ऐराब

? तारीफ़(परिभाषा)- हरफ़े तबही के अलावा ऊर्दू में बाज़ दूसरी अलामते भी आवाज़ व कोई ज़ाहिर करने के लिए इस्तमाल की जाती है- इस को “ऐराब” कहते है (REET-L-II)
“हरुफ़ पर लगाए जाने वाले- ज़ेर, ज़बर, फ़ेस ऐराब कहलाते है”
अब , इस , उस वगेरा

ऊर्दू रस्मे-उलखत में ऐराब लगाने में कमी आती है अगर पढ़ाया जरूर जाते है- कही इन नशानात को अखत्यात के तोर पर लिख दिया जाता है-
ऊर्दू में मन्द्रजाजिल(निम्नलिखित) ऐराब इस्तमाल(उपयोग) किये जाते है

?(I) जबर या फ़तह- लिखने में इस की अलामत है यानी इस का रूप है
??   `   ??  जो के हरफ के ऊपर लगाया जाता है

? (ii) जेर- लिखने में इस की अलामत।    `   है जो हरफ के निचे लगाया जाता है

? (iii) पेश- लिखने में इस की अलामत  ‘ है जो हरफ के ऊपर लगाया जाता है

? (iv) तनुन- लिखने में अलामत (पेश)?? ” ,  (जेर) ??,,  ,  (जबर) ??”
लफ्ज़ो के आख़िर हरफ पर दो जबर दो जेर दो पेश को तनुन कहते है
जैसे- लफ़्ज के आख़िर में ऊन, उन, इन, की आवाज आती है

? (V) तसदीद- तसदिद लगाने से हरफ की आवाज दोहरी(दो बार) हो जाती है और हरफ पर या अलामत  लगाई जाती है इसे मश्दीद कहते है

?(VI) सकून या जजम- जिस हरफ पर जजम हो इस में हरकत नही होती, बलके इस से पहले वाला हरफ अपने ऐराब के मुताबिक़ इस के साथ बड़ जाता है
जैसे- मजदूर, मक़सद

?(VII) मद- मद अल्फाज के ऊपर लगाया जाता है इस का मायने है कम ज्यादा करना, जिस अल्फ़ाज पर मद हो जस की आवाज तीन लफ्ज में बराबर हो जाती है-