महाराणा कुम्भा की जीवनी | चित्तौड़ दुर्ग का आधुनिक निर्माता

महाराणा कुम्भा की जीवनी | चित्तौड़ दुर्ग का आधुनिक निर्माता

महाराणा कुम्भा एक महान शासक, महान सेनाध्यक्ष, महान निर्माता, वरिष्ठ विद्वान, वीर तथा साहसी था।

महाराणा कुम्भा का जीवन परिचय –

  • पूरा नाम – कुम्भकर्ण सिंह
  • राज्याभिषेक – 1433
  • शासनावधि – 1433 से 1468 ई.
  • पिता – महाराणा मोकल
  • माता – सौभाग्यवती परमार
  • राजवंश – सिसोदिया राजवंश
  • पुत्र – ऊदा (उदयसिंह प्रथम), राणा रायमल
  • पुत्री – रमाबाई (वागीश्वरी)

भारत के राजाओं में महाराणा कुम्भा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान हैं। उनसे पूर्व राजपूत केवल अपनी स्वंत्रता की जहाँ-तहाँ रक्षा कर सके थे। कुम्भकर्ण ने मुसलमानों को अपने-अपने स्थानों पर हराकर राजपूती राजनीति को एक दोहरा रूप दिया। इतिहास में ये “राणा कुंभा” के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं। महाराणा कुंभा को ‘चित्तौड़ दुर्ग का आधुनिक निर्माता’ भी कहते हैं क्योंकि इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग के अधिकांश वर्तमान भाग का निर्माण करवाया।

महाराणा कुम्भा राजस्थान के शासकों में सर्वश्रेष्ठ थे। चाचा, मेरा, महपा पंवार और अक्का द्वारा कुम्भा के पिता राणा मोकल की हत्या कर दी गई थी। अपने पिता की हत्या के पश्चात कुंभा गद्दी पर बैठे। महाराणा कुंभा के अल्पायु में शासक बनने के कारण हंसाबाई द्वारा रणमल को उनके संरक्षक के तौर पर नियुक्त किया गया।

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कुंभा की प्रारंभिक आंतरिक समस्याएं –

 (1) चाचा व मेरा की हत्या – कुंभा ने रणमल के सहायता से अपने पिता के हत्यारों चाचा व मेरा की हत्या करवाई।

 (2) रणमल की हत्या: – राठौड़ो के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए महाराणा कुम्भा ने 1438 ई. में दासी भारमली के सहायता से रणमल राठौड़ की हत्या करवा दी, जिससे रणमल के पुत्र राव जोधा मेवाड़ छोड़कर मण्डोर (जोधपुर-मारवाड़) चले गए। अंततः हंसाबाई के सहयोग से राव जोधा व राणा कुम्भा के बीच 1453 ई. में आंवळ-बावळ की संधि हुई,

इतिहास में इसे आवळ-बावळ की संधि, मारवाड़-मेवाड़ संधि या राणा-सिसोदिया संधि भी कहा गया। यह संधि मेवाड़ के महाराणा कुंभा और मारवाड़ के राव जोधा के मध्य हुई। इस संधि द्वारा मारवाड़-मेवाड़ सीमा का निर्धारण किया गया। सीमा निर्धारण का केंद्र बिंदु ‘सोजत’ था। जोधा ने अपनी पुत्री श्रृंगार देवी का विवाह कुंभा के पुत्र रायमल से किया। इसी श्रृंगार देवी ने चित्तौड़ में ‘घोसुंडा बावड़ी’ बनवाई।

अपने पिता के हत्यारों को सजा दिलवाने के पश्चात कुम्भा ने राज्य की सुरक्षा की ओर ध्यान केन्द्रित किया। वह मेवाड़ से अलग हुए क्षेत्र को पुनः अपने अधीन करना चाहता था। अतः इसके लिए उसने विभिन्न दिशाओं में विजय-अभियान शुरू किया।

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महाराणा कुम्भा के प्रमुख विजय अभियान –

