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सिंधु सभ्यता से ब्रिटिश काल: भारत की वास्तुकला व साहित्य | RAS Mains

सिंधु सभ्यता से ब्रिटिश काल: भारत की वास्तुकला व साहित्य | RAS Mains

"सिंधु घाटी सभ्यता के उत्कृष्ट नगर नियोजन से लेकर ब्रिटिश काल की आधुनिक वास्तुकला तक, भारत की सांस्कृतिक यात्रा इसके अद्वितीय स्थापत्य और समृद्ध साहित्यिक इतिहास में जीवंत है। यह ब्लॉग पोस्ट UPSC, MPPSC, BPSC, UKSSSC, UPPSC और RAS मुख्य परीक्षा के दृष्टिकोण से कला एवं संस्कृति के इस अत्यंत महत्वपूर्ण खंड का एक विश्लेषणात्मक संकलन प्रस्तुत करती है। इसमें प्राचीन काल की मंदिर शैलियों, मध्यकालीन इस्लामी नवाचारों और आधुनिक वास्तुकला के क्रमिक विकास को मुख्य परीक्षा के सटीक प्रारूप (अतिलघु, लघु और निबंधात्मक प्रश्नों) में ढाला गया है, जो अभ्यर्थियों के उत्तर-लेखन कौशल को निखारने में सहायक सिद्ध होगा।"

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Indian Vastu & Literature Indus to British Era

Vastu and literary tradition of India from Indus civilization to British period

अतिलघुतरात्मक ( 15 से 20 शब्द )

प्र 1. बेसर शैली?

उत्तर- यह शैली विंध्य और कृष्णा नदी के बीच दक्षिणावर्त में फैली हुई थी। इस शैली में नागर व द्रविड़ शैली के तत्व मिश्रित है। इस शैली के मंदिर अर्द्ध गोलाकार होते थे तथा इनमें देवुल गर्भगृह और सभा मंडप होता था। एलोरा का कैलाश मंदिर, एलिफेंटा की गुफा मंदिर तथा होयसेल राजाओं द्वारा निर्मित मंदिर इसी शैली में है।

प्र 2. गोपुरम क्या है?

उत्तर- गोपुरम का अर्थ है प्रवेश द्वार। जो दक्षिण भारत में द्रविड़ शैली के मंदिरों के आगे होता था। यह काफी कलात्मक ढंग एवं भव्यता के साथ बनाया जाता था और कभी कभी मुख्य मंदिर से भी ऊंचा होता था। चोल एवं गंग राजाओं द्वारा बनाए गए गोपुरम भव्य है।

प्र 3. गोल गुंबद ?

उत्तर- बीजापुर की सबसे अधिक प्रसिद्ध इमारत मोहम्मद आदिल शाह का मकबरा है। इसे गोल गुंबद कहते हैं। इस इमारत की गिनती भारत की सबसे विशाल और भव्य इमारतों में होती है। यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गुंबद है।

प्र 4. चित्रित धूसर मृदभांड परंपरा?

उत्तर- पंजाब, हरियाणा, उत्तर राजस्थान, ऊपरी गंगा घाटी चित्रित धूसर मृदभांड परंपरा के प्रमुख केंद्र थे। उत्तर-वैदिक काल (लगभग 1000-600 ई.पू.) से संबंधित एक लौह-युगीन संस्कृति हैं। यह ग्रामीण से अर्ध-शहरी संक्रमण को दर्शाती है। इस संस्कृति का अनुमानित समय 800 से 400 बीसी है।

प्र 5. सैयद एवं लोदी कालीन स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएं बताइए?

उत्तर- 1. अष्टकोणीय और चतुष्कोणीय मकबरों की प्रधानता।

2. वास्तुकला में 'दोहरे गुंबद' (Double Dome) तकनीक की शुरुआत।

3. इमारतों का ऊंचे चबूतरों पर निर्माण तथा तामचीनी टाइलों (Enamelled Tiles) का प्रयोग।

 

लघुउत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 6. "गांधार मूर्तिकला रोम निवासियों की उतनी ही ऋणी थी जितनी कि वह यूनानियों की थी।" स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: कनिष्क काल में विकसित गांधार कला मूलतः भारतीय विषयों पर आधारित 'ग्रीको-रोमन' शैली थी।

  • यूनानी प्रभाव: बुद्ध के घुंघराले बाल, अपोलो देवता सदृश मुखाकृति, शारीरिक सौष्ठव और वस्त्रों की लहरदार तहें (Drapery)।

  • रोमन प्रभाव: मूर्तियों में अत्यधिक यथार्थवाद, मूंछों का अंकन, बुद्ध के सिर के पीछे 'प्रभामंडल' (Halo) तथा तोरणों एवं अलंकरणों की रोमन कलात्मक शैली।

    अतः, इसने यूनानी सौंदर्यशास्त्र और रोमन यथार्थवाद का भारतीय आध्यात्मिकता के साथ उत्कृष्ट समन्वय किया।

प्रश्न 7. आधुनिक भारतीय स्थापत्य कला की मुख्य विशेषताएं बताइए।

उत्तर: औपनिवेशिक एवं उत्तर-औपनिवेशिक काल की आधुनिक भारतीय वास्तुकला की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  1. प्रकार्यात्मकता (Functionalism): भव्यता के स्थान पर उपयोगिता, सादगी और जन-उपयोग (जैसे- रेलवे स्टेशन, सचिवालय) को प्राथमिकता।

  2. इंडो-सारैसेनिक शैली: ब्रिटिश, मुगल और हिंदू स्थापत्य तत्वों का सम्मिश्रण (उदा. गेटवे ऑफ इंडिया)।

  3. आधुनिक सामग्री: कंक्रीट, स्टील, कांच और उन्नत इंजीनियरिंग तकनीकों का व्यापक प्रयोग।

  4. ज्यामितीय शुद्धता: समरूपता, विशालकाय ढांचे और सुव्यवस्थित नगरीय नियोजन (उदा. चंडीगढ़ और लुटियंस दिल्ली)।

प्रश्न 8. मुगल कालीन स्थापत्य कला की मुख्य विशेषताएं बताइए।

उत्तर: मुगल वास्तुकला इस्लामी, फारसी और भारतीय शैलियों का एक परिष्कृत संश्लेषण थी। इसकी मुख्य विशेषताएं हैं:

  1. सामग्री: लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर का संतुलित व व्यापक उपयोग।

  2. चारबाग पद्धति: भवनों के चारों ओर ज्यामितीय रूप से व्यवस्थित उद्यान और बहते पानी के फव्वारे।

  3. पिएत्रा-ड्यूरा (Pietra Dura): संगमरमर पर रंगीन कीमती पत्थरों की जड़ाई की पच्चीकारी तकनीक।

  4. संरचनात्मक तत्व: विशाल कड़े मेहराब, ऊंचे गुंबद, पतली मीनारें और प्रकाश-छाया के लिए जालीदार झरोखे।

  5. सममिति (Symmetry): भवनों में पूर्ण संतुलन और भव्य पैमाना (उदा. ताजमहल)।

 

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 9. द्वितीय नगरीकरण से आप क्या समझते हैं? छठवीं शताब्दी ईस्वी पूर्व में नगरों के पुनरुत्थान के कारणों की विवेचना करते हुए इसमें लोहे की भूमिका का परीक्षण करें।

उत्तर: प्रस्तावना: प्राचीन भारत में नगरों के उदय और विकास की द्वितीय लहर को 'द्वितीय नगरीकरण' कहा जाता है, जिसका केंद्र मुख्य रूप से मध्य-गंगा घाटी (छठी शताब्दी ईसा पूर्व) था। भारत का प्रथम नगरीकरण कांस्य युगीन हड़प्पा सभ्यता में हुआ था, जिसके पतन के लंबे अंतराल के बाद प्राक-मौर्य काल में पुनः नगरों का उदय हुआ।

नगरों के पुनरुत्थान (उदय) के कारण: छठी शताब्दी ईसा पूर्व में नगरों का उदय आकस्मिक न होकर बहुआयामी सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों का परिणाम था:

  1. आर्थिक कारण (कृषि अधिशेष): कृषि तकनीकों में सुधार से अधिशेष उत्पादन हुआ, जिसने गैर-कृषि गतिविधियों (शिल्प और व्यापार) को जन्म दिया। शिल्प विशिष्टीकरण के कारण व्यावसायिक संघों या श्रेणियों (Guilds) का उदय हुआ।

  2. व्यापार एवं मौद्रिकरण: 'आहत सिक्कों' (Punch-marked coins) के प्रचलन और आंतरिक व बाह्य व्यापारिक मार्गों (जैसे- उत्तरापथ) के विकास ने व्यापारिक केंद्रों को नगरों में बदल दिया।

  3. राजनीतिक कारण: महाजनपदों के उदय ने राजधानियों (जैसे- राजगृह, श्रावस्ती, पाटलिपुत्र) को प्रशासनिक, सामरिक और आर्थिक शक्ति का केंद्र बना दिया, जहाँ सैनिक, शिल्पी और अधिकारी निवास करते थे।

  4. सामाजिक-धार्मिक कारण: वर्ण व्यवस्था में वैश्यों को निम्न स्थान प्राप्त था, परंतु आर्थिक रूप से वे समृद्ध हो रहे थे। जैन और बौद्ध धर्मों ने समुद्री व्यापार, ब्याज प्रथा और नगरीय जीवन को सामाजिक स्वीकृति दी, जिससे वैश्य वर्ग नगरों की ओर आकर्षित हुआ।

नगरीकरण में लोहे की भूमिका का परीक्षण: द्वितीय नगरीकरण को 'लौह-युगीन नगरीकरण' भी कहा जाता है, क्योंकि इस प्रक्रिया को गति देने में लोहे की भूमिका क्रांतिकारी थी:

  • जंगलों की सफाई: गंगा घाटी की सघन वनस्पतियों और कड़े वनों को साफ करने में लोहे की कुल्हाड़ियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे विशाल कृषि योग्य भूमि उपलब्ध हुई।

  • कृषि का आधुनिकीकरण: लोहे के फाल (Iron plowshares) के प्रयोग से भारी और गीली मिट्टी की गहरी जुताई संभव हुई। इससे धान की रोपाई प्रणाली (Transplantation) को बल मिला, जिसने 'कृषि अधिशेष' (Surplus) को कई गुना बढ़ा दिया। यही अधिशेष नगरीय आबादी के भरण-पोषण का आधार बना।

  • शिल्प और उद्योगों का विकास: लोहे के मजबूत औजारों ने बढ़ईगिरी, रथ-निर्माण, और पाषाण-शिल्प जैसे उद्योगों को उन्नत किया।

  • सामरिक सुदृढ़ता: लोहे के उन्नत हथियारों ने मगध जैसे साम्राज्यों को सैन्य शक्ति प्रदान की, जिससे राजनीतिक स्थिरता आई और व्यापारिक मार्ग सुरक्षित हुए।

निष्कर्ष: यद्यपि द्वितीय नगरीकरण में सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक कारकों का महत्वपूर्ण योगदान था, परंतु लोहे के तकनीकी ज्ञान ने उस आर्थिक आधारशिला (कृषि अधिशेष और शिल्प) का निर्माण किया जिसके बिना नगरों का पुनरुत्थान संभव नहीं था।

प्रश्न 10. अकबर युगीन स्थापत्य की तुलना में शाहजहाँ युगीन स्थापत्य कला में क्या परिवर्तन आए? समीक्षा कीजिए।

उत्तर: प्रस्तावना: मुगल स्थापत्य कला का विकास एक क्रमिक प्रक्रिया थी। अकबर का काल जहाँ इस वास्तुकला का 'प्रयोग और निर्माण काल' (Formative Phase) था, वहीं शाहजहाँ का काल इसका 'स्वर्ण युग' या चरमोत्कर्ष (Climax) माना जाता है। दोनों शासकों के काल में स्थापत्य प्राथमिकताओं, निर्माण सामग्री और सौंदर्यशास्त्र में स्पष्ट परिवर्तन देखे जा सकते हैं।

स्थापत्य के आयाम अकबर युगीन स्थापत्य शाहजहाँ युगीन स्थापत्य
1. प्राथमिक निर्माण सामग्री मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) का उपयोग किया गया। (उदा. फतेहपुर सीकरी, आगरा का किला) अत्यधिक रूप से सफेद संगमरमर (White Marble) को प्राथमिकता दी गई। (उदा. ताजमहल, मोती मस्जिद)
2. अलंकरण एवं तकनीक अलंकरण में सादगी थी; दीवारों पर नक्काशी और ज्यामितीय प्रतिरूपों का प्रयोग था। अत्यंत जटिल और भव्य 'पिएत्रा-ड्यूरा' (Pietra Dura - संगमरमर पर कीमती पत्थरों की जड़ाई) तकनीक का चरमोत्कर्ष था।
3. मेहराब एवं स्तंभ मेहराब सीधे और मजबूत होते थे। वास्तुकला पर हिंदू और राजपूत शैलियों (कोठक/Brackets और शहतीर) का गहरा प्रभाव था। मेहराब दांतेदार या बहु-नुकीले (Foliated/Cusped Arches) हो गए। स्तंभों पर अत्यधिक महीन नक्काशी और बेल-बूटे बनाए गए।
4. गुंबद एवं मीनार संरचना गुंबद सामान्यतः अर्ध-गोलाकार या लोदी शैली से प्रभावित थे। स्वतंत्र मीनारों का विकास प्रारंभिक चरण में था। प्याज के आकार के दोहरे गुंबद (Bulbous/Double Domes) और भवनों के चारों कोनों पर स्वतंत्र, संतुलित मीनारों का पूर्ण विकास हुआ।
5. सांस्कृतिक दृष्टिकोण अकबर के भवन धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी दृष्टिकोण को दर्शाते हैं, जहाँ विभिन्न भारतीय संस्कृतियों का समन्वय है। शाहजहाँ की वास्तुकला में रूढ़िवादी इस्लामी और फारसी तत्वों की प्रधानता है, जो राजशाही वैभव और विलासिता को प्रदर्शित करती है।

विश्लेषणात्मक समीक्षा (परिवर्तनों का प्रभाव):

  • दृढ़ता बनाम कोमलता: अकबर के भवनों में एक साम्राज्य की सुदृढ़ता, मौलिकता और विशालता (Robustness) दिखाई देती है, जबकि शाहजहाँ के भवनों में नाजुक कलात्मकता, संवेगात्मक सौंदर्य और अति-व्ययपूर्ण प्रदर्शन (Sophistication) प्रमुख है।

  • पुनर्निर्माण: शाहजहाँ ने कलात्मक असंतोष के कारण आगरा के किले में अकबर द्वारा निर्मित कई लाल बलुआ पत्थर की संरचनाओं को तुड़वाकर उनके स्थान पर संगमरमर के दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास का निर्माण करवाया।

निष्कर्ष: संक्षेप में, अकबर ने मुगल वास्तुकला को एक विशाल, मजबूत और समन्वयात्मक आधार ढांचा प्रदान किया, जबकि शाहजहाँ ने उसमें संगमरमर की शुद्धता और पिएत्रा-ड्यूरा की सूक्ष्मता को जोड़कर उसे वैश्विक विस्मय और कला के चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया।

अन्य महत्वपूर्ण नोट्स और टेस्ट इन्हें भी ज़रूर देखें।

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