

यह संकलन संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की 'सिविल सेवा मुख्य परीक्षा' (GS Paper-1: भारतीय संस्कृति) तथा राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की 'RAS मुख्य परीक्षा' (General Studies Paper-1: राजस्थान का इतिहास, कला एवं संस्कृति) के अभ्यर्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। RPSC RAS Mains में जहां सीधे तौर पर 2 अंक (15 शब्द), 5 अंक (50 शब्द) और 10 अंक (100 शब्द) के प्रश्न इस खंड से पूछे जाते हैं, वहीं UPSC Mains में भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत और क्षेत्रीय कलाओं के संरक्षण से जोड़कर विश्लेषणात्मक प्रश्न बनते हैं। यह पोस्ट न केवल परीक्षा के पाठ्यक्रम को प्रामाणिक रूप से कवर करती है, बल्कि इसमें शामिल ऐतिहासिक तथ्य, तकनीकी शब्दावलियां और हालिया सरकारी प्रयास (जैसे सलाहकार बोर्ड व नीतियां) उत्तर लेखन (Answer Writing) में अधिकतम अंक प्राप्त करने के लिए बेहद उपयोगी हैं।
Advertisement

प्रश्न 1. 'हेला ख्याल' पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर: यह पूर्वी राजस्थान (विशेषकर लालसोट-दौसा, करौली एवं सवाई माधोपुर क्षेत्र) का एक अत्यंत लोकप्रिय पारंपरिक लोकनाट्य/रंगमंच है। इसमें मुख्यतः नौबत वाद्य यंत्र की थाप पर पौराणिक एवं समसामयिक विषयों को लोक गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इसकी मुख्य विशेषता उच्च स्वर में लंबी 'टेर' (आवाज) देना है, जिसे स्थानीय भाषा में 'हेला देना' कहा जाता है।
प्रश्न 2. राजस्थान की 'फड़ चित्रण' कला को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: रेजी या खादी के कपड़े पर स्थानीय लोक देवी-देवताओं (जैसे पाबूजी, देवनारायण जी) के जीवन और उनकी पौराणिक व ऐतिहासिक गाथाओं का सजीव चित्रण 'फड़ चित्रण' कहलाता है। भीलवाड़ा का शाहपुरा उप-शैल इस कला का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध केंद्र है। श्रीलाल जोशी इसके ख्याति प्राप्त 'फड़ चितेरे' हैं, जिन्होंने इस अमूर्त विरासत को वैश्विक पहचान दिलाई।
प्रश्न 3. सांगानेरी प्रिंट की प्रमुख विशेषताएं बताइए।
उत्तर: जयपुर के निकट सांगानेर का यह पारंपरिक वस्त्र शिल्प अपनी हस्त-ठप्पा छपाई (Hand-Block Printing), प्राकृतिक/वनस्पति रंगों (Vegetable Colors) के उपयोग तथा अत्यंत बारीक व सुरुचिपूर्ण अलंकरण (बेल-बूटे) के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसमें मुख्य रूप से लाल और काले रंग का बाहुल्य होता है। इसे भौगोलिक उपदर्शन (GI Tag) भी प्राप्त है, जो इसकी मौलिकता को प्रमाणित करता है।
प्रश्न 4. सांस्कृतिक एवं धार्मिक दृष्टि से 'बेणेश्वर धाम' का क्या महत्व है?