बूंदी विजय अभियान –

राव बैरीसाल ने मेवाड़ के मांडलगढ़ दुर्ग सहित ऊपरमाल के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। अतः कुम्भा ने 1436 ई. में इन स्थानों को पुनःप्राप्त करने के लिए बूंदी के राव बैरीसाल के विरुद्ध सैनिक अभियान प्रारंभ किया। जहाजपुर के समीप दोनों ही सेनाओं में गंभीर युद्ध हुआ, जिसमें बूंदी की हार हुई। बूंदी ने मेवाड़ की अधीनता स्वीकार कर ली। मांडलगढ़, बिजौलिया, जहाजपुर एवं पूर्वी-पठारी क्षेत्र मेवाड़ राज्य में मिला लिए।

गागरोन विजय अभियान – कुंभा ने मेवाड़ के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित गागरोन दुर्ग पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में कर लिया।

सिरोही विजय अभियान –

सिरोही के शासक सहसमल देवड़ा ने महाराणा कुम्भा के पिता मोकल की मृत्यु के पश्चात उत्पन्न अव्यवस्थाओं का लाभ उठाते हुए मेवाड़ राज्य की सीमा के अनेक गांवों पर अधिकार कर लिया था। तब कुम्भा ने नाहरसिंह डोडिया के सेनापतित्व के रूप में वहां सेना भेजी। इस प्रकार हुए अचानक आक्रमण में सहस मल देवड़ा की हार हुई और मेवाड़ की सेना ने आबू तथा सिरोही राज्य के कई हिस्सों को जीत लिया।

वागड़ पर विजय – कुम्भा ने डूंगरपुर पर भी आक्रमण किया और बिना कठिनाई के सफलता मिली। इस तरह उसने वागड़ प्रदेश को जीतकर जावर मेवाड़ राज्य में मिला लिया।

मेरों का दमन – बदनौर के आस-पास ही मेरों की बड़ी बस्ती थी। ये लोग सदैव विद्रोह करते रहते थे। कुम्भा ने इनके विद्रोह का दमन कर विद्रोही नेताओं को कड़ा दंड दिया।

पूर्वी राजस्थान का संघर्ष – राजस्थान के पूर्वी भाग में स्थित बयाना व मेवात मुसलमानों की शक्ति का केंद्र बनता जा रहा था। रणथंबोर की पराजय के बाद चौहानों के हाथ से भी यह क्षेत्र जाता रहा। इस क्षेत्र को प्राप्त करने के लिए कछवाहा और मुस्लिम शासकों के अतिरिक्त मेवाड़ और मालवा के शासक भी प्रयत्नशील थे।  ‘फरिश्ता’ के अनुसार महाराणा कुम्भा ने इस क्षेत्र पर आक्रमण करके रणथंबोर पर अधिकार कर लिया था।

मेवाड़-मालवा संघर्ष: –

सारंगपुर युद्ध /मालवा युद्ध (1437 ई.) –

सारंगपुर का युद्ध राणा कुंभा और सुल्तान महमूद खिलजी के बीच 1437 ई. में लड़ा गया। मालवा शासक महमूद खिलजी ने चाचा व मेरा का पुत्र महपा व अक्का को शरण दी थी। इस युद्ध के दौरान महाराणा कुम्भा ने खिलजी की सेना को पूरी तरह से खदेड़ दिया और विजय प्राप्त की। महमूद खिलजी प्रथम को कुंभा ने 6 माह बंदी बनाकर रखा फिर छोड़ दिया। इस महान विजय के उपलक्ष्य में राणा कुंभा ने चित्तौड़ के किले में महान “विजय स्तंभ” (विजय का टॉवर) का निर्माण करवाया।

महाराणा कुंभा सारंगपुर से गागरोन, मंदसौर आदि स्थानों पर अधिकार करता हुआ मेवाड़ लौट आया। इस युद्ध में मेवाड़ की गिनती एक शक्तिशाली राज्य के रूप में की जाने लगी, परंतु महमूद खिलजी उसका स्थाई रूप से शत्रु हो गया और दोनों राज्यों के बीच एक संघर्ष की एक परंपरा चली। हरबिलास शारदा का यह मानना है कि सारंगपुर में हुए अपमान का बदला लेने के लिए महमूद खिलजी ने मेवाड़ पर पाँच बार आक्रमण किए।

