इल्तुतमिश की समस्याएँ

? शासक बनने के पश्च्यात इल्तुतमिश को अनेक प्रकार की आंतरिक और बाह्य कठिनाइयों का सामना करना पड़ा
? इल्तुतमिश के तीन प्रमुख प्रतिद्वंदियों गजनी के यल्दोज, सिंध के कुबाचा और बंगाल के अलीमर्दान ने उनके लिए समस्या उत्पन्न कर दी थी
? आरामशाह की अयोग्यता का लाभ उठाकर कुबाचा ने भटिंडा,कुहराम और सरस्वती तक अपने साम्राज्य का विस्तार कर लिया था

 ? बंगाल और बिहार दिल्ली से पृथक हो गए थे लखनौती में अली मर्दान ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर लिया था
? राजपूत राजाओं ने भी दिल्ली सल्तनत को कर भेजना बंद कर दिया था
? जालौर और रणथंबोर स्वतंत्र हो गए थे अजमेर ग्वालियर और दोआब ने भी तुर्को का आधिपत्य अस्वीकार कर दिया था
? सामंतो का एक प्रभावशाली वर्ग इल्तुतमिश की सत्ता को मानने के लिए तैयार नहीं था। इनमें कुत्बी व मुइज्जी सामंत प्रमुख थे
? यह कुलीन शासक  थे जो इल्तुतमिश को एक दास का दास होने के नाते सुल्तान के योग्य नहीं मानते थे
? ऐसी कठिन परिस्थितियों में चंगेज खां के नेतृत्व में मंगोल आक्रमण का भय भी इल्तुतमिश के समय में उपस्थित हुआ
? यह सभी परिस्थितियां संकटपूर्ण थी
? इस प्रकार नवस्थापित तुर्की सल्तनत विनाश के कगार पर खड़ी थी
? लेकिन इल्तुतमिश ने कौशल ,साहस और शक्ति से इन सभी संकटों का मुकाबला किया और अंत में सफलता प्राप्त की

? उसके कार्य और उपलब्धियां ?
?इल्तुतमिश के 26 वर्षीय कार्यकाल (1210 से 1236ई.)  को तीन चरणों में बांटा जा सकता है
1. प्रथम चरण– 1210 से 20 तक ,अपने विरोधियों का दमन किया
2. द्वितीय चरण– 1221 से 29 तक ,उसने मंगोल आक्रमण के खतरे का सामना किया और अन्य समस्याओं का निदान किया
3. तृतीय चरण– 1229-36ई.तक अपनी सत्ता को सुदृढ़ किया