Stress ( तनाव )

Stress ( तनाव )

तनाव शब्द का अर्थ ( Meaning of stress word )

तनाव अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘स्ट्रेस’ (stress) की उत्पत्ति लेटिन भाषा के शब्द ‘स्ट्रिक्टस’ (strictus) से हुई इसका अर्थ है ‘तंग या संकीर्ण’ तथा स्ट्रिंगर (stringer) जो क्रियापद है जिसका अर्थ है ‘कसना’ से हुई है। यह मूल शब्द अनेक व्यक्तियों द्वारा तनाव अवस्था में वर्णित मांसपेशियों तथा श्वसन की कसावट अथवा संकुचन की आंतरिक भावनाओं को प्रतिबिंबित करता है।

प्रायः तनाव को पर्यावरण की उन विशेषताओं के द्वारा भी समझाया जाता है जो व्यक्ति के लिए विघटन कारक होती है। तनाव विभिन्न कठिन एवं चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों द्वारा व्यक्ति में होने वाले शारीरिक, संवेगात्मक, व्यवहारात्मक, संज्ञानात्मक परिवर्तन है, जो व्यक्ति के इन सभी पक्षों को प्रभावित करता है।

तनाव उत्पन्न करने वाले कारक तनाव कारक कहलाते हैं।

तनाव के संकेत या लक्षण ( Signs or symptoms of stress )

व्यक्ति की तनाव के प्रति अनुक्रिया उसके व्यक्तित्व, पालन पोषण तथा जीवन के अनुभव के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है। प्रत्येक व्यक्ति के तनाव अनुक्रियाओं के अलग-अलग प्रतिरूप होते हैं। अतः चेतावनी देने वाले संकेत तथा उनकी तीव्रता भी भिन्न-भिन्न होती है।

तनाव के निम्नलिखित लक्षण है 

  1. ध्यान केंद्रित ना कर पाना
  2. स्मृति ह्रास
  3. गलत निर्णयन
  4. विसंगति
  5. अनियमित उपस्थिति
  6. अनियमित समय पालन
  7. आत्म सम्मान में कमी
  8. दुर्बल दीर्घकालिक योजना
  9. अचानक व्यग्र ऊर्जा का फट पडना
  10. आंत्यतिक भाव दशा परिवर्तन
  11. भावात्मक विस्फोटक
  12. आकुलता
  13. दुश्चिंता
  14. भय
  15. अवसाद
  16. निद्रा में कठिनाई
  17. खाने में कठिनाई
  18. औषधियों का दुरुपयोग
  19. शारीरिक रोग जैसे पेट खराब होना, सिर दर्द, कमर दर्द आदि।

तनाव के प्रकार ( Types of stress )

तनाव के तीन प्रमुख प्रकार बताए गए हैं-

  1. भौतिक एवं पर्यावरणी ( Physical and ecological )
  2. मनोवैज्ञानिक तथा ( Psychological )
  3. सामाजिक तनाव ( Social Stress )

1. भौतिक एवं पर्यावरणी तनाव ( Physical and ecological )- भौतिक तनाव मांगे हैं, जिसके कारण हमारी शारीरिक दशा में परिवर्तन हो जाता है। हम तनाव का अनुभव करते हैं जब हम शारीरिक रूप से अधिक परिश्रम करते हैं, पौष्टिक भोजन की कमी हो जाती है, कोई चोट लग जाती है या निद्रा की कमी हो जाती है।

पर्यावरणी तनाव हमारे परिवेश की वैसी दशाएं होती है जो प्रायः अपरिहार्य होती है। जैसे वायु प्रदूषण, भीड़, शोर, ग्रीष्म काल की गर्मी, शीतकाल की सर्दी, प्राकृतिक आपदाएं तथा विपाती घटनाएं हैं, जैसे आग, भूकंप, बाढ़ इत्यादि।

2. मनोवैज्ञानिक तनाव ( Psychological ) – यह वे तनाव है जिन्हें हम अपने मन में उत्पन्न करते हैं। तनाव उत्पन्न करने वाले व्यक्ति के लिए विशिष्ट होते हैं। मनोवैज्ञानिक तनाव के कुछ प्रमुख स्रोत कुंठा, द्वंद्व एवं आंतरिक तनाव इत्यादि है।

जब कोई व्यक्ति या परिस्थिति हमारी आवश्यकता तथा अभिप्रेरकों को अवरुद्ध करती है या हमारे इस लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा डालती है तो कुंठा उत्पन्न होती है। कुंठा के अनेक कारण हो सकते हैं जैसे सामाजिक भेदभाव, अंतवैयक्तिक क्षति, स्कूल में कम अंक प्राप्त करना इत्यादि।।

