भारत की जलवायु( India's climate)
मानसून : एक नजर- मानसून अरबी शब्द " मौसिम " से बना है , जिसका अर्थ है - मौसमी हवाओ या ऋतु ।
- हमारे देश की जलवायु अक्षांशीय स्थिति , समुंद्रतल से ऊंचाई , समुन्द्र से दूरी , पर्वतों की स्थिति व दिशा , पवनों की दिशा तथा धरातल की बनावट आदि तत्वों से प्रभावित है ।
- ग्रीष्म ऋतु में यहां समुंद्री पवनें चलती है , जो समुन्द्र से स्थल की ओर आते हैं ।
- शीत ऋतु में यहां स्थलीय पवनें चलती है , जो स्थल से समुन्द्र की ओर जाती है ।
- भारत की जलवायु मानसून प्रदान जलवायु है ।
- लंबे समय (30 वर्षो से अधिक) के सम्मिलित रूप को ' जलवायु ' कहते है ।
- ध्यातव्य रहे - जलवायु में मुख्य रूप से वायु , जल , ताप तत्वों को जोड़ा गया व इनकी गणना वर्षा में होती है ।
- हवाएं हमेशा उच्च वायुदाब से न्यून वायुदाब की ओर चलती है ।
- हिन्द महासागर के दक्षिण से उठने वाली वे दक्षिणी - पश्चिमी हवाएं भारत की ओर आती है तथा हिमालय से टकराकर यहां वर्षा करती है , इन्हें ही दक्षिणी - पश्चिमी मानसून कहा जाता है । इसे ग्रीष्मकालीन मानसून भी कहते है ।
- जब सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर या इसके आसपास लम्बवत पड़ती है तो उत्तरी गोलार्द्ध ( भारत ) में तेज गर्मी पड़ती है ।
- जब दक्षिणी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें मकर रेखा व उसके आसपास के क्षेत्र पर लम्बवत पड़ने पर मध्य एशिया में बेकाल झील के पास व मुल्तान के आसपास उच्च दाब कायम हो जाता है ।
- नवीनतम विचारधाराओं के अनुसार मानसून की उत्पत्ति क्षोभमंडल में विकसित सामयिक आँधियों से मानी जाती है ।
- हवाओ का ऐसा प्रवाह जो निम्न क्षोभमंडल में पहुँचता है , उसी जेट स्ट्रीम से धरातल पर वापसी होती है ।
- वर्तमान समय में मानसून की उत्पत्ति का सिद्धांत ' जेट पवन ' से सम्बंधित है , जो कि ऊपरी वायुमंडल के संचालन से प्रभावित है ।
- जेट वायु धाराओं की खोज द्वितीय विश्वयुद्ध में हुई थी ।
- शीत या जाड़े की ऋतु में जेट स्ट्रीम क्षोभमंडल में लगभग 12 किमी. की ऊंचाई पर स्थित है एवं हिमालय तथा तिब्बत पठार के अवरोध के कारण दो शाखाओं में विभक्त हो जाती है ।
- जेट स्ट्रीम के कारण ही भूमध्य सागरीय पश्चिमी विक्षोभों को उत्तरी - पश्चिमी भारत के क्षेत्र में प्रवेश करने और यहां के मौसम को प्रभावित का मौका मिलता है ।
- भारत की जलवायु मानसूनी जलवायु है ।
- यहां की जलवायु परिस्थितियों को सामान्य रूप से मानसून पूर्व की स्थिति , मानसून कल एवं मानसून वापसी के कालक्रम में बांटा गया है ।
- मानसून पूर्व की स्थिति में देश में भयंकर गर्मी पड़ती है जिससे उत्तरी भारत में निम्न वायुदाब विकसित हो जाता है वे पवनें समुन्द्र से स्थल की और चलने लगती है ।
- मानसून काल में दक्षिणी - पश्चिमी से आने वाली पवनें अरब सागर के मानसून एवं बंगाल की खाड़ी के मानसून के रूप में भारत में
- वर्षा करती है । यह कल वर्षाकाल कहा जाता है।
- मानसून वापसी का समय शीत ऋतु एवं ग्रीष्म से सम्बंधित है ।
सामान्यतः प्रति 165 मीटर की ऊंचाई पर 1 डिग्री से. ग्रे. तापमान कम होता है ।
एक ही अक्षांश पर स्थित होते हुए भी ऊंचाई की भिन्नता के कारण ग्रीष्म कालीन तापमान मसूरी में 24 डिग्री से. ग्रे. , देहरादून में 32 डिग्री से. ग्रे. तथा अंबाला में 40 डिग्री से. ग्रे. रहता है ।
