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19-20वीं सदी में सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन

19-20वीं सदी में सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन

19वीं और 20वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन भारतीय इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ हैं, जो UPSC (Mains- GS Paper I) और RAS (Mains- Paper I) के पाठ्यक्रम का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। यह कालखंड केवल धार्मिक कुरीतियों के विरुद्ध सुधारों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने भारत में बुद्धिवाद (Rationalism), वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवतावाद (Humanism) की नींव रखी। सती प्रथा उन्मूलन, बाल विवाह पर रोक, और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध हुए इन प्रयासों ने भारतीय जनमानस में आत्मगौरव की भावना का संचार किया, जिसने आगे चलकर 'भारतीय राष्ट्रवाद' और 'स्वतंत्रता संग्राम' की वैचारिक आधारभूमि तैयार की। मुख्य परीक्षाओं में इन आंदोलनों के स्वरूप, सीमाओं और राष्ट्रीय चेतना के विकास में इनके योगदान पर अक्सर विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।

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19-20th Century Social and Religious Reform Movements Quiz

अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type)

प्र 1. तत्वबोधिनी सभा

उत्तर: देवेंद्र नाथ टैगोर द्वारा 1839 में ब्रह्म समाज की एक शाखा के रूप में तत्वबोधिनी सभा की स्थापना की, जिसका अध्यक्ष आचार्य केशव चंद्र सेन को नियुक्त किया। सेन ने इसकी शाखाएं बंगाल से बाहर उत्तर प्रदेश, पंजाब, मद्रास में स्थापित की।

प्र 2. वहाबी आंदोलन

उत्तर: मूलतः अरब के अब्दुल वहाब के विचारों से प्रेरित, परंतु भारत में इसका नेतृत्व सैयद अहमद रायबरेली ने किया। यह एक पुनरुत्थानवादी आंदोलन था जिसका उद्देश्य इस्लाम का शुद्धिकरण करना और भारत में मुस्लिम सत्ता की पुनर्स्थापना का प्रयास करना था।

प्र 3. सत्यशोधक समाज

उत्तर: सत्यशोधक समाज की स्थापना ज्योतिबा फुले द्वारा 1873 में की गई। इस समाज के अधिकांश नेताओं का संबंध समाज के निम्न वर्गों से था खासकर माली, तेली, कुनबी आदि। जाति प्रथा का विरोध तथा सामाजिक समानता पर बल देना इस आंदोलन का प्रमुख लक्ष्य था।

प्र 4. अलीगढ़ आंदोलन

उत्तर: सर सैयद अहमद खान के नेतृत्व में आधुनिक मुस्लिम सुधार आंदोलन। इसका मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समाज में पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार करना, पर्दा प्रथा व बहुविवाह जैसी कुरीतियों को समाप्त करना तथा उनका आधुनिक आधुनिकीकरण करना था।

प्र 5. रहनुमाई माजदयासन समाज

उत्तर: वर्ष 1851 में मुंबई में नौरोजी फरदोनजी, दादाभाई नौरोजी और एस.एस. बंगाली द्वारा स्थापित पारसी सुधार संस्था। इसका उद्देश्य पारसी धर्म का शुद्धिकरण करना तथा महिलाओं की सामाजिक स्थिति और शिक्षा में सुधार करना था।

प्र 6. ब्रह्म समाज

उत्तर: राजा राममोहन राय द्वारा 1828 में स्थापित। यह भारत का पहला संगठित सुधार आंदोलन था, जिसका मुख्य उद्देश्य एकेश्वरवाद का प्रचार, मूर्तिपूजा का विरोध और सती प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों का उन्मूलन करना था।

प्र 7. भारतीय सेवक समाज (Servants of India Society)

उत्तर: गोपाल कृष्ण गोखले ने मुंबई में 1905 में भारतीय सेवक समाज की स्थापना की, जो एक समाज सुधारक संस्था थी। इसके अन्य सदस्य श्रीनिवास शास्त्री, हृदयनाथ कुंजरू, एन एम जोशी थे।

प्र 8. अहमदिया आंदोलन?

उत्तर- मिर्जा गुलाम अहमद ने 1889 में एक आंदोलन शुरू किया जो उन्हीं के नाम पर अहमदिया आंदोलन कहलाया उन्होंने स्वयं को हजरत मुहम्मद के समकक्ष कहा तथा इस्लाम का मसीहा बताया। बाद में यह अपने आप को कृष्ण का अवतार कहने लगा।

प्र 9. शारदा अधिनियम?

उत्तर- श्री हरविलास शारदा के प्रयासों से बाल विवाह को रोकने के लिए 1929 में शारदा एक्ट बना, जिसके द्वारा विवाह की न्यूनतम आयु सीमा बढ़ाकर बाल विवाह पर रोक लगाने की कोशिश की गई।

प्र 10. भारत में पुनर्जागरण के जनक के नाम से कौन जाना जाता है?

उत्तर- राज् राममोहन राय का जन्म 1772 में राधा नगर, हुगली (बंगाल) में एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार में हुआ। राजा राम मोहन राय को 'आधुनिक भारत का पिता', 'भारतीय राष्ट्रवाद का जनक', 'पुनर्जागरण के जनक', 'भोर का तारा', 'प्रथम समाज सुधारक' कहा जाता है।

लघुत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type)

प्र 11. 19वीं - 20वीं सदी के दौरान हुए प्रमुख कानूनी सामाजिक सुधारों की सूची बनाइए।

उत्तर: इस कालखंड में औपनिवेशिक सरकार और भारतीय सुधारकों के प्रयासों से निम्नलिखित महत्वपूर्ण कानून बने:

  • शिशु वध प्रतिबंध अधिनियम(1795): शिशु हत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए गवर्नर जनरल वैलेजली द्वारा
  • सती प्रथा निषेध अधिनियम (1829): लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा (राजा राममोहन राय के प्रयासों से)।
  • दास प्रथा का उन्मूलन (1843): लॉर्ड एलेनबरो के समय (एक्ट V द्वारा)।
  • हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856): लॉर्ड कैनिंग/डलहौजी द्वारा (ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से)।
  • सि सिड मैरिज एक्ट (1872): अंतर्जातीय विवाहों को मान्यता।
  • सम्मति आयु अधिनियम / एज ऑफ कंसेंट एक्ट (1891): लड़की के विवाह की न्यूनतम आयु 12 वर्ष।
  • शारदा एक्ट (1929): विवाह की आयु लड़की हेतु 14 और लड़के हेतु 18 वर्ष।

प्र 12. ज्योतिराव गोविंदराव फुले के सामाजिक अवदान की समीक्षा कीजिए।

उत्तर: ज्योतिबा फुले के नाम से प्रसिद्ध 19वीं शताब्दी के एक महान भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रांतिकारी कार्यकर्ता के रूप में ज्योतिबा राव गोविंदराव फुले का नाम प्रसिद्ध है। सितंबर 1873 में इन्होंने महाराष्ट्र में सत्यशोधक समाज नामक संस्था का गठन किया। महिलाओं व दलितों के उत्थान के लिए इन्होंने अनेक कार्य किए। वे स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे और उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर पुणे में लड़कियों के लिए देश का पहला विद्यालय खोला। उनकी पुस्तक 'गुलामगिरी' शोषितों की आवाज बनी। उन्होंने बुद्ध और कबीर की मानवीय करुणा व समानता के विचारों को पुनर्जीवित किया।

प्र 13. प्रार्थना समाज के मुख्य उद्देश्यों एवं इसकी अनुषंगी संस्थाओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: वर्ष 1867 में केशवचंद्र सेन की प्रेरणा से आत्माराम पांडुरंग और महादेव गोविंद रानाडे द्वारा मुंबई में प्रार्थना समाज की स्थापना की गई। आर जी भंडारकर, एम जी चंद्रवाकर इसके अन्य प्रमुख नेता थे।

प्रार्थना समाज के चार उद्देश्य थे-:

(1) जाति प्रथा का विरोध,

(2) विवाह की आयु में वृद्धि,

(3) विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहन,

(4) स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना।

संबद्ध संस्थाएं: इसके प्रभाव से सोशल सर्विस लीग, डिप्रेस्ड क्लासेज मिशन (दलित जाति मंडल), आर्य महिला समाज, सेवा सदन और विधवा आश्रम संघ जैसी प्रगतिशील संस्थाओं का विकास हुआ।

प्र 14. धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में राजा राममोहन राय के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर: राजा राममोहन राय ने बहुभाषाविद् और बहुशास्त्रज्ञ होने के नाते उपनिषदों के आधार पर एकेश्वरवाद का समर्थन किया तथा मूर्तिपूजा, कर्मकांड और बहुदेववाद का खंडन किया। उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज नामक संस्था की स्थापना की। उन्होंने अंधविश्वास, मूर्ति पूजा, धार्मिक कर्मकांड आदि की निंदा की।

सामाजिक क्षेत्र में उनका सबसे ऐतिहासिक योगदान 1829 में सती प्रथा की गैर-कानूनी घोषणा करवाना था। उन्होंने महिलाओं के संपत्ति अधिकारों की वकालत की, बहुविवाह का विरोध किया और पाश्चात्य वैज्ञानिक शिक्षा का समर्थन किया। उनके इन्हीं बहुआयामी सुधारों के कारण उन्हें 'प्रथम आधुनिक पुरुष' माना जाता है।

प्र 15. थियोसोफिकल सोसायटी के सिद्धांत और भारत में इसके प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: रूसी मैडम ब्लावत्स्की और अमेरिकी कर्नल ऑल्काट द्वारा 1875 (न्यूयॉर्क) में स्थापित इस संस्था का मुख्यालय 1882 में अड्यार (मद्रास) बना। यह सोसायटी हिंदू धर्म के दार्शनिक स्वरूप (वेदांत, सांख्य, पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत) से अत्यधिक प्रभावित थी। इसने सार्वभौमिक बंधुत्व की भावना पर बल दिया। भारत में एनी बेसेंट ने इसे लोकप्रिय बनाया। इस आंदोलन ने प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति भारतीयों में खोए हुए राष्ट्रीय गौरव और आत्मविश्वास को पुनः जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

निबंधात्मक प्रश्न (Long Answer Type) 

प्र 16. 19वीं शताब्दी में सामाजिक-धार्मिक सुधारों का क्या स्वरूप था और इन सुधारों ने भारतीय राष्ट्रीय जागरण में किस प्रकार योगदान किया था?

उत्तर:

सुधार आंदोलनों का स्वरूप: 19वीं शताब्दी के सुधार आंदोलनों का स्वरूप बहुआयामी, तर्कसंगत और मानवतावादी था। चूंकि तत्कालीन भारतीय समाज में कुरीतियां धर्म से गहराई से जुड़ी थीं, इसलिए समाज सुधार और धर्म सुधार एक-दूसरे के पूरक बन गए। स्वरूप के आधार पर ये आंदोलन दो धाराओं में बंटे थे:
  • सुधारवादी (Reformist): जो आधुनिक पाश्चात्य विचारों और बुद्धिवाद से प्रभावित थे (जैसे- ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, अलीगढ़ आंदोलन)।
  • पुनरुत्थानवादी (Revivalist): जो अपनी प्रेरणा अतीत और प्राचीन शुद्ध धार्मिक ग्रंथों से लेते थे (जैसे- आर्य समाज, वहाबी आंदोलन, थियोसोफिकल सोसायटी)।

यह आंदोलन मुख्य रूप से शहरी मध्यम वर्ग तक सीमित था, जिसने वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वैयक्तिक स्वतंत्रता और धार्मिक सार्वभौमिकता पर बल दिया।

राष्ट्रीय जागरण में योगदान: इन आंदोलनों ने अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक राष्ट्रवाद की मजबूत आधारभूमि तैयार की:

  • सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उदय: स्वामी दयानंद और विवेकानंद जैसे विचारकों ने भारतीयों के मन से हीनभावना को समाप्त कर आत्मगौरव की भावना का संचार किया।
  • लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रसार: स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और नागरिक अधिकारों जैसे आधुनिक विचारों को भारतीय जनमानस के अनुकूल बनाकर प्रस्तुत किया गया।
  • समाजिक सुदृढ़ीकरण: जातिवाद, छुआछूत और लैंगिक असमानता पर चोट करने से समाज आंतरिक रूप से एकजुट हुआ, जो राष्ट्रीय आंदोलन के लिए अनिवार्य था।
  • स्वदेशी की भावना: स्वामी दयानंद सरस्वती ने सर्वप्रथम 'स्वराज' शब्द का प्रयोग किया और विदेशी शासन को एक अभिशाप बताया, जिसने आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम को वैचारिक ईंधन दिया।

प्र 17. राष्ट्रीय चेतना के विकास में स्वामी विवेकानंद की भूमिका पर संक्षिप्त रूप से विचार कीजिए।

उत्तर: स्वामी विवेकानंद और उनके द्वारा 1897 में स्थापित रामकृष्ण मिशन ने भारतीय राष्ट्रीय चेतना को एक नई दिशा और आक्रामकता प्रदान की। विवेकानंद ने अध्यात्म को पलायनवाद के बजाय 'कर्मयोग' से जोड़ा। 1893 के शिकागो विश्व धर्म संसद में उनके व्याख्यान ने पाश्चात्य जगत में भारतीय संस्कृति की सर्वोच्चता स्थापित की, जिसने औपनिवेशिक दासता झेल रहे भारतीयों में अभूतपूर्व आत्मविश्वास भरा। 1899 में उनके द्वारा बेलूर मठ को स्थापित किया गया।

राष्ट्रीय चेतना में मुख्य योगदान:

  • नैतिक राष्ट्रवाद का सृजन: उन्होंने युवाओं को "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए" का मंत्र दिया। उनका राष्ट्रवाद संकीर्ण नहीं, बल्कि आत्मिक शक्ति और निर्भीकता पर आधारित था।
  • कमजोर वर्गों के प्रति संवेदना: विवेकानंद का प्रसिद्ध उद्घोष था कि "जब तक देश में लाखों लोग भूखे और अज्ञानी हैं, तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूँ जो उनकी कीमत पर शिक्षा पाकर भी उनकी परवाह नहीं करता।" उन्होंने 'दरिद्र नारायण' की सेवा को ही वास्तविक धर्म माना।
  • हीनभावना और जड़ता का अंत: उन्होंने भारतीयों को कायरता और हीनभावना त्यागकर 'अभय' (निडर) बनने का संदेश दिया। सुभाष चंद्र बोस ने ठीक ही कहा था कि "विवेकानंद आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन के आध्यात्मिक पिता थे।" उनके विचारों ने युगांतर और अनुशीलन समिति जैसे जुझारू राष्ट्रवादी संगठनों के क्रांतिकारियों को मानसिक रूप से प्रेरित किया।

प्र 18. 'आर्य समाज ने एक पुनरुत्थानवादी आंदोलन को जन्म देकर इसे व्यापक बनाया, लेकिन इसके साथ ही साथ इसने अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू कट्टरपंथिता एवं सांप्रदायिकता को भी बढ़ावा दिया।' दयानंद सरस्वती के प्रयासों के आधार पर इस कथन की समीक्षा करें।

उत्तर: स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में स्थापित आर्य समाज एक अत्यंत प्रभावशाली पुनरुत्थानवादी आंदोलन था। उन्होंने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा देकर वैदिक शुद्धता को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया।

पुनरुत्थानवाद और व्यापक प्रभाव (सकारात्मक पक्ष):

आर्य समाज ने हिंदू धर्म की आंतरिक बुराइयों पर प्रगतिशील प्रहार किया। उन्होंने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, पुरोहितवाद और बाल विवाह का तीव्र खंडन किया। उन्होंने महिलाओं और शूद्रों को वेद पढ़ने का समान अधिकार देकर सामाजिक क्रांति की। शिक्षा के क्षेत्र में डी.ए.वी. (DAV) कॉलेजों और पारंपरिक गुरुकुलों की स्थापना कर देश में राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत शिक्षा का प्रसार किया। दयानंद सरस्वती पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 'स्वराज', 'स्वदेशी' और 'मानक हिंदी (राष्ट्रभाषा)' पर बल दिया। उनके इसी उग्र राष्ट्रवाद के कारण ब्रिटिश लेखक वैलेंटाइन शिरोल ने उन्हें 'भारतीय अशांति का जनक' कहा था।

हिंदू कट्टरपंथिता और सांप्रदायिकता का उभार (नकारात्मक/समीक्षात्मक पक्ष):

आर्य समाज की कुछ नीतियों के अप्रत्यक्ष और अनपेक्षित परिणाम भी सामने आए, जिन्होंने सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया:

  • शुद्धि आंदोलन: गैर-हिंदुओं या धर्मांतरित हिंदुओं को पुनः हिंदू धर्म में लाने के इस प्रयास को अन्य अल्पसंख्यक समुदायों (विशेषकर मुस्लिमों और ईसाइयों) ने एक आक्रामक चुनौती के रूप में देखा। इसके जवाब में मुस्लिम समाज में 'तंजीम' और 'तबलीग' जैसे आंदोलन शुरू हुए।
  • गोरक्षिणी सभाएं: गायों की रक्षा के लिए बनाई गई इन सभाओं और 'हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान' के नारे ने बहुसंख्यकवाद की भावना को बल दिया, जिससे धार्मिक ध्रुवीकरण की स्थिति उत्पन्न हुई।
  • वैदिक सर्वोच्चता का दावा: वेदों को पूर्णतः अचूक और समस्त वैज्ञानिक ज्ञान का स्रोत मानने के हठ ने अन्य धर्मों के प्रति तार्किक संवाद के रास्ते बंद किए।

निष्कर्ष:

यद्यपि स्वामी दयानंद का मूल उद्देश्य हिंदू समाज की रक्षा और राष्ट्रीय स्वतंत्रता हेतु एकजुटता स्थापित करना था, परंतु उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया की राजनीति (अलीगढ़ आंदोलन बनाम आर्य समाज) ने कालांतर में दोनों समुदायों के मध्य अविश्वास की खाई को चौड़ा किया, जो आगे चलकर भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता के विकास का एक कारण बनी।

Specially thanks to Post Authors - P K Nagauri, महावीर जी कुमावत

अन्य महत्वपूर्ण नोट्स और टेस्ट इन्हें भी ज़रूर देखें।

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