दो या दो से अधिक असंगत आवश्यकताओं तथा अभिप्रेरकों में द्वंद्व हो सकता है जैसे क्या नृत्य का अध्ययन किया जाए या मनोविज्ञान का।आंतरिक तनाव हमारे अपने उन विश्वासों के कारण उत्पन्न होते हैं जो हमारी कुछ प्रत्याशाओं पर आधारित होते हैं। जैसे मुझे हर कार्य में सर्वोत्तम होना चाहिए।

3. सामाजिक तनाव ( Social Stress )- सामाजिक तनाव उन व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं जो हमारे ऊपर अत्यधिक मांगे थोप देते हैं। यह तनाव तब और बढ़ जाता है जब हमारे तथा उन लोगो के मध्य गहरा संबंध होता है। सामाजिक तनाव दूसरे लोगों के साथ हमारी अंतर क्रियाओं के कारण उत्पन्न होते हैं।

इस प्रकार सामाजिक घटनाएं जैसे परिवार में किसी की मृत्यु या बीमारी, तनावपूर्ण संबंध, पड़ोसियों से परेशानी सामाजिक तनाव के कुछ उदाहरण है।

तनाव के प्रभाव ( Effects of stress )

तनावपूर्ण स्थिति के साथ चार प्रमुख तनाव के प्रभाव संबद्ध है –

1. संवेगात्मक प्रभाव ( Susceptive effect )- वह व्यक्ति जो तनाव ग्रस्त होते हैं प्रायः आकस्मिक मनः स्थिति परिवर्तन का अनुभव करते हैं तथा सनकी की तरह व्यवहार करते हैं। जिसके कारण वे परिवार तथा मित्रों से विमुख हो जाते हैं।

कुछ स्थितियों में इसके कारण एक दुश्चक्र प्रारंभ होता है जिससे विश्वास में कमी होती है तथा जिसके कारण फिर और भी गंभीर संवेगात्मक समस्याएं उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए दुश्चिंता तथा अवसाद की भावनाएं, शारीरिक तनाव में वृद्धि, मनोवैज्ञानिक तनाव में वृद्धि तथा आकस्मिक मनः स्थिति में परिवर्तन।

2. शरीर क्रियात्मक प्रभाव ( Body physiological effects )- जब शारीरिक या मनोवैज्ञानिक तनाव मनुष्य के शरीर पर क्रियाशील होते हैं तो शरीर में कुछ हार्मोन जैसे एड्रीनलीन तथा कॉर्टिसोल का स्राव बढ़ जाता है। ये हार्मोन हृदय गति, रक्तचाप स्तर, चयापचय तथा शारीरिक क्रिया में विशिष्ट परिवर्तन कर देते हैं।

जब व्यक्ति थोड़े समय के लिए तनावग्रस्त होता है तो यह शारीरिक प्रतिक्रियाएं कुशलता से कार्य करने में सहायता करती है किंतु दीर्घकालिक से शरीर को अधिक नुकसान पहुंचा सकती है तथा पाचन तंत्र की धीमी गति, फेंफड़ों में वायु मार्ग का विस्तार, ह्रदय गति में वृद्धि, रक्त वाहिकाओं का सिकुड़ना इस प्रकार के शरीर क्रियात्मक प्रभाव के उदाहरण है।

3. संज्ञानात्मक प्रभाव ( Cognitive effect ) – यदि तनाव के कारण दाब निरंतर रूप से बना रहता है तो व्यक्ति मानसिक अतिभार से ग्रस्त हो जाता है। उस दाब के कारण उत्पन्न पीड़ा व्यक्ति में ठोस निर्णय लेने की क्षमता को तेजी से घटा सकती है।

घर में, जीविका में अथवा कार्य स्थान में लिए गए गलत निर्णयों के द्वारा तर्क वितर्क, असफलता, वित्तीय घाटा, यहां तक कि नौकरी की क्षति भी इसके परिणाम स्वरूप हो सकती है। एकाग्रता में कमी तथा स्मृति क्षमता का घटना भी संज्ञानात्मक प्रभाव हो सकते हैं।

4. व्यवहारात्मक प्रभाव ( Behavioral effect ) – तनाव का हमारे व्यवहार पर कम पोष्टिक भोजन करने, उत्तेजित करने वाले पदार्थों, जैसे कैफीन का अधिक सेवन करने एवं सिगरेट, मद्य तथा अन्य औषधियों जैसे उपशामकों इत्यादि के अत्यधिक सेवन करने में परिलक्षित होता है।