कुंभलगढ़ एवं चित्तौड़ पर आक्रमण (1442-43) –

 महमूद खिलजी ने सारंगपुर की हार का बदला लेने के लिए सबसे पहले 1442 ईसवीं में कुंभलगढ़ पर आक्रमण किया। महमूद खिलजी ने मेवाड़ के सेनापति दीप सिंह को मारकर बाणमाता के मंदिर को नष्ट-भ्रष्ट किया और चित्तौड़ को जीतना चाहा। इस बात का पता महाराणा को लगने पर वह बूंदी से चित्तौड़ वापस लौट आए, जिससे महमूद की चित्तौड़ विजय की योजना सफल नहीं हो सकी और महाराणा ने उसे पराजित कर मांडू भगा दिया।

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गागरोन विजय (1443-44) –

मालवा के सुल्तान द्वारा कुंभा की शक्ति को नष्ट नहीं कर पाने के कारण सीमावर्ती दुर्गों पर अधिकार करने की चेष्टा की। महमूद खिलजी ने नवम्बर 1443 ई. में गागरोन पर आक्रमण किया उस समय यह दुर्ग खींची चौहानों के अधिकार में था। 1444 ईस्वी में इस दुर्ग को खिलजी ने पूर्ण रूप से घेर लिया और 7 दिन के संघर्ष के बाद सेनापति दाहिर की मृत्यु हो जाने से राजपूतों का मनोबल गिर गया और गागरोन पर महमूद खिलजी का अधिकार हो गया।

मांडलगढ़ पर आक्रमण – महमूद खिलजी को 1444 ई. में मिली गागरोन की सफलता ने उसे मांडलगढ़ पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया । महाराणा कुम्भा ने इसकी रक्षा का पूर्ण प्रबंध कर रखा था और 3 दिन के कड़े संघर्ष के बाद खिलजी को करारी हार का सामना करना पड़ा।

मांडलगढ़ का दूसरा घेरा – 11 अक्टूबर 1446 ई. को महमूद खिलजी पुनः मांडलगढ़ अभियान के लिए रवाना हुआ। किंतु इस बार भी उसे कोई सफलता नहीं मिली। अगले 6-7 वर्षों तक वह मेवाड़ पर आक्रमण करने का साहस नहीं कर सका।

अजमेर-मांडलगढ़ अभियान –

पहले की हार का बदला लेने के लिए अगले ही वर्ष 1455 ईसवी में सुल्तान महमूद खिलजी ने कुम्भा के विरुद्ध अभियान प्रारंभ किया।अपने पुत्र गयासुद्दीन को रणथंबोर की ओर भेजा और स्वयं सुल्तान ने जाइन का दुर्ग जीत लिया। इस विजय के बाद सुल्तान अजमेर की ओर रवाना हुआ। अजमेर तब महाराणा कुम्भा के पास में था और उसके प्रतिनिधि के रूप में राजा गजधर सिंह वहां की प्रशासनिक व्यवस्था को देख रहा था। सुल्तान को इस बार भी पराजित होकर मांडू लौटना पड़ा था। अक्टूबर, 1457 ईस्वी में सुल्तान का मांडलगढ़ पर अधिकार हो गया। इसका कारण यह था कि तब महाराणा कुम्भा गुजरात से युद्ध करने में व्यस्त था किंतु शीघ्र ही उसने मांडलगढ़ को पुनः हस्तगत कर दिया।

कुंभलगढ़ आक्रमण (1459 ई.) – मालवा के सुल्तान ने 1459 ई. में कुंभलगढ़ पर फिर आक्रमण किया। युद्ध में महमूद खिलजी को गुजरात के सुल्तान ने भी सहायता दी थी, किंतु सफलता नहीं मिली।

जावर आक्रमण – 1459 ई. के पश्चात सुल्तान का मेवाड़ में दबाव कम हो गया था इसलिए 1467 ई. में वह एक बात पुनः जावर तक पहुंचा तब कुम्भा ने उसे खदेड़ कर यहां से जाने के लिए बाध्य कर दिया।

