष्टिकोण का विकास हुआ, जिसमें धर्मनिरपेक्ष और विवेक सम्मत परिपृच्छा को प्रोत्साहित किया गया, जिसे सामूहिक रूप से प्रबोधन कहा जाता है।

प्र 5. प्रबोधन युग के प्रमुख विचारक कौन कौन थे ?

उत्तर- प्रबोधन युग के प्रमुख विचारक निम्न थे-
1. जॉन लॉक 2. मांटेस्क्यू
3.वाल्टेयर 4. इमैन्युअल कांट
5. रूसो 6. दिदरो

लघूतरात्मक (50 से 60 शब्द)

प्र 6. धर्म सुधार आंदोलन के उद्देश्य क्या थे।

उत्तर- धर्म सुधार आंदोलन के निम्न उद्देश्य थे-

  1. पोप व उसके अधीनस्थ धर्म अधिकारियों के जीवन में नैतिक सुधार करना।
  2. पोप के असीमित अधिकारों पर नियंत्रण स्थापित करना।
  3. धर्म अधिकारियों को आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख करना।
  4. जनसाधारण को मोक्ष प्राप्ति के लिए पॉप के आश्रित न रहकर परमात्मा पर अवलंबित करना।
  5. चर्चों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करना।
  6. कैथोलिक धर्म के मिथ्योआडंबरों का निवारण कर जनसाधारण के समक्ष धर्म का सच्चा स्वरूप प्रकट करना।

प्र 7. लूथरवाद एवं काल्विनवाद दोनों में समानताओं के साथ अंतर भी मौजूद थे। विवेचना कीजिए ।

उत्तर- लूथर और काल्विन- एक तुलना : दोनों ने करीब करीब एक ही समय कैथोलिक चर्च का विरोध कर पृथक पृथक संप्रदाय खड़े किए। दोनों ने ईसा मसीह और बाइबिल को पूर्णतः स्वीकार किया लेकिन पॉप की सता को नकारा। दोनों ने विशेषकर मध्यम वर्ग को प्रभावित किया। दोनों ने आडंबर का विरोध किया।

लूथर एवं काल्विन के विचारों में अंतर –

  1. लूथर चर्च को बिना पूरी तरह नकारे थोड़े परिवर्तनों से संतुष्ट था जबकि काल्विन अधिक परिवर्तन का पक्षपाती था।
  2. लूथर राज्य और धर्म के बीच स्पष्ट रेखा नहीं खींच सका, काल्विन ने स्पष्ट विभाजन किया।
  3. लूथर चमत्कारों का पक्षधर था, काल्विन ने इन्हें नकार दिया।
  4. लूथर आस्था को मुक्ति का उपाय मानता था, काल्विन नियतिवाद को।
  5. लूथर ने अनुयायियों के आचार विचार पर विशेष ध्यान नहीं दिया जबकि काल्विन कठोर अनुशासन का पक्षधर था।

प्र 8. प्रबोधन युगीन चिंतन एवं पुनर्जागरण में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- प्रबोधन युगीन चिंतन एवं पुनर्जागरण में निम्नलिखित अंतर निहित थे-

पुनर्जागरण कालीन मध्यमवर्ग अभी आत्मविश्वास से युक्त नहीं था। अतः वह इस बात पर बल देता था कि अतीत से प्राप्त ज्ञान ही श्रेष्ठ है और बुद्धि की बात करते हुए उदाहरण के रूप में ग्रीक एवं लैटिन साहित्य पर बल देता था जबकि प्रबोधन कालीन मध्य वर्ग में शक्ति और आत्मविश्वास आ चुका था। इस कारण उसने राजतंत्र की निरंकुशता एवं चर्च के आडंबर के खिलाफ आवाज उठाई और तर्क के माध्यम से अपनी बात व्यक्त की।

