अभिलेख ( Part 02)

नांदसा यूप स्तंभ लेख:-
यह अभिलेख भीलवाड़ा जिले के नांदसा ग्राम के एक सरोवर में 12 फीट ऊंचे एक गोल स्तंभ पर उत्कीर्ण है जो 225ई.का माना जाता है|
नांदसा गांव भीलवाड़ा से 36 मील की दूरी पर स्थित है|
इस लेख की स्थापना सोम द्वारा की गई थी|
इस लेख में शक्तिगुरू नामक व्यक्ति द्वारा इस स्थान पर षष्ठिरात्र यज्ञ संपादित किए जाने का उल्लेख मिलता है|
यह लेख वर्ष के अधिकांश समय में पानी में डूबा रहता है केवल गर्मियों में तालाब के पानी सूखने पर इसे पढ़ा जाता है|
यह लेख एक छह पत्तियों का लेख ऊपर से नीचे और दूसरा 11 पंक्तियों का उसके चारों और उत्कीर्ण है|

बर्नाला यूप- स्तंभलेख:-
जयपुर राज्य के अंतर्गत बर्नाला नामक स्थान पर एक यूप-स्तंभ  प्राप्त हुआ है|
जिसे आमेर संग्रहालय में सुरक्षित रख दिया गया है चैत्र शुक्ल पूर्णिमा 284 कृत संवत है|
इसके अनुसार संवत 284 में सोहर्न गोत्रोत्पन वर्धन नामक व्यक्ति ने सात यूप-स्तम्भों की प्रतिष्ठा का पुन्यार्जन किया था|
यह लेख 278 का माना जाता है|
इस शिलालेख में भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए गर्गत्रिरात्रि का आयोजन का उल्लेख मिलता है|

सिवाना का लेख:-
1537 का यह लेख राव मालदेव (जोधपुर)की सिवाना विजय का सूचक है|

बैराट का लेख:-
यह लेख बैराट की छत्री का है|
इसका समय पोष-शुक्ला पंचमी संवत 1743 वर्णित है|
छत्री का निर्माण छितरमल के भतीजे सांवल दास ने करवाया था|
सांवल दास गौड़ा ब्राह्मण थे इस को सिंह की उपाधि मुगल सम्राट औरंगजेब ने दी थी|
पीपाड गांव उसे जागीर के रूप में दिया गया था|
छतरी का निर्माण छितरमल की पत्नी जमना के सती होने पर कराया गया था|
यह लेख ढुंढाडी भाषा में उत्कीर्ण है|   

बड़वा यूप(स्तंभ) लेख:-
बॉरा जिले के बडवा नामक स्थान से प्राप्त यह शिलालेख 238-39ई.का है यह शिलालेख  3-यूप-स्तंभ में प्राप्त हुए है|
इस शिलालेख मे बलवर्धन सोमदेव और बलसिंह द्वारा त्रिरात्र यज्ञों के आयोजन के उपरांत मौखरी धनत्रात द्वारा अप्तोयाम यज्ञ  को संपादित किए जाने का उल्लेख मिलता है|
यह अभिलेख मौखरी राजाओं का सबसे पुराना और पहला अभिलेख है|
यह एक यूप पर खुदा है यूप एक प्रकार का स्तंभ है|
इस अभिलेख में कृत संवत का उल्लेख किया गया है जिस में कहा गया है कि कृत युग के 295 वर्ष व्यतीत होने पर मौखरी शासकों ने यज्ञ किए थे|
इस अभिलेख से मौखरीयो की एक नई शाखा का पता लगता है|
बड़वा यूप मौखरी वंश से संबंधित है मौखरी राजाओं की कई शाखाएं थी|
बड़वा यूप का प्रमुख व्यक्ति बल था जो अन्य शाखाओं से अधिक पुरानी शाखा से संबंध रखता है|
उस की उपाधि महा सेनापति की होने से अर्थ निकलता है कि वह बहुत शक्तिशाली था|
यह प्रतीत होता है कि यह शक-क्षत्रपों के अधीन रहे होंगे|
बड़वा यूप अभिलेख की भाषा संस्कृति और लिपि ब्राह्मी उतरी है|