मेवाड़-गुजरात संघर्ष (1455 ई. से 1460 ई.): –

कुम्भा का गुजरात से संघर्ष का तात्कालिक कारण शम्स खां और मुजाहिद खां के बीच नागौर का उत्तराधिकार संघर्ष रहा। अपने पिता फिरोज खां की मृत्यु के पश्चात उसके छोटे पुत्र मुजाहिद खां द्वारा राजगद्दी पर अधिकार कर लेने पर शम्स खां ने कुम्भा से सहायता मांगी। कुम्भा द्वारा नागौर पर आक्रमण करके मुजाहिद खां को वहां से हटाकर शम्स खां को गद्दी पर बिठाया, परन्तु शम्स खां द्वारा संधि की शर्तों का उल्लंघन करने पर कुम्भा ने शम्स खां को नागौर से हटा कर नागौर अपने अधिकार में कर लिया। शम्स खां गुजरात पहुँच कर वहां से सैनिक सहायता प्राप्त कर महाराणा से युद्ध करने को बढ़ा, परंतु विजय का सेहरा मेवाड़ के सिर बंधा।

नागौर युद्ध (1456 ई.) – नागौर के पहले युद्ध में शम्स खां की सहायता के लिए भेजे गए गुजरात के सेनापति रायरामचंद्र व मलिक गिदई महाराणा कुंभा से हार गए थे। इस हार का बदला लेने तथा शम्स खां को नागौर की गद्दी पर बिठाने के लिए 1456 ईस्वी में गुजरात का सुल्तान कुतुबुद्दीन सेना के साथ मेवाड़ पर बढ़ा, तब सिरोही को जीतकर कुंभलगढ़ का घेरा डाल दिया, किंतु उसमें उसे असफल होकर लौटना पड़ा।

सुल्तान कुतुबुद्दीन का आक्रमणसिरोही के देवड़ा राजा ने सुल्तान कुतुबुद्दीन से प्रार्थना की कि वह आबू जीतकर सिरोही उसे दे दे। सुल्तान ने इसे स्वीकार कर लिया। आबू को कुम्भा ने देवड़ा से जीता था। सुल्तान ने अपने सेनापति इमादुलमुल्क को आबू पर आक्रमण करने भेजा किंतु उसकी पराजय हुई। इसके बाद सुल्तान ने कुंभलगढ़ पर चढ़ाई कर 3 दिन तक युद्ध किया।

मालवा-गुजरात का संयुक्त अभियान (बदनौर के युद्ध 1457) –

गुजरात एवं मालवा के सुल्तानों ने चंपानेर नामक स्थान पर समझौता किया। इतिहास में यह संधि चंपानेर की संधि के नाम से जानी जाती हैं। इसके अनुसार दोनों की सम्मिलित सेनाएं मेवाड़ पर आक्रमण करेगी तथा विजय के बाद मेवाड़ का दक्षिण भाग गुजरात में तथा शेष भाग मालवा में मिला लिया जाएगा। कुतुबुद्दीन शाह आबू को विजय करता हुआ आगे बढ़ा और मालवा का सुल्तान महमूद खिलजी दूसरी ओर से आगे बढ़ा। महाराणा कुम्भा ने दोनों की संयुक्त सेना का साहस के साथ सामना किया और “कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति” व “रसिकप्रिया” के अनुसार इस मुकाबले में कुंभा विजय रहा। इतिहास में यह “बदनौर के युद्ध” के नाम से जाना जाता हैं।

नागौर विजय (1458) – कवि श्यामल दास के अनुसार नागौर के शम्स खां और मुसलमानों द्वारा बहुत गो-वध करने तथा मालवा के सुल्तान के मेवाड़ आक्रमण के समय शम्स खां के द्वारा महाराणा के विरुद्ध सहायता करने के कारण 1458 ई. में महाराणा कुंभा ने नागौर पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।

कुंभलगढ़ अभियान (1458 ई.) – 1458 ईस्वी में कुतुबुद्दीन का कुंभलगढ़ पर अंतिम आक्रमण हुआ जिसमें उसे महाराणा कुंभा द्वारा पराजित होकर लौटना पड़ा इसके पश्चात 25 मई 1458 को उसका देहांत हो गया।

महमूद बेगड़ा का आक्रमण – कुतुबुद्दीन के बाद महमूद बेगड़ा गुजरात का सुल्तान बना। उसने 1459 ई. में जूनागढ़ पर आक्रमण किया। वहां का शासक कुम्भा का दामाद था अतः महाराणा उसकी सहायतार्थ जूनागढ़ गया और सुल्तान को पराजित कर भगा दिया।

महाराणा कुम्भा की स्थापत्य कला: –

मेवाड़ के राणाओं की विरासत में महाराणा कुम्भा एक महान योद्धा, कुशल प्रशासक, कवि, संगीतकार जैसी बहूमुखी प्रतिभाओं के धनी होने के साथ-साथ विभिन्न कलाओं के कलाकारों तथा साहित्यसर्जकों के प्रश्रयदाता भी थे। इतिहासकार कुंभा की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि महाराणा कुंभा के व्यक्तित्व में कटार, कलम और कला की त्रिवेणी का अद्भुत समन्वय था।

लगातार युद्धों में लगे रहने के बावजूद 35 वर्षों का महाराणा कुम्भा का काल सांस्कृतिक दृष्टि से मेवाड़ के इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता हैं।निसंदेह हम कह सकते हैं कि इतिहास में कुंभा का जो स्थान एक महान विजेता के रूप में है, उससे भी बड़ा व महत्वपूर्ण स्थान उसका स्थापत्य और विविध विधाओं की उन्नति के पुरोधा के रूप में हैं। कुंभा का समय ‘राजस्थान की स्थापत्य कला का स्वर्ण काल’ माना जाता हैं। शाहजहां का समय ‘भारत की स्थापत्य कला का स्वर्ण काल’ माना जाता हैं।

कुम्भा की वास्तुकला –

कुंभा वास्तु व स्थापत्य कला का मर्मज्ञ था। इसके काल में मेवाड़ ने वास्तु कला के क्षेत्र में सर्वाधिक प्रगति की थी। कुंभा ने अनेक दुर्गों का निर्माण कराया तथा कवि श्यामलदास द्वारा रचित “वीर विनोद” के अनुसार ऐसा माना जाता है कि मेवाड़ की 84 दुर्गों में से 32 दुर्ग महाराणा कुंभा ने ही बनवाए थे।

कुम्भा द्वारा निर्मित प्रमुख दुर्ग  –

  • बसंतगढ़ दुर्ग – पश्चिमी सीमा को सुरक्षित रखने के लिए सिरोही के निकट बसंती का दुर्ग बनवाया।
  • मचान दुर्ग – मेरों के प्रभाव को रोकने के लिए मचान का दुर्ग बनवाया।
  • भोमट का दुर्ग – भीलों की शक्ति पर नियंत्रण हेतु भोमट का  दुर्ग बनवाया।
  • अचलगढ़ का दुर्ग – केंद्रीय शक्ति को पश्चिम में अधिक सशक्त बनाने और सीमांत क्षेत्रों में सैनिक सहायता पहुंचाने के लिए आबू में अचलगढ़ दुर्ग का निर्माण कराया।
  • कुंभलगढ़ दुर्ग – अरावली के पश्चिम में मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा पर कुंभलगढ़ नामक दुर्ग बनवाया। इस किले का प्रारंभिक नाम ‘मच्छिंद्रपुर’ था जिसका पुनर्निर्माण महाराणा कुंभा ने 1443 ई. में प्रारंभ किया जो 1458 ई. में पूरा हुआ जिसे ‘कुंभलगढ़’ नाम दिया गया।
  • चित्तौड़गढ़ दुर्ग – कुंभलगढ़ के अलावा महाराणा ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग को भी पुनः निर्मित करवाया। इसी दुर्ग में उन्होंने सुप्रसिद्ध विजय स्तंभ और कीर्ति स्तंभ भी बनवाएं।