(2) समुन्द्र से दूरी : - समुन्द्र तट पर स्थित नगरों में तापमान अति न्यून रहता है तथा जलवायु नम रहती है । समुन्द्र से जैसे - जैसे दुरी बढ़ती जाती है वैसे ही तापमान एवं शुष्कता बढ़ती जाती है । पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में वर्षा जा वार्षिक औसत 200 से.मी. से अधिक रहता है , जैसलमेर में यह औसत केवल 5 से.मी. रह जाता है ।
(3) अक्षांशीय स्थिति : - यह तापमान को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला कारक है । बढ़ते हुए अक्षाशों के साथ तापमान में कमी आती जाती है , क्योकि सूर्य की किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है । भारत का उत्तरी भाग शीतोष्ण प्रदेश तथा दक्षिणी भाग उष्ण प्रदेश के अंतर्गत आता है ।
(4) पर्वतों की स्थिति : - ➡ दक्षिणी - पश्चिमी मानसून से प्रायद्वीपीय पठार के पश्चिमी ढालो पर प्रचुर वर्षा होती है , जबकि इसके विपरीत ढाल एवं प्रायद्वीपीय पठार दक्षिणी - पश्चिमी मानसून के सृष्टि - छाया क्षेत्र में अंतर है ।
(5) पर्वतों की दिशा : - ➡ साइबेरियाई से आने वाली ठंडी पवनों को हिमालय रोकता है । तथा हिमालय ग्रीष्मकालीन मानसून को रोककर भारत में ही वर्षा कराते है । ➡ पश्चिमी राजस्थान की शुष्क जलवायु का मुख्य कारण अरावली श्रेणी की दिशा दक्षिणी - पश्चिमी मानसून के समान्तर होना है ।
(6) पवनों की दिशा : - ➡ ग्रीष्मकालीन मानसून हिन्द महासागर से चलने के कारण उष्ण व आर्द्र होते है , अतः वर्षा करते है । ➡ शरद कालीन मानसून स्थली व शीत क्षेत्रों से चलते है , अतः ये शीत व शुष्कता लाते हैं ।
(7) उच्च स्तरीय वायु संचरण : - ➡ भारत की जलवायु क्षोभमंडल की गतिविधियों से प्रभावित होती है ➡ मानसून की कालिक व मात्रात्मक अनिश्चितता उच्च स्तरीय वायु संचरण की दिशाओं पर निर्भर करती है ।
इनके अलावा मेघच्छादन की मात्रा , वनस्पति आवरण , समुंद्री धारा आदि भी भारत की जलवायु को आंशिक रूप से प्रभावित करती है ।
भारत सरकार के मौसम विभाग के अनुसार भारत की जलवायु परिस्थितियों को चार ऋतुओं में बांटा है : - (क) उत्तर - पूर्वी या शीतकालीन मानसून काल : - 1. शीत ऋतु - दिसंबर से फरवरी तक । 2. ग्रीष्म ऋतु - मार्च से मध्य जून तक ।
(ख) दक्षिणी - पश्चिमी या ग्रीष्म कालीन मानसून : - 3. वर्षा ऋतु - मध्य जून से मध्य सितंबर तक । 4. शरद ऋतु - मध्य सितंबर से मध्य दिसंबर तक ।
भारतीय संस्कृति के अनुसार छः ऋतुएँ मानी गई है - 1. बसंत ऋतु - चैत्र - बैशाख 2. ग्रीष्म ऋतु - ज्येष्ठ - आषाढ़ 3. वर्षा ऋतु - श्रावण - भाद्रपद 4. शरद ऋतु - आश्विन - कार्तिक 5. शीत ऋतु - मार्गशीष - पोष 6. हेमन्त ऋतु - माघ - फाल्गुन
1. शीत ऋतु - (अ) तापमान - ➡ उत्तर से दक्षिण जाने पर इस के तापमान में वृद्धि होती है । ➡ भूमध्य रेखा व समुन्द्र से दूरी तथा समुन्द्र तल से ऊंचाई में वृद्धि से उत्तरी भारत में भूमध्य रेखा से निकटता व समुंद्री प्रभाव से तापमान अधिक रहता है । ➡ इस समय उत्तरीभारत में औसत तापमान 21 डिग्री सेंटीग्रेट से कम व दक्षिणी भारत में अधिक रहता है ।
(ब) वायुदाब व पवनें - ➡ इस ऋतु में उच्च दाब मध्य एशिया तथा निम्न दाब हिन्द महासगार क्षेत्र में केंद्रित होता है । ➡ इससे पवनें उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलने लगती है जिसे उत्तरी - पूर्वी मानसूनी पवनें कहा जाता है ।
(स) वर्षा - ➡ भूमध्य सागरीय चक्रवातों ( पश्चिमी विक्षोभ ) से होने वाली वर्षा रबी की फसल के लिए लाभदायक होती है । इसे स्थानीय भाषा में " मावठ " कहा जाता है । ➡ मावठ की वर्षा जम्मू कश्मीर , पंजाब , हरियाणा , राजस्थान , उत्तराखंड व उत्तरप्रदेश में होती है । ➡ दक्षिण में उत्तरी - पूर्वी मानसून से होने वाली वर्षा तमिलनाडु में होती है ।