इस अभिलेख में प्रारंभिक मौखरियों की स्थिति (छठी सदी) के बारे में बताया गया है:-
1-श्री महा सेनापति मौखरी बल पुत्र बलवर्धन का यूप जिसने यज्ञ किया|
2-श्री महासेनापति मौखरी बल पुत्र सोमदेव का यूप जिसने यज्ञ किया|
3-श्री महासेनापति मौखरी बली पुत्र बलसिंह का यूप जिसने यज्ञ किया|            

श्रंगी ऋषि शिलालेख:-
यह शिलालेख एकलिंग जी से लगभग 6 मील दूर दक्षिण पूर्व में श्रंगी ऋषि नामक स्थान में एक तिबारे(बरामदा)में लगा हुआ है|
इसका समय विक्रमी संवत 1485 श्रावण शुक्ला 5 का है|
हालांकि इस लेख के प्रस्तर के 3 टुकड़े हो जाने के कारण क्षत-विक्षत हो गया है|
फिर भी श्याम प्रस्तर पर उत्कीर्ण यह लेख तत्कालीन ऐतिहासिक स्त्रोत की एक अच्छी सामग्री बना हुआ है|
यह संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण लेख है और इसमें 30 श्लोक हैं|
इसकी रचना कविराज वाणी विलास योगेश्वर द्वारा मानी जाती है और इसे हादा के पुत्र  फना ने खोदा था|
यह लेख मोकल के समय का है|
जिसने अपने धार्मिक गुरु की आज्ञा से अपनी पति गोरांबिका की मुक्ति के लिए श्रृंगी ऋषि के पवित्र स्थान पर एक कुंड बनवाया और उसकी प्रतिष्ठा की|
इस लेख का प्रारंभ विद्या देवी की प्रार्थना से किया गया है|बाद में हम्मीर,क्षेत्रसिह  और मोकल की उपलब्धियों का वर्णन किया गया है|
हम्मीर की विजय यात्रा के वर्णन के साथ इसमें यह भी उल्लेखित है कि लाखा के पुत्र मोकल ने नागौर के प्रशासक फिरोज खॉ और गुजरात के प्रशासक अहमद खाँ के साथ युद्ध किए थे|
इस अभिलेख का समय विक्रमी संवत 1485 व 1428ई. माना गया है|
इस अभिलेख में भीलो के सामाजिक जीवन पर भी प्रकाश डाला गया है|
इस अभिलेख के द्वारा यह ज्ञात होता है कि हम हम्मीर ने भीलों से सफलतापूर्वक युद्ध किया और अपने शत्रु राजा जैत्र को पराजित किया था|
इस लेख में लक्ष्मण सिंह और क्षेत्रसिंह की काशी ,प्रयाग और गया की यात्रा का उल्लेख है जहां उन्होंने दान में विपुल धनराशि दी थी|
इस लेख में यह वर्णित किया गया है कि लाखा के त्रिस्थली काशी प्रयाग और गया से हिंदुओं से लिए जाने वाले करों को हटवाया था और गया में मंदिर का निर्माण करवाया था|
इस अभिलेख से मेवाड़ गुजरात और मेवाड़ मालवा के राजनीतिक संबंधों की जानकारी प्राप्त होती है|

बर्बथ का लेख:-
इस लेख में मुगल राजपूत वैवाहिक संबंधों के साथ-साथ अकबर की रानी मरियम मुज्बानो की आज्ञा से निर्मित बाग और बावरियों का बर्बथ(बयाना) में निर्माण का उल्लेख मिलता है|
बर्बथ के लेख का समय 1613ई.माना गया है|
यह राज्य का सबसे बड़ा लेख है|

अपराजित का शिलालेख (661):-
यह शिलालेख नागदा गांव (उदयपुर)के निकट कुंडेश्वर के मंदिर की दीवार पर अंकित है|
इससे सातवीं शताब्दी में मेवाड़ की धार्मिक स्थिति के बारे में जानकारी मिलती है|
यह लेख संस्कृत भाषा में और कुटिल-लिपि मे है|
इस शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि इस युग में विष्णु मंदिरों का निर्माण काफी प्रचलित था|

