अरबों के विजय से पूर्व सिंध | मध्यकालीन भारतीय इतिहास

इस्लाम का उदय अरब के रेगिस्तान में हुआ इसके प्रथम अनुयाई अरब थे जो एशिया में एक शक्तिशाली ताकत बनकर उभरे उन्होंने अपने इस नए धर्म के प्रचार हेतु पूरे विश्व में विजय अभियान शुरू किया अरबों का विशाल साम्राज्य पश्चिम में अंध महासागर से लेकर पूर्व में सिंधु नदी के तट तक और उत्तर में कैस्पियन सागर से लेकर दक्षिण में नील नदी घाटी तक विस्तृत थासिंध एक शक्तिशाली साम्राज्य था इसका विस्तार मुल्तान से लेकर नीचे की ओर समुद्र तट तक सिंधु घाटी का निचला क्षेत्र तक था

अरब भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमणकारी थे अरबों के आक्रमण से पहले सिंध पर चाच नामक एक ब्राह्मण का अधिकार था। चाच ने कन्नौज से बड़ी संख्या में ब्राह्मणों को यहां बसाया था। उन्हें मालगुजारी से मुक्त जमीनें दान में दी जिसे कृषि का प्रसार हुआ। अरबों के आक्रमण के समय 712 में सिंध पर चाच का भतीजा दाहिर राज्य कर रहा था इसी के समय में अरबों के साथ संघर्ष हुआ जिसमें अरब विजय हुए और सिंध पर अरब राज्य स्थापित हो गया

इससे पूर्व सिंध पर राय परिवार का आधिपत्य था इस वंश के 5 राजाओं ने 137 वर्षों तक शासन किया उनकी राजधानी ऐलोर (वर्तमान रोहडी/रोहेरा) थी ह्वेंसाग की भारत यात्रा के समय ( 629-45) सिंध पर शूद्र जाति के बौद्ध राजा का शासन था ! इस वंश का अंतिम शासक साहसी था जिसकी मृत्यु के बाद उसके ब्राह्मण मंत्री चाच ने उसकी विधवा लाडी से विवाह कर स्वयं गद्दी पर बैठा उस के शासनकाल में राज्य की सीमा और सत्ता दोनों का विस्तार हुआ चाच के बाद चंद्र और चंद्र के बाद उसका पुत्र दाहिर गद्दी पर बैठा था

अरबों के आक्रमण से पूर्व भारत की दशा

राजनीतिक दशा इस समय देश में कोई केंद्रीय सत्ता नहीं थी भारत विभिन्न राज्यों में विभक्त था जो अपने आप में स्वतंत्र थे उनके बीच संबंध भी मैत्रीपूर्ण नहीं था वह एक दूसरे से लड़ते रहते थे, चीनी यात्री हेनसांग के अनुसार काबुल की घाटी में एक क्षत्रिय राजा का शासन था जिसके उत्तराधिकारी नवी शताब्दी के अंत तक शासन करते रहे इसके बाद लालीय की अधीनता में एक ब्राह्मण वंश की स्थापना हुई जिसे हिंदू शाही साम्राज्य अथवा काबुल या जाबुल का राज्य कहा गया था

धार्मिक दशा 

पाल और सेन वंश के राजाओं ने बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान किया किंतु अरबों के आक्रमण के समय बौद्ध धर्म अवनति पर था बौद्ध धर्म की तुलना में जैन धर्म अधिक समय तक चलता रहा, दक्षिण भारत में जैन धर्म का अधिक बोल वाला था शैव और वैष्णव धर्म के अनुयाई भी थे बाद में भक्ति के प्रयास से हिंदू समाज की धार्मिक मनोवृत्ति में सुधार हुआ और हिंदु धर्म एक शक्तिशाली धर्म बन गया

सामाजिक दशा 

इस समय जाति प्रथा पहले से अधिक दृढ  हो चुकी थी अंतर जातिय  विवाह निषेध थे समाज में लोग छुआछूत को मानते थे बहु विवाह प्रचलित था किंतु स्त्रियों के लिए दूसरा विवाह करना निषेध था सती प्रथा का प्रचलन था

शासन प्रबंध

शासन प्रबंध में राजतंत्र की प्रथा प्रचलित थी ज्येष्ठधिकार के नियम का पालन होता था शासकों के चुनाव के भी उदाहरण मिलते हैं जैसे- शशांक के समय में बंगाल में अराजकता इतनी फैल गई थी कि वहां की प्रजा ने 750ई. में गोपाल को अपना शासक चुनाव जिसने पाल वंश की स्थापना की शासन क्षेत्र में राजा देवीय अधिकारों में विश्वास करता था और अपने असीमित अधिकारों का प्रयोग करता था शासन की सर्वोच्च सत्ता उसके हाथ में थी

राजा की सहायता के लिए मंत्री होते थे साम्राज्य प्रांतों में विभक्त था जिन्हें भुक्ति कहते थे प्रत्येक प्रांत उपरिक के अधीन था । प्रांत कई जिलों में विभक्त था जिन्हें विषय करते थे । विषय विषयपति के अधीन था । जिला कई गांव का समूह होता था गांव का अध्यक्ष अधिकारिन कहलाता था । नगर का प्रबंध नगर पति के अधीन था । नगर पति की सहायता के लिए नागरिकों द्वारा सभा का चुनाव होता था

विभिन्न राजवंश

सातवीं शताब्दी में कश्मीर में दुर्लभ वर्धन ने कार्कोट राजवंश (हिंदू वंश) की स्थापना की थी इसी के शासनकाल में हैनसांग ने कश्मीर की यात्रा की थी उसके उत्तराधिकारी प्रतापदित्य ने प्रतापपुर की नींव रखी। ललितादित्य मुक्तापीड( 724 से 760 ईसवी ) और जयापीड विनयदित्य (779 से 810 ई.) इस वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक थे

  • मध्य प्रदेश के प्रमुख राजवंश

ललितादित्य मुक्तापिंड

ललितादित्य मुक्तापिंड ने पंजाब, कन्नौज, दरिस्तान और काबुल पर विजय प्राप्त की उसने अरबो को भी पराजित किया और तिब्बत पर अधिकार कर लिया। 740 ईसवी के दौरान ललितादित्य ने कश्मीर के राजा यशोवर्धन को भी पराजित किया उसने कश्मीर में अनेक मंदिरों, बिहारो और भवनों का निर्माण कराया जिसमें कश्मीर का प्रसिद्ध मार्तंड (सूर्य) मंदिर के अतिरिक्त भूतेश के शिव मंदिर और परिहास केशव के विष्णु मंदिर प्रमुख हैं

नेपाल जो हर्ष के समय में मध्यवर्ती राज्य था। अंशु वर्मा ने यहां पर ठाकुरी वंश की स्थापना की थी असम भास्करवर्मन के अधीन था हर्ष के मृत्यु के बाद उसने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी किंतु शिलास्तंभ ने भास्करवर्मन को पराजित कर असम पर अधिकार कर लिया इस प्रकार 300 वर्षों तक असम मलेच्छो के अधीन रहा

पाल वंश

बंगाल में पाल वंश का राज्य था जिसकी स्थापना 750ई. में गोपाल ने की थी। इस वंश का सबसे महान शासक देवपाल था देवपाल के अंतिम समय में प्रतिहार साम्राज्य की शक्ति बढ़ने लगी थी गुर्जर प्रतिहार नरेश मिहिरभोज( 836-85 ई.) देवपाल का विरोधी था, मिहिरभोज प्रतिहार वंश का सबसे शक्तिशाली राजा था प्रतिहार साम्राज्य के विघटन के बाद उत्तर भारत में कई राजपूत राज्यों का उदय हुआ जिसमें अजमेर और शाकंभरी के चौहान वंश सर्वाधिक महत्वपूर्ण थे पृथ्वीराज चौहान ने अपने पड़ोसियों की शक्ति को बढ़ने नहीं दिया

हर्ष का समकालीन चालुक्य वंश के शासक पुलकेशिन द्वितीय था चालुक्य वंश के शासक विजय आदित्य 689 से 733 ईसवी तक शासन किया उसने कांची पर विजय प्राप्त कर पल्लव राजाओं से कर प्राप्त किया । अरबों के आक्रमण के समय चालुक्य वंश के शासक विजयादित्य और पल्लवों का शासक नरसिंह वर्मन द्वितीय का शासन था

राजनीतिक दशा का संक्षिप्त अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि अरबों के सिंध आक्रमण के समय कोई ऐसी शक्तिशाली सत्ता नहीं थी जो उन्हें रोक सके सभी शक्तियां आपसी संघर्ष में उलझी हुई थी समान संकट के समय में भी उन में एकता का अभाव था

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