Vastu and literary tradition of India भारत की वास्तु व साहित्यिक परम्परा

Vastu and literary tradition of India from Indus civilization to British period

सिंधु सभ्यता से लेकर ब्रिटिश काल तक की भारत की वास्तु व साहित्यिक परम्परा

अतिलघुतरात्मक ( 15 से 20 शब्द )

प्र 1. बेसर शैली ?

उत्तर- यह शैली विंध्य और कृष्णा नदी के बीच दक्षिणावर्त में फैली हुई थी। इस शैली में नागर व द्रविड़ शैली के तत्व मिश्रित है। इस शैली के मंदिर अर्द्ध गोलाकार होते थे तथा इनमें देवुल गर्भगृह और सभा मंडप होता था। एलोरा का कैलाश मंदिर, एलिफेंटा की गुफा मंदिर तथा होयसेल राजाओं द्वारा निर्मित मंदिर इसी शैली में है।

प्र 2. गोपुरम क्या है ?

उत्तर- गोपुरम का अर्थ है प्रवेश द्वार। जो दक्षिण भारत में द्रविड़ शैली के मंदिरों के आगे होता था। यह काफी कलात्मक ढंग एवं भव्यता के साथ बनाया जाता था और कभी कभी मुख्य मंदिर से भी ऊंचा होता था। चोल एवं गंग राजाओं द्वारा बनाए गए गोपुरम भव्य है।

प्र 3. गोल गुंबद ?

उत्तर- बीजापुर की सबसे अधिक प्रसिद्ध इमारत मोहम्मद आदिल शाह का मकबरा है। इसे गोल गुंबद कहते हैं। इस इमारत की गिनती भारत की सबसे विशाल और भव्य इमारतों में होती है। यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गुंबद है।

प्र 4. चित्रित धूसर मृदभांड परंपरा ?

उत्तर- पंजाब, हरियाणा, उत्तर राजस्थान, ऊपरी गंगा घाटी चित्रित धूसर मृदभांड परंपरा के प्रमुख केंद्र थे। यह लौह प्रयुक्तता संस्कृति थी। जिनमें विकसित ग्रामीण जीवन पाया जाता था। इस संस्कृति का अनुमानित समय 800 से 400 बीसी है।

प्र 5. सैयद एवं लोदी कालीन स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएं बताइए ?

उत्तर- सैयद एवं लोदी काल में इमारतों में मकबरे अधिक बने। मकबरे चतुर्भुजी और अष्टभुजी, दोहरे गुंबद का प्रयोग, नकाशी व सजावट तथा टाइलों का प्रयोग इनकी प्रमुख विशेषता है।

लघूतरात्मक ( 50 से 60 शब्द )

प्र 6. गांधार मूर्तिकला रोम निवासियों की उतनी ही ऋणी थी जितनी कि वह यूनानियों की थी। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- गांधार कला का विकास वर्तमान पश्चिमी पाकिस्तान तथा पूर्वी अफ़गानिस्तान में सांस्कृतिक क्रांति के परिणाम स्वरुप सम्राट कनिष्क के काल में हुआ। गांधार शैली की मूर्तियां कनिष्क काल की महत्वपूर्ण विशेषता है जिनमें भगवान बुद्ध की मूर्तियां विशेष रूप से उल्लेखनीय है। गांधार कला पर यूनानी तथा रोमन दोनों संस्कृतियों का विशेष प्रभाव था।

यूनानी प्रभाव को भगवान बुद्ध के घुंघराले बालों, दोनों कंधों को ढके वस्त्र विन्यास, पादुकाओं, बुद्ध को यूनानी देवता हेराकल्स के संरक्षण में दिखाना एवं अनेक विशेषताओं द्वारा देखा जा सकता है। यहां तक कि ‘ईश्वर इंसान’ का सिद्धांत भी यूनान की ही देन है। बुद्ध की महिमा मंडित पौराणिक कथाएं भी यूनानी संस्कृति से संबंधित की जा सकती है।

प्र 7. आधुनिक भारतीय स्थापत्य कला की मुख्य विशेषताएं बताइए।

उत्तर- आधुनिक स्थापत्य कला की कुछ अपनी ही विशेषताएं हैं जो निम्नलिखित है-

  1. भक्ति भाव या प्रशंसा भाव जगाने वाली इमारतों के निर्माण के उद्देश्य का स्थान सामाजिक जीवन उपयोगी इमारतों ने ले लिया।
  2. स्थापत्य कला अब आवश्यकता पूरक बन गई।
  3. इसके सजावटी पहलू को पुराना समझा जाने लगा।
  4. इसकी सादगी में सुंदरता के विचार ने ले ली।
  5. प्राचीन परंपरागत डिजाइनों को छोड़कर नए सादा किस्म के डिजाइनों को पसंद किया गया।
  6. स्थापत्य कला का नया सिद्धांत जिसने कार्यात्मकता कहा जाता है केवल इसे अधिक उपयोगी बनाने का सिद्धांत है।
  7. विज्ञान और टेक्नोलॉजी ने आधुनिक इंजीनियरिंग कौशल के साथ मिलकर आज के स्थापत्य इंजीनियर पुराने जमाने की इमारतों से कहीं ऊंची ऊंची इमारतों को बना सकता है।
  8. आधुनिक वास्तुशिल्प में पुरानी भव्यता तो नहीं है परंतु इसका आकार और ऊंचाई देखकर मनुष्य विस्मयाविभूत हो जाता है। विशालकाय ढांचा, समरूपता, सुविधा व्यवस्था, बहुत सारी जगह और दृढ़ता के कारण आंखों को सुंदर प्रतीत होती है।