आबू का लेख(अचलेश्वर) अभिलेख:-
इस अभिलेख का समय 1285 का है इसमें 62 श्लोक हैं||
इसमें बप्पा रावल से समरसिंह तक के मेवाड़ के शासकों का वर्णन है|
इस अभिलेख की रचना चित्तौड़ निवासी वेद शर्मा ने की थी|
इस अभिलेख में यह भी उल्लेखित है कि समरसिंह ने मठाधीश भाव शंकर की आज्ञा से उक्त मठ का जीर्णोद्धार करवाया और तपस्वी की भोजन व्यवस्था की थी
मेट पाद का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि बापा द्वारा यहां दुर्जनों का संहार हुआ और उनकी चर्बी से यहां की भूमि गीली हो जाने से इसे मेटपाद कहा गया|
इस अभिलेख में हारित ऋषि के द्वारा नागदा में घोर तपस्या करने और इसके उपरांत बप्पा को राज्य की प्राप्ति का वर्णन भी आता है|
इस अभिलेख में आबू पर्वत की स्थिति उपज वनस्पति के बारे में पता चलता है|
इसमें परमार वंशी राजाओं की उपलब्धियों के साथ साथ वास्तु पाल व तेजपाल के वंशो का उल्लेख मिलता है|
इस अभिलेख से ज्ञात होता है की देलवाड़ा के नेमिनाथ मंदिर में यह प्रशस्ति तेजपाल ने लगवाई थी|          

रण कपूर प्रशस्ति:-
यह प्रशस्ति अभिलेख 1439 का है|
यह पाली जिले के रण कपूर के चौमुखा जैन मंदिर के बाए स्तम्भ पर उत्कीर्ण है|
इसमें नागरी लिपि और संस्कृत भाषा का गद्य में प्रयोग हुआ है|
इस प्रशस्ति का ऐतिहासिक महत्व है|
इसमें इस मंदिर के निर्माता दीपा का नाम अंकित है और बप्पा रावल से कुंभा तक की वंशावली भी दी गई है|
इसमें महाराणा कुंभा की विजय का विशद वर्णन उपलब्ध है और उसके द्वारा प्रयुक्त विरुद भी इसमें उपलब्ध है|
ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रशस्ति में मेवाड़ के राज परिवार के वंश क्रम को बड़ी छानबीन के साथ लिखने का सफल प्रयास किया गया है|
महेन्द्र,अपराजितों के नाम तो इसमें छोड़ दिए गए हैं पर राणा कुंभा का वर्णन विशेष रुप से किया गया है|
इस में गुहिल को बापा का पुत्र बताया गया है|
इस शिलालेख में बप्पा और काल भोज को प्रथक प्रथक व्यक्ति बताया गया है|
इसमें धरणक सेठ के वंश और उसके शिल्पी का परिचय दिया गया है|
इस प्रशस्ति में तत्कालीन मुद्रा (नाणक) की जानकारी दी गई है|
नाणक एक मुद्रा थी जो 15 शताब्दी में मेवाड़ में प्रचलित थी|

नेमिनाथ(आबू)के मंदिर की प्रशस्ति:-
सिरोही जिले में आबू के समीप देलवाड़ा ग्राम में नेमिनाथ का मंदिर निर्मित है|
इस मंदिर का निर्माता तेजपाल था उसी ने यह प्रशस्ति लगवाई थी|
इस प्रशस्ति में आबू,मारवाड़, सिंध,मालवा और गुजरात के कुछ क्षेत्रों पर शासन करने वाले परमार नरेशों की उपलब्धियों का उल्लेख है|
इसके साथ ही मंदिर के निर्माता वास्तु पाल और तेजपाल के वंशजों का विवरण है|
यह प्रशस्ति विक्रमी संवत 1287 श्रावण बुदि 3 रविवार और (1230ई.)की है|
इसमें 74 श्लोक हैं इस प्रशस्ति की रचना सोमेश्वर देव ने की थी और उसे सूत्रधार चंडेश्वर ने खोदा था|

कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति दिसंबर (1460):-
मेवाड़ राज्य के राणा कुंभा द्वारा कीर्ति स्तंभ (चित्तौड़गढ़ दुर्ग) की नौवीं मंजिल पर दिसंबर 1460 में एक शिलालेख लगवाया था|
जिसे कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति कहा गया था इस प्रशस्ति की रचना अत्रि और महेश ने की थी|
चित्तौड़ दुर्ग में कहीं शिलाओं पर उत्कीर्ण श्लोकों को सामूहिक रुप से कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति कहा जाता है|
इस प्रशस्ति में 187 श्लोक माने गए हैं|
इस प्रशस्ति में इसके रचनाकार महेश का भी वर्णन है|
इस प्रशस्ति का समय विक्रमी संवत  1517 बताया गया है|
कीर्ति स्तंभ से राणा कुंभा की मालवा विजय,कुंभा के संगीत ग्रंथ और उसकी उपाधियों के साथ साथ बप्पा से लेकर कुंभा तक के गुहिल वंश का विस्तृत इतिहास जानकारी मिलती है|
इसमें कुंभा द्वारा मंडोर से हनुमान मूर्ति लाने और उसे दूर्ग के प्रमुख द्वार पर लगवाने का वर्णन आता है|
वर्तमान समय में कीर्ति स्तंभ की केवल दो ही शिलाएं उपलब्ध है इससे पूर्व यह कई जिलों पर उत्कीर्ण था|
यह प्रशस्ति 15वीं सदी के राजस्थान की राजनीतिक धार्मिक सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति को समझने के लिए बहुत उपयोगी है|
इस प्रशस्ति में चंडीशतक ,गीत गोविंद कि टीका ,संगीत राज आदि प्रमुख ग्रंथों का उल्लेख हुआ है|
इस प्रशस्ति में कुंभा को महाराजाधिराज ,अभिनव भरताचार्य ,हिंदु सुरतान, राय रायन,राणो-रासो, छाप गुरु, दान गुरु ,राजगुरु और शैल गुरु जैसी उपाधि से पुकारा गया है|
इस शिलालेख में मालवा और गुजरात की संयुक्त सेना को कुंभा द्वारा परास्त कर और इस विजय के उपलक्ष में चित्तौड़ में विजय स्तंभ का निर्माण करने इसी के साथ अनेक मंदिरों के निर्माण का उल्लेख प्रशस्ति में किया गया है|     

राज प्रशस्ति:-

मेवाड़ के महाराणा राज्यसिंह ने राज समुंद्र नामक विशाल झील का निर्माण करवाया था|
उसके पश्चात महाराणा के आदेश पर रणछोड़ भट्ट ने संस्कृत भाषा में एक महाकाव्य की रचना की थी|
उसी महाकाव्य को 25 श्याम रंग के प्रस्तरों पर उत्कीर्ण कर झील के तट पर लगा दिया गया है|
राजसमंद झील की नो चौकी पर  स्थित 25 शिलाओं पर अंकित इस प्रशस्ति को दुनिया का सबसे बड़ा शिलालेख कहा जाता है|
प्रशस्ति के प्रारंभ में मेवाड़ के प्रारंभिक राणाओं की उपलब्धि का वर्णन है जो काव्यमय होने के कारण कुछ काल्पनिक बन गया है|
इसका समय विक्रमी संवत 1732 मार्च शुक्ला 15 और 1676ई.) है|
निसंदेह काव्य की रचना संस्कृत भाषा में की गई है तथापि कहीं-कहीं फारसी भाषा के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है|
रणछोड़ भट्ट स्यवं तेलंग ब्राह्मण थे संभवत उसके नाना के नाथद्वारा के आचार्य से संबंध थे|
इसी कारण रणछोड़ जी भट्ट संभवत महाराणा राज्यसिंह के संपर्क में आए थे|
प्रत्येक पट्टीका का प्रारंभ देवस्तुति  से किया गया है|उसके उपरांत मेवाड़ राजवंश के महाराज और उनकी उपलब्धि का वर्णन किया गया है
प्रारंभिक सर्गो में प्राचीन राणाओं के नाम भाटो की वंशावली पर आधारित है जिनमें कई काल्पनिक नाम भी आ गए हैं|
राणा ,बप्पा, कुंभा ,सांगा ,प्रताप की उपलब्धियों को युद्ध का इसमें अच्छा वर्णन किया गया है|
बप्पा के लिए बाष्प शब्द का प्रयोग किया गया है और लिखा है कि यह 50 पल के सोने के कंकंण धारण करता था|
कुंभा व राणा सांगा को अच्छी योद्धा के रूप में इसमें उल्लेखित किया गया है|
राणा अमर सिंह द्वारा जहांगीर के साथ की गई संधि का भी इसमें उल्लेख है|
करण सिंह द्वारा गंगा तट पर दिए गए तुलादान और जगजीत सिंह के उल्लेखनीय दानों का भी इसमें वर्णन है|
जगतसिंह और राजसिंह की उपलब्धियों का वर्णन विशद रुप से किया गया है|
राजसिंह ने जो निर्माण कार्य करवाए उनका तो इस प्रशस्ति में उल्लेख है ही पर उसके साथ-साथ राणा राज सिंह की अजमेर टोंक लालसोट सांभर शाहपुरा आदि स्थानों की विजय यात्रा का भी वर्णन दिया गया है|
झील के निर्माण से कितने ग्रामों को सिंचाई का लाभ मिला उसका भी इसमें उल्लेख किया गया है|
राज समुंदर के निर्माण हेतु लाहौर गुजरात सूरत आदि स्थानों से कारीगर बुलाए गए थे इसका भी बोध इस प्रशस्ति में से होता है|
राजसमंद झील की नो चौकी पर स्थित 25 शिलाओं में प्रत्येक शीला 3 फीट लंबी और 2½ चौड़ी है|
इन शिलाओं पर काव्य के 24 सर्ग 1106 श्लोक खुदे हुए हैं|
छठी शिला को पढ़ने से जाहिर होता है कि इस महाकाव्य को पत्थर की शिलाओं पर खुदवाने के आदेश रावसिंह के उत्तराधिकारी जयसिंह के द्वारा दिए गए थे|
इस में महाराणा अमर सिंह द्वारा की गई मुगल मेवाड़ संधि का वर्णन है|
इस प्रशस्ति के अनुसार राजसमंद झील का निर्माण अकाल राहत कार्यों के लिए राजसिंह द्वारा करवाया गया था जिसे 14 वर्षों में पूरा किया जा सका था|
राज प्रशस्ति की रचना करने वाला रणछोड़ भट्ट तेलंग जाति के कठोरी कुल के गोसाई मधुसूदन के पुत्र है|
यह प्रशस्ति पद्यमय है लेकिन इस के अंत में हिंदी भाषा की कुछ पंक्तियां खुदी हुई है
इससे 17 वी शताब्दी की सामाजिक धार्मिक और आर्थिक व्यवस्था जानने  का अच्छा स्त्रोत साबित हुई       