उपशामक औषधियां व्यसन बन सकती है ततथा उनके अन्य प्रभाव भी हो सकते हैं। जैसे एकाग्रता में कठिनाई, समन्वय में कमी, चक्कर आ जाना, निद्रा प्रतिरूप में व्याघात, अनुपस्थितता में वृद्धि, कार्य निष्पादन में ह्रास आदि।

तनाव प्रबंधन तकनीके ( Stress management techniques )

1. तनाव/ विश्रांति की तकनीकें ( Stress / relaxation techniques ) यह वह सक्रिय कौशल है जिनके द्वारा तनाव के लक्षणों तथा बीमारियों जैसे उच्च रक्तचाप एवं हृदय रोग के प्रभाव में कमी की जा सकती है। प्रायः विश्रांति शरीर के निचले भाग से प्रारंभ होती है तथा मुख एवं पेशियों तक इस प्रकार लाई जाती है जिससे संपूर्ण शरीर विश्राम अवस्था में आ जाए।

मन को शांत तथा शरीर को विश्राम अवस्था में लाने के लिए गहन श्वसन के साथ पेशी शिथिलन का उपयोग किया जाता है।

2. तनाव / ध्यान प्रक्रियाएं ( Stress / Meditation Procedures ) – योग विधि में ध्यान लगाने की प्रक्रिया में कुछ अधिगत गतिविधियां एक निश्चित अनुक्रम में उपयोग में लाई जाती है जिससे ध्यान को पुनः केंद्रित कर चेतना की परिवर्तित स्थिति उत्पन्न की जा सके।

इसमें एकाग्रता को इतना पूर्ण रूप से केंद्र किया जाता है कि ध्यानस्थ व्यक्ति किसी बाह्य उद्दीपक के प्रति अनभिज्ञ हो जाता है तथा वह चेतना की एक भिन्न स्थिति में पहुंच जाता है।

3. जैवप्रति प्राप्ति या फीडबैक ( Biometric receipt or feedback )- यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा तनाव के शरीरक्रियात्मक पक्षों का परीक्षण कर उन्हें कम करने के लिए फीडबैक दिया जाता है कि व्यक्ति में वर्तमान कालिक शारीरिक क्रियाएं क्या हो रही है।

जैवप्रति प्राप्ति प्रशिक्षण में तीन अवस्थाएं होती है- किसी विशिष्ट शरीरक्रियात्मक अनुक्रिया जैसे हृदय गति के प्रति जागरूकता विकसित करना, उस शरीरक्रियात्मक अनुक्रिया को शांत व्यवस्था में नियंत्रित करने के उपाय सीखना तथा उस नियंत्रण को सामान्य दैनिक जीवन में अंतरित करना।

4. सृजनात्मक मानस प्रत्यक्षीकरण ( Creative psyche ) – तनाव से निपटने के लिए यह एक प्रभावी तकनीक है। सृजनात्मक मानस प्रत्यक्षीकरण एक आत्मनिष्ठ अनुभव है जिसमें प्रतिमा तथा कल्पना का उपयोग किया जाता है।

यदि व्यक्ति का मन शांत हो, शरीर विश्राम की अवस्था में ह तथा आंखें बंद हो तो मानस प्रत्यक्षीकरण सरल होता है। ऐसा करने से अवांछित विचारों के हस्तक्षेप में कमी आती है तथा व्यक्ति को वह सृजनात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है जिससे की काल्पनिक विषय को वास्तविकता में परिवर्तित किया जा सके।

5. संज्ञानात्मक व्यवहारात्मक तकनीके ( Cognitive behavioral technique ) – इन तकनीकों का उद्देश्य व्यक्ति को तनाव के विरुद्ध संचारित करना होता है। इस उपागम का सार यह है कि व्यक्ति के नकारात्मक विचारों के स्थान पर सकारात्मक विचार प्रतिस्थापित कर दिए जाएं। इसके तीन प्रमुख चरण है- मूल्यांकन, तनाव न्यूनीकरण तकनीकें तथा अनुप्रयोग एवं अनुवर्ती कार्रवाई।

6. व्यायाम ( Exercise ) – तनाव के प्रति अनुक्रिया के बाद अनुभव किए गए शरीरक्रियात्मक भाव प्रबोधन के लिए व्यायाम एक सक्रिय निर्गम मार्ग प्रदान कर सकता है। नियमित व्यायाम के द्वारा हृदय की दक्षता में सुधार होता है। कार्य में वृद्धि होती है। रक्त में वसा की मात्रा घटती है। शरीर के प्रतिरक्षक तंत्र में सुधार होता है।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri