कुतुबुद्दीन मुबारक शाह खिलजी

कुतुबुद्दीन मुबारक शाह मलिक काफूर का वध करके अप्रैल 1316 ईस्वी में गद्दी पर बैठा था वह दिल्ली का प्रथम शासक था जिसने स्वयं को खलीफा घोषित किया और खलीफा की सत्ता को मानने से इनकार किया उसने “अल- इमाम- उल- इमाम, खिलाफत -उल -अल्लाह व अलवासिक बिल्लाह की उपाधि ग्रहण की वह अपने योग्य पिता का अयोग्य पुत्र था | बरनी के अनुसार “वह कभी-कभी नग्न होकर अपने दरबारियों के बीच दौड़ा करता था”

उसे नग्न स्त्री पुरुषों की संगत पसंद थी वह अत्यधिक शराब पीने लगा और स्त्रियों के वस्त्र पहनकर दरबार में आने लगा, मुबारक शाह ने नसीरुद्दीन खुसरो शाह नामक धर्म परिवर्तित मुसलमान को अपना वजीर और मलिक नाईब नियुक्त किया, उसे अपने प्रिय मुबारक हसन से अत्यधिक लगाव था जिसे उसने खुसरो खां की उपाधि दी थी विलास प्रियता और दंभ ने कुतुबुद्दीन मुबारक की बुद्धि और विवेक को नष्ट कर दिया था

अपनी मूर्खता के कारण वह स्वयं और अपने वंश के पतन का उत्तरदाई बना ।अपने पिता से उसने एक शक्तिशाली विस्तृत और समृद्धशाली साम्राज्य प्राप्त किया था लेकिन शीघ्र ही उसे खो दिया अतः वह न तो योग्य शासक सिद्ध हुआ और ना ही योग्य व्यक्ति बना

कुतुबुद्दीन मुबारक शाह प्रारंभिक कार्य 

सत्ता संभालने के बाद कुतुबुद्दीन मुबारक ने उदारता के साथ शासन प्रारंभ किया प्रशासकीय कार्यों में वह भूल जाने और क्षमा करने की नीति का अनुसरण करने लगा सभी लोगों को बंदी गृह से मुक्त कर दिया और उसने अपने पिता के सभी कठोर नियमों का उन्मूलन कर दिया उन सरदारों को वापस बुला लिया गया जिन्हें अलाउद्दीन खिलजी ने निकाल दिया था उन्मोचित भूमि को उनके वैद्य स्वामियों को लौटा दिया गया और करो में कमी कर दी गई

मुबारक शाह ने जागीर व्यवस्था को पुन: शुरू कर दी थी नियंत्रण में इस ढील के परिणाम स्वरुप अधिकारियों और प्रदेशों के नैतिक स्तर में पतन प्रारंभ हो गया, मुबारक शाह स्वयं सरदारों के साथ रहने लगा वह समलिंगकामी और इत्तरलिंगकामी दोनों था। उसकेे दरबार में बरादु संप्रदाय के मुबारक हसन और हुसामुद्दीन नामक दो भाई रहते थे। जब 1305 ईस्वी में आईनुल मुल्क मुल्तानी ने मालवा पर विजय प्राप्त की तो दोनों भाइयों को दास के रूप में दिल्ली लाया गया, बरादु हिंदुओं की एक लड़ाकू जाति थी

मुबारक हसन से उसका लगाव अधिक था जिससे वह खुल्लम-खुल्ला आलिंगन और चुंबन करता था उसे खुसरो खॉ की उपाधि दी थी और मलिक काफूर की सभी इच्छाएं और वजारत का पद भी प्रदान किया था सुल्तान की कमजोरी का लाभ उठाकर विभिन्न प्रांतों में विद्रोह प्रारंभ हो गया, गुजरात में उपद्रव हुआ। देवगिरि के शासक ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी राजपूताना के महत्वपूर्ण प्रांत मुख्यतः मारवाड़ स्वतंत्र हो गया

गुजरात अभियान 

अलप खॉ की हत्या के बाद Haider और जीरक के नेतृत्व में गुजरात की सेना ने विद्रोह किया था यद्यपि मलिक काफूर को अपने कर्मों का फल मिल चुका था लेकिन Haider और जीरक ने विद्रोह को जारी रखा, गुजरात विद्रोह के दमन के लिए आईनुलमुल्क को भेजा गया उसने अपनी बुद्धिमत्ता से विद्रोहियों पर नियंत्रण पा लिया, कुतुबुद्दीन मुबारक शाह ने मलिक दिनार जफर खां को गुजरात का राज्यपाल नियुक्त किया, जफर खां ने गुजरात की शासन व्यवस्था को इतनी कुशलतापूर्वक निर्वहन किया कि 3-4 महीने में वहां की जनता अलप खा के शासन को भूल गई थी

देवगिरी की पुनर्विजय 

मलिक काफूर के मृत्यु के तत्काल बाद देवगिरी का राज्य दिल्ली की अधीनता से मुक्त हो गया और रामचंद्र देव के दामाद हरपाल देव जो उस समय वहां शासक था ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी, 1317 में मुबारक शाह ने देवगिरी पर चढ़ाई कर दी थी हरपाल देव राजधानी छोड़कर भाग खड़ा हुआ लेकिन वह पकड़ा गया और उसकी हत्या कर दी गई, मलिक यकलाकी को देवगिरी का सूबेदार नियुक्त किया गया ,मुबारक शाह ने देवगिरी में अलाउद्दीन के परोक्ष नियंत्रण की नीति के विपरीत प्रत्यक्ष शासन की नीति का अनुसरण किया

वारंगल अभियान 

वारंगल का शासक प्रताप रुद्रदेव था उसने कई वर्षों से खराज देना बंद कर दिया था।अत:उसके विरुद्ध खुसरो खां को भेजा गया, उसके साथ अलाउद्दीन के प्रसिद्ध सुरक्षा मंत्री ख्वाजा हाजी को अभियान के सर्वोच्च अधिकारी के रूप में भेजा गया, एक युद्ध में दिल्ली के सैनिकों ने बाहरी दुर्ग पर अधिकार कर लिया

प्रताप रुद्र का एक मंत्री अनिल मेहता युद्ध में बंदी बनाकर खुसरो के समक्ष लाया गया और उसे प्राणदंड दे दिया गया, प्रताप रुद्रदेव संधि के लिए तैयार हो गया संधि के तहत उसने बदर कोट के जिले और 40 सोने की ईटे वार्षिक खराज के रूप में देने का वचन किया, वारंगल के कुछ हिस्सों को भी दिल्ली सल्तनत में मिला लिया इस प्रकार दक्षिण को सर्वप्रथम दिल्ली सल्तनत में मिलाने की शुरुआत कुतुबुद्दीन मुबारक शाह खिलजी ने की थी

षड्यंत्र और विद्रोह का दमन

जब मुबारक शाह देवगिरी में था षडयंत्रकारियों ने अनुपस्थिति का लाभ उठाकर उसकी हत्या करने और उसके स्थान पर खिज्र खां के पुत्र को सिंहासनारोहन करने के लिए एक षड्यंत्र रचा, षड्यंत्र का मुख्य निर्माता मुबारक शाह का एक चचेरा भाई मलिक आसुद्दीन था लेकिन आरामशाह नामक एक षड्यंत्र कारी द्वारा यह सूचना सुल्तान को दे दी गई, मुबारक शाह ने सभी षडयंत्रकारियों और उनके संबंधियों को पकड़वाकर बंद करवा दिया

क्रोध में उसने अपने तीनों भाइयों खिज्र खॉ सादी खॉ और शहाबुद्दीन उमर जिन्हें ग्वालियर के दुर्ग में कैद किया था की हत्या करवा दी, बाद में उसने खिज्र खां की विधवा देवल रानी से विवाह कर लिया उसने गुजरात के सूबेदार जफर खॉं की भी हत्या कर दी थी, जफर खां की हत्या के बाद हुसामुद्दिन को गुजरात का सूबेदार बनाया गया लेकिन उसने भी विद्रोह कर दिया, सरदारों ने विद्रोह पर नियंत्रण स्थापित कर हुसामुद्दीन को पकड़ लिया और दिल्ली भेज दिया

हिसामुद्दीन मुबारक शाह के कृपा पात्र खुसरो खॉ का भाई था । इस कारण उसे माफ़ कर दिया गया, इस समय देवगिरी का सूबेदार यकलकी खॉ ने विद्रोह कर दिया और शमशुद्दीन का खिताब धारण कर अपने नाम के सिक्के चलाए लेकिन दिल्ली से भेजी गई सेना ने विद्रोह को दबा दिया, विद्रोही समसुद्दीन को दिल्ली लाया गया जहां उसके नाक और कान काट दिए गए

माबर (मदुरा) अभियान

तेलंगाना के पश्चात खुसरो का सुदूर दक्षिण में मालाबार पहुंचा उसे कोई सफलता नहीं मिली । बरनी के अनुसार “माबर के दोनों राय खुसरो खॉ के लिए कुछ हाथी छोड़कर अपनी राजधानी से भाग गए लेकिन खुशरो खां को दक्षिण में अपार संपत्ति मिली थी” फल स्वरुप मालाबार में एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का सपना देखने लगा, इसकी सूचना कुछ सरदारों ने सुल्तान को दी सुल्तान ने खुसरो खॉ को दिल्ली बुलवा लिया था

मुबारक शाह की हत्या और खिलजी वंश का अंत

मुबारक शाह की सबसे बड़ी भूल थी, खुसरो खां के प्रति उसका मोह और उस पर अत्यधिक विश्वास करना बरनी ने लिखा है कि “जब कभी सुल्तान उसका खुल्लम-खुल्ला आलिंगन और चुंबन करता था तो यह क्षुद्र जन्मित बरादु लड़ाका अपने निकृष्ट स्वभाव के फलस्वरुप प्राय: अपनी कटार से सुल्तान की हत्या करने का विचार किया करता था”

15 अप्रैल 1320 ईस्वी को खुसरो खां के सैनिकों ने महल में अचानक प्रवेश किया इसमें जाहरिया नाम का एक व्यक्ति था जिसने सुल्तान की हत्या करने का संकल्प उठाया | इन सैनिकों ने सुल्तान के अंग रक्षकों का कत्ल कर दिया, सुल्तान अपने प्राण की रक्षा के लिए जनानखाने की ओर भागा लेकिन खुसरो खां ने उसके बाल पकड़कर उसे जमीन पर गिरा दिया | जहारिया ने अपनी कुल्हाड़ी से सुल्तान पर प्रहार किया और उसका सिर काट डाला | मुबारक शाह खिलजी वंश का अंतिम शासक था इसकी हत्या के साथ ही खिलजी वंश का अंत हो गया

सूफी संत निजामुद्दीन ओलिया से कुतुबुद्दीन मुबारक शाह द्वेष

मुबारक शाह खिलजी सूफी संत शेख निजामुद्दीन औलिया से द्वेष रखता था, मुबारक शाह ने निजामुद्दीन औलिया का अभिवादन स्वीकार करने से मना कर दिया था, वह निरंतर कहा करता था कि जो व्यक्ति शेख निजामुद्दीन औलिया का सिर काटकर उसके पास लाएगा उसे वह 1000 टंके पुरस्कार देगा किंतु कोई व्यक्ति इस से आकर्षित नहीं होता था

शेख निजामुद्दीन औलिया भयभीत हुए मुबारक शाह खिलजी के जीवन के अंतिम महीने में यह द्वेष चरम सीमा पर पहुंच गया, उन दिनों यह प्रथा थी कि दिल्ली के समस्त प्रमुख व्यक्ति चाहे वह राजकीय सेवा में हो या ना हो ने चंद्रमास के आरंभ में सुल्तान के पास शुभकामनाएं अर्पित करने जाया करते थे, शेख निजामुद्दीन स्वयं कभी नहीं गए मुबारक शाह ने घोषणा की कि अगले चंद्रमास को शेख निजामुद्दीन यदि स्वयं नहीं आए तो वह राजाज्ञा द्वारा उन्हें आने के लिए विवश करेगा

सुल्तान की इस घोषणा के बाद शेख निजामुद्दीन औलिया अपनी माता की कब्र पर प्रार्थना कर रहा था इसके अतिरिक्त उन्होंने कुछ नहीं किया, अगले चंद्र मास के प्रथम दिन जब सूर्योदय हुआ तो मुबारक शाह की हत्या हो चुकी थी |

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