उत्तर: डूंगरपुर जिले के नवाटापरा गांव में सोम, माही और जाखम नदियों के पवित्र त्रिवेणी संगम पर स्थित बेणेश्वर धाम को 'वागड़ का कुंभ' या 'आदिवासियों का महाकुंभ' कहा जाता है। माघ पूर्णिमा को यहाँ विशाल मेला भरता है। यहाँ स्थित खंडित शिवलिंग आदिवासियों और संपूर्ण प्रदेश के श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र है, जो जनजातीय संस्कृति के सामंजस्य को दर्शाता है।
प्रश्न 5. जैन तीर्थ स्थल 'नाकोड़ा' के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: बालोतरा (पूर्व में बाड़मेर का हिस्सा) से लगभग 9 किमी दूर स्थित नाकोड़ा जैन संप्रदाय का एक अत्यंत पवित्र और प्राचीन तीर्थ स्थल है, जिसे 'मेवानगर' के नाम से भी जाना जाता है। 12वीं-13वीं शताब्दी के इस ऐतिहासिक स्थल पर 23वें जैन तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का भव्य मंदिर है तथा यहाँ अधिष्ठायक देव नाकोड़ा भैरव जी की प्रतिमा विशेष पूजनीय है।
प्रश्न 6. चित्तौड़गढ़ दुर्ग के ऐतिहासिक एवं स्थापत्य कलात्मक महत्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर: स्थापत्य महत्व: यह राजस्थान के 'गिरि दुर्गों' का सिरमौर और सबसे प्राचीन दुर्ग है। इसका मूल निर्माण मौर्य शासक चित्रांगद मौर्य ने करवाया था, जिसका आधुनिक परवर्धन महाराणा कुंभा द्वारा किया गया। यह अभेद्य किला स्थापत्य की दृष्टि से विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ, पद्मिनी महल और कुंभश्याम मंदिर जैसी कालजयी संरचनाओं को समेटे हुए है।
ऐतिहासिक महत्व: चित्तौड़गढ़ वीरता, स्वाभिमान और त्याग का जीवंत प्रतीक है। यह दुर्ग इतिहास के प्रसिद्ध तीन शाकों (1303, 1534, 1567-68), रानी पद्मिनी के जौहर तथा गोरा-बादल एवं जयमल-फत्ता के अप्रतिम पराक्रम का साक्षी रहा है, जिसके कारण इसे 'राजस्थान का गौरव' कहा जाता है।
प्रश्न 7. बूंदी चित्रकला शैली की प्रमुख विशेषताओं पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर: राव उम्मेद सिंह के शासनकाल में बूंदी चित्रकला शैली अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। स्थापत्य और कला की दृष्टि से यह शैली मेवाड़ और मुगल प्रभाव का एक उत्कृष्ट मिश्रण है।
प्रमुख विशेषताएं: आकृतियों में लंबा और गठीला शरीर, महिलाओं के अरुण अधर (लाल होंठ), पटोलाक्ष (परवल जैसी आँखें) और नुकीली नाक इसकी पहचान हैं। रंग योजना में श्वेत, गुलाबी, लाल, हिंगलू और हरे रंग का प्रचुर प्रयोग मिलता है।
विषय वस्तु व प्रकृति: इसमें प्रकृति का सतरंगा व सुरम्य चित्रण (पशु-पक्षी, लताओं, सरोवरों का अंकन) प्रमुख है। राग-रागिनी, नायिका-भेद, ऋतु-वर्णन, बारहमासा और शिकार इसके मुख्य विषय रहे हैं। यहाँ का 'भित्ति चित्रण' (चित्रशाला) संपूर्ण राजस्थान में अद्वितीय है।
प्रश्न 8. 'शेखावाटी ख्याल' की प्रमुख विशेषताओं और प्रासंगिकता को रेखांकित कीजिए।
उत्तर: चिड़ावा (झुंझुनू) से उद्भूत 'शेखावाटी ख्याल' राजस्थानी लोकनाट्य की सबसे लोकप्रिय और समृद्ध विधा है। चिड़ावा के नानूराम और दूलिया राणा इसके प्रसिद्ध कलाकार (खिलाड़ी) रहे हैं। इसके प्रमुख आख्यानों में हीर-रांझा, राजा हरिश्चंद्र, भर्तृहरि, जयदेव कलाली और आल्हादेव शामिल हैं।
प्रमुख विशेषताएं: 1. इसमें सरल, सुबोध स्थानीय भाषा और विशेष मुद्राओं में गीतों का गायन किया जाता है। 2. इसमें उत्कृष्ट पद-संचालन (नृत्य) और वाद्य यंत्रों (नगाड़ा, हरमोनियम आदि) की उचित संगत होती है। 3. इसके कलाकार पारंपरिक रूप से मिरासी, ढोली और सरगड़ा समुदाय से होते हैं।
सामाजिक महत्व: मनोरंजन के साथ-साथ यह ख्याल पौराणिक कथानकों और हास्य प्रसंगों के माध्यम से समाज सुधार व नैतिक आदर्शों का यथार्थ संदेश प्रसारित करता है।
प्रश्न 9. "राजस्थान के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में हस्तशिल्प (Handicraft) उद्योग की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।" (अथवा: राजस्थान में हस्तशिल्प पर एक विस्तृत लेख लिखिए।)
