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सरदार सरोवर बांध: विकास, विवाद और विस्थापन की पूरी कहानी

Comprehensive study materials and practice resources for सरदार सरोवर बांध: विकास, विवाद और विस्थापन की पूरी कहानी

सरदार सरोवर बांध (Sardar Sarovar Dam) नर्मदा नदी पर निर्मित एक विशालकाय बहुउद्देशीय परियोजना (multipurpose project) है, जो भारत के आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और जल संसाधन विकास (water resources development) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। जहाँ यह गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के लिए सिंचाई (irrigation supply), पेयजल और 1450 MW के बिजली उत्पादन (power generation) का प्रमुख स्रोत है, वहीं इसका इतिहास विस्थापन, पर्यावरणीय प्रभावों (environmental impact) और नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसे सामाजिक विरोधों से भी गहराई से जुड़ा है। गुजरात की जीवनरेखा (lifeline of Gujarat) माना जाने वाला यह बांध आर्थिक समृद्धि और जल सत्याग्रह के संघर्ष की एक अद्भुत, संतुलित और प्रेरणादायक कहानी प्रस्तुत करता है।
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विकास और विवाद के बीच सरदार सरोवर बांध: एक नदी, दो तस्वीर

नर्मदा नदी पर बना सरदार सरोवर बांध भारत की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी नदी घाटी परियोजनाओं में से एक है। एक तरफ जहां यह गुजरात के लिए जीवनदायिनी और विकास का प्रतीक माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में जलभराव और विस्थापन के कारण यह जल सत्याग्रह और विरोध का केंद्र भी बना हुआ है। आइए जानते हैं भारत की इस विशालकाय संरचना से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य, इसके फायदे और इसके पीछे छुपे सामाजिक संघर्षों को।

सरदार सरोवर बांध: एक नज़र में (मुख्य बिंदु)

विशेषता विवरण
नदी नर्मदा नदी
ऊंचाई 138.68 मीटर (बढ़ाकर 138.72 मीटर/455 फीट की गई)
लंबाई 1,210 मीटर
दरवाजों (Gates) की संख्या 30 दरवाजे
जल संग्रहण क्षमता 4.73 मिलियन क्यूसेक
प्रयुक्त कंक्रीट 86.20 लाख क्यूबिक मीटर
 
रोचक तथ्य: इस बांध को बनाने में 86.20 लाख क्यूबिक मीटर कंक्रीट का इस्तेमाल हुआ है। यह मात्रा इतनी अधिक है कि इससे पृथ्वी से चंद्रमा तक सड़क बनाई जा सकती थी।

1945 से 2017: नींव से उद्घाटन तक का सफर

  • शुरुआती पहल: इस बांध के निर्माण की पहली पहल सरदार वल्लभभाई पटेल ने वर्ष 1945 में की थी।
  • शिलान्यास: भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 5 अप्रैल, 1961 को इसकी नींव रखी।
  • ऊंचाई बढ़ाने की अनुमति: वर्ष 2014 में सरकार ने बांध की ऊंचाई 121.92 मीटर से बढ़ाकर 138.72 मीटर करने की अनुमति दी, जिसे सितंबर 2017 तक पूरा कर लिया गया।
  • द्वार बंद होना और खोलना: 17 जून 2017 को नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण द्वारा बांध के 30 गेट बंद किए गए थे, जिन्हें बाद में खोला गया।

बांध की सुंदरता और आधुनिक तकनीक

रात के समय बांध का नजारा देखने लायक होता है। बांध पर गुलाबी, सफेद और लाल रंग के 620 LED बल्ब लगाए गए हैं। इनमें से 120 बल्ब विशेष रूप से 30 दरवाजों (गेट्स) पर लगे हैं। इन लाइट्स की रोशनी से पानी के ओवरफ्लो होने का एक अद्भुत दृश्य निर्मित होता है।

किसे कितना मिलेगा फायदा?

सरदार सरोवर परियोजना का लाभ चार राज्यों—गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान को मिलता है:

1. सिंचाई और जल आपूर्ति

  • गुजरात: बांध का सबसे बड़ा फायदा गुजरात को मिलता है। इससे राज्य के 15 जिलों के 3,137 गांवों की 18.45 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई संभव होगी।
  • राजस्थान: राजस्थान को इस परियोजना से मुख्य रूप से पानी की आपूर्ति मिलती है।
  • ग्रामीण लाभ: नहरों के माध्यम से लगभग 9,000 गांवों में सिंचाई और पेयजल की सुविधा पहुंचेगी।

2. बिजली का बंटवारा (Power Sharing)

बांध से उत्पन्न होने वाली बिजली का वितरण इस प्रकार है:
  • मध्य प्रदेश: 57% (सबसे अधिक हिस्सा)
  • महाराष्ट्र: 27%
  • गुजरात: 16%

विरोध, विस्थापन और 'जल सत्याग्रह'

जहाँ एक ओर गुजरात में इस परियोजना का स्वागत उत्सव की तरह किया गया, वहीं पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के कई जिलों में इसका तीव्र विरोध जारी रहा।
  • नर्मदा बचाओ आंदोलन: वर्ष 1985 में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर की अगुवाई में बांध निर्माण के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ।
  • विस्थापन का संकट: बांध के डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों के कारण एक अनुमान के मुताबिक 5 लाख से अधिक परिवार विस्थापन की समस्या से प्रभावित हुए हैं।
  • जल सत्याग्रह: पुनर्वास और विस्थापन के उचित प्रबंधन की मांग को लेकर प्रभावित क्षेत्रों में ग्रामीणों का 'जल सत्याग्रह' और संघर्ष आज भी जारी है।

निष्कर्ष

सरदार सरोवर बांध भारत के आधुनिक इंजीनियरिंग का एक बेजोड़ नमूना है जो लाखों किसानों के खेतों तक पानी पहुँचाने और बिजली उत्पादन में मील का पत्थर साबित हो रहा है। हालाँकि, इस बड़े विकास के साथ उन लाखों विस्थापित परिवारों का दर्द भी जुड़ा है जिन्होंने इसके लिए अपनी जमीन और घर गंवाए। सच्चा विकास वही है जिसमें पर्यावरणीय संतुलन और विस्थापितों के अधिकारों का पूरा ध्यान रखा जाए।

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