कर्नल टॉड के अनुसार महाराणा कुम्भा ने ही मेवाड़ को सुदृढ दुर्गों से सुसंपन्न करके अपना नाम चिरस्थाई कर दिया। अचरज हैं कि विभिन्न दुर्ग, मंदिर, जलाशय, भवन आदि के निर्माण कराने वाले कुम्भा के स्वयं के निवास स्थान में उतनी भव्यता नहीं थी बल्कि उनका निवास स्थान अत्यंत साधारण व सात्विक था।

कुम्भा की मूर्तिकला  –

कुंभा के काल में मूर्तिकला का भी उत्कृष्ट विकास हुआ। सारंगपुर विजय के उपलक्ष्य में राणा कुंभा ने चित्तौड़ के किले में महान “विजय स्तंभ” (विजय का टॉवर) का निर्माण करवाया।

विजय स्तंभ/ विष्णु ध्वजगढ़/ मूर्तियों का अजायबघर –

  • चित्तौड़गढ़ दुर्ग में ।
  • निर्माण – 1440 – 48 के मध्य महाराणा कुम्भा द्वारा सारंगपुर विजय के उपलक्ष्य में । इसके शिल्पी – जेता, नापा, पामा, पूंजा थे। यह 9 मंजिला है।
  • उस समय इसके निर्माण में खर्चा –  90 लाख रुपये।
  • सीढ़ियां – 157
  • ऊंचाई- 120 से 122 फिट।
  • विजय स्तम्भ पर 1949 में ₹1 का डाक टिकट जारी हुआ। इस टॉवर की 9वीं मंजिल पर कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति लिखी है, इसके लेखक अत्रि और महेश हैं इन दोनों को अभिकवि के नाम से भी जानते है। इसकी तीसरी मंजिल पर अरबी भाषा में 9 बार ‘अल्लाह’ लिखा हैं। आठवीं मंजिल पर कोई मूर्ति नहीं हैं। इसका पुनः निर्माण स्वरूप सिंह द्वारा करवाया गया। यह राजस्थान पुलिस एवं माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिह्न है।

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 विजय स्तंभ के उपनाम –

  • डॉक्टर गोट्ज – “भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश”
  • उपेंद्रनाथ डे- “विष्णु ध्वजगढ़”
  • फर्ग्यूसन – “रोम के टार्जन के समान”
  • आर.पी. व्यास – “हिंदू प्रतिमा शास्त्र की अनुपम निधि”
  • गोपीनाथ शर्मा – “लोक जीवन का रंगमंच”
  • गौरीशंकर हीराचंद ओझा – “पौराणिक देवताओं का अमूल्य कोष”
  • सीमा राठौड़ – “संगीत की भव्य चित्रशाला”

चित्तौड़गढ़ के किले में कुंभ श्याम मंदिर, कुंभस्वामी मंदिर, लक्ष्मीनाथ का मन्दिर, मीरा मंदिर, श्रृंगार चँवरी और रामकुंड महाराणा कुम्भा ने बनवाए।

महाराणा कुम्भा कालीन संगीत व साहित्य –

कुंभा के काल में संगीत साहित्य एवं चित्रकला के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। कुंभा स्वयं अपने समय का एक महान संगीतज्ञ था और कई विद्वानों एवं साहित्यकारों का आश्रयदाता था। ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में पारंगत कुंभा को वेद, स्मृति व मीमांसा का अच्छा ज्ञान था। उसने कई ग्रंथों की रचना की जिसमें संगीत राज, संगीत मीमांसा, सूड प्रबंध प्रमुख हैं। 

संगीत राज की रचना विक्रम संवत 1509 में चित्तौड़गढ़ में की गई थी जिसकी पुष्टि कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति से होती हैं। यह ग्रंथ 5 भागों में बँटा है –

  1. पाठ्य रत्नकोष
  2. गीत रत्नकोष
  3. वाद्य रत्नकोष
  4. नृत्य रत्नकोष
  5. रस रत्नकोष

कामराज रतिसार, सुधा प्रबंध, एकलिंग महात्म्य का प्रथम भाग “राज वर्णन” कुंभा ने लिखा। कुंभा द्वारा “रसिक प्रिया”, “संगीत रत्नाकार” और “चंडी शतक” नामक टीका लिखी गई।

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कुंभा द्वारा लिखे गए नाटक –     

  1. मुरारी संगति – कन्नड़
  2. रस नंदिनी – मेवाड़ी
  3. नंदिनी वृत्ति – मराठी
  4. अतुल्य चातुरी – संस्कृत

महाराणा कुम्भा के दरबारी विद्वान  –

अत्रि – कुम्भा के दरबार का प्रमुख दरबारी विद्वान था। कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति का लेखन इसी को सौंपा गया परंतु इसे पूर्ण उनके पुत्र महेश ने किया।

मंडन – दरबार का दूसरा महत्वपूर्ण विद्वान सूत्रधार मंडन था। यह कुंभलगढ़ दुर्ग का प्रमुख शिल्पी था। मंडन के प्रमुख ग्रंथ –

  • राजवल्लभ – इसके 14 भाग है।
  • राजवल्लभ प्रसाद मंडन – महल निर्माण की जानकारी।
  • देव मूर्ति मंडन – मूर्ति निर्माण की जानकारी।
  • शकुन मंडन –  शकुन शास्त्र की जानकारी।
  • कोदण्ड मंडन – धनुर्विद्या की जानकारी।
  • वास्तु मंडल
  • रूप मंडल
  • नाथा – मण्डन का छोटा भाई। इसने ‘वास्तुमंजरी’ ग्रंथ लिखा।
  • गोविंद – मण्डन का पुत्र। इसने कलानिधि, द्वार दीपिका, उद्धार धोरिणी ग्रंथ लिखा।
  • हीरानंद मुनि – कुंभा के गुरु। कुंभा ने इन्हें ‘कविराजा’ की उपाधि दी।
  • कुंभा के दरबार में जैन विद्वान –  सोम सुंदर, मुनी सुंदर, जयचंद सूरी, सुंदर सूरी, सोम देव।

चित्रकला की दृष्टि से भी यह युग बड़ा ही महत्वपूर्ण था। सुपासनाह-चरित्रम चित्रित ग्रंथ महाराणा कुंभा के काल की देन हैं। इसमें स्वर्ण स्याही का प्रचुर प्रयोग किया गया हैं। निस्संदेह कुंभा के शासनकाल में सांस्कृतिक क्षेत्र में मेवाड़ ने चहुंमुखी उन्नति की।

महाराणा कुम्भा की उपाधियां  –

  • अभिनव भरताचार्य – संगीत के ज्ञाता होने के कारण।
  • राणों रासौ – साहित्यकारों के आश्रयदाता होने के कारण।
  • हिंदू सुरतान –  मुस्लिम शासकों द्वारा दी गई उपाधि।
  • नव्य भारत – कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति में कहा गया।
  • हाल गुरु , छाप गुरु, दान गुरु, राजगुरु, परम गुरु, शैल गुरु, नंदीश्वर अवतार, प्रजा पालक।

महाराणा कुम्भा की मृत्यु  –

ऐसे वीर, प्रतापी, विद्वान महाराणा का अंत बहुत दुःखद हुआ। अपने अंतिम समय में नहीं उन्माद रोग हो गया था जिसके चलते उनके पुत्र उदा (उदयकरण सिंह) ने 1468 ई. में उनकी हत्या कर दी और स्वयं मेवाड़ के सिहांसन पर आसीन हो गया। गोपीनाथ शर्मा के अनुसार “कुंभा की मृत्यु केवल उसकी जीवन लीला की समाप्ति नहीं थी, वरन यह संपूर्ण कला, साहित्य, शौर्य की परंपरा में गतिरोध था। कुम्भा के अंत से इस प्रकार की सर्वोतोन्मुखी उन्नति की इतिश्री दिखाई देती है जिसका पुनः आभास महाराणा राज सिंह के काल में फिर से होता हैं।” अद्वितीय विधाओं और प्रतिभाओं के धनी महाराणा कुम्भा ने वास्तव में अपनी युद्ध नीति, कूटनीति, कला-साहित्यप्रियता तथा दूरदर्शिता से मेवाड़ को महाराज्य बना दिया था।

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Special thanks to the Post Author : मीना सोनी, चित्तौड़गढ़

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