Secularism : धर्म निरपेक्षता

Secularism

धर्म निरपेक्षता

धर्मनिरपेक्ष प्राचीन अवधारणा है। धर्मनिरपेक्षता शब्द का सबसे पहले प्रयोग जॉर्ज जैकब होलीयॉक नामक व्यक्ति ने सन् 1846 में किया था।बीसवीं शताब्दी में होलीयॉक ने चार्ल्स ब्रेडला के साथ मिलकर धर्म निरपेक्ष आंदोलन को आगे बढ़ाया।

धर्मनिरपेक्षता क्या है

धर्मनिरपेक्षता के संबंध में विद्वान एकमत नहीं है।

इस संबंध में वाटर हाउस का कहना है कि – “धर्मनिरपेक्षता एक ऐसी विचारधारा है जो कि जीवन और आचरण का एक ऐसा सिद्धांत प्रस्तुत करती है जो मत पंथ या मजहब के विरुद्ध होता है।”

लियो पेफर नामक विद्वान के अनुसार- ” धर्मनिरपेक्षता अपने अर्थ में पूरी तरह भौतिकवादी विचार है जो यह मानकर चलता है कि मानवीय विकास केवल भौतिक साधनों द्वारा ही किया जा सकता है।”

ब्रिटेनिका विश्वकोश में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ बताते हुए कहा गया है कि- “आध्यात्मिक या मजहबी विषयों में किसी तरह का संबंध न रखते हुए गैर आध्यात्मिकता से होता है।…….. धर्मनिरपेक्षता का अर्थ मत पंथ या मजहबी नियमों से अलग या उसके विपरीत व्यवस्था से होता है। यह आध्यात्मिक या मजहबी स्थिति के विपरीत पूरी तरह लौकिक होती है।”

डेनाल्ड स्मिथ का कहना है कि-” धर्मनिरपेक्ष राज्य वह राज्य है जिसके अंतर्गत व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है, जो व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय न हीं धर्म की उन्नति की चेष्टा करता है और ना ही धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करता है।”

धर्मनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में यूरोप से प्रारंभ हुआ और उसमे स्वतंत्र चिंतन पर बहुत अधिक बल दिया गया है।

उपयुक्त विश्लेषण से धर्मनिरपेक्षता के दो अर्थ होते हैं –

  • राज्य धर्म विरोधी विचारधारा का समर्थक हो तथा उसका आचरण भी धर्म विरोधी हो।
  • राज्य किसी भी धर्म को अपना सरंक्षण नहीं दे अर्थात राज्य सभी धर्मों को समान समझे तथा किसी भी धर्म से किसी प्रकार का विद्वेष न रखें।

धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएं –

  • धार्मिक स्वतंत्रता।
  • राज्य का कोई धर्म नहीं।
  • लोकतंत्र का समर्थक।
  • धर्म का राजनीति से पृथक्करण।
  • तानाशाही का विरोधी।
  • सार्वभौमिक सद्भावना का पोषक।
  • सभी पंथ के लोगों को समान समझना।
  • पंथनिरपेक्ष राज्य सर्वधर्म समभाव पर आधारित होता है।

भारत में धर्मनिरपेक्षता –

भारत में ‘सर्वधर्म समभाव’ की अवधारणा के अधीन धर्मनिरपेक्ष राज्य का सिद्धांत इस मान्यता के आधार पर बहुत पुराने समय से चला आ रहा है। भारत में सर्वधर्म समभाव की श्रेष्ठ अवधारणा से विकसित यह सिद्धांत पूरी तरह सकारात्मक है।

भारत में पंथनिरपेक्ष राज्य के दो पक्ष है – नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष।

नकारात्मक पक्ष से अभिप्राय राज्य का कोई धर्म नहीं होता है। वह सभी धर्मों (पंथों) से अलग रहता है।

सकारात्मक पक्ष से अभिप्राय राज्य सभी धर्मों को समान दर्जा देता है। पंथ, जाति, वंश या नस्ल के आधार पर राज्य कोई भेदभाव नहीं करता है।

भारत एक पंथनिरपेक्ष राज्य है जिसका अर्थ है इसका अपना कोई धर्म नहीं है। यह सभी पंथों को समान व समानांतर विकास करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

संविधान के भाग 3 में मूल अधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 25 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 25 के अनुसार किसी भी धर्म को मानने व उसके अनुरूप आचरण करने की छूट है अर्थात सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के तीसरे भाग की बाकी अन्य व्यवस्थाओं का विचार करते हुए सभी को अन्तःकरण की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।

अनुच्छेद 26 के अनुसार धार्मिक मामलों के प्रबंधन की छूट दी गई है।

अनुच्छेद 27 के अनुसार किसी धर्म विशेष के प्रसार के लिए करने की स्वतंत्रता दी गई है।

अनुच्छेद 28 सरकारी शिक्षा संस्थान में धार्मिक शिक्षा पर रोक लगाता है।

42 वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया।

भारतीय दर्शन में धर्म का अर्थ कर्तव्य एवं सदाचार पालन से है। व्यक्ति या राष्ट्र इससे निरपेक्ष नहीं रह सकता है। इसलिए धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर पंथनिरपेक्षता शब्द जोड़ा गया। 3 जनवरी 1977 से भारत घोषित रूप से पंथ निरपेक्ष राज्य है।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri

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