पुनर्जागरण का बल ज्ञान के सैद्धांतिक पक्ष पर अधिक था जबकि प्रबोधन चिंतन का मानना था कि ज्ञान वही है जिसका परीक्षण किया जा सके और जो व्यावहारिक जीवन में उपयोग में लाया जा सके। इस तरह प्रबोधन कालीन चिंतन का बल व्यावहारिक ज्ञान पर था।

पुनर्जागरण कालीन वैज्ञानिक अन्वेषण निजी प्रयास का प्रतिफल था दूसरी तरफ प्रबोधन कालीन वैज्ञानिक अन्वेषण तथा वैज्ञानिक क्रांति सामूहिक प्रयास का नतीजा था।

प्र 9. प्रबोधन युग का आधुनिक विश्व पर क्या प्रभाव पड़ा? विवेचना कीजिए । (निबन्धात्मक)

उत्तर- आधुनिक विश्व के निर्माण में प्रबोधन युग का प्रभाव दूरगामी रहा। यह प्रभाव निम्नलिखित है –

1. आधुनिक विश्व के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

2. वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति ने औद्योगिकरण के नए युग का आधार तैयार किया।

3. निरंकुश राजतंत्र पर चोट, फलतः लोकप्रिय सरकारों की स्थापना।

4. चिंतकों के द्वारा प्रतिपादित व्यक्ती स्वातंत्र्य की बात ने उदारवादी सरकार के निर्माण मार्ग को प्रशस्त किया।

5. व्यक्ति स्वतंत्र पैदा हुआ है। नारी और व्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग ने आर्थिक स्वतंत्रता को प्रोत्साहित किया। इस तरह वाणिज्यवादी आर्थिक नीति से मुक्त अर्थव्यवस्था की ओर जाने की बात की जाने लगी और इसकी अभिव्यक्ति एडम स्मिथ के ‘द वेल्थ ऑफ नेशंस’ (1776) में देखी जा सकती है।

स्मिथ का कहना था कि प्रकृति के नियम के तरह बाजार के भी अपने शाश्वत नियम है। अतः इसमें हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं है और बाजार के यह शाश्वत नियम मांग और पूर्ति पर आधारित है। इस तरह विश्व के समक्ष मुक्त अर्थव्यवस्था का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ जिसे वर्तमान में काफी महत्व दिया जाता है।

6. भारत में 19 वीं सदी में चले सामाजिक सुधार आंदोलन पर भी इसका असर दिखाई पड़ता है। आधुनिकीकरण के सिद्धांतों ने समाजों को वर्गीकृत करने और आधुनिक लोकतांत्रिक शासन का मॉडल खड़ा करने के लिए अतीत और वर्तमान, परंपरा और आधुनिकता संबंधी ज्ञानोदय की समझदारी से मदद ली।

समाज सुधार आंदोलन ने ज्ञानोदय के मानवतावादी विचारों से प्रेरणा ली और धर्म तथा रीति-रिवाजों को मानव विवेक के सिद्धांतों के अनुरूप ढालने की कोशिश की। उन्होंने पारंपरिक रस्मों रिवाजों की आलोचनात्मक परीक्षा की और उन नीतियों को बदलने की लड़ाई लड़ी जो समानता और सहिष्णुता के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ थी।

इन समाज सुधारकों पर प्रबोधन का इतना गहरा असर था कि उन्होंने अंग्रेजी शासन के साथ आने वाले नए विचारों का स्वागत किया और उन्हें विश्वास था कि जब कभी वे स्वशासन की मांग करेंगे, उन्हें मिल जाएगा। हालांकि औपनिवेशिक शासन के शोषण चरित्र को सब लोग मानते हैं लेकिन प्रबोधन कालीन व्यक्ति की धारणा, वैज्ञानिक ज्ञान और स्वतंत्र उद्यम में तत्कालीन विश्वास आज भी लोकप्रिय कल्पना को प्रभावित करता है।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri, राजपाल जी

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