उत्तर: प्रस्तावना: मानव हाथों द्वारा निर्मित कलात्मक, सांस्कृतिक और आकर्षक वस्तुओं को हस्तशिल्प या दस्तकारी कहा जाता है। राजस्थान अपने विविध भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश के कारण हस्तशिल्प के मामले में न केवल भारत में बल्कि संपूर्ण विश्व में एक विशिष्ट पहचान रखता है। यहाँ की दस्तकारी यहाँ की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का जीवंत रूप है।
राजस्थान के प्रमुख हस्तशिल्प केंद्र और विविधता: राज्य के कोने-कोने में हस्तशिल्प की समृद्ध विधाएं बिखरी हुई हैं:
जयपुर: मीनाकारी, कुंदन कार्य, रत्न-नक्काशी, लाख की चूड़ियां और विश्व प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी।
जोधपुर: कशीदाकारी, चमड़े की कलात्मक जूतियां, बादले (जस्ते से निर्मित पानी की बोतलें) और मलमल।
बीकानेर: ऊंट की खाल पर की जाने वाली उस्ता कला (कलात्मक वस्तुएं), लहरिये और मोठड़े।
अन्य क्षेत्रीय शिल्प: शाहपुरा की फड़ पेंटिंग, प्रतापगढ़ की थेवा कला (कांच पर सोने की नक्काशी), मोलेला की मृण्मूर्तियां (टेराकोटा), बस्सी की काष्ठ कला, कोटा की डोरिया व मसूरिया साड़ियां, नाथद्वारा की पिछवाई कला, सांगानेर व बगरू की ब्लॉक प्रिंटिंग और खंडेला का बाटिक कार्य तथा बाड़मेर की अजरख व मलीर प्रिंट।
आर्थिक एवं सामाजिक महत्व:
क्षेत्रीय असमानता में कमी: हस्तशिल्प उद्योग ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में संचालित होता है, जिससे क्षेत्रीय आर्थिक असंतुलन दूर होता है।
रोजगार सृजन एवं पलायन पर रोक: एक मोटे अनुमान के अनुसार, राज्य में लगभग 4.10 लाख हस्तशिल्प इकाइयां कार्यरत हैं, जिनमें से लगभग 2.04 लाख ग्रामीण क्षेत्रों में और 2.06 लाख शहरी क्षेत्रों में हैं। यह क्षेत्र सीधे तौर पर लगभग 6 लाख शिल्पकारों (आर्टिजंस) को आजीविका प्रदान करता है, जिससे ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन रुका है।
विदेशी मुद्रा का अर्जन: राजस्थानी हस्तशिल्प की मांग विदेशों में निरंतर बढ़ रही है। यह क्षेत्र राज्य में प्रत्यक्ष निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा अर्जित करने का सबसे बड़ा और प्रमुख स्रोत है।
संस्थागत एवं नीतिगत प्रयास: राज्य सरकार और अन्य राष्ट्रीय संस्थाओं ने इस क्षेत्र के संवर्धन के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:
नीतिगत बल: राजस्थान की औद्योगिक नीति (विशेषकर 1998 और हालिया नीतियों) में हस्तशिल्प के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।
सलाहकार बोर्ड का गठन: राज्य सरकार द्वारा हाल ही में 'राजस्थान हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास सलाहकार बोर्ड' का गठन किया गया है, जो नीति निर्माण और शिल्पकारों की समस्याओं के समाधान में मील का पत्थर साबित हो रहा है।
संस्थान और सहायता: सीडो (SIDO) द्वारा प्रबंधकीय, तकनीकी और आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और खादी ग्रामोद्योग के सहयोग से सांगानेर में 'हस्तशिल्प कागज राष्ट्रीय संस्थान' (कुमारप्पा राष्ट्रीय संस्थान) की स्थापना की गई है।
राजसीको (RAJSIKO) की भूमिका: राजस्थान लघु उद्योग निगम (राजसीको) शिल्पकारों को नवीन तकनीकी ज्ञान, रियायती दरों पर कच्चा माल, विपणन (राजस्थली एम्पोरियम के माध्यम से) तथा प्रशिक्षण केंद्र उपलब्ध कराकर सराहनीय योगदान दे रहा है।
निष्कर्ष: बदलते समय की मांग के अनुरूप अब हस्तशिल्प में आधुनिक डिजाइनों और गुणवत्ता का समावेश किया जा रहा है। राजस्थान का हस्तशिल्प उद्योग न केवल राज्य की गौरवशाली संस्कृति का संवाहक है, बल्कि यह न्यूनतम पूंजी निवेश में अधिकतम रोजगार और विदेशी मुद्रा देने वाला राज्य की अर्थव्यवस्था का एक सुदृढ़ स्तंभ है।
Specially thanks to Questions Authors - P K Nagauri
साथियों, राजस्थान की यह अनमोल सांस्कृतिक धरोहर हमारी परीक्षाओं के साथ-साथ हमारी पहचान का भी एक गौरवशाली हिस्सा है। आपको यह पोस्ट कैसी लगी और आपकी तैयारी में इससे कितनी मदद मिली, हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं। आपके मूल्यवान सुझाव और फीडबैक हमें आने वाले क्विज़ और टेस्ट को और अधिक बेहतर बनाने में मदद करेंगे। अपने विचार साझा कर इस कम्युनिटी लर्निंग का हिस्सा बनें और साथी अभ्यर्थियों को प्रेरित करें। पढ़ते रहें, बढ़ते रहें!
Advertisement