प्र 8. मुगल कालीन स्थापत्य कला की मुख्य विशेषताएं बताइए।

उत्तर- मुगल स्थापत्य की विशेषताएं निम्नलिखित है-

  1. भवनों का निर्माण विशाल पैमाने पर किया गया।
  2. श्रेष्ठतर सामग्री का उपयोग किया गया।
  3. वास्तुकला में विभिन्नता, पलस्तरऔर पच्चीकारी की ओर विशेष ध्यान।
  4. जड़ावट और अलंकरण का प्रयोग।
  5. जालीदार दीवारों का निर्माण जिससे रहस्यमय छायांकन उभरा।
  6. सामंजस्य व संतुलन का समन्वय।
  7. फारसी चारबाग पद्धति का प्रयोग।
  8. बलुआ लाल पत्थर एवं सफेद संगमरमर का भरपूर प्रयोग।
  9. पित्रादूरा का प्रयोग जिसमें सफेद संगमरमर पर रंगीन मूल्यवान और अर्द्ध मूल्यवान पत्थरों की जड़ावट की गई।

प्र 9. द्वितीय नगरीकरण से आप क्या समझते हैं छठवीं शताब्दी ईस्वी पूर्व में नगरों के पुनरुत्थान के कारणों की विवेचना करते हुए इस में लोहे की भूमिका का परीक्षण करें।(निबन्धात्मक)

उत्तर- प्राचीन काल में नगरों के उदय और विकास की प्रक्रिया को नगरीकरण की संज्ञा दी जाती है। भारत में नगरों का उदय सर्वप्रथम हड़प्पा संस्कृति में हुआ, अतः इसे प्रथम नगरीकरण कहा जाता है। हड़प्पा सभ्यता के पतन के पश्चात प्राक मौर्य युग में पुनः नगरों का उल्लेख प्राप्त होता है। अतः इस छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व को द्वितीय नगरीकरण कहा जाता है।

द्वितीय नगरीकरण की अवस्था अनायास निर्मित नहीं हुई बल्कि तद्युगीन परिस्थितियों ने इस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि अधिशेष के आधार पर छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व से अनेक नए व्यावसायिक वर्गों का उदय हुआ। इनका कृषि से कोई संबंध नहीं रहा। इनमें से कुछ शिल्प से जुड़े थे। उनके निवास स्थान नगर का आकार लेने लगे जहां व्यावसायिक गतिविधियों को संपन्न किया जाता था।

नए व्यवसाय के उदय के साथ ही ऐसी बस्तियों का भी निर्माण हुआ जहां एक ही प्रकार के व्यवसायी रहते थे। इनकी स्थापना ऐसे स्थलों पर हुई जहां कच्चे माल की सुगमता हो एवं प्रमुख मार्गों अथवा नदियों के निकट हो, जिससे विनिर्मित उत्पादों को आसानी से विक्रय किया जा सके। ऐसी बस्तियां, बाजारों और बाजारों से व्यावसायिक केंद्रों और नगरों में परिवर्तित हो गई।

शिल्प और व्यवसाय के विकास के साथ-साथ व्यवसायिक संघों व श्रेणियों का भी उदय हुआ। इन संघों ने शिल्पियों एवं कारीगरों का नियमन किया तथा उत्पादन और वितरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई एवं उद्योगों का स्थानीयकरण बडढा जिसने नगरीकरण की प्रगति में सहायता पहुंचाई। इसके साथ ही देशी एवं विदेशी व्यापार में वृद्धि के फलस्वरूप सार्थवाह, वनिक सेठी आदि बड़े व्यापारी नगरों में निवास करने लगे और नगरों का विकास हुआ।

नगरों के विकास को राजनीतिक परिवर्तन ने भी प्रभावित किया। महाजनपदों के उदय के साथ ऐसे केंद्रों का भी उदय हुआ जो राजधानी या राजनीतिक सत्ता के केंद्र के रूप में विकसित हुए जो सामरिक एवं व्यापारिक दृष्टिकोण से बसाए गए। यहां राजा सहित प्रशासक वर्ग, सेना, शिल्पी, कारीगर, व्यापारी भी निवास करने लगे। इससे राजधानी के रूप में नगरों का विकास संभव हुआ।