चित्तौड़ का शिलालेख:-
चित्तौड़ का शिलालेख गुहिल शासकों की धार्मिक सहिष्णुता पूर्ण नीति को बताता है|
इसमें शैव मतावलंबी होते हुए भी राज परिवार द्वारा जैन मंदिर के निर्माण हेतु अनुदान देने का वर्णन है|
इस शिलालेख का समय 1278ई|
इस शिलालेख से स्पष्ट होता है कि राजा तेजसिंह की रानी जयतल्ल देवी ने चित्तौड़ में श्यामपार्श्व नाथ मंदिर का निर्माण करवाया था|
इसी मंदिर के पिछले भाग में महारावल समर सिंह द्वारा गच्छ के आचार्य प्रद्युम्नसूरि को मठ के लिए भूमि दान दिए जाने का भी उल्लेख है|

बीकानेर दुर्ग की प्रशस्ति(रायसिंह प्रशस्ति):-
बीकानेर नरेश रायसिंह के द्वारा जूनागढ़ के निर्माण के बाद दुर्ग के एक पार्श्व में स्थापित की गई प्रशस्ति है|
जिसमें दुर्ग के निर्माण की तिथि,राव बीका से लेकर राव रायसिंह  तक के शासकों की उपलब्धियों,रायसिंह की विजयों आदि का वर्णन है|
इस प्रशस्ति के रचियता जेता नामक जैन मुनि थे|
बीकानेर दुर्ग की प्रशस्ति को रायसिंह की प्रशस्ति भी कहते हैं|
इस प्रशस्ति में राव रायसिंह की विजय और साहित्य प्रेम , सांस्कृतिक और धार्मिक विषय का वर्णन है|
इस प्रशस्ति के अनुसार बीकानेर दुर्ग का निर्माण राव रायसिंह ने अपने मंत्री कर्मचंद द्वारा करवाया था|
बीकानेर दुर्ग लाल पत्रों से निर्मित होने के कारण लालगढ़ भी कहा गया है इस दुर्गा दूसरा नाम जूनागढ़ भी है|
बीकानेर प्रशस्ति में रायसिंह की काबुल विजय का भी उल्लेख है|
यह प्रशस्ति बीकानेर के दुर्ग के द्वार पर लगाई गई है इस प्रशस्ति का समय जूनागढ़ किले के निर्माण के बाद 1594ई.का ह      

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