2. ग्रीष्म ऋतु - ➡ उत्तरी भारत में ग्रीष्म ऋतु में तापमान अधिक होने के तीन प्रमुख कारण है - 1. सूर्य की किरणों का उत्तरी गोलार्द्ध में लम्बवत पड़ना 2. समुन्द्र से दूरी 3. प्रति चक्रवातों के कारण तापमान में वृद्धि ।
(अ) वायुदाब व पवनें - ➡ इस समय उत्तरी भारत में अत्यधिक गर्मी के कारण निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है। ➡ इस समय राजस्थान व पंजाब में अति निम्न दाब हो जाता है । इसके विपरीत हिन्द महासागर क्षेत्र में अधिक दाब रहता है। ➡ इस ऋतु में उत्तरी भारत में पवनें चलती है , जिन्हें " लू " कहा जाता है । ➡ उत्तर पूर्व भारत में इसे नार्वेस्टर / चाय वर्षा कहते है । ➡ पश्चिमी बंगाल में इन आंधी तूफानों को ' काल बैशाखी ' कहते है ।
(ब) वर्षा - ➡ इस ऋतु में वर्षा बहुत कम मात्रा में होती है । ➡ दक्षिणी भारत में मालाबार तट के पास होने वाली वर्षा को " आम्र वर्षा " तथा कहवा उत्पादन वाले क्षेत्रों (कर्नाटक) की वर्षा को " फूलों की बौछार / चैरी ब्लास्म " कहते है ।
3. वर्षा ऋतु -
(अ) तापमान - ➡ मानसूनी वर्षा में वृद्धि के साथ - साथ तापमान में कमी आने लगती है ।
(ब) वायुदाब व पवनें - ➡ इस समय निम्न वायुदाब ( जिसे ' मानसून गर्त ' भी कहते है ) राजस्थान व पंजाब में , व उच्च वायुदाब हिन्द महासागर में केंद्रित हो जाता है । जिससे हवाओं की दिशा दक्षिण - पश्चिम से बनने के कारण यह दक्षिणी - पश्चिमी मानसून के नाम से जाना जाता है।
(स) वर्षा - ➡ दक्षिण पश्चिमी मानसून दक्षिण प्रायद्वीप की स्थिति के कारण दो शाखाओं में बंट कर देश में वर्षा करता है : - 1. अरब सागरीय शाखा 2. बंगाल की खाड़ी की शाखा ➡ जब मानसून स्थल भाग में प्रवेश करता है तो प्रचंड गर्जन एवं तड़ित के साथ घनघोर वर्षा करती है । जिनको मानसून का फटना या टूटना कहते है ।
4. शरद ऋतु - ➡ यह ऋतु मानसून लौटने का काल है । ➡ सूर्य के दक्षिणी गोलार्द्ध में जाने से तापमान में कमी आ जाती है
भारत में मानसून की उत्पत्ति तथा क्रियाविधि के सिद्धांत
1. चिर सम्मत सिद्धान्त / परम्परागत सिद्धान्त : - ➡ यह सिद्धांत 1686 ई. में एडमण्ड होली द्वारा दिया गया । ➡ इन्होंने भारतीय मानसूनी पवनें जल समीर तथा थल समीर के रूप में चलती है ।
2. ITCZ संकल्पना ( Inter Tropical Conversation zone ) / अंतर उष्ण अभिसरण क्षेत्र : - ➡ फ्लोन ने 1951 में इस तापीय संकल्पना का प्रतिपादन किया । ➡ फ्लोन ने बताया कि सूर्य की उपस्थिति के कारण भू मध्य रेखीय क्षेत्र में विकसित निम्न दाब की स्थिति व्यपारिक पवनों को अपनी ओर आकर्षित करती है , इस क्षेत्र को ITCZ कहा जाता है ।
3. जेट सिद्धान्त : - ➡ यह सिद्धांत भारतीय जलवायुवेता पी. कोटेश्वरम ने प्रतिपादन किया ।
4. अन्तः उष्ण कटिबंधीय अभिसरण परिकल्पना : - ➡ जर्मन मौसम विज्ञान शास्त्री फ्लोन के अनुसार भूमध्यरेखीय निम्न दाब की ओर चलने वाली दोनों व्यापारिक पवनें से मिलने से वाताग्र उत्पन्न हो जाता है । यही वाताग्र मानसून की जननी है ।
5. ब्लादिमीर कोपेन ने 1936 में वनस्पति के आधार पर संसार की जलवायु का संशोधित वर्गीकरण प्रस्तुत किया । ➡ डॉ कोपेन ने 1918 में भारत की जलवायु को तीन क्षेत्रो मे बांटा - (1) शुष्क भारत , (2) अर्द्ध - शुष्क भारत , (3) आर्द्र भारत ।
कोपेन के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश?
➡ कोपेन ने भारत को 8 जलवायु प्रदेशों में बांटा है , जिसका वर्गीकरण निम्न है : - A = उष्ण + आर्द्र B = उष्ण + शुष्क C = उष्ण + शीत D = शीत + आर्द्र E = शीत + शुष्क f = वर्षभर वर्षा w = सर्दियों में सूखा s = गर्मियों में सूखा h = हॉट ( गर्मी ) c = ठंडा (Cold ) m = मानसून g = वर्षा पहले गर्मी W = शुष्क मरुस्थलीय S = स्टेपी जलवायु ( अर्द्धशुष्क )
1. As : - उष्णार्द्ध जलवायु का वह क्षेत्र जहाँ ग्रीष्मकाल शुष्क रहता है । जैसे - तमिलनाडु का कोरोमंडल तट ।
2. Aw : - उष्णार्द्ध जलवायु का वह क्षेत्र जहाँ शीतकाल शुष्क रहता है । जैसे - दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश ।
3. Amw : - उष्णार्द्ध जलवायु का शीत शुष्क वाला मानसून प्रभावित क्षेत्र । जैसे - केरल का मालाबार तट ।
4. BWhw : - उष्ण जलवायु का गर्म रेतीला मरुस्थलीय भाग जहाँ शीतकाल शुष्क रहता है । जैसे - राजस्थान का पश्चिमी रेतीला मैदानी प्रदेश ।
5. BShw : - उष्ण शुष्क जलवायु का प्रदेश जहाँ सवाना तुल्य वनस्पति पाई जाती है । उष्ण एवं शीत शुष्क का यह प्रदेश अर्द्धशुष्क जलवायु से संबंधित है । इसके अंतर्गत पंजाब , हरियाणा , पश्चिमी उत्तर प्रदेश , गुजरात , पूर्वी राजस्थान आदि शामिल है ।
6. Cwg : - शीतोष्ण जलवायु का वह प्रदेश जहाँ शीतकाल शुष्क एवं वर्षा ऋतु उमस भरी होती है । इसके अंतर्गत गंगा के मैदानी सहित उत्तर का विशाल मैदान शामिल है ।
7. Dfc : - शीत आर्द्ध जलवायु के इस प्रदेश में वर्षा की स्थिति हमेशा बनी रहती है । इसके अंतर्गत उत्तरी पूर्वी भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम का कुछ क्षेत्र शामिल है ।
8. E : - ध्रुवीय जलवायु के इस क्षेत्र में सदा बर्फ जमी रहती है । तापमान की न्यूनता और वर्षा का अभाव मुख्य लक्षण है । इसके अंतर्गत जम्मू कश्मीर , हिमाचल प्रदेश , उत्तराखंड , सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश का उच्च पर्वतीय बर्फीला क्षेत्र शामिल है ।
भारत में वर्षा का वितरण ➡ वर्षा के क्षेत्रीय वितरण के आधार पर देश को चार भागों में बांटा जा सकता है -
(1) अधिक वर्षा वाले भाग : - ➡ इसमें असम , मेघालय , अरुणाचल प्रदेश , त्रिपुरा . . . . आदि शामिल है । ➡ यहां पर 200 सेंटी मीटर से अधिक वर्षा प्राप्त होती है । ➡ अधिक वर्षा के कारण यहां उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन पाये जाते हैं ।
(2) साधारण वर्षा वाले भाग : - ➡ इसके अंतर्गत पश्चिमी घाट के पूर्वोत्तर ढाल , पश्चिमी बंगाल , छत्तीसगढ़ , झारखण्ड .... आदि शामिल है । ➡ यहां वर्षा 100 - 200 सेंटीमीटर के मध्य होती है । ➡ यहां पर मानसूनी वन पाए जाते है ।
(3) न्यून वर्षा वाले भाग : - ➡ इसके अंतर्गत दक्षिणी प्रायद्वीप का आतंरिक भाग , मध्य प्रदेश , पूर्वी राजस्थान , पंजाब , हरियाणा . . . आदि शामिल है । ➡ इस भाग में वर्षा 50 -100 सेंटीमीटर के मध्य होती है ।
(4) अपर्याप्त वर्षा वाले भाग : - ➡ इस भाग पर तमिलनाडु का रायलसीमा क्षेत्र , कच्छ , पश्चिमी राजस्थान , पश्चिमी पंजाब व लद्दाख आदि शामिल है । ➡ यहां पर वर्षा 50 सेंटीमीटर से भी कम वर्षा होती है ।