नगर संरचना के विकास में उत्तर वैदिक युगीन सामाजिक संरचना का भी योगदान रहा। छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व तक आर्थिक परिवर्तन के कारण वैश्यों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई परंतु वर्ण आधारित व्यवस्था के कारण ग्रामों में इन्हें उचित सम्मान और अधिकार नहीं दिए गए। अतः वैश्य वर्ण धीरे धीरे व्यापारिक और औद्योगिक केंद्रों की ओर आकर्षित हुआ। इस प्रकार वैश्यों की आर्थिक सम्पन्नता ने नगरों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

धर्म सुधार आंदोलन और जैन एवं बौद्ध धर्मों ने वैदिकीय कर्मकांडों का निषेध कर पशुधन के संरक्षण का कार्य किया जो नई अर्थव्यवस्था के विकास के लिए आवश्यक था। इसके अतिरिक्त इन धर्मों का दृष्टिकोण व्यक्तिगत संपत्ति, कर्ज एवं सूद प्रथा और नगरीय जीवन की अन्य विशेषताओं के प्रति सहज था। अतः नगरीकरण की प्रक्रिया का विकास संभव हुआ।

लोहे की भूमिका – द्वितीय नगरीकरण के दौरान जिन नगरों का उत्थान एवं विकास हुआ उन्हें लौहयुगीन नगर कहा जाता है। अतः इनके विकास में लोहे की भूमिका को विस्मृत नहीं किया जा सकता। लोहे की जानकारी और इसके व्यवहार ने ना सिर्फ आर्यों के गंगा घाटी में प्रसार में सहायता पहुंचाई बल्कि उनकी अर्थव्यवस्था को भी क्रांतिकारी रूप से प्रभावित किया। लोहे के उपकरणों के प्रयोग से कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई जिससे अधिशेष की अवस्था निर्मित हुई। इस अधिशेष उत्पादन के आधार पर समाज में अनेक ऐसे शिल्पों का उदय हुआ जिनके शिल्पी कृषि पर आश्रित नहीं थे जिससे नगरीय केंद्रों की भूमिका निर्मित हुई।

अतः लोहे के ज्ञान और इसके कृषि में व्यवहार में आरंभिक आर्यों की पशु चारण अर्थव्यवस्था को उन्नत कृषि अर्थव्यवस्था में परिवर्तित कर नगरों के उदय का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

प्र 10. अकबर युगीन स्थापत्य की तुलना में शाहजहां युगीन स्थापत्य कला में क्या परिवर्तन आए? समीक्षा कीजिए। (निबन्धात्मक)

उत्तर- शाहजहां के काल में स्थापत्य कला में अपूर्व विशिष्टता आई। एक और जहां संगमरमर का प्रयोग व्यापक रूप से हुआ वहीं दूसरी तरफ फूलों वाली आकृतियों में बहुमूल्य पत्थरों का प्रयोग, काले संगमरमर से कुरान की आयतें व ज्यामितीय अंकन का प्रयोग हुआ। शाहजहां के काल में गुंबदों की संरचना और ज्यादा प्रभावी हुई इसे अमरुदी गुंबद कहते हैं।

इस पर निर्मित कमलनुमा संरचना इसके सौंदर्य में वृद्धि करता है। सुंदर अलंकृत व नक्काशीदार स्तंभ भी शिल्प कला के शानदार उदाहरण है। विशेषकर दांतेदार मेहराब इस काल के स्थापत्य का प्रमुख उदाहरण है। चारों कोनों पर मीनारों का निर्माण, बाग व झरनों की प्रचुरता, सममितीय संरचना इस युग के भवनों की अन्य प्रमुखता है।

इस युग के मुख्य भवनों में संगमरमर से निर्मित ताजमहल, दिल्ली का लाल किला, दीवाने आम, दीवाने खास, जामा मस्जिद, आगरा का किला, मोती मस्जिद, आगरा आदि प्रमुख है। शाहजहां ने अकबर द्वारा निर्मित आगरे के किले के कई भवनों को तोड़कर उन्हें पुनः लाल बलुआ पत्थर की जगह संगमरमर से निर्मित करवाया। मोती मस्जिद शुद्ध रूप से संगमरमर से निर्मित है। जामी मस्जिद त्रिगुंबदीय है जिसमें मध्यवर्ती गुंबद विशाल है। लाल किला बलुआ पत्थर से निर्मित विशाल संरचना है, जिसमें पश्चिम की ओर लाहौरी और पूरब की ओर दिल्ली दरवाजा है।

अकबर की तुलना में सजीवता, मौलिकता, दृढ़ता आदि गुणों की इस युग के भवनों में कमी है किंतु ये अतिव्ययपूर्ण प्रदर्शन एवं समृद्ध व कौशल सजावट से परिपूर्ण है। साथ ही धर्म निरपेक्षताकी भावना का भी अभाव है। ज्यादातर भवन पूर्ण इस्लामिक पद्धति से निर्मित है। एक और जहां अकबर कालीन भवनों में मुगल स्थापत्य का प्रारंभिक काल था वहीं शाहजहां का काल मुगल स्थापत्य के चरमोत्कर्ष का काल था।

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri, रजनी